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प्रिय साथियों, मैं अपनी पुस्तक जिसका शीर्षक है,  “ इंग्लिश मीडियम दैट इज अंग्रेजी राज ”  की एक प्रति आपको भेज रहा हूँ । यह पुस्तक शोध पर आधारित है । इस पुस्तक को लिखने से पूर्व किए गये अध्ययन के दौरान मैंने पाया कि अंग्रेजी भाषा  देश के सभी भागों अर्थात्त उत्तर, दक्षिण पूरब, पश्चिम क्षेत्र के हर कोने के ग्रामीण, कस्बाई, स्लम, निम्न एवं निम्न मध्यम वर्गी आबादी के समक्ष एक बाधा के रूप में खड़ी है ।  भाषा के रूप में अंग्रेजी में अपने आप में कोई बुराई नहीं है ।  पर व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी देश के 95 %  लोगों को मुख्यधारा से काटे रखने का काम ही करती है । ये व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व ही है जिसने लोगों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ भागने को विवश किया है ।   लोगों का अंग्रेजी प्रेम पतंगे और शमा का प्रेम है । पतंगा जानता है कि शमा उसे जला देगी । पर फिर भी वह शमा की तरफ जाता है । इसी प्रकार लोग जानते है कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाली शिक्षा कभी उन्हें आगे बढ़ने  नहीं देगी, फिर भी वे अंग्रेजी माध्यम की तरफ भागते है । परिणाम भी ...
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‘इंग्लिश मीडियम’,   दैट इज ‘अंग्रेजी राज’  :  ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की व्यवस्था पर ‘सांस्कृतिक ठप्पा’ कार्टून (साभार)- आर के लक्ष्मण, टाईमस आफ इंडिया, एनसीइरटी प्रस्तावना भगत सिंह ने कहाँ था, “मुझें विश्वास है कि आने वाले 15-20 सालों में ये गौरे मेरे देश को छोड़ कर जाएगे । पर मुझें डर है कि आज जिन पदों पर ये ‘गौरे अंग्रेज’ विराजमान है, उस पर यदि ‘काले अंग्रेज’ विराजमान हो जाएगे तो हमारी लड़ाई और भी कठीन हो जाएगी ।” भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद “गौरे अंग्रेज” तो चले गये । पर जाते जाते वे सत्ता ‘मैकाले के मानस पुत्रों’ अर्थात “काले अंग्रेजों” को सौप गये । फिर क्या था, सरकार बदली, झंडा बदला, रंगाई-पुताई के साथ राज-व्यवस्था को भी नया रंग रूप मिला, पर राजसत्ता का ढ़ाचा नहीं बदला । जी हाँ ! राजसत्ता का स्वरूप वही का वही रहा । एक तरिका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज तीस-चालीस करोड़ अविभाजित हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे । यह तंत्र ही विरासत के रूप में काले अंग्रेजों को प्राप्त हुआ ।  26 जनवरी 1950 में लागू हुए संविध...