ईद, रामनवमी,
फाग सभी, खुशियों की मुस्कान,
गुरुपर्व, बड़ादिन
साथ कहें, मिलकर रहो इंसान।
मिलकर
सारे पर्व मनाएँ,
जुड़े दिल और जान,
भेदभाव से नाता
टूटे,
यही सच्ची पहचान।
नफ़रती
सियासत छोड़े,
जोड़े दिल और जान,
इंसानियत मज़हब
जाने,
वही सच्चा इंसान।
मंदिर
मस्जिद पीछे छूटें,
दिल होवे पहचान,
रूह से रूह जो
मिल जावे,
वही सच्चा ईमान।
जात
धरम की गाँठ जो खोले, टूटे झूठा मान,
दर्द पराया
अपना माने,
होवे सब पर मेहरबान।
खाल
के नीचे, सब एक से, तो काहे का गुमान
जात-धर्म में
क्या रखा है, इंसानियत बने पहचान
नफ़रत
वाली आग बुझा दे,
दोस्ती का ऐलान,
स्नेह का बंधन
ऐसा,
बस रह जावे सब इंसान॥
यार ना होवे हिंदू, ना होवे मुसलमान,
स्नेह का बंधन ऐसा, बस रह जावे इंसान।
ना
कोई होवे हिंदू,
ना कोई होवे मुसलमान,
स्नेह का बंधन बंध, बस रह
जावे इंसान।

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