नेहरू पार्क में एक सवाल नेहरू पार्क में , लेनिन की मूर्ति के साथ , सेल्फी लेते-लेते मेरे शागिर्दों ने मुझसे पूछी यह बात। समाजवाद का वह दौर भला आख़िर कब आएगा , जब न कोई ग़रीब रहेगा , न कोई अमीर कहलाएगा। या समाजवाद , साम्यवाद की बातें क्या सिर्फ़ दिखावा थीं , सर्वहारा वर्ग की मुक्ति क्या केवल छलावा थीं। साम्यवाद क्या नहीं, चंद हुक्मरानों का फ़तवा है , जहाँ विरोधी होने भर से आदमी का क़त्ल पक्का है। उत्तर कोरिया में चलता किम ख़ानदान का राज है , चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी लाल परचम का यही साज़ है। नाम साम्यवाद का है , लेकिन रुख़ सामंतवाद से भी कड़ा , मुखौटा समाजवाद का ओढ़े चीन साम्राज्यवाद की ओर बढ़ा। उसकी विस्तारवादी नीति से कौन-सा देश है, बचा भला। स्टालिन के दौर में भी हर असहमति पर पहरा था , कानाफूसी तक जुर्म ठहरी , मौत का साया गहरा था। फिर क्या ऐसा निज़ाम भी इंसाफ़ का पैग़ाम कहलाएगा , या साम्यवाद के नाम तले बस शोषण-दमन का जाम पिलाएगा। चिंता बड़ी वाजिब थी , जिज्ञासा में कोई साज़िश न थी , जो देखा , जो समझा , वही कहा , न कुछ मोल लिया , न रटा-रटाया पढ़ा। मैंन...
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