परिवेश के बाहर की भाषा और बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र
परिवेश के बाहर की भाषा को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने से विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता पर पड़ने वाला प्रभाव
जिस प्रकार कृषि कार्य
करने से पूर्व भूमि को फसल की प्रकृति के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता होती है।
भूमि वही होती है, पौधे की प्रकृति पर निर्भर करता है कि भूमि को किस रूप में तैयार किया
जाए। धान के लिये तैयार भूमि पर गेहूँ की फसल नहीं बोई जा सकती। उस खेत में यदि
आलू बो दिया तो निश्चित तौर पर सड़ जाएगा। इसी प्रकार कोई भी फसल तब ही अच्छा
उत्पादन दे सकती है, जब वह मौसम एवम्
भूमि के अनुरूप हो। अतः किसी भी फसल की कृषि हेतु भूमि, फसल, एवम्
वातावरण में एक समंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता होती है। यही बात शिक्षण अधिगम
पर भी लागू होती है। जैसे धान के लिए तैयार भूमि पर यदि गहूँ बोया जायेगा, तो वह सड़
जायेगा और कभी पनप नहीं पायेगा। यही बात शिक्षा पर भी लागू होती है।
जब तक समाज-व्यवस्था
(राज-व्यवस्था एवं अर्थ-व्यवस्था) की भूमि बाल-केन्द्रित रचनात्मक शिक्षाशास्त्र
के अनुरूप ना हो, तो रचनात्मक शिक्षा शास्त्र पर आधारित पाठ्यचर्चा को
स्कूली कार्यक्रम में लागू करने से सतही तौर पर कुछ परिवर्तन दिखेंगे, पर कुछ
विशेष प्रगतिशील परिवर्तन हासिल नहीं हो पायेगा। अतः बाल केन्द्रित, रचनात्मक
एवं विवेचनात्मक पाठ्यचर्चा को लागू करने
हेतु न केवल समाज में जन-सामान्य के बीच भी इस शिक्षाशास्त्र की एक सामाजिक एवं
साँस्कृतिक समझ होनी जरूरी है, अपितु राज-व्यवस्था का ढ़ाँचा भी इस शिक्षा शास्त्र के
अनुरूप होना चाहिए। तब ही स्कूलों में इस शिक्षा शास्त्र पर बोया गया पौधा एक
फलदाई वृक्ष बन सकता है।
अतः इस अध्ययन का मूल सिद्धांत
यह है कि बाल-केन्द्रित विवेचनात्मक एवं रचनात्मक शिक्षाशास्त्र के अनुरूप ‘भूमि’ (अर्थात् सामाजिक एवं साँस्कृतिक वातावरण) के बिना,
बाल-केन्द्रित विवेचनात्मक एवं रचनात्मक शिक्षाशास्त्र पर आधारित पाठ्यचर्चा का
स्कूली शिक्षण में प्रयोग सफल ही नहीं हो सकता।
हम इस खंड में, इन दोनों
के बीच के तालमेल को खोजने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार हम औपचारिक शिक्षा
व्यवस्था की सम्पूर्ण राज-व्यवस्था एवं समाज-व्यवस्था के संदर्भ में विवेचना
करेंगे और उस विवेचना के आधार पर अंग्रेजी
माध्यम स्कूली व्यवस्था के प्रति बढ़ते ज़ुनून को ढ़ूँढ़ने का प्रयास करेंगे।
वर्त्तमान पाठ्यचर्या
का आधार राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा-2005 (National Curriculam Framework/NCF-2005) है। जो बाल केन्द्रित रचनात्मक
एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र की वकालत करता है तथा सीखने के रचनात्मक तरीकों के
अपनाने पर बल देता है।
वहीँ एन.सी.ई.आर.टी. की
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार समझ तथा भाषा का गहरा रिश्ता है। “समझ और भाषा का कुछ
इस प्रकार का रिश्ता होता है, जैसे- हवा और उसकी तरंगो का। हमारी समझ अपनी भाषा में
ही बनती है।” भाषा के बिना समझ की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है। पर स्कूलों
में भाषा को एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
16 जुलाई 2014 को
हिन्दुस्तान में छपी भाषा के विषय पर किए गये अनुसंधान की यह खब़र गवाह है कि
व्यक्ति के विचार और विश्लेष्ण करने की क्षमता परिवेश की भाषा में अधिक होती है।
तो हमारे यहाँ तमाम उच्च संस्थाओं और नैकरियों की नियुक्ति करने वाली संस्थाओं में
गैर परिवेश की भाषा हावी क्यों है?? पाठक तनिक विचार करे !!!!
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