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विश्वविद्यालय एवं कॉलेज में खाली पड़े रिक्त पदों की भर्ती की प्रक्रिया के संदर्भ में माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री को खुला पत्र / ज्ञापन

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सेवा में , 1.      माननीय राष्ट्रपति महोदय , राष्ट्रपति भवन , भारत सरकार, नई   दिल्ली । 2.      माननीय प्रधानमंत्री महोदय , प्रधानमंत्री कार्यालय , साऊथ ब्लाक ,             नई दिल्ली। 3.      कैबिनेट , कैबिनेट सचिवालय , भारत सरकार, नई दिल्ली। 4.      माननीय मानव संसाधन मंत्री, भारत सरकार, दिल्ली। 5.      माननीय सांसद, लोकसभा, दिल्ली। 6.      माननीय सांसद, राज्यसभा, दिल्ली। 7.      माननीय मुख्य मंत्री , राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली , नई दिल्ली । खुला पत्र / ज्ञापन विषय :-   विश्वविद्यालय एवं कॉलेज में खाली पड़े रिक्त पदों की भर्ती की प्रक्रिया के संदर्भ में :-        i.             केन्द्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों एवं कालेजों में सहायक प्रोफेसर स्तर पर नियुक्ति हेतू साक्ष...

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र

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इस देश में एक व्यक्ति ने व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए न कोई पत्थरबाजी की , न हिंसात्मक आन्दोलन ही किया और तो और कोई धरना भी नहीं दिया। व्यक्ति बुद्धिजीवी तो था, पर अफसोस, वह चरणदास नहीं था। उसने लेख लिखा। “ लेख लिखा ? तो कौन सा अनोखा काम कर दिया। हर रोज सैकड़ों पत्र पत्रिकाओं में हजारों लेख छपते है। “ पर, 25 अगस्त , 2019 को जनसत्ता में कौशलेंद्र प्रपन्ना का छपा लेख ‘ शिक्षा : न पढ़ा पाने की कसक ’ उसकी जिन्दगी का अंतिम लेख साबित हुआ। उस लेख में व्यवस्था की तारिफ में यदि दोचार कसीदे लिख दिया होता तो, शायद उसे 5 सितम्बर, 2019 को कोई शिक्षक अवार्ड (पुरस्कार) ही मिल जाता। “तो क्या उससे इतनी भी ‘ चरणदासी ’ नहीं हुई ?” अरे कहा न , वह कोई चरणदास था नहीं, वह तो था सत्य का पुजारी उसने न हिंसात्मक कार्यवाही की, न पत्थरबाजी की, न तथाकथित तौर पर देश द्रोही कहलाने वाले नारे ही लगाए, उस दुसाहसी ने बस व्यवस्था के भ्रष्टातार की पोल खोलने वाला एक लेख भर लिखा। “ अरे ! इसमें दुसाहसी की क्या बात है ? हजारों लेख छपते है, जिसमें सामान्यकृत (जरनलाइजड) तौर पर पर सरकार की आलोचना होती रहती है। ...