अंग्रेजी माध्यम राज व्यवस्था का परिणाम - अंग्रेजी माध्यम विद्यालय


जब तक जन भाषाओं का प्रयोग शासन, प्रशासन तथा उच्च शिक्षा के श्रेष्ठ माने जाने वाले संस्थानों में नहीं होगा, तब तक स्कूली शिक्षा का माध्यम साँस्कृतिक परिवेश के अनुरूप भी नहीं होगा। अतः बेहतर यह होगा की स्कूली शिक्षण को सुधारने के बजाए उच्च शिक्षण के तथाकथित सर्वश्रेष्ठ संस्थानों, नौकरियों  एवं उच्च शिक्षण संस्थाओं की परीक्षाओं का आयोजन करने वाली एजेंसियों जैसे यूपीएससी, एसएससी, राज्य-पीसीएस, IIM-CAT आदि इसके अतिरिक्त सत्ता के तमाम दूसरे केन्द्र जैसे सम्पूर्ण विधायिका, कार्यपालिका, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के ढाँचे में भी क्रांतिकारी परिवर्तन किए जाने की ज़रूरत है। जब तक इन संस्थाओं के ढांचे को संस्कृति की भाषा (क्षेत्रीय भाषाओं) के अनुरूप नहीं बनाया जायेगा, तब तक लोग उच्च शिक्षा के माध्मय से बेहतर भविष्य की तलाश की आस में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की तरफ़ भागते ही रहेंगे। अतः प्राथमिक शिक्षा की भाषा को परिवेश के अनुकूल बनाने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि ‘इंग्लिश सिस्टम’ अंग्रेजी छोड़े। सारी समस्या की जड़ इंग्लिश मीडियम सिस्टम में है।

विश्‍लेषण के दौरान निष्कर्ष के रूप में जो तथ्‍य उभर कर आए, उन्हें साँस्कृतिक तत्वों के अनुरूप यहाँ आपके विचारार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है -

 


पहला तत्व निरूपण, साक्ष्य एवं व्यवहार

·    अप्रैल 2012 में राष्‍ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्‍वविद्यालय (न्‍यूइपा / NUEPA) द्वारा प्रो. अरुण सी. मेहता के नेतृत्व में जिला शिक्षा सूचना प्रणाली (डाइस / DISE)  की एक रिपोर्ट 'भारत में प्राथमिक शिक्षा : शिक्षा के सर्वव्‍यापीकरण की दिशा में प्रगति / Elementary Education in India: Progress towards UEE'  प्रकाशित हुई। यह रिपोर्ट प्राथमिक स्कूलों के स्तर पर शिक्षा के सर्वव्‍यापीकरण के संदर्भ में किये गए शोध-सर्वे पर आधारित थी। न्‍यूइपा / NUEPA की रिपोर्ट में दिए गए तथ्‍यों की क्रॉस-जाँच के दौरान शोधकर्ता ने भी पाया कि लोगों का झुकाव तेजी से अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की तरफ़ बढ़ा है। शोधकर्ता ने पाया कि इस क्षेत्र में पलायन की यह दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। महज़ अनुसन्धान इलाकों के 10% से 20% बच्‍चे, पूर्ण रूप से गरीब़ वर्ग के ही सरकारी स्कूल में जाते हैं। अतः यह स्थिति पलायन नहीं,  ‘महा पलायन’ को दर्शा रही है। निजी स्कूलों के प्रति बढ़ते झुकाव के पीछे का एक बड़ा कारण शिक्षा और व्यवस्था का अंग्रेजी मीडियमीकरण है।

·    आर्थिक स्थिति में होने वाले परिवर्तन एवं अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के चुनाव में एक धनात्मक सह-सम्बन्ध है। अर्थात् जिस हिसाब से व्‍यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है, उसी हिसाब से वह निजी स्कूल के चुनाव में भी परिवर्तन करता जाता है। परन्तु साथ ही ऐसे भी साक्ष्य भी मिले जिसमें आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के बावजूद भी लोग कर्ज़ लेकर अपने बच्‍चों को अंग्रेजी माध्‍यम वाले सी.बी.एस.ई. से मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में डाल रहे हैं।  सी.बी.एस.ई. शब्द ग्रामीण अंचलों में अंग्रेजी माध्‍यम के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है। आज किसान नहीं चाहता कि उसका बेटा गलती से भी किसान रह जाए।

·    अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के स्तर में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव है। हर तरह से सुविधा-संपन्न स्कूल से लेकर गली के नुक्‍कड़ पर दो कमरों में चलने वाले गैर-मान्यताप्राप्त स्कूल भी शामिल हैं। अतः प्रत्‍येक आर्थिक वर्ग के लिए उसकी आर्थिक हैसियत के अनुरूप स्कूल उपलब्‍ध है। सही मायने में जो अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल है उस तक सिर्फ़ एलिट वर्ग की ही पहुँच है।

·    प्रत्‍येक माता-पिता का सपना, अपनी आर्थिक हैसियत के अनुरूप सबसे बेहतर स्कूल का चुनाव करना है। जो माता पिता अपने बच्‍चे को सम्पन्न वर्ग के समान बेहतर माने जाने वाले हाई-फाई अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों में नहीं डाल पाता, वह अपने बच्‍चे का दाखिला गैर-मान्यताप्राप्त या साधारण माने जाने वाले अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल में करा कर सम्पन्न वर्ग के समतुल्य होने का सुख प्राप्त करता है, या यूँ कहें कि भ्रम मे जीना पसंद करता है।

·    सरकारी स्‍कूलों की स्थिति यह हो गई है कि यहाँ सिर्फ़ निम्‍नतर वर्ग के विद्यार्थी ही बचे हैं। वहीं दूसरी ओर,  निजी स्कूलों की पूरी इमारत अंग्रेजी माध्‍यम की नींव पर टिकी है।

·    लड़कियों के सरकारी स्कूलों की तुलनात्मक स्थिति लड़कों के स्कूलों से बेहतर है। कारण - समाजिक आर्थिक सोच, सुरक्षा या अन्य कारणों से अभी-भी कुछ प्रतिशत संपन्न एवं जागरूक परिवारों की लड़कियाँ सरकारी स्कूलों में जा रही हैं।

·    सरकारी स्कूलों के खस्ता हालत की एक वजह तुलनात्मक रूप से जागरूक परिवार के बच्‍चों का निजी स्कूलों की तरफ़ गमन भी है। क्योंकि जिन माता-पिता के बच्‍चे अब सरकारी स्कूलों में बच गये हैं, वे लोग बेहतर शिक्षा की मांग करने की स्थिति में ही नहीं हैं। यह बात जितनी ग्रामीण अंचलों में लागू होती है उतनी ही शहरी इलाकों में।

·    ऐसे मामले भी देखने को मिले हैं जिनमें आर्थिक फायदे लेने के लिए लोग अपने बच्‍चों का नाम तो सरकारी स्कूल में लिखवा देते हैं पर पढ़ाने के लिए अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में भेजते हैं।

·    सरकारी स्कूलों से निकलने वाला एक तबका निम्‍न स्तर के गैर-मान्यताप्राप्त निजी स्कूलों एवं राज्य बोर्ड से संचालित स्कूलों में जाता है। शेष जो आर्थिक रूप से थोड़ा सम्पन्न वर्ग है अथवा जिन माता-पिता में बच्‍चों की शिक्षा पर थोड़ा-बहुत भी खर्च वहन करने की क्षमता है, वह ही सी.बी.एस.ई. से मान्यता प्राप्त स्कूल में दाख़िला ले पाता है।

·    फरीदाबाद, पलवल, होडल के निजी अंग्रेजी माध्यम सी.बी.एस.ई. से संबद्ध स्कूलों में आने वाले विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों का तथा शहरी निम्न माध्यम वर्गीय परिवारों का भी है। यह स्थिति देश बर की है।

·    इन इलाकों में सी.बी.एस.ई. स्कूल का अर्थ ही होता है- अंग्रेजी माध्यम। हरियाणा राज्य शिक्षा बोर्ड जिसे संक्षेप में लोग हरियाणा बोर्ड ही कहते हैं, का अर्थ होता है – हिंदी माध्यम।  

·    शहरी क्षेत्र के उच्‍च पदों पर कार्यरत उच्‍च-मध्यम वर्गीय परिवारों को छोड़ दें, तो ग्रामीण क्षेत्र या साधारण शहरी मध्यम वर्गीय परिवारों में अंग्रेजी का चलन देखने को नहीं मिलता। ग्रामीण क्षेत्र में धनाड्य वर्ग के परिवारों में भी अंग्रेजी का कहीं कोई  प्रयोग नहीं होता, पर बच्‍चों से अपेक्षा रहती है कि वे अंग्रेजी में बोलें।

·    आमतौर पर अभिभावक अंग्रेजी माध्यम निजी स्कूलों में अपने बच्‍चों को डालता जरूर है पर उसे उन स्कूलों में दी  जाने वाली शिक्षा की कोई समझ ही नहीं है। स्कूली पढ़ाई पूरी तरह उसकी समझ के बाहर है। अतः स्कूल की शिक्षा के बाद अपने बच्‍चों के होम वर्क करवाने के लिए ट्यूशन की व्यवस्था भी उसे करनी पड़ती है।

·     स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थी अपने दिन का 10 से 14 घंटे का समय स्कूल, ट्यूशन, घर से स्कूल आने-जाने के उबाऊ सफर, अतिरिक्‍त कक्षाओं (एक्स्ट्रा क्लास) में गँवाते हैं। गाँव के इलाके में तो रविवार को भी अतिरिक्‍त कक्षाएँ (एक्स्ट्रा क्लास) लगती हैं और परीक्षा के दो महीने पूर्व बिस्तर भी स्कूल में ही लगना शुरू हो जाता है। यह स्थिति दिल्ली फरीदाबाद जैसे बड़े शहरों में उच्‍च मध्यम वर्गीय लोगों के लिए खुले हाई-फाई स्कूलों से भिन्न है जहाँ स्कूल हफ्ते में पाँच ही दिन चलता है।

·    राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ / NCF) 2005  में बच्‍चे की औपचारिक शिक्षा का समन्वय परिवेश की अनौपचारिक शिक्षा एवं काम के साथ करने पर बल दिया गया है। परंतु अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने तो बच्‍चे के परिवेश का ही अतिक्रमण कर लिया है। अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल में जाने वाले किसान के बच्‍चे के पास खेत-खलिहान में जाकर काम करना तो दूर खेतों में जाकर खड़े होने तक का समय नहीं है। निजी अंग्रेजी माध्‍यम स्कूली व्यवस्था ने बच्‍चों के मन में हाथ से किए जाने वाले कामों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण न केवल बढ़ाया है, अपितु पुख़्ता भी किया है। माता-पिता भी यह कहते वक्त गर्व महसूस करते हैं कि - “हम तो अपने बच्‍चों से कुछ भी काम नहीं करवाते, हमने तो उन्‍हें केवल पढ़ाई-लिखाई खातिर खुला छोड़ रखा है।”

·    प्राचार्य, शिक्षक और खुद विद्यार्थियों से मिले साक्ष्यों के अनुसार ग्रामीण, शहरी, मध्यम एवं निम्‍न-मध्यम वर्गीय परिवारों के विद्यार्थी इस अंग्रेजी माध्यम स्कूली व्यवस्था में अंतिम तौर पर महज़ रटते ही रहते हैं। समझने की क्रिया वे अपने परिवेश की भाषा में ही करते हैं। उच्‍च मध्यम वर्ग के स्कूलों में जहाँ प्राचार्य पूर्णतः अंग्रेजी के प्रयोग का दावा करते हैं, वहाँ भी बोर्ड की कक्षाओं में समझने के लिए हिंदी मिश्रित अंग्रेजी (हिंग्लशि/हिंग्रेजी) का प्रयोग ही होता है।

·    चूँकि ‘ट्यूशन’ का माहौल माध्यम (भाषा) को लेकर बहुत ज्यादा संकुचित और कठोर नहीं होता अतः वहाँ बच्‍चे अपने आपको ज्यादा तनाव-मुक्‍त महसूस करते हैं। परंतु ट्यूशन का काम स्कूल द्वारा परोसे जाने वाली किताबों को ही घोल कर पिलाने में सहायता प्रदान करना भर ही है। ट्यूशन की व्यवस्था स्कूलीसमझ के गैप’ को भरने हेतु ही हुई है। परिवेश की साँस्कृतिक बोली-भाषा तथा स्कूल के भाषा-माध्यम में जितना अधिक अंतर/गैप होगा, शिक्षा में समझ का अंतर/गैप भी उतना ही अधिक होगा और  उसी अनुपात में ट्यूशन की व्यवस्था भी पैर पसारेगी।

अब दूसरे बिंदू पर चर्चा करेंगे, अर्थात् वे कौन-से मानदंड (NORMS) हैं जो लोगों को इसके अनुरूप आचरण करने हेतु प्रेरित करते हैं।

Ø    यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि जब बच्‍चा एक बार स्कूल में प्रवेश ले लेता है, तो सिर्फ़ विद्यार्थी ही स्कूल से प्रभावित नहीं होता अपितु उसका सम्पूर्ण परिवार, आस-पड़ोस भी उससे प्रभावित होता है। स्कूल घर के मानदंड तय करना प्रारंभ कर देता है। शहरी मध्यम वर्गीय ही नहीं, निम्‍न-मध्यम वर्गीय परिवारों ने भी अब अपने बच्‍चों से अपनी बोली-भाषा में बात करना तक बंद कर दिया है। कोशिश यह होती है कि परिवार के लोग सभ्य समझे जाने वाली भाषा (अंग्रेजी) का ही प्रयोग करें। गँवारू भाषा का प्रयोग करने वाले नाते-रिश्तेदारों से बच्‍चे को कम ही संपर्क में लाया जाता है क्‍योंकि इससे बच्‍चों को छूत की बीमारी के समान गँवारू भाषाओं से प्रभावित होने का खतरा माना जाता है। बच्‍चों के लिए ऐसे परिवेश की तलाश की जाती है, जहाँ नई स्कूली संस्कृति के अनुरूप भाषा और संस्कृति का प्रयोग होता हो। ऐसे लोगों से बच्‍चों का संपर्क कराया जाता है जो अंग्रेजी में ही बातें करते हों। इस मानसि‍क स्थिति पर किसी ने व्‍यंग्‍य भी किया है कि काश! बी.सी.जी. के टीके के समान अंग्रेजी स्पीकिंग  का भी कोई टीका होता, तो सब कुछ कितना आसान हो जाता।

Ø   अंग्रेजी माध्यम स्कूल में चलाना (पढ़ाना) है तो स्कूल के समय के बाद ट्यूशन की भी व्यवस्था करनी ही होती है।  यह भी लोगों के मानस में बैठा दिया जाता है।

Ø   इन स्कूलों की पढ़ाई करने वाला बच्‍चा अमूमन कम ही घर के काम में हाथ बँटाता है। आजकल अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में अपने बच्‍चों को भेजने वाले माता-पिता के द्वारा कहा जाने वाला आम जुमला है। “ हम तो बच्‍चों से घर का कुछ काम करवाते ही नहीं। पढाई के लिए फ्री छोड़ रखा है, पर फिर भी पढाई ना करे है.... ”  अतः काम और शिक्षा के सम्बन्ध को अंग्रेजी माध्‍यम व्यवस्था ने नकार दिया है। खेत-खलिहानों, कुम्हार की चाक, लुहार की भट्टी ,घर के खूँटे पर बँधी गाय-भैस का इस अंग्रेजी माध्यम वाली स्कूली व्यवस्ता से कोई सम्बन्ध नहीं है। चूँकि ये स्कूल ही शिक्षा व्यवस्था के आदर्श हैं अतः शेष स्कूलों के साथ भी यही प्रवृति जन्म लेती  है। इस प्रकार, अंग्रेजी माध्‍यम की व्यवस्था ने अंग्रेजों के जमाने की 3R की संकल्पना को ही पुख्ता करने का काम किया है और गाँधीजी के 3H की संकल्पना को गर्त में पहुँचा दिया है।

Ø   निजी स्कूलों की तुलनात्मक ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज सरकारी विद्यालय भी अंग्रेजी माध्यम में शिक्षण करा रहे हैं। अंग्रेजी की पुस्तक का बोझ छठी की जगह पहली कक्षा में ही बच्‍चों के माथे डाला जा रहा है। बच्‍चों के ऊपर पड़ा यह बोझ अंग्रेजी के प्रति विकसित नई मानसिकता का ही परिणाम है। दिल्ली विश्वविद्यालय के केन्द्रीय शिक्षण संस्थान का प्रायोगिक स्कूल भी वर्ष 2014-15 के सत्र से अंग्रेजी को पहली कक्षा से ही बच्‍चों के कंधे पर लादने जा रहा है।

Ø   बच्‍चे का स्कूल माता-पिता की हैसियत का प्रतीक है। अतः हर एक अपनी हैसियत के अनुरूप बेहतर स्कूल में अपने बच्‍चे को दाखिला करवाना चाहता है। जैसी जिसकी आर्थिक हैसियत, वैसा उसका स्कूल। अतः बच्‍चे का स्कूल, सिर्फ़ बच्‍चे को शिक्षित करने के लिए ही नहीं है अपितु व्यक्ति/परिवार की समाज में आर्थिक प्रतिष्ठा को दर्शाने के लिए भी है।

अगला बिंदु, विश्‍वास और धारणाओं पर आधारित है -

ª      अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के पीछे भागने के कारण को यदि एक पंक्ति में स्पष्ट करना हो तो भिडूकी गाँव, जिला पलवल, हरियाणा के स्कूल जाने वाले बच्‍चे के शब्दों में कर सकते हैं। “अंग्रेजी माध्‍यम में पढने से अंग्रेजी बोलनी आ जाती है।” और अंग्रेजी बोलने से क्या फायदा होता है, “ हम कहीं भी जॉब कर सकते हैं, आगे पढ़ सकते हैं।”

ª     विद्यार्थियों एवं उनके माता-पिता में मिथ्‍या विश्वास गढ़ चुका है कि बिना अंग्रेजी के ना तो उच्‍च शिक्षा के श्रेष्ठ संस्थानों (आईआईटी, आईआईएम्, दिल्ली विश्वविद्यालय आदि) में अध्ययन किया जा सकता है, ना ही अच्छी नौकरियाँ पाई जा सकती हैं, ना ही दुनिया के किसी दूसरे कोने में “सर्वाइव” ही किया जा सकता है। यहाँ तक कि  बिना अंग्रेजी के सहारे देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाना भी संभव नहीं।

ª     इस धारणा का ठोस आधार माता-पिता, भाई-बहन, आस-पड़ोस वालों के व्यक्तिगत एवं सामूहिक अनुभव ही नहीं, अपितु ऐसे लोगों के अनुभव भी शामिल हैं जिनसे उनका कोई व्यक्तिगत जुड़ाव नहीं है। दूसरों के मुँह से सुनी बातें, बेशक वो बढ़ा-चढ़ा कर ही क्यों ना बताई गई हों, गहरा असर डालती हैं। इसके अतिरिक्‍त, अखबार-मीडिया आदि से प्रसारित होने वाली खबरें एवं कार्यक्रम आदि, मुँहबोली कहानियाँ, सामाजिक विश्‍लेषण के साथ धारणाओं एवं मान्यताओं को और दृढ़ता प्रदान करने का कार्य करती हैं। इन सब का स्रोत उच्‍च शिक्षा, उच्‍च संस्थानों, जैसे- सुप्रीमकोर्ट, नौकरशाही, यू्पीएससी आदि से हासिल होता है। बेशक ये सभी मिथ ही हो, पर इनका भी मानसिक प्रभाव होता ही है।  

ª     सबसे बड़ा कारक, जो मीडिया का ‘बड़बोला मुँह’ है, उसके ऊपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। एक कान से दूसरे कान होते हुए सामाजिक धारणाओं एवं विश्‍वासों की नींव इससे भी आकार लेती है और पुख्ता होती है। इस व्यवस्था में सफल होने वाला प्रत्‍येक व्यक्ति, अपने आप को शासक वर्ग के साँस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करने वाले एजेंट के रूप में काम करता है।

इन भाषाई मूल्यों के स्रोत क्या हैं? आइए, इस पर कुछ चर्चा करें-

«     इन साँस्कृतिक मूल्यों के स्रोत सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के गर्भ में छुपे हैं। प्रोमेश आचार्य अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि अंग्रेजी भाषा के प्रति क्रेज आजादी के बाद के वर्षों में तेजी से तब बढ़ा, जब सरकारी नौकरियों के दरवाजे आम भारतीयों के लिए खोल दिए गए, अर्थात् औपचारिक शिक्षा तथा नौकरी का प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। लोग इसलिए अंग्रेजी के पीछे नहीं भाग रहे कि उन्हें अंग्रेजी भाषा ज्ञान की कुंजी लगती है। उनकी रुचि उस भाषा को जानने के बाद मिलने वाले आर्थिक सामाजिक फायदे में है।

«     जैसा कि एक पिता ने कहा “आखिर बच्‍चों को कॉम्पीटीशन में भी तो रखना है। आज की डेट में हायर एजुकेशन के लिए अंग्रेजी तो मस्ट है।”  यह मूल्य ठोस रूप से उच्‍च शिक्षा के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता से पनपता है।

«     सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता यह मूल्य पैदा करती है कि अंग्रेजी सीख कर ही सरकारी नौकरियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। परीक्षा चाहे यूपीएससी की हो, या पीसीएस, डीएसएसएसबी की हर जगह अंग्रेजी की अनिवार्यता बनाई गई है।  ये कुछ ठोस मान्यताएँ हैं जो ठोस भाषाई मूल्यों की नींव रखती हैं।

«     जब लोग ऊँचे ओहदों पर आसीन लोगों को अंग्रेजी का प्रयोग करते हुए देखते हैं, तो खुद भी उनके अनुरूप बनने की इच्छा से उसके प्रयोग की लालसा करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी का प्रयोग कर वे भी उन जैसे हो जाएँगे। ये मूल्य ‘साँस्कृतिकरण’ की प्रक्रिया को उच्‍च वर्ग के लोगों के अनुरूप बनाते हैं।

«     सवाल यह उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि पिछले दस वर्ष में इसमें एकाएक उछल आया। यहाँ तक कि लोगों ने कर्ज लेकर भी अपने बच्‍चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिला कराना शुरू कर दिया। इसका कारण अर्थव्यवस्था में हुआ आमूलचूल परिवर्तन है। जहाँ कृषि क्षेत्र पूर्णतः स्थिरता की अवस्था में है। कृषि क्षेत्र में 54% कार्यकारी जनसंख्या निर्भर है, वहीं उसकी आय में हिस्सेदारी मात्र 14% के लगभग रह गयी है। जबकि सेवा और विनिर्माण की हिस्सेदारी 86% के लगभग है। जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा सेवा तथा विनिर्माण क्षेत्र के हिस्से में है। इस क्षेत्र में भी मोटी कमाई चंद बड़े ओहदों वालों तक सीमित है। सेवा तथा विनिर्माण में बड़े पदों पर आसीन लोगों की भाषा अंग्रेजी ही है। वे ही इस देश की जीडीपी का बड़ा हिस्सा अर्जित करते भी हैं। अतः उनके मूल्यों, उनकी भाषा, उनके रहन-सहन को अपनाने और उन पदों तक पहुँचने की अभिलाषा का ही नतीजा है - अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों की दौड़।

आखिर इससे क्‍या परिणाम हासिल होता है?

·    अंग्रेजी माध्यम व्यवस्था ‘साँस्कृतिक-पूँजी’ को एक छोटे-से वर्ग तक समेटे रखती है। इस दौड़ में जनसँख्या का बड़ा हिस्सा पीछे छूट जाता है। यह एक ऐसा जुआ है, जिसमें हार निश्चित है। 6 घंटे का स्कूल तथा 4 घंटे की ट्यूशन के बाद, आप क्या उम्मीद करते हैं। फिर भी ग्रामीण तथा निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से कोई यदि उस शिखर तक पहुँच जाता है तो शेष समाज के लिए वह प्रतीक बन जाता है और इस अंधी दौड़ को तेज करने का आदर्श बनता है।

·    अनिश्चित भविष्य की लालसा में वर्तमान तथा भविष्य, दोनों को बरबाद करता है। ऐसे में अधिकतर लोगों के हाथ निराशा ही लगती है। सिर्फ़ यह कह कर संतोष करते हैं- “दिमाग होता तो कर लेता, माँ-बाप तो पैसे ही खर्च कर सकते हैं। अंग्रेजी में समझने के लिए तो दिमाग चाहिए।”

·    अंग्रेजी माध्यम के शीर्ष स्कूल बेशक बोर्ड की कक्षा तक आते-आते अंग्रेजी की जगह हिंग्रेजी/हिंग्लिश की छूट दे देते हों। पर निम्न कोटि के स्कूलों में बच्‍चों को भेजने का मकसद ही अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हासिल करना है। स्लम में रहने वाले माता-पिता भी चाहते हैं कि उनका बच्‍चा अंग्रेजी बोले। निम्न वर्ग के लोग अंग्रेजी बोलने को ही शिक्षित होने का पर्याय समझ लेते हैं। परंतु जैसा कि इस अनुसन्धान के दौरान यह सामने आया कि भाषा, साँस्कृतिक परिवेश से अन्तः क्रिया का परिणाम है और जो भाषा सहज साँस्कृतिक परिवेश में महज़ 1 से 2 वर्ष में सीखी जा सकती है, उसे सिखाने में ही हम अपने बच्‍चों की सारी उर्जा लगा देते हैं।

अंग्रेजियत की संस्कृति का मूल – राजव्यवस्था

«   भारतीय संविधान की धारा 348, 343(1) व (2), 147,120 और  210 अंग्रेजी की साँस्कृतिक दीवार को खड़े करने वाली नींव है, तो धारा 344, 345, 346, 347, 349, 350, 350, 350B, 351, 30 उस नींव को भरने का मसाला तैयार करती है। संविधान के आधार पर खड़ी की गयी राज व्यवस्था की इमारत अंग्रेजियत की संस्कृति को बचाए रखने वाली दीवारों का निर्माण करती है और धारा 21ए  राज्य की ज़रूरत के अनुरूप गैरबराबरी की शिक्षा को बनाए रखने के लिए किया गया संशोधन भर है।

«   संविधान पर अंग्रेजियत के प्रभाव को समझना है तो संविधान की धारा 147, 347 और 348 का जो प्रभाव धारा 120, 210 पर है, उसको समझना होगा। 343(1) के अनुसार हिन्दी केन्‍द्र की राजभाषा है तो अन्‍य उपबंधों के अनुसार तमिल, तेलुगू, मराठी, बंगाली, मलयालम आदि अपने-अपने राज्‍यों की राजभाषाएँ हैं? इस प्रकार संविधान की धारा 343(1) भारतीय भाषा-भाषी लोगों को आपस में लड़ाने का ही काम करती है। 343(2) के माध्यम से स्थाई तौर पर अंग्रेजी थोपने का आधार प्रदान किया गया है। 

«   अंग्रेजियत की संस्कृति को बनाए रखने का काम राजव्यवस्था कर रही है।  जी हाँ! अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल ही नहीं होते, अंग्रेजी माध्‍यम अदालतें भी होती हैं। अंग्रेजी माध्‍यम संसद के कानून भी होते हैं, सरकारी कार्यालयों सहित सम्पूर्ण नौकरशाही का ढाँचा अंग्रेजी माध्‍यम में है। स्कूल तो इसलिए अंग्रेजी माध्‍यम खुलते हैं क्योंकि ये सभी संस्थान अंग्रेजी माध्‍यम में हैं और इन सबको पोसने का काम अंग्रेजी माध्‍यम विश्वविद्यालय करते हैं। यही अल्प तंत्र अंग्रेजी माध्‍यम सिस्टमहै। यह अंग्रेजी माध्‍यम सिस्टमही शोषण और गैर-बराबरी के अल्पतांत्रिक-पंगु-पूँजीवादी किले को बनाए रखने वाली साँस्कृतिक दीवार को पुख्ता करने का काम करता है। सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख कर, यह सिस्टम उस किले के चारों और भ्रष्टाचार की सड़ांध वाली दलदली जमीन निर्मित करता है। इस अंग्रेजी माध्‍यम तंत्रको नेस्तनाबूद किए बिना न तो भ्रष्टाचार की गंदगी दूर किया जा सकता है और न ही सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी को बनाए रखने वाली किले की दीवार को ही ढहाया जा सकता है। आम जनता की समझ से परे रहने वाली भाषा (अंग्रेजी)  का अल्पतंत्र ही आम जनता को भ्रम और असमंजस की स्थिति में रखता है।

«   यूपीएससी, डीएसएसएसबी जैसी संस्थाएँ बैरिकेटर एजेंसी के रूप में काम करती हैं। जिनका काम सत्ता के स्वरूप को बनाए रखना है। इनके द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसलिए रखी जाती है कि उस अंग्रेजी के सहारे ग्रामीण कस्बाई गैर-अंगेजीदाँ पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को सत्ता के गलियारे से दूर रखा जा सके।

चलते-चलते........

सिस्टम की भाषा अंग्रेजी है, इसलिए लोग इंग्लिश के पीछे भाग रहे हैं। जिस दिन इंग्लिश सिस्टम खत्म हो जाएगा। उस दिन इंग्लिश मीडियम नर्सरी स्कूलों के दाखिला फार्म खरीदने की मारकाट भी खत्म हो जाएगी। पर जैसा कि अनुसन्धान के विशलेषण में भी पाया कि भाषा सीखने के लिए चेतन ही नहीं अवचेतन संस्कृति सन्दर्भों की ज़रूरत होती है। भाषा मूलतः परिवेश में प्रयोग की बदौलत ही आती है। अतः किसी परिवेश विशेष में जाकर उस पारिवेश की भाषा को सीखना सहज है। वही बिना परिवेश के सिर्फ़ स्कूली वातावरण में सीखना कठिन ही नहीं कष्टदायक भी है। कुछ शब्दों को रट सकते हैं, ग्रामर के नियमों को घोट सकते हैं पर बिना परिवेश के भाषा को आत्मसात करना असंभव ही है। स्कूल एवं कॉलेज जाने वाले वाले अधिकतर विद्यार्थियों की अधिकांश ऊर्जा सिर्फ़ अंग्रेजी रटने में ही लग जाती है। यह सीखने-सिखाने की संपूर्ण प्रक्रिया को ही अरूचिकर बना देती है। अंग्रेजी माध्यम वाली वर्चस्व पूर्ण व्यवस्था में जब बच्चे की समस्त ऊर्जा ही अंग्रेजी में लिखे पाठ्यक्रम को रटने में ही खत्म हो जाती है। तो उनके पास रचनात्मक करने को क्या रह जाता है। अंग्रेजी भाषा के अवचेतन सन्दर्भों के अभाव में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले विद्यार्थी शिक्षा के नाम पर पुस्तक में छपे तथ्यों को तोतों की तरह रटने भर का काम करते हैं। वे रटने को ही समझना समझते हैं। इस प्रकार NCF 2005 का शिक्षा को बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक बनाने का प्रयास सामाजिक पृष्ठभूमि के बाल केन्द्रित ना होने की वजह से धरा का धरा ही रह जाता है। जन सामान्य के साँस्कृतिक परिवेश में अंग्रेजी भाषा के अवचेतन सन्दर्भों का अभाव कभी परिवेश के बाहर की भाषा में उन्हें सहज होने ही नहीं देता। परिणाम ग्रामीण जन एवं निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के क्षेत्रीय बोली बोलने वाले लोग साँस्कृतिक हीनताके शिकार होकर अंग्रेजी भाषा बोलने की योग्यता को ही शिक्षित होने का चिन्ह मान लेते हैं। अंग्रेजी की पुस्तकों के गूढ़ ज्ञान को समझ से परे पाते हुए जन सामान्य अर्हता को ही शिक्षा और अंक को उस शिक्षा की गुणवता मापने का पैमाना मान लेता है। यह स्थिति शिक्षा का भ्रमपैदा करती है और लोग अंग्रेजी-भाषी बनने को ही शिक्षित होने का लक्ष्य समझ लेते हैं। आम आदमी की अभिजात्य वर्ग अर्थात् समाज की  सामाजिक पूँजी”  में शामिल होने की अभिलाषा उन्हें इंग्लिश मीडियम कल्चर के अनुरूप ढ़लने को प्रेरित करती है। चूँकि एक आमआदमी अर्थात् जन सामान्य के लिए शिक्षा ही एक मात्र साधन है जिससे वह अपनी तक़दीर बदल सकता है। और जब वह देखता है उच्च शिक्षा के श्रेष्ठ माने जाने वाले विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों और नौकरियों की परीक्षा का आयोजन करने वाली तमाम एजेंसियों जैसे यूपीएससी आदि में अंग्रेजी माध्यम का ही वर्चस्व है। उच्च और प्रतिष्ठित पदों पर बैठे प्रोफेसर, जज, सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के वकीलों, नौकरशाहों तथा उच्च अधिकारियों के द्वारा अंग्रेजी का प्रयोग एक भाषाई- वर्चस्वको पैदा करता है। ये भाषाई वर्चस्व इस अल्प परन्तु शक्तिशाली वर्ग की साँस्कृतिक पूँजीको संरक्षण प्रदान करने का काम करता है। इस प्रकार ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ अर्थात् ‘भाषाई(अंग्रेजी) साँस्कृतिक पूँजी’ आर्थिक पूँजी को छोटे से वर्ग तक ही समेटे रखने का कारगर हथियार है। इंग्लिश मीडियम सिस्टम और इंग्लिश मीडियम एजुकेशन का चेतन एवं अवचेतन दबाव इंग्लिश मीडियम कल्चर (अंग्रेजी माध्यमिय संस्कृति) के अनुरूप साँस्कृतिकरण करने का दृश्य और अदृश्य दबाव बनाता है। शीर्ष का अंग्रेजी भाषी यह छोटा सा वर्ग ही एक सिस्टम बनाता है जिसे हम इंग्लिश मीडियम सिस्टम कह सकते हैं। इस सिस्टम में हर विचारधारा का शीर्ष नेतृत्व है। यह सिस्टम ही अर्थव्यवस्था की शर्तों को तय करने का काम करता है। अतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से रूपांतरित होकर ज्ञान आधारित(सेवा एवं विनिर्माण) अर्थव्यवस्था में रूपांतरित होने के साथ मानव पूँजी की भूमिका तो बढ़ी है। पर मानव पूँजी को तैयार करने की प्रक्रिया पर इस इंग्लिश मीडियम सिस्टम का ही नियंत्रण रहता है। यह सिस्टम ही ज्ञान, कौशल, योग्यता की परिभाषाओं को गढ़ने का काम कर रहा होता है। सुरक्षित माने जाने वाले संगठित क्षेत्र के  श्रेष्ठ पदों तक पहुंचने हेतु उच्च शिक्षा की जरुरत है और बी ए-ती एको छोड़ दें तो मेडिकल, इंजीनियरिंग, एमबीए, सीए, जैसे प्रोफेसनल विषय ही नहीं विज्ञान, सामाजिक विज्ञान जैसे  विषयों की शिक्षा भी देश के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले संस्थानों में सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। निजी ही नहीं सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं तथा साक्षात्कार के लिए भी अंग्रेजी ही अनिवार्य है। जिस वकील को अंग्रेजी नहीं आती वह तो सुप्रीम कोर्ट में खड़े होने का सोच भी नहीं सकता है। अब चूँकि श्रेष्ठ माने जाने वाले पदों (निजी हो या सरकारी) के लिए उच्च शिक्षा जरूरी है और उच्च शिक्षा चूँकि सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। जनसामान्य की एक पीढ़ी को उच्च शिक्षा और नौकरियों की परीक्षा में अंग्रेजी के वर्चस्व को लेकर कटु अनुभव भी हासिल हो चुके हैं। बच्चे भी अपने बड़े भाई बहनों, सहोदरों से यह ज्ञान हासिल कर ही लेते हैं कि ‘उच्च शिक्षा के मंदिर’ में बिना अंग्रेजी देवीके आशीर्वाद के बिना कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। अतः वे रटते है, पर इंग्लिश में ही पढ़ते हैं। उच्च ओहदों तक पहुंचने की अभिलाषा समाज के चलने के लिए ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ एक पगडंडी तैयार कर देता है। लोग उस पगडंडी पर निकल पड़ते हैं। परिणाम शायद कोई विरला ही इस रास्ते पर चल कर सफलता की मंजिल तक पहुँच पाता हो। शेष रास्ते में ही ढ़ेर होते जाते हैं। जो विरला इस रास्ते से सफल होता है वह शेष जन के लिए आदर्श बन जाता है। फलस्वरूप बिना रास्ते की हकीकत जाने लोग परवानों की तरह मंजिल की तरफ़ बढ़ निकलते हैं। इस प्रकार यह क्रम जनून की तरह बढ़ता ही जाता है। इससे यह बात और स्पष्ट होती उच्च शिक्षा ही नहीं समाज के मुख्य केन्द्रों पर अंग्रेजी भाषी लोगों का वर्चस्व ही, इस जनून के पीछे की हकीकत है। इस जनूनी दौड़ में गैर अंग्रेजी परिवेश के ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय परिवेश के लोगों का पिछड़ना तो तय ही है। इस प्रकार समाज की मानवीय पूँजीअंग्रेजी भाषी वर्ग तक ही सीमित रह जाती है। जो पुनः सामाजिक-साँस्कृतिक पूँजीको छोटे से अंग्रेजी भाषी वर्ग तक समेटे रखती है। अर्थव्यवस्था के ज्ञान आधारित होने की वजह से सेवा तथा उद्योग के श्रेष्ठ पदों पर इस छोटे से वर्ग का वर्चस्व बना रखता है। शेष जन के लिए इनका तौर तरीका भाषा ही आदर्श होती है। उस तौर पहुँचने की अभिलाषा रखते हैं। यह वर्चस्व अंग्रेजी नहीं अंग्रेजियत के अनुरूप संस्कृतिकरण को गति देता है। इस मोह से ग्रस्त लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की कैद में डालने के लिए विवश है।

अतः शिक्षा को बाल केन्द्रित बनाने से पूर्व व्यवस्था को जन अर्थात् आम आदमी केन्द्रित बनाना पड़ेगा। जब तक समाज और राजव्यवस्था के मुख्य केन्द्रों पर छोटे से अंग्रेजी भाषियों का वर्चस्व को तोड़ा नहीं जाता, तब तक व्यवस्था जन केन्द्रित नहीं होगी। और जब तक उच्च शिक्षा, प्रशाशन, देश के हर प्रकार के न्यायालयों एवं नौकरियों के चयन में क्षेत्रीय बोलियों/जन भाषाओं का प्रयोग नहीं होता, तब तक स्कूल की शिक्षा परिवेश की संस्कृति बोलियों के अनुरूप नहीं हो सकती। समाज का अधिकतर लोग बीच में ही ढेर हो जाएंगे और शीर्ष बिन्दुओं पर अंग्रेजी भाषीयों का नियंत्रण रहेगा। वे ही समाज संचालन की समस्त शर्तों को तय करते रहेंगे।

अतः अंग्रेजी भाषी व्यवस्था गैर बराबरी को बनाए रखने का हथियार है और सत्ता को छोटे से सीमित वर्ग तक समेटे रखने का काम करती है। चूँकि सत्ता सीमित वर्ग तक सिमटी रहती है। अतः उसका भ्रष्ट होना लाज़िम है।... और इंग्लिश मीडियम कल्चर आर्थिक पूँजी को चंद हाथों तक समेटे रखने का भी काम करती है। और इस प्रकार इंग्लिश मीडियम खुद दमनकारी साधन है। अतः यह शोषण के तंत्र को पुख्ता करने का काम करती है।      

पर स्कूली विद्यार्थियों की शिक्षा पर इंग्लिश मीडियम राजसत्ताके बोझ पर यशपाल कमेटी मौन है। चूँकि यशपाल कमेटी इन बिन्दुओं पर मौन है, अतः स्कूली बच्चे ही नहीं समस्त समाज इंग्लिश मीडियम कल्चर के बोझ तले दबा पड़ा है।इसी प्रकार एनसीएफ 2005 के शिक्षाविदों को इंग्लिश मीडियम राजसत्ताकी साँस्कृतिक दीवार नहीं दिखती। इसलिए बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र के लागू होने के बाद भी तोता रटंत शिक्षा जारी है।

गैरबराबरी की बहुस्तरीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ़ आन्दोलन करने वाले और साँस्कृतिक परिवेश के अनुरूप समान स्कूली शिक्षा के पैरवीकार बहुत से शिक्षाविद इंग्लिश मीडियम साँस्कृतिक को पोसती युपीएससी आदि की नैकरी की परीक्षाओं, विश्वविद्यालयों और शासन व्यवस्था के गैर बराबरी बनाए रखने वाली संवैधानिक व्यवस्था (अनुच्छेद-348, 351, 343(1) & (2), 147, 120,) पर मौन है । वे संविधान के अनुच्छेद 350 बी का हवाला देकर प्राथमिक स्तर पर मातृभाषाओं में शिक्षण की वकालत तो करते रहे है । पर इस व्यवस्था की बैरिकेटिंग एजेंसी युपीएससी और दिल्ली विश्वविद्यालय आदि की पीजी कक्षाओं में थोपी गयी अंग्रेजी माध्यम की अनिवार्यता पर मौन है । परिणाम समान स्कूली शिक्षा का आन्दोलन बैक फुट पर है और बहुस्तरीय अंग्रेजी माध्यम शिक्षा फ्रंटफूट पर है।

प्रो. रमाकांत अग्निहोत्री, एवं प्रो. यशपाल जैसे शिक्षाविदों के अनुसार स्कूली शिक्षा के लिए मातृभाषा और विश्वविद्यालयी शिक्षा के लिए इंग्लिश मीडियम बेहतर है। पर जनाब स्कूल इंग्लिश मीडियम इसलिए है क्योंकि विश्वविद्यालय, न्यायालय, सचिवालय इंग्लिश मीडियम है। Some time the chains that prevent us from being free are more mental than physical……..And English is mental chain in India…………………….

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