अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-1
मानवतावादी दृष्टिकोण से भी देखें तो हर व्यक्ति की समाज में अपनी ही अहमियत है। अतः कोई भी व्यवस्था यदि किसी एक व्यक्ति को समाहित करने से चूक जाती है तो यह माना जा सकता है कि वह असमानता और गैर-बराबरी को ही पुख़्ता कर रही है। रमेश भी उन हजारों-लाखों विद्यार्थियों में से एक है, जो अंग्रेजी माध्यम वाली औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने में असफल रहा है। पर फिर भी उसमें ही शिक्षा ग्रहण करने को बाध्य है।
विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षा शास्त्र के सिद्धान्त के अनुसार स्कूल का साँस्कृतिक परिवेशगत
वातावरण का समन्वय, स्कूली वातावरण में दिखाई पड़ना चाहिये। पर जब स्कूल की
अंग्रेजी माध्यम की वर्चस्व वाली संस्कृति, विद्यार्थियों के परिवेश की संस्कृति को
पूरी तरह नकार रही हो, परिवेश की संस्कृति को निपट गँवारू बता रही
हो, तो ऐसी स्थिति में एक विद्यार्थी की समझ पर और उसकी पहचान पर क्या प्रभाव पड़़ता है। यह जानने के लिए लेखक ने
रमेश के परिवार के साथ कुछ समय बिताया।
रमेश तथा उसके परिवार का संक्षिप्त परिचय
रमेश अपने माता-पिता का कनिष्ठ पुत्र है।
उसके परिवार में उसके अतिरिक्त उससे बड़ी एक बहन तथा बहन से भी बड़ा एक भाई है। रमेश
के पिता अजय कुमार बीस-बाईस वर्ष पूर्व नौकरी की तलाश में अपने बुलंदशहर स्थित गाँव
से फरीदाबाद आये थे। ओल्ड फरीदाबाद स्थित अहिरवाड़ा गाँव में उनके नानाजी का एक
पुश्तैनी मकान भी था। इसी गाँव में उन्हें अपने नानाजी से तोहफ़े के रूप में एक
प्लॉट अर्थात् जमीन का एक टुकड़ा भी मकान बनाने के लिए मिल गया। विवाह उपरांत वे
इसी मोहल्ले में बस भी गए। परन्तु बुलंदशहर स्थित गाँव से उनका जुड़ाव बना रहा।
गाँव के प्रति मोह उन्हें बार-बार खींच कर बुलंदशहर ले जाता। इस वजह से कई बार
उन्होंने गाँव में ही बसने की भी सोची। उनके बड़े लड़के की प्रारम्भिक औपचारिक
शिक्षा गाँव में ही हुई। परन्तु बच्चों की शिक्षा की चिंता उन्हें स्थाई रूप से
शहर खींच लाई। अजय कुमार जी के शब्दों में, “गाँव में
खुली हवा है, शुद्ध पानी है, खेत की
ताजी सब्जियाँ और घर का खुल्ला दूध-दही भी है। मतलब यह कि जो कुछ भी हम यहाँ मोल
लेते हैं वो सब वहाँ पर मुफ्त में / ‘फ्री आफ
कॉस्ट’ उपलब्ध है। बस नहीं है तो वहाँ शहर जैसी पढ़ाई नहीं है।
बालकों की खातिर ही हम इस शहर में बसे हुए हैं और यहाँ का ‘पॉल्युशन’
पी रहे हैं।” रमेश कुमार
जी की पत्नी कमला जी के अनुसार, “गाँव में बालकों का भविष्य ना है।” इस प्रकार बच्चों के भविष्य की चिंता उन्हें स्थाई रूप से गाँव से शहर ले
आई।
वर्तमान में अजय कुमार का परिवार स्थाई रूप से फरीदाबाद के अहिरवाड़ा में बस चुका है। अहिरवाड़ा भी अब
गाँव नहीं रहा,
शहर का ही भाग बन गया है। गाँव से सटे खेतों पर प्लॉट कट गये और इस प्रकार जहाँ
कभी ज्वार-बाजरे की खेती होती थी वहाँ मकान बन गए हैं। इस प्रकार, अहिरवाड़ा
तथा उससे सटी बस्लवा कॉलोनी, इस क्षेत्र में निम्न-मध्यम वर्गीय प्रवासी लोगों की
कॉलोनी के रूप में उभर कर आई है।
आय के स्रोत्र के रूप में रमेश के पिता अजय
कुमार जी की पारिवारिक आय में तकनीशियन के रूप में रोड़वेज़ से प्राप्त होने वाली
आय के अतिरिक्त पशु-पालन (भैंस) अर्थात् दूध के व्यवसाय से होने वाली आय तथा अपने
मकान के एक पोर्शन अर्थात् हिस्से को किराये पर देकर प्राप्त होने वाली आय भी
शामिल है।
पशुपालन अर्थात् भैसों की मुख्य जिम्मेदारी
विशेषतः रमेश की माता,
कमला जी के कंधों पर ही रहती है। कमला जी का
कहना है, “पशु-पालन हमारा पुश्तैनी काम है। हालाँकि शहरों में चारा
आदि न मिलने से इस काम में काफी दिक्कत आती है पर इससे कम-से-कम बच्चों के पीने के
लिए घर का दूध तो हो ही जाता है।” जहाँ तक पशुओं की देखरेख का सवाल है, वह
मुख्यतः कमला जी खुद ही करती हैं। रमेश की माता जी के कार्य में कुछ सहायता रमेश
के पिता, अजय कुमार जी अपने ऑफिस से आने के बाद देते हैं। परन्तु
कमला जी के अनुसार “भाई बहनों में पशु-पालन (भैंस-पालन) के कार्य को लेकर
तूतू-मैंमैं की स्थिति बणी (बनी) रहती है।
हर कोई एक-दूसरे पर काम को टालने का प्रयास करता है। इन बालकों को भैंसों का काम
करने में शर्म-सी महसूस होती है।”
रमेश के बड़े भाई नितीश ने हिंदी माध्यम से
बारहवीं की परीक्षा पास की। उसके बाद उसने बी-फार्मा में दाखिला लिया। पर
सारा-का-सारा कोर्स अंग्रेजी में होने की वजह से सिर्फ़ प्रेक्टिकल को छोड़ बाकी सब
में फेल हो गया। रमेश के पिता के साथ साथ उसके बड़े भाई नितीश को लगता है, “यदि मैंने हिंदी की जगह शरू से ही अंग्रेजी माध्यम से पढाई की होती तो उसे
बी-फार्मा का कोर्स बीच में छोड़ने की नौबत ना आती। नितीश के पिता अजय को भी जब पता
चला तो वे सब काम छोड़ कर अपने पुत्र के होस्टल पहुँचे। उन्होंने डबडबाई आँखों से
लेखक को बताया, “जब कुछ दिनों तक इसका फोन नहीं आया, फोन पर बात करो तो सही से ना बोलता... तब हमें कुछ डाउट-सा हुआ और मैंने
उसके कॉलेज में फोन करके उसका रिजल्ट पता किया। जब पता चला फेल है तो मैं सब काम
छोड़ इसके कॉलेज भागा और उसी दिन उसका बोरिया-बिस्तर वापस ले आया।” हमारे फरीदाबाद के सभी कॉलेज महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध होकर
चलते हैं तथा निकटतम शहर दिल्ली के कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से या आई.पी.
यूनिवर्सिटी से संबद्ध हैं। इनमें से किसी में भी बी.एससी. का पाठ्यक्रम हिंदी
माध्यम से करने की सुविधा नहीं है। इसलिए विज्ञान में रुचि होने के बावजूद भी
मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी माध्यम से बी.ए. में दाखिला ले लिया।” नितीश के
अनुसार, “बी.ए./बी.काम. के अतिरिक्त, अन्य सभी विषयों को पढ़ाने का माध्यम
अंग्रेजी ही है।” नितीश की
बहन भावना के अनुसार,
“हिंदी माध्यम से तो बी.ए. ही हो सकती है।” नितीश के अनुसार, “अंग्रेजी भाषा उसकी ही नहीं, हरियाणा
बोर्ड-हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों की समस्या है।” पर जिन दिनों नितीश बी.ए. में पढ़ रहा था। तब ही उसका सिलेक्शन जे.बी.टी.
में हो गया और उसने आर्थिक रूप से अपने आप को स्थिर करने हेतु जेबीटी ‘ज्वाइन’ किया, अर्थात् उसमें प्रवेश ले लिया। नितीश
जे.बी.टी. कोर्स के हिंदी माध्यम में होने से खुश है। नितीश ने बताया, “जे.बी.टी. की पढाई हिंदी माध्यम से होती हैं, किताबें भी हिंदी में उपलब्ध हैं।” उसने अपनी पुस्तकों से मनोविज्ञान के सिद्धांतों को कोट करते हुए कहा, “गाँधीजी के अनुसार हमारी पढाई मातृभाषा में होनी चाहिए।” मनोविज्ञान भी तो कहता है कि बच्चे की समझ उसकी अपनी बोली-भाषा में ही
विकसित होती है।”
नितीश ने आगे प्रश्न रखा, “जब बच्चे के विकास में मातृभाषा की
इतनी अहम् भूमिका है तो हमारे देश में अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा पर बल क्यों
दिया जाता है?” लेखक इस प्रश्न के जबाब से इस प्रकार बच गया कि इस
प्रश्न का जबाब नितीश से छोटी परन्तु रमेश
से बड़ी उनकी बहन भावना ने ही दे दिया। भावना ने जबाब देते हुए कहा, “ये सिद्धांतों की बातें किताबों में ही अच्छी लगती हैं। ‘प्रैक्टिकल’
कुछ और ही है। आजकल अंग्रेजी का जमाना है, कहीं-भी
चले जाओ,
वहाँ अंग्रेजी की ज़रूरत पड़ती है। मल्टी-नैशनल कंपनियों में तो अंग्रेजी के बिना
खड़े तक नहीं हो सकते। पढाई की बात करते हो... बी.ए. जे.बी.टी. आदि तो हिंदी में कर
सकते हो पर मास्टर लेवल पर कोई पढाई करनी हो तो वह अंग्रेजी में ही होगी। यहाँ तक
कि डी.यू. से एम.एड. भी अंग्रेजी में ही तो होती है।” दिल्ली
विश्वविद्यालय से बी.बी.एस. करने वाली भावना ने अपने दोनों भाइयों को नसीहत देते
हुए कहा, “यदि कामयाब होना है तो अंग्रेजी का रोना रोने से बेहतर
है कि अंग्रेजी को इम्प्रूव करो। हमारी क्लास में सरकारी स्कूल की हिंदी माध्यम
की एक लड़की आई थी। सेशन के बीच में कोर्स छोड़ कर चली गई। पूरा लेक्चर अंग्रेजी में
देने के बाद टीचर पूछती, यदि किसी को अंग्रेजी में समझ नहीं आया तो पूछ लो। कोई
कुछ बोले तो उसकी बेइजती। क्या करे.... अगली ने बीच में ही कोर्स छोड़ दिया। हमारी
कलास में तो सभी स्टूडेंट्स इंग्लशि मीडियम स्कूलों के हैं।”
अजय कुमार जी के अनुसार भावना पढाई-लिखाई
में सभी भाई-बहनों में सबसे बेहतर है। उसने स्थानीय अंग्रेजी माध्यम स्कूल से
बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंको से पास करने के पश्चात् मैरिट से दिल्ली
विश्वविद्यालय में बी.बी.एस. में दाखिला ले लिया। वहाँ भी वह अंग्रेजी माध्यम से
ही बी.बी.एस. का कोर्स कर रही है। पिता की बात को बीच में टोकते हुए नितीश ने कहा, “उसकी शुरू से पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से हुई है। हमारी तरह नहीं कुछ साल
इधर तो कुछ उधर।” इस पर जबाब
देते हुए अजय कुमार जी ने कहा, “तेरे बारे में तो हम अपनी गलती मानते हैं पर
इस छोटने के बारे में क्या कहता है? इसको भी तो शुरू से उसी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिल कराया है। यो
क्यों ना चाल रहा?”
काफी समय से चुप बैठी रमेश की माताजी कमला
जी ने कहा, “कामयाब होने के खातर दिमाग चाहिए। जब तुम अपना दिमाग
इधर-उधर लगावोंगे,
किताब में ध्यान ना दोगे तो पढाई कुकर
आवेगी?” उन्होंने लेखक की तरफ़ प्रश्न पूछने की मुद्रा में अपनी
बात रखी, “ये बात करते हैं कि अंग्रेजी कठिन है, मैं पुछूँ हिंदी कोण-सी आसाण है। हिंदी में इसे-इसे कठिन शब्द होवे है के
सर घूम जाये। अरे! स्कूल तो हम भी गए हैं। याद करण आले खातर अंग्रेजी आसान है, हाँ! ना
करण आले खातर, सब कुछ कठिन है। इसके मामा के बच्चों को देख लो...
अंग्रेजी माध्यम से से एम.सी.ए. किया है।”
कुल मिला कर रमेश के माता-पिता की वर्तमान
चिंता का विषय उनका कनिष्ठ पुत्र रमेश ही है। माता-पिता तथा दोनों बड़े भाई-बहन
अपने-अपने अनुभवों का पिटारा रमेश के सर पर ही फोड़ते रहते हैं। रमेश के पिता कई
बार सोचते हैं कि रमेश का दाखिला सोनीपत स्थित हरियाणा बोर्ड से संबद्ध हिंदी माध्यम
के ट्रस्ट के विद्यालय में करवा दें। पर रमेश चाहता है कि वह अपने दोस्तों के साथ
उसी स्कूल में पढ़े। रमेश के भाई नितीश ने इस बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए
कहा, “आखिर पढ़ाई के अलावा यारी-दोस्ती भी तो देखनी होती है।
सोनीपत के ट्रस्ट वाले स्कूल में डाल दो, फिर इसको
पता चलेगा। सुबह चार बजे उठाएँगे और ग्राउंड के चार चक्कर लगवाएँगे। इसका सारा
घूमना चार दिन में निकल जायेगा।” जबकि माँ का स्पष्ट मानना है, “हिंदी माध्यम में पढ़ाने का कोई फायदा नहीं। उससे तो अच्छा है, घर बिठा दो” रमेश की
व्यक्तिगत इच्छा फरीदाबाद वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ने की है क्योंकि
उसके बाकी दोस्त भी उसी में पढ़ रहे हैं और कम-से-कम समाज में इज्जत तो अंग्रेजी
माध्यम वालों की ही होती है। इस प्रकार रमेश पर भी दबाव बेहतर तरीके से पढ़ने का
रहता है।
परन्तु रमेश की समस्या यह है कि अंग्रेजी
उसे समझ नहीं आती। अंग्रेजी में वह कुछ भी याद कर ले, अगले दिन सब साफ हो जाता है। उससे कुछ पूछ
भी लो, पर
वह अंग्रेजी में याद करके लिख नहीं पाता अर्थात् याद (रट) नहीं कर पाता। रमेश को
इस तरह की पढ़ाई में कोई आनंद भी नहीं आता। पर दोस्तों के चक्कर में स्कूल भी जाता
है ट्यूशन भी। ट्यूशन का मास्टर थोडा आसन कर हिंदी में भी उन्हीं बातों को समझा
देता है। कुछ आसान से उदाहरण भी देता है। एक तरफ़ माता-पिता का व्यक्तिगत अनुभव और
दूसरी तरफ़ उस अनुभव की आग में घी डालने का काम करने वाले नाते-रिश्तेदारों के
सुझाव, तीसरी तरफ़ इंग्लिश की वजह से बहन को मिली सफलता तथा भाई को इसी वजह से
मिली बाधा, चौथी तरफ़ उसके खुद के यार-दोस्त और समाज में इंग्लिश की
वजह से मिलने वाली प्रतिष्ठा। इन सब का बोझ सीधे-सीधे रमेश के कंधे पर आ गिरा है।
उसको उसकी वर्तमान शिक्षा में कहीं-भी उसका परिवेश नज़र नहीं आ रहा है।
इस केस से निकले मुख्य बिंदु -
Ø परिवार के बच्चों का अपने पारंपरिक काम के
प्रति नकरात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ है।
Ø रमेश की वर्तमान शिक्षा में उसका परिवेश
कहीं-भी शामिल नहीं है।
Ø भाषा की दिक्कत की वजह से वह विज्ञान, सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को भी नहीं समझ पाता है।
Ø वही विषय, जब ट्यूशन पर आसान घरेलू भाषा में समझाए
जाते हैं तो वह समझ जाता है। पर अंग्रेजी में लिखने की दिक्कत बनी रहती है। उसके
लिए पुनः रटने की ज़रूरत पड़ती है।
Ø ................पर साथ ही यह तो तय है कि
बिना अंग्रेजी के सफलता नहीं मिल सकती है।
Ø माताजी का मानना है कि मानक हिंदी और
अंग्रेजी दोनों ही भाषाएँ कठिन होती हैं इसलिए अंग्रेजी पर ही जोर दो।
Ø पिता अंग्रेजी ना चल पाने पर हिंदी में भी
पढ़ाने के पक्ष में हैं। पर वे भी मानते हैं कि कामयाब होने के लिए “विटामिन E” का होना जरुरी है। पर जरूरी तो नहीं कि हर
कोई अफ़सर ही बने।
Ø
चयन परिक्षाओं में अंग्रेजी को समाप्त कर सभी भारतीय भाषाओं को समान
महत्व दिए जाने की मांग करते छात्र अधिकार मंच/राष्ट्रिय अधिकार मंच की साइट से प्राप्त यह चित्र कुछ सवाल खड़े कर रहा
है।
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