अर्थव्यवस्था के गर्भ में ‘अंग्रेजी माध्‍यम संस्‍कृति’ (इंग्लिश मीडियम कल्चर) को पैदा करने वाले साँस्कृतिक कारकों की खोज

 इस पाठ में हम भारत सरकार द्वारा जारी किए भारतीय अर्थव्यवस्था सम्‍बन्‍धी आँकड़ों के आधार पर ही अंग्रेजी माध्यम संस्कृति’ (इंग्लिश मीडियम कल्चर) को बढ़ावा देने वाले साँस्कृतिक कारकों को तलाशने का प्रयास करेंगे। प्रस्तुत पाठ में उद्धरित सभी आँकड़े भारत सरकार द्वारा जारी किए गए हैं। इस अध्‍याय में, हम आँकड़े सरकार के और विश्लेषण हमारा  के सिद्धान्त का प्रयोग करते हुए, अंग्रेजी माध्यम संस्कृति’ (इंग्लिश मीडियम कल्चर) की तरफ़ बढ़ते झुकाव के कारणों को अर्थव्यवस्था की तह से कुरेद-कुरेद कर निकालने का प्रयास करेंगे।

गौरतलब है कि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के साथ अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन आता ही है। कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की तुलनात्मक स्थिति कम होती जा रही है और उद्योग और सेवा क्षेत्र की स्थिति बढ़ती जा रही है। इसके पीछे कारण यह है कि जहाँ उत्पादन का एक सोपान ही, कृषि की प्रधानता वाले, प्राथमिक क्षेत्र में होता है, वहीं आगे के सोपान उद्योग और सेवा क्षेत्र में पूरे होते हैं। उदाहरण के तौर पर कमीज बनाने की प्रक्रिया को ही लेते हैं। सिर्फ़ कपास की फसल को तैयार करने भर की प्रक्रिया ही कृषि क्षेत्र में सम्‍पन्न होती है। उसके बाद, सारी-की-सारी प्रकियाएँ जैसे कपास के फूलों से बिनौलों को अलग करना, धागा बनाना, कपड़े को तैयार करना आदि उद्योगों में ही होती है। हर नए सोपान के साथ परिवहन, बैंकिग जैसी सेवाओं की ज़रूरत भी पड़ती ही है। अतः अर्थव्यवस्था के विकास के साथ कृषि क्षेत्र की तुलनात्मक स्थिति, अर्थात् प्रतिशत योगदान कम होता जाता है और उद्योग एवं सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जाता है। तुलनात्मक योगदान का कम होना, विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है। तुलनात्मक योगदान के कम होने की प्रक्रिया न केवल अर्थव्यवस्था के उत्पादन क्षेत्र में, अपितु व्यावसायिक संरचना अर्थात् रोज़गार के ढाँचे में भी देखने को मिलती है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि कृषि क्षेत्र बदहाल हो जाता है। दुनिया भर को गेहूँ का निर्यात करने वाले अमेरिका (यूएसए) की अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र का योगदान महज 2% का है। वहाँ की कार्यशील जनसंख्या का भी महज 2% ही कृषि कार्यों में संलग्न है। यह स्थिति सिर्फ़ अमेरिका की ही नहीं, अपितु तमाम विकसित देशों की है। तमाम विकसित देशों में 3-5% उत्पादन ही कृषि क्षेत्र में होता है और 3-5% कार्यशील जनसंख्या ही कृषि क्षेत्र में संलग्न होती है। शेष उत्पादन और रोज़गार उद्योग और सेवाओं का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों में ही होता है। अभी हम विकसित अर्थव्यवस्थाओं के किन्‍तु/परंतु ‘इफ और बट’ को चर्चा के केन्द्र में न लाकर सिर्फ़ इतना भर कहना चाहेंगे कि इन अर्थव्यवस्थाओं में भी संवृद्धि के साथ कृषि का तुलनात्मक या प्रतिशत योगदान, उत्पादन एवं रोज़गार दोनों क्षेत्रों में बेशक कम होता जाता है, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि कृषि बदहाल होती जाती है। कृषि क्षेत्र का उत्पादन लगातार बढ़ता ही रहा है और कृषि का विकास उद्योगों के विकास का मार्ग प्रशस्त करता रहा है और उद्योग पुनः कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को बढ़ाने में सहायक बनते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कृषि क्षेत्र में पैदा होने वाले कपास, गन्ना आदि, उद्योग क्षेत्र के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं, वहीं उद्योग क्षेत्र में बनने वाले कृषि औजार भी कृषि के विकास में सहायक हैं। इसी प्रकार बैंकिंग सेवा और नहरी पानी व्यवस्था के बिना कृषि क्षेत्र में सतत् विकास संभव ही नहीं है। कृषि के विकास के बिना उद्योगों और सेवा क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी, न तो कच्चा माल ही मिल सकता है और न ही खाद्य अधिशेष। अतः कृषि की खुशहाली अर्थव्यवस्था के विकास की अनिवार्य शर्त है।

अब यदि वर्ष 1950-51 तथा वर्ष 2011-12 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की उत्पादन संरचना की तुलना करें तो पाएँगे कि जो परिवर्तन विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादन की संरचना में देखने को मिलाता है, कुछ वैसा ही परिवर्तन भारतीय अर्थव्यवस्था की उत्पादन संरचना में भी आ रहा है। अर्थव्यवस्था में वर्ष 1950-51 के दौरान 59% का योगदान करने वाला कृषि क्षेत्र का तुलनात्मक योगदान, अब महज़ 13-14% के आस-पास रह गया है और 28% का योगदान करने वाला सेवा क्षेत्र, अर्थव्यवस्था के उत्पादन में 59% का योगदान करने लगा है। उद्योग क्षेत्र इका उत्पादन संरचना इमें प्रतिशत योगदान 13% से बढ़ कर 27% के लगभग हो गया है। कुछ अर्थशास्त्री इसे एक विकासात्मक परिवर्तन मानते हैं और दलील देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था परम्परागत से आधुनिक की ओर बढ़ रही है। हकीकत में यह दलील अधूरी है। पर कैसे?

ये आँकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की अधूरी तस्वीर ही दिखाते हैं। इन आँकड़ों की पोल तो उस वक्त खुल कर सामने आ जाती है, जब हम रोज़गार की संरचना पर एक निगाह डालते हैं। यदि हम चित्र संख्या-4  के आँकड़ों को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की दर्दनाक तस्वीर उभर कर सामने आ जाती है। अभी-भी 13% का आय सृजन करने वाले क्षेत्र पर 52% जनसंख्या निर्भर है। वर्ष 1950-51 में जहाँ जनसंख्या का 72% हिस्सा कृषि पर निर्भर था, वहाँ अभी-भी कार्यशील जनसंख्या का 52% के लगभग हिस्सा कृषि कार्यों में संलग्न है। अब यदि कृषि के साथ अन्य पारम्परिक गतिविधियों को भी शामिल कर लें, तो यह 60% से 65% के लगभग पहुँच जाएगा। इस प्रकार, अभी-भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा पारम्परिक एवं कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर है। अब ज़रा अन्य क्षेत्रों की आय से कृषि की तुलना करें तो कृषि क्षेत्र की दयनीय स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में लगी 52% कार्यशील आबादी की औसत आय 29 रुपये है। इसमें से आप बड़े किसानों के हिस्से को निकाल दें तो खेतीहर मज़दूरों और सीमान्त किसानों के हिस्से में शायद ही कुछ बचता हो। इसी प्रकार अपंजीकृत रूप से काम करने वाले स्व-मज़दूरों एवं निर्माण-कार्यों में लगे मज़दूरों को भी शामिल कर लें, तो कुल आबादी का 70% से अधिक हिस्सा 30 रुपए से कम आय अर्जित करने वालों में आ जाता है। परंतु देश की आय का नगण्य हिस्सा ही इस जनसंख्‍या को मिल पाता है। अब सवाल उठता है कि आखिर आय भला जाती कहाँ है? आय जाती है- उस वर्ग के पास, जो उत्पादन के नाम पर सिर्फ़ मैनीपुलेशन अर्थात् जोड़-तोड़ का काम भर करते हैं। इसमें मलाई खाने वाला रिअल एस्टेट और जमा खोरी करने वाला वेयरहाउसिंग क्षेत्र भी आ जाता है, अर्थात् उत्पादन के नाम पर सिर्फ़ मूल्यवृद्धि करने वाले क्षेत्र इसमें समाहित हैं। इसके अतिरिक्त, स्थिर एवं सुरक्षित, छठवें के बाद सातवें वेतन आयोग के अनुसार, वेतन लेने की तैयारी करने वाला सरकारी क्षेत्र भी इसी में आ जाता है। यह खाता-पीता मध्यम और उच्चवर्ग, कुल आबादी का महज़ 12-14% हिस्सा भर है। इसी वर्ग के पास एक सुरक्षित खर्च करने योग्य आय भी है। इस बिन्दु के साँकृतिक प्रभाव पर आगे चर्चा करेंगे। पर फिलहाल, आइए आँकड़ों से कुछ और भी रहस्‍य कुरेद लें।

नवउदारवाद के दौर में, कृषि की उपेक्षा की सभी हदें पार हो गयी हैं। इस नई आर्थिक नीति को अपनाने के बाद कृषि पूर्णतः हाशिये पर खड़ी है। वर्ष 2000 के बाद तो कृषि क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक ऊपरी आधारभूत संरचना/इन्फ्रास्ट्रक्चर, जैसे- सिंचाई आदि के साधनों में निवेश भी नगण्‍य रहा है। फलस्वरूप कृषि क्षेत्र पूर्णतः भगवान भरोसे  ही चल रहा है। इस तथ्य को हम चित्र संख्या-3 से स्पष्ट कर सकते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि वर्ष 2003-04 से वर्ष 2012-13 की अवधि में तीन वर्ष तो ऐसे हैं जब अर्थव्यवस्था की वृद्धि को बनाये रखने में कृषि का योगदान ही नहीं है। वर्ष 2003-04 को छोड़ दें तो शेष वर्षों में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में कृषि का योगदान शून्य के करीब ही रहा है। अर्थात् इस पूरी अवधि में कृषि पूर्णतः उपेक्षित ही रही है।

आर्थिक सर्वेक्षण के इन आँकड़ों को देखने भर से स्पष्ट हो जाता है कि पारम्परिक ज्ञान पर आधारित कृषि, अब पूर्ण रूप से घाटे का सौदा बन चुका है। यदि हम हर दूसरे-तीसरे दिन किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं के आँकड़ों को भी इन आँकड़ों में जोड़ दें, तो पाएँगे कि मध्यम, सीमान्त और खेतीहर किसान, किसी भी तरह से कृषि क्षेत्र से अपना पिण्ड छुडाना चाहता है। उदाहरण के तौर पर हम पंजाब को लेते हैं जो कि हरित प्रदेश के नाम से जाना जाता है, वहाँ किसान कर्ज में गर्दन तक डूबे हुए हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा किए गये एक सर्वे के अनुसार पिछले 15 सालों के दौरान करीब 20 हजार किसानों एवं कृषि से जुड़े ग्रामीण मज़दूरों ने आत्महत्याएँ की हैं। ये सभी पंजीकृत आत्महत्याएँ हैं, जबकि सैकड़ों अन्य ऐसे मामलों को पुलिस ने पंजीकृत ही नहीं किया है। (सुनिल कुमार) अतः स्पष्ट होता है कि एक सधारण दर्जे के किसान के लिए कृषि में गुजारा कर पाना ही नामुमकिन हो गया है। खैर, इस मुद्दे पर आगे चर्चा करेंगे। परंतु इससे पहले हम ज़रा कुछ और बिन्दुओं पर भी निगाह डाल लें।

जीडीपी में हेरा-फेरी (मैनीपुलेशन)

सर्वप्रथम, यही प्रश्न खड़ा होता है कि ये जीडीपी क्या बला है? जीडीपी, जो ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट  या  सकल घरेलू उत्पाद  का संक्षिप्‍त रूप है। एक वर्ष की अवधि में जितना भी उत्पादन प्रक्रिया के दौरान वस्तुओं के विनिमय मूल्य में वृद्धि होती है, उसे जीडीपी  कहा जाता है। यह तो हुई तकनीकी परिभाषा, अब देखते हैं कि इसका मैनीपुलेशन अर्थात् हेरा-फेरी। उदाहरण के तौर पर प्याज़ को लेते हैं। मान लो, एक किसान प्याज़ की फसल को उगाने के लिए  कच्चे माल के रूप में खाद, बीज आदि खरीदने पर 8,000 रुपए खर्च करता है और फिर अपनी मेहनत (हल-बैल, ट्रेक्टर आदि साधनों) का प्रयोग करके फसल तैयार करता है। फसल तैयार होने की प्रक्रिया में वह तीन–चार महीने तक फसल को खेत में अगोरने का रिस्क भी लेता है और फिर 10 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 1000 किलो प्याज़ बेच देता है। इस प्रकार उसे 10,000 रुपए प्राप्त होते हैं। इस 10,000 रुपए में से यदि लागत 8,000 रुपए की है, उसको घटा दें तो शेष बचते हैं- 2000 रुपए। ये दो हजार रुपए ही एक किसान का तीन-चार महीने तक धूप-गर्मी सहने का प्रतिफल है। यही किसान का जीडीपी में योगदान है। अब मान लीजिए प्याज़ का स्टॉक अर्थात् जमाखोरी करने वाली कोई  कखग नाम की कम्‍पनी है। यह कखग कम्पनी, किसानों से 10 रुपए प्रति किलो के हिसाब से प्याज़ खरीदती है और अगले तीन महीने तक उसकी जमाखोरी करती है। फिर जैसे-जैसे बाजार से प्याज़ खत्‍म होता जाता है, वैसे-वैसे प्याज़ की कीमतें बढ़ती जाती हैं और तीन महीने बाद प्याज़ की कीमत 10 रुपए से बढ़ कर 100 रुपए हो जाती है। तब कखग कम्पनी  उस 10 रुपए पर खरीदे गए प्याज़ को 100 रुपए में बेच देती है और इस प्रकार वह जमाखोर कंपनी 90 रुपए प्रति किलो की मूल्यवृद्धि करके मुनाफ़ा कमाती है। जहाँ चार-पाँच महीने तक खेत में फसल को खड़ा करके धूप, गर्मी, बरसात सहने वाला किसान जीडीपी में महज 2 रुपए प्रतिकिलो का योगदान कर पाता है। उसके हिस्से में 2 रुपए प्रति किलो के हिसाब से ही आय होती है। वहीं जमाखोरी करने वाली कंपनी 90 रुपए प्रति किलो की मूल्यवृद्धि करती है। उसकी आय 90 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बनती है। कखग कम्पनी, कारोबार/बिजनेस करती है और बिना कुछ किए लाखों के वारे-न्यारे करती है। वहीं दूसरी ओर, किसान रात-दिन खट कर भी इतना नहीं कमा पाता कि वह दो-जून की रोटी भी कमा सके। यही जीडीपी की हेराफेरी या मैनिपुलेशन कहलाता है।

अब ज़रा चित्र संख्या-7  पर एक निगाह डालें, जो असंगठित क्षेत्र तथा संगठित क्षेत्र में कामगारों के विभाजन से सम्‍बन्धित है। पर इससे पहले, संगठित तथा असंगठित क्षेत्र में जो अंतर है, उस पर भी चर्चा कर लें। जहाँ संगठित क्षेत्र में आय और रोज़गार की सुरक्षा होती है। न केवल हर माह समय पर पगार मिलती है अपितु पगार में यथोचित वृद्धि के साथ महगांई भत्‍ते का भी लाभ हासिल होता है। इसके अतिरिक्त, अस्पताल और रिटायरमेंट के बाद पैन्‍शन आदि जैसी सामाजिक सुरक्षा सेवाओं का लाभ भी संगठित क्षेत्र के कामगारों को ही प्राप्त होता है। असंगठित क्षेत्र में वे सभी आ जाते हैं जिनको इन में से किसी-भी लाभ की गारंटी नहीं है।

अब रोज़गार संरचना को दर्शाने वाले चित्र संख्या-7 पर गौर करें, तो पाते हैं कि महज 4% जनसंख्या ही संगठित क्षेत्र में स्थाई तौर पर काम कर रही है। शेष सभी या तो असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं अथवा संगठित क्षेत्र में ही ठेके प्रणाली पर काम करने वाले अस्थाई कामगार। कुल संगठित क्षेत्र में काम पर लगे लोगों की संख्या को देखें तो यह कुल जनसंख्या का महज 15% के आस-पास है। ऊपर के 4% लोग ही स्थाई रोज़गार और बीमारी भत्ता, पैन्‍शन आदि जैसे समाजिक लाभ को प्राप्त कर पाते हैं। संगठित क्षेत्र के ही शेष 11% अस्थाई एवं ठेका-कामगार कुछ हद तक उन सभी लाभों की मांग करने की स्थिति में हैं, जो उनके संगठित क्षेत्र के अन्य सहकर्मी प्राप्त करते हैं। जैसे सरकारी स्कूली व्यवस्था में ही दो तरह के शिक्षक हैं। एक जो नियमित हैं और दूसरे जो अनियमित हैं। एक तरफ़ नियमित शिक्षक पूरा वेतन और तमाम दूसरी सुविधाएँ एवं भत्ते पाते हैं, वहीं अनुबंध शिक्षक अस्थाई तौर पर तयशुदा वेतन पर ही गुजारा करते हैं। निजी क्षेत्र के स्कूल, जो कहने के लिए तो संगठित क्षेत्र में ही आते हैं, पर इस क्षेत्र के अधिकतर शिक्षकों की हालत इतनी खस्ता है कि उसके बारे मे लिखने में भी संकोच ही होता है। इन स्कूलों में अधिकतर शिक्षक तो ऐसे हैं जो तनख्वाह तो दो कौड़ी की लेते हैं, पर बेचारे हस्ताक्षर पूरे पर करते हैं। उसके बाद बची देश के 85% कामगार आबादी तो बस भगवान भरोसे ही गुजर-बसर कर रही है। उनके नाम पर रोज़गार गारंटी योजना से लेकर वृद्धा अवस्था पैन्‍शन जैसी अनेकों योजनाएँ चलती हैं, पर शायद ही किसी का लाभ, वास्तव में उन तक पहुँचता होगा।

बहरहाल, संगठित क्षेत्र एक अनार, सौ बीमार  की कहावत को ही सत्यार्थ कर रहा है। हर व्यक्ति का सपना संगठित क्षेत्र का रोज़गार है, पर श्रेष्ठ समझे जाने वाले इस संगठित क्षेत्र में एक तो नौकरी अर्थात् जॉब कम हैं। दूसरे, उन नौकरियों में वृद्धि दर कम ही नहीं, कई बार ऋणात्मक प्रवृति भी देखने को मिलती है। इस तथ्य को हम चित्र संख्या-8 में देख सकते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि आकर्षित करने वाले इस रोज़गार क्षेत्र का दायरा ग्लेशियर पर जमी बर्फ़ की तरह कम होता जा रहा है। समाज के हर वर्ग की लड़ाई इस 4% के रोज़गार क्षेत्र को लेकर ही है। सरकार के द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग को दिए जाने वाले नौकरियों के आरक्षण के लाभ भी इस घटते 4% के किसी कोने में ही सिमट कर रह जाते हैं। निजी क्षेत्र में जिस आऱक्षण की मांग की जा रही है, उसका दायरा भी इस 4% से बाहर नहीं निकल पाता। मण्‍डल से लेकर कमण्‍डल तक की राजनीति भी इस 4% के दिवास्वप्न को लेकर ही हो रही है।

शायद यह महज़ इत्तफ़ाक से बना संयोग मात्र हो, पर यह संयोग न होकर सत्य हुआ तो? इस देश में 4% लोग संगठित क्षेत्र में स्थाई पदों पर हैं और इत्‍तफ़ाकन 3-4% ही अंग्रेजी का ठीक-ठाक प्रयोग करने की क्षमता भी रखते हैं। इस देश में लगभग 10-12% का उच्च मध्यम वर्ग है। 10-12 % के आस-पास लोगों की द्वितियक भाषा अंग्रेजी है। यही फलता-फूलता मध्यम वर्ग ही महँगे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं के फार्म खरीदने की लाईन में खड़ा रहता है और यही वर्ग अपने बच्चों को महँगें ‘हाई-फाई’ स्कूलों में पढ़ाने की क्षमता रखता है। अर्थात् इन स्कूलों की फीस और फीस के अतिरिक्त जो भी एजुकेशन के नाम पर चलता रहता है, उन सभी को वहन करने की क्षमता रखता है। इसी मध्यम वर्ग की ही तीव्र इच्छा अंग्रेजी-भाषी बनने की है और यही मध्यम वर्ग ग्लोबलाइजेशन, लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन (भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण) की नीतियों से लाभान्वित भी हुआ है। इस वर्ग का ही आइडियल कल्चर,  अमेरिकी समाज का लाइफ स्टाइल है। इस वर्ग का वास्तविक आदर्श अमेरिकी लाइफ स्टाइल  के साथ-साथ इस देश का एलिट क्लास भी है। इंडिया दैट इज भारत के  0.23% लोग ही अंग्रेजी को प्राथमिक रूप से प्रयोग करते हैं और एलिट वर्ग अर्थात् ज्ञान, न्याय, राजनीति, पूँजी, नैकरशाही, पत्रकारिता, अर्थात् सत्ता के तमाम शीर्ष ओहदों और उसके आस-पास विराजमान व्यक्तियों, उनके परिवारों की अलग-से गणना करें, तो यह संख्या शायद ही 10-20 लाख को भी पार कर पाएगी। ये आँकड़े उन्‍नीस-बीस हो सकते हैं, पर यह इत्‍तफ़ाक, एक कटु सच्चाई को व्यक्त करता है कि इस देश के एलिट क्लास की प्राथमिक भाषा ही अंग्रेजी है। एलीट सोसाइटी में ही अंग्रेजी का प्रयोग भी होता है। इस सोसाइटी के लोग बेशक नौकरों से बात-चीत के लिए भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हों, पर इनका खुद का औपचारिक एवं अनौपचारिक रूप में होने वाला प्राथमिक संवाद अंग्रेजी में ही होता है। अंग्रेजी इस संभ्रान्‍त (एलीट) वर्ग की ही भाषा है। इसी वर्ग की संस्‍कृति, इंग्लिश मीडियम कल्चर है। ये लोग मिल कर एक तंत्र / सिस्टम बनाते हैं। उसे हम अंग्रेजी माध्‍यम तंत्र / इंग्लिश मीडियम सिस्टम  कह सकते हैं।


 

चित्र संख्या 1                                                       

 

 

 

 

चित्र संख्या 2

 

 

 

 

 

 

 

चित्र संख्या 3: अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में विभिन्न क्षेत्रों का योगदान, सन्दर्भ:आर्थिक सर्वेक्षण 2012 -13

 

 

 

 

चित्र संख्या 4 -  श्रम उत्पादकता के आधार पर रोज़गार का वितरण, सन्दर्भ आर्थिक सर्वेक्षण 2012

चित्र संख्या 5 - खुद देख कर पता लगाएँ कि किस क्षेत्र मे भविष्य सुरक्षित है। सन्दर्भ आर्थिक सर्वेक्षण 2012

 

 

 

 

 

चित्र 6 : जीडीपी सवृद्धि में विभिन्‍न क्षेत्रों का योगदान को दर्शाता यह चित्र। आखिर कौन सा क्षेत्र आज के युग का आदर्श है और उस क्षेत्र में वर्चस्व प्राप्त लोगों की भाषा क्या है?

 

 

चित्र संख्‍या 7– संगठित क्षेत्र में एक तो रोजगार कम दूसरा संवृद्धी भी ऋणात्मक । स्थिति एक अनार सौ बीमार की। वही संगठित क्षेत्र का सम्पूर्ण पदक्रम ही जब अंग्रेजी आधारित हो, तो गली-गली में खुले ये इंग्लिश कोचिंग सेंटर उस अनार को पाने की लालसा का ही      परिणाम तो नहीं।

चित्र संख्या – 8

इन आकड़ों को देख तो यही लगता है कि जय किसानतो अब नारों में ही अच्छा लगता है।

इस पाठ के सभी आकड़ों का स्रोत्र- आर्थिक सर्वेक्षण 2012

अंग्रेजी माध्‍यम तंत्र (इंग्लिश मीडियम सिस्टम) की संस्‍कृति (कल्चर) हमें किस प्रकार प्रभावित करती है, इसका आकलन हम अगले अध्‍याय में करेंगे।

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