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Showing posts from June, 2017

प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए है..’आरक्षण’ की व्यवस्था । मनुवादी-ब्राह्मणवर्चस्ववादी व्यवस्था से उपजी समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही है 'आरक्षण' की व्यवस्था...

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प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए है.. ’ आरक्षण ’ की व्यवस्था मनुवादी - ब्राह्मणवर्चस्ववादी व्यवस्था से उपजी समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही है ' आरक्षण ' की व्यवस्था... ब्राह्मणवादी व्यवस्था से उपजी समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही ' आरक्षण ' की वर्तमान व्यवस्था है। आरक्षण आर्थिक नहीं समाजिक गैरबराबरी समाप्त करने का व्यवस्थागत प्रयास भर है। समाज के हर तबके का व्यवस्था में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए। आज आरक्षण को लेकर पक्ष विपक्ष आमने सामने है। ना ना तरिके से इस मुद्दे पर भटकाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इसका फायदा आर्थिक रूप से कमजोर समाज के नीचले तबके तक नहीं पहुंच पाया है। परंतु आरक्षण की व्यवस्था ने जिस प्रतिवाद को जन्म दिया, उस प्रतिवाद से इंकार नहीं किया जा सकता है। वह वाद है जन्म के आधार पर समाजिक रूप से श्रेष्ठता के आरक्षण का । आज, आरक्षण के माध्यम से समाज के एक तबके को ऊपर उठाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योकि भारतीय समाज में एक बड़े तबके को जन्म के आधार पर अछूत माना जाता रहा है । क्यों पिछले 5000 सालों से, कर...

गांधी मार्ग सॆ ही कामरेड जनता के बीच पहूंच सकते हैॆ।

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  जमीनी हकीकत से कहीं दूर,  कमरेड साहब! समझने में असफल रहे कि समाज की जमीनी हकीकत क्या है?  उस दौर में जिस दौर में कांग्रेस चंद सम्मानित लोगों तक ही सीमित थी,  उस दौर में गांधी आए और  समाज के सबसे निचले क्रम  में  घुसपैठ कर गए।  यदि भगत सिंह को छोड़ दिया जाए तो आज तक कोई भी कामरेड नेता  समाज के निचले क्रम को अपने साथ नहीं ले पाय़ा है। कॉमरेड कामरेड महज़ बौद्धिक जुगाली तक ही सीमटे रहे।  और दक्षिणपंथी  संघी  जन्म मुद्दों को उठाकर,  अपने साथ बहा ले गये।  कामरेडों को जनता के साथ  कैसे जुड़ना है यह सीखना है तो उन्हें RSS की कार्यप्रणाली का अध्यन करना होगा।  गांधी की अहिंसा का मार्ग ही वह रास्ता है, जिस पर चलकर आज राजसत्ता से मुकाबला किया जा सकता है।  वरना वरना आप सबको खत्म करने के लिए राजसत्ता के पास अच्छा असला बारुद है।  और सबसे बड़ी बात,  पूंजी पतियों का संरक्षण करने वाली इस राजसत्ता को  आप सब आप से मुकाबला करने के लिए आपकी बिरादरी के लोगों  को ही सेना और अर्धसैनिक बलों  में भर्त...

क्या वामपंथी और कम्युनिस्ट देश द्रोही है?

एक हमारे फेसबुकिया साथी है , जो हमपर लगातार बेतूके आरोप लगाते रहते है। जब आरोप लगाने के लिए कुछ नहीं मिलता तो वामपंथी या कम्युनिस्ट लिख दते है। मुझें मालूम नहीं कि उन्हे कम्युनिस्ट शब्द का अर्थ भी मालूम है या नहीं। मुझे नहीं मालूम कि वामपंथ के इतिहास की उनको कितनी जानकारी है और उसको वामपंथ और कम्युनिजम में फर्क भी मालूम है या नहीं ? कम्युनिजम की कितनी धाराए प्रचलित है इसकी कितनी समझ है , यह भी नहीं मालूम। शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण और भाषा के स्थानीयकरण की मांग पहले किसकी रही...इस संदर्भ में ऐतिहासिक जानकारी भी शायद ही उठाने की जहमत शायद ही की हो।वैसे तथ्यात्मक आलोचना के ना किसने रोका है। पर यदि आप वर्तमान व्यवस्था के किसी भी पहलू की आलोचना कर रहे हो , तो आप या तो वामपंथी या कम्युनिस्ट है ? और पता नहीं किस आधार पर संकल्पना गढ़ी है कि वामपंथी और कम्युनिस्ट देश द्रोही है। इसलिए शिक्षा , स्वास्थ्य , भाषा व्यवस्था , आवास , न्यायव्यवस्था किसी भी पहलू पर आलोचना करो तो आप देश द्रोही हो। मैं जानना चाहता हूँ क्या आज वामपंथियों की वजह से रोजगार दर 1% से नीचे यहा तक की संगठित क...