ईद , रामनवमी , फाग सभी , खुशियों की मुस्कान , गुरुपर्व , बड़ादिन साथ कहें , मिलकर रहो इंसान। मिलकर सारे पर्व मनाएँ , जुड़े दिल और जान , भेदभाव से नाता टूटे , यही सच्ची पहचान। नफ़रती सियासत छोड़े , जोड़े दिल और जान , इंसानियत मज़हब जाने , वही सच्चा इंसान। मंदिर मस्जिद पीछे छूटें , दिल होवे पहचान , रूह से रूह जो मिल जावे , वही सच्चा ईमान। जात धरम की गाँठ जो खोले , टूटे झूठा मान , दर्द पराया अपना माने , होवे सब पर मेहरबान। खाल के नीचे, सब एक से, तो काहे का गुमान जात-धर्म में क्या रखा है, इंसानियत बने पहचान नफ़रत वाली आग बुझा दे , दोस्ती का ऐलान , स्नेह का बंधन ऐसा , बस रह जावे सब इंसान॥ यार ना होवे हिंदू , ना होवे मुसलमान , स्नेह का बंधन ऐसा , बस रह जावे इंसान। ना कोई होवे हिंदू , ना कोई होवे मुसलमान , स्नेह का बंधन बंध , बस रह जावे इंसान। अश्विनी कुमार सुकरात