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  अनुपस्थित अश्विनी कुमार ‘ सुकरात ’ यह कहानी एक चिंतनशील स्कूल-शिक्षक की है , जो डॉ. भीमराव अंबेडकर और पंडिता रमाबाई के विचारों से प्रेरित होकर विद्यार्थियों को जाति-केंद्रित सोच से विमुख करने की दिशा में काम करता है और इस प्रक्रिया में जाति-उन्मूलन की आधारभूमि निर्मित करता है। कथा की शुरुआत एक स्कूल-कक्षा में उपनाम को लेकर हुए मज़ाक से उत्पन्न जातिगत तकरार से होती है। शिक्षक प्रारंभ में भारतीय संविधान के आधार पर हस्तक्षेप करता है , परंतु इस हस्तक्षेप की सीमाएँ स्पष्ट होने पर वह डॉ. अंबेडकर के विचारों और सामाजिक अध्ययन की ओर उन्मुख होता है। अगले चरण में वह कक्षा को इस प्रकार पुनर्संयोजित करता है कि विद्यार्थी जन्माधारित श्रेष्ठता के दावों की अस्थिरता को समझने लगते हैं , अपने व्यवहार में निहित हिंसा को पहचानते हैं , और अंततः बराबरी , गरिमा तथा बंधुत्व जैसे मूल्यों की ओर उन्मुख होते हैं। ......................................................................................... सुबह की वह घड़ी थी जब स्कूल पूरी तरह जाग तो चुका था , पर पहली घंटी की औपचारिक गंभीरता अभी कक्षाओं...