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Showing posts from 2020

जनता सचेत हो, तुम्हेँ दरकिनार करने वाले नेताओं को दर्किनार करों!

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जो लोग चुनाव के वक्त हाथ जोड़कर, वोट मांगने आते थे, किसी को माँ, किसी को बहन, किसी को बाबूजी कहते थे, वे चुनाव के बाद, और संकट की इस घड़ी में, क्यों नहीं देखने आये कि उनकों वोट देने वाले, उनके तथाकथित माँ, बाबूजी, बहन, भाईयों और उनके बच्चों, ने खाना खाया या नहीं, क्या जनता के इन तथाकथित पुत्रों/पुत्रियों(नेताओं), को जनता ने वोट देकर, नेता इसी दिन के लिए बनाया था? कि मुसीबत की घड़ी में, जब घर-घर में कनस्तर खाली है, बच्चे दाने-दाने को मोहताज है, घर के कमाऊ के पास रोजगार नहीं है, न किराये के पैसे, न स्कूल की फीस का इंतजाम, जनता जलालत झेलने को विवश है, तो, वोट मांगने आये उनके नेता मुंह छूपा कर बैठ जाएं हैं। या गायब हो जाएं हैं, ठीक उसी तरह जैसे गधे के सर पर सींग, और फिर ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे अब, लेकर फिरते रहो दूरबीन, ऐसे नेताओं और उनकी पार्टियों को जनता को तत्काल चलता करें, पर, नेताओं और उनके लगूओं भगूओं को, फिर कभी अपनी गली, अपने मुहल्ले,अपने इलाकों में, घुसने न दे। पर, इन नेताओं को भी मालूम है, जनता ...

प्रवासी मजदूर या विस्थापित मज़दूर : क्या कहना उचित होगा?

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गांव और कस्बों एक क्षेत्र में बेहतर रोजगार , शिक्षा आदि ना होने की वजह से जब लोग , गांव-कस्बों से ऐच्छिक तौर पर शहर-महानगर या दूसरे क्षेत्र में आते है , तब   प्रवजन करने वाले लोग प्रवासी कहलाते हैं। परन्तु , शहर-महानगर या दूसरे क्षेत्र में कोई स्थाई ठिकाना , स्थाई रोजगार ना होने और शहर का जीवन यापन लागत वहन न कर पाने की स्थिति में , अब इस करोना महामारी की वजह से , जब लोग महानगरों से आपने गांव और कस्बों में वापस जा रहे हैं तो , अब वे प्रवजित प्रवासी नहीं , विस्थापित ही कहलाएंगे। प्रवास एक ऐच्छिक क्रिया है और बेहतर संभावना की तलाश में होती है। जबकि विस्थापन अनैच्छिक और कोई और विकल्प न रह जाने की स्थिति में , मजबूरी वश उठाया गया कदम मात्र। अब सवाल उठता है, क्या वापस जाते लोगों के पास वापस जाने के अलावा और कोई विकल्प है ​? यदि, नहीं तब ही वे जा रहे है। तो यह प्रवर्जन / प्रवास नहीं विस्थापन ही है।   ​ ​ प्रवजन के पीछे भी   नीतिगत खामियाँ हो सकती है। पर, प्रवजन हमेशा एक बेहतर विकल्प की संभावना से वहां हो सकता है, जहाँ बेहतर विकल्प उपलब्ध हो। जैसे आम गा...

महामारी कानून 1897, आपदा प्रबंधन कानून 2005 और महामारी रोकने का तरीका

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महामारी कानून 1897  सरकार को यह आदेश देता है कि कोई भी व्यक्ति ऐसे इलाके से दूसरे इलाके प्रवेश नहीं कर सकता जहां महामारी फैली हुई है। यदि आता है तो उसी स्थिति में उसे सरकार की निगरानी में 14 से 21 दिनों तक के लिए एकांतवास अर्थात, क्वॉरेंटाइन में रहना पड़ेगा। यह बात जितना देश कि एक कोने से दूसरे कोने जाने वाले लोगों पर लागू होती है उतना ही विदेशों से आने वाले लोगों पर भी। देश में महामारी समुदायिक संचार स्थिति तक नहीं पहुंची थी इसके बावजूद भी देश के लोगों को आपने रेल और बस रोककर जहां थे वहीं अपनी तरफ से स्टैचू कर दिया। परंतु विदेश से आने वाले लोगों को लाने के लिए आप विशेष विमान और जलयान भेज रहे हैं यह कहां तक न्याय है? जबकि 30 जनवरी को ही वर्ल्ड हेल्थ इमरजेंसी डिक्लेअर कर दी गई थी। इसका सीधा अर्थ है विश्व में महामारी अपने पांव पसार रही है। अपने अपने क्षेत्र में आने वाले लोगों का क्वॉरेंटाइन अर्थात एकांतवास निश्चित करो। पर इस दिशा में कोई कदम आपने नहीं उठाया। पहले भी इसी दौरान विदेशों से लोग आए और एकांतवास की जगह ट्रंप के हेलो इंडिया कार्यक्रम में शामिल हुए, बिजनेस और पार्टियों क...