व्यवस्था का बोझ बच्चों के सर भाग-1 साथियों, भगत सिंह ने कहा था , “ मुझे विश्वास है कि आने वाले 15-20 सालों में ये गोरे मेरे देश को छोड़ कर जाएंगे। पर मुझे डर है कि आज जिन पदों पर ये ‘ गोरे अंग्रेज ’ विराजमान हैं , उस पर यदि ‘ काले अंग्रेज ’ विराजमान हो जाएंगे तो हमारी लड़ाई और भी कठिन हो जाएगी। ” भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद ‘ गोरे अंग्रेज ’ तो चले गये। पर जाते जाते वे सत्ता ‘ मैकाले के मानस पुत्रों ’ अर्थात ‘ काले अंग्रेजों ’ को सौंप गये। फिर क्या था , सरकार बदली , झंडा बदला , रंगाई - पुताई के साथ राज - व्यवस्था को भी नया रंग रूप मिला , पर राजसत्ता का ढाँचा नहीं बदला। जी हाँ ! राजसत्ता का स्वरूप वही का वही रहा। एक तरीका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज तीस - चालीस करोड़ अविभाजित हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे। यह तंत्र ही विरासत के रूप में काले अंग्रेजों को प्राप्त हुआ। अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में अंग्रेजीयत का वर्चस्व अंग्रेजों द्वारा राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये के सहभागी दलाल वर्ग का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा है । 200 साल के अंग्...
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- जनभाषा में सबको मिले ये अधिकार, समान- सार्थक शिक्षा , न्याय और रोजगार- शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त करके. परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक शिक्षा , न्याय और रोजगार व्यवस्था को संभव बनाने हेतू संविधान के अनुच्छेद 348 , 343(1) & ( 2) , 351 , 147 में व्यापक संशोधन की मांग को लेकर लिखा खुला पत्र / ज्ञापन अश्विनी कुमार ' सुकरात ' अध्यक्ष जनभाषा जनशिक्षा अधिकार मंच , नई दिल्ली 1 6 /02/201 5 सेवा में , माननीय राष्ट्रपति महोदय, राष्ट्रपति भवन, दिल्ली 110001 (भारत) खुला पत्र / ज्ञापन विषय :- शिक्षा को अंग्रेजी माध्यम के बोझ से मुक्त करके. परिवेश की भाषाओं में केजी से पीजी/पीएच़डी तक समान-सार्थक शिक्षा , न्याय और रोजगार व्यवस्था को संभव बनाने हेतू संविधान के अनुच्छेद 348 , 343(1) & ( 2) , 351 , 147 में व्यापक संशोधन की मांग । महोदय, श्रीमान, इस विषय पर मेरे द्वारा माननीय राष्ट्रपति,माननीय प्रधानमंत्री एवं संसद लिखा गया ये छठा पत्र है । प्रधानमंत्री कार्यालय ने मेरे दूसरे पत्र को मानव संसाधन मंत्राल...
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विश्व भाषा का मिथक एवं लोकतंत्र लोकतंत्र में शासन में जनता की सहभागिता तभी आ सकती है जब शासन व्यवस्था जन-भाषाओं में संचालित हो। इंग्लैड़ समेत सम्पूर्ण यूरोप में लोकतंत्र के विकास के साथ वहाँ की जनभाषाएं शासन प्रशासन और शिक्षा का हिस्सा बनी। युरोप में भी जब आम जन ने प्रोटेस्टेंट मूवमेंट के द्वारा न केवल चर्च अपितु सत्ता के अन्य स्तंभों पर भी अपनी दावेदारी ठोकी , तब ही लेटीन के स्थान पर आम जन की भाषा चर्च के साथ साथ शासन प्रशासन का भी हिस्सा बनी। जब जनसाधारण ने ज्ञान की सत्ता पर अपनी दावेदारी ठोकी, तब ही आम जन की भाषा शिक्षा का माध्यम भी बन पायी। स्वयं इंग्लेंड में कुलियों की भाषा समझें जाने वाली ‘ अंग्रेजी ’ जन आन्दोलनों की बदौलत ही मुख्यधारा में आयी। युरोप के मध्य काल के अंध युग का अंत स्वभाषा पोषित ज्ञान की बदौलत ही संभव हो सका। या यु कहे पुनर्जागरण काल जन भाषाओं में ज्ञान विज्ञान के प्रसार की बदौलत ही संभव हुआ। स्पष्ट है कि युरोप की तमाम जन क्रांतियाँ तब ही संभव हो पाई जब ज्ञान विज्ञान जन की भाषा में प्रतिस्फुटित हुआ । भारत में कहने के लिए लोकतंत्र है । पर ‘ इंग्लिश मीडियम सिस्...