अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र
इस देश में एक व्यक्ति ने व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए न कोई पत्थरबाजी की , न हिंसात्मक आन्दोलन ही किया और तो और कोई धरना भी नहीं दिया। व्यक्ति बुद्धिजीवी तो था, पर अफसोस, वह चरणदास नहीं था। उसने लेख लिखा। “ लेख लिखा ? तो कौन सा अनोखा काम कर दिया। हर रोज सैकड़ों पत्र पत्रिकाओं में हजारों लेख छपते है। “ पर, 25 अगस्त , 2019 को जनसत्ता में कौशलेंद्र प्रपन्ना का छपा लेख ‘ शिक्षा : न पढ़ा पाने की कसक ’ उसकी जिन्दगी का अंतिम लेख साबित हुआ। उस लेख में व्यवस्था की तारिफ में यदि दोचार कसीदे लिख दिया होता तो, शायद उसे 5 सितम्बर, 2019 को कोई शिक्षक अवार्ड (पुरस्कार) ही मिल जाता। “तो क्या उससे इतनी भी ‘ चरणदासी ’ नहीं हुई ?” अरे कहा न , वह कोई चरणदास था नहीं, वह तो था सत्य का पुजारी उसने न हिंसात्मक कार्यवाही की, न पत्थरबाजी की, न तथाकथित तौर पर देश द्रोही कहलाने वाले नारे ही लगाए, उस दुसाहसी ने बस व्यवस्था के भ्रष्टातार की पोल खोलने वाला एक लेख भर लिखा। “ अरे ! इसमें दुसाहसी की क्या बात है ? हजारों लेख छपते है, जिसमें सामान्यकृत (जरनलाइजड) तौर पर पर सरकार की आलोचना होती रहती है। ...