अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व से उत्पन्न विश्व ज्ञान अनुक्रम ( ऑर्डर )
अवसर की समानता परिस्थितियों की समानता पर निर्भर करती है । पर विविध संस्कृतियों वाले देश में यदि हम एक ही भाषा- संस्कृति (चाहे वह कोई भी हो) को पूरे देश पर थोप देंगे तो यह कुछ ही लोगों को अवसर प्रदान करेगी, शेष लोग हीनता के ही शिकार ही होंगे। यह बात जितनी एक देश पर लागू होती है उतनी ही सम्पूर्ण विश्व व्यवस्था पर भी।
अंग्रेजी भाषा की विश्व में तुलनात्मक स्थिति क्या है? यह किस तरह के
विश्व ज्ञान अनुक्रम आर्डर को पैदा करती है? आइए जरा इन प्रश्नों से रूबरू होएँ।
विकिपीडिया से मिली जानकारी के अनुसार, यदि हम
अंग्रेजी भाषा की तुलनात्मक स्थिति पर गौर करें तो अंग्रेजी का उपयोग विश्व के 88
देशों में अधिकारिक भाषा के रूप में होता है। जिसमें से 60 देश प्रभुसत्ता संपन्न
हैं तथा शेष 28 प्रभुसत्ता हीन हैं।
विकीपीडिया से प्राप्त विश्व के नीचे दिए गये नक्शे पर गौर करें तो पाते
हैं कि अंग्रेजी का प्रयोग विश्व के हर कोने में होता है । “अंग्रेजों
के राज में सूरज कभी अस्त नहीं होता”
वाली कहावत के सन्दर्भ में, सतही स्तर
पर देखें तो अंग्रेजी विश्व के हर कोने में प्रचलित भाषा प्रतीत होती है, परंतु यथार्थ में ऐसा है नहीं।
चित्र व्याख्या:-अंग्रेज जहाँ
स्थाई तौर पर बसे, वहाँ उन्होनें पहले से
बसे मूल निवासियों का पूरी तरह से सफ़ाया
कर यूरोपीय बस्तियाँ बसाईं। इन क्षेत्रों को गहरे नीले रंग से दर्शाया गया है। जहाँ
मूल निवासियों का सफाया संभव नहीं था और संख्या बल में कहीं न कहीं वे कमजोर साबित
हो रहे थे, वहाँ उन्होनें बिचौलिया-दलाल वर्ग पैदा किया। इस बिचौलिया दलाल वर्ग की
बदौलत ही शेष समाज को नियंत्रित किया। अंग्रेजों के साथ अंतरंग संबंध की बदौलत ही
यह बिचौलिया-दलाल वर्ग उनकी भाषा और संस्कृति को अपना सका। अंग्रेजों के जमाने में
सत्ता में भगीदारी के लिए तैयार यह वर्ग उनके जाने के बाद भी सत्ता के शीर्ष पर
बना रहा और अंग्रेज के सत्ता छोड़ने के बाद इस वर्ग के हाथों ही सत्ता रही। यहां
का अंग्रेजों के द्वारा पैदा किया बिचौलिया दलाल वर्ग ही संभ्रांत वर्ग का रूप
लेकर अंग्रेजी को कायम रखे हुए है और इन देशों में आधिकारिक भाषा के रूप में
अंग्रेजी को ही कायम बनाए रखना चाहता है। इसे हलके नीले रंग से दर्शाया गया है। किसी जमाने में अंग्रेजों के गुलाम रहे देशों
को छोड़ दें तो शेष विश्व में अंग्रेजी का प्रयोग नगण्य ही होता है। चीन, जपान, रूस, जर्मनी आदि देशों
में अंग्रेजी का प्रचलन नगण्य ही है।
अंग्रेजों के पूर्व उपनिवेशों में ही अंग्रेजी
शिक्षा और प्रशासन की अधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग जरूर होती है। पर इन देशों
में पैदाइशी अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या नगण्य ही है। पैदाइशी अंग्रेजी बोलने
वालों का 87% भाग अमेरिका / यूएसए, ब्रिटेन/यूके,
आस्ट्रेलिया, कनाड़ा, न्यूज़ीलैण्ड,
आयरलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका में बसा है। अर्थात् सिर्फ़ सात देशों में
ही पैदाइशी अंग्रेजी बोलने वालों की जनसंख्या का घनत्व अधिक है। इन देशों में
पैदाइशी अंग्रेजी बोलने वालों में एक बड़ी संख्या इंग्लैंड से आकर बसे लोगों की ही
है या उन लोगों की, जिनकी मूल भाषा को अंग्रेजों ने पूरी तरह
नष्ट कर दिया है। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी मूलतः अंग्रेज बस्तियों की ही मूल
भाषा है। तो अमेरिका/यूएसए में भी अंग्रेजी के बाद दूसरा स्थान स्पेनिश का है। शेष
विश्व में मूल रूप से पैदाइशी अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या 13% ही है। इसमें से
भी एक बड़ा तबका अमेरिका और इंग्लैड़ के कब्ज़े वाले गैर- प्रभुसत्तासंपन्न द्वीपों
में बसा है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में ढाई लाख लोगों की भी 1qमूल भाषा अंग्रेजी नहीं है। महज .023% लोग ही अंग्रेजी को मूल रूप से प्राथमिक
भाषा मानते हैं।
चित्र संख्या 29.2 - अंग्रेजीको मातृभाषाके रूप
में बोलने वाले देशों का विवरण (सन्दर्भ- विकिपीडिया)
अब यदि हम एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘समझ का माध्यम’
में लिखी बात, “हमारी समझ अपनी भाषा में ही बनती है।” को सैद्धांतिक रूप से
सत्य मानें तो अंग्रेजी के वर्चस्व वाली व्यवस्था में मौलिक समझ पर अधिकार अमेरिका/यूएसए,
ब्रिटेन/यूके, आस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूज़ीलैण्ड का ही बना रहेगा । भारत जैसे देशों
के विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र महज
इन देशों में छपी पुस्तकों का सन्दर्भ ही लेते रहेंगे। भारत जैसे विकासशील देशों
के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग अपने ज्ञान को सत्यापित करने के लिए उन देशों की तरफ़
ही मुँह बाये खड़े रहेंगे। भारत जैसे देशों का मौलिक ज्ञान धीरे-धीरे नष्ट होता
जाएगा और मौलिक ज्ञान के लिए वे हमेशा फश्चिम की तरफ़ ही ताकते रहेंगे। देश का 72 %
दबा-कुचला वर्ग ज्ञान-परंपरा का भाग कभी-भी नहीं बन पायेगा और न ही
इसके ज्ञान को कभी-भी अधिकारिक दर्जा ही प्राप्त हो पाएगा। ज्ञान पर पेटेंट एवं
कॉपी राईट की व्यवस्था अमीर मुल्कों एवं भरत जैसे मुल्क के भी अमीर वर्ग के पक्ष
मे ही बनी रहेगी। भारत जैसे देशों का संभ्रांत वर्ग अपने आप को ब्रिटेन और अमेरिका
के साथ जोड़ने के प्रयास में लगा रहेगा। इंग्लिश मीडियम सिस्टम, जहाँ विश्व स्तर पर व्यवस्था को अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के पक्ष
में बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर, अंग्रेजी
का वर्चस्व इन विकसित देशों की तुलनात्मक स्थिति को बेहतर बनाता है। वहीं भारत
जैसे पूर्व उपनिवेश देशों में सत्ता का केन्द्र ऊपर के 3-4 % अंग्रेजी भाषी
संभ्रांत वर्ग तक ही सीमित रहता है। मौलिक ज्ञान, चूँकि
मौलिक भाषा में ही प्रतिष्फुटित हो सकता है अतः यह ज्ञान अंग्रेजी भाषी मूल्कों
में ही पैदा होगा। द्वितीयक भाषा के रूप में शिक्षा में अंग्रेजी का प्रयोग करने
वाले देश मूल रूप से अंग्रेजी का प्रयोग करने वाले देशों के पिछलग्गू ही बने रहेंगे।
यही इंग्लिश मीडियम सिस्टम आधारित व्यवस्था की विशेषता है।
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विश्व में अंग्रेजी भाषी लोगों की स्थिती को
दर्शाता भाषा नीति की वैबसाइट से प्राप्त यह चित्र । प्राथमिक एवं द्वितीयक स्तर
दोनों को मिला कर 10 % का भी आकड़ा भी पार नहीं कर
पाते । स्रोत : भाषा नीति
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