नेहरू
पार्क में एक सवाल
नेहरू पार्क में,
लेनिन की मूर्ति के साथ,
सेल्फी लेते-लेते
मेरे शागिर्दों ने मुझसे पूछी यह बात।
समाजवाद का वह दौर भला
आख़िर कब आएगा,
जब न कोई ग़रीब रहेगा,
न कोई अमीर कहलाएगा।
या समाजवाद, साम्यवाद की बातें
क्या सिर्फ़ दिखावा थीं,
सर्वहारा वर्ग की मुक्ति
क्या केवल छलावा थीं।
साम्यवाद क्या नहीं,
चंद हुक्मरानों का फ़तवा है,
जहाँ विरोधी होने भर से
आदमी का क़त्ल पक्का है।
उत्तर कोरिया में चलता
किम ख़ानदान का राज है,
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी
लाल परचम का यही साज़ है।
नाम साम्यवाद का है, लेकिन
रुख़ सामंतवाद से भी कड़ा,
मुखौटा समाजवाद का ओढ़े
चीन साम्राज्यवाद की ओर बढ़ा।
उसकी विस्तारवादी नीति से
कौन-सा देश है, बचा भला।
स्टालिन के दौर में भी
हर असहमति पर पहरा था,
कानाफूसी तक जुर्म ठहरी,
मौत का साया गहरा था।
फिर क्या ऐसा निज़ाम भी
इंसाफ़ का पैग़ाम कहलाएगा,
या साम्यवाद के नाम तले
बस शोषण-दमन का जाम पिलाएगा।
चिंता बड़ी वाजिब थी,
जिज्ञासा में कोई साज़िश न थी,
जो देखा, जो समझा, वही कहा,
न कुछ मोल लिया, न रटा-रटाया पढ़ा।
मैंने उन जिज्ञासुओं को
फिर कुछ यूँ जवाब दिया,
समाजवाद के नाम भर से
हर राज समाजवाद नहीं हुआ।
एक परिवार का राज अगर हो,
या चंद जनों का इख़्तियार,
समता की चादर ओढ़ लेने से
जन का नहीं हो जाता संसार।
एक देश में समाजवाद का नारा,
बाक़ी दुनिया में साम्राज्य का विस्तार,
यह भी समाजवाद, साम्यवाद नहीं,
यह ताक़त का बस नया व्यापार।
अगर हुक्म किसी एक का हो,
और विरोध पर हो, अत्याचार,
तो नाम भले समाजवाद रहे,
वह शोषणकारी साम्राज्यवाद का ताज।
चेहरा बदल जाने भर से
राज बदला नहीं करता,
लाल झंडा थाम लेने से
अन्याय पिघला नहीं करता।
जिज्ञासुओ, यह जान लो,
समाजवाद वह होगा जहाँ
धन से पहले, सोचने की भी
बेरोक-टोक हो, बराबरी ।
न धन का फ़र्क़, न जात का
दंभ,
न मज़हब का ही कोई दबाव।
फ़ैसले मिलकर लिए जाएँ,
न हो कोई भेदभाव,
मौक़ा सबको बराबर मिले,
ऊँच-नीच में कोई न बटे,
रोटी भी हो, इज़्ज़त भी हो,
और सोच का दरवाज़ा भी खुला।
विचार की पूरी आज़ादी हो,
सवाल उठाना जुर्म न हो,
मुख़ालिफ़ का सम्मान बचे,
विरोधियों पर कोई ज़ुल्म न हो।
जहाँ बहस से बात खुले,
न गोली से हर जवाब मिले,
जहाँ इंसान निज़ाम से ऊँचा हो,
और अवाम ही निज़ाम हो।
नेहरू पार्क में,
लेनिन की मूर्ति के साथ,
एक सवाल अब भी गूँज रहा है,
निज़ाम बड़ा या इंसान की बात।
साम्राज्यवादी तानाशाही में
कैसा भला समाजवाद।
✍️अश्विनी कुमार 'सुकरात'




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