भाषा एवं संस्कृति को समझने हेतु कुछ विशेष अध्ययन
भाषा और संस्कृति का गहरा सम्बन्ध है। भारत जैसे देश में जहाँ अंग्रेजी माध्यम शिक्षण’ अपने आप में एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। ग्रामीण, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के लगभग सभी बच्चे इंग्लिश मीडियम शिक्षण व्यवस्था में सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा की बाधा को न पार कर पाने की वजह से किसी भी विषय को नहीं समझ पाते और पिछड़ते जाते हैं। आज भी बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रामीण एवं शहरी निम्न एवं निम्न मध्यम वर्ग के अधिकतर विद्यार्थी अंग्रेजी में ही ‘फेल’ होते हैं। और साथ यह मिथक भी प्रचलित है कि बिना अंग्रेजी के आप दुनिया के किसी दूसरे हिस्से से संपर्क ही नहीं कर सकते, बाहर के देशों में नौकरी नहीं कर सकते। “आपका ज्ञान ग्लोबल ज्ञान बने इसके लिए सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा सीखना ही काफी नहीं है अपितु बाकी सभी विषयों को भी अंग्रेजी में पढ़ना और ज्ञान हासिल करना जरूरी है। तब ही आप दुनिया के किसी भी कोने में ‘सर्वाइव’ कर पाओगे, अन्य देशों तथा एमएनसी में जॉब कर पाओगे।” “ सरकारी नौकरी कौन-सी बिना अंग्रेजी के मिल जाती है। सरकारी नौकरी की हर स्तर की परीक्षा के लिए अंग्रेजी अनिवार्य है।” “लेकिन यहाँ एक सवाल यह भी पैदा होता है कि पुराने समय में जो लोग बिना भाषा ज्ञान के ही एक देश से दूसरे देश में किस प्रकार जाते थे और वे वहाँ किस प्रकार से विचार-विनिमय करते थे।” “जिन दिनों ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पाँव भारत की सरज़मीं पर कदम रखे, उस वक्त भारत में किसको अंग्रेजी आती थी। अंग्रेजी बोलने वाले लोग मिलेंगे तब ही व्यापार होगा। इस आधार पर तो अंग्रेजों को एशिया और अफ्रीका की सरज़मीं पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था।” नालंदा और तक्षशिला में पढ़ने आने वाले विदेशी विद्यार्थी क्या भारत के इन विश्विद्यालयों में प्रचलित भाषा सीख कर पढ़ने आते थे।” “आज कल तो कहते हैं कि अंग्रेजी की वजह से ही विदेशी एमएनसी कपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं। अंग्रेजी माध्यम के शिक्षित लोग नहीं मिले तो ये कम्पनियाँ वापस लौट जाएँगी। देश के विकास का पैमाना कहलाने वाला जीडीपी का ग्राफ नीचे गिर जायेगा। अतः देश के विकास के लिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा जरूरी है।”
ये सब बातें कुछ यक्ष प्रश्नों
के रूप में लोगों से बातचीत के दौरान मिलीं। मैंने तो बस उन कुछ बातों को
जोड़ कर ऊपर का पैरा भर लिखा है। असल सवाल
तो इससे भी कहीं ज्यादा बड़ा है। यह तो संभव नहीं कि नालंदा एवं तक्षशिला में आने
वाले विद्यार्थियों की केस स्टडी करने के लिए हम बीते समय में जाएँ। पर हम कुछ ऐसे
व्यक्तियों को तो खोज ही सकते हैं, जिन्होंने अपने ‘प्राथमिक-भाषा-परिवेश’ से बाहर निकलकर ‘दूसरे- भाषा-परिवेश’ में जाकर दूसरी भाषा को सीखी हो
और उस क्षेत्र में जीवन जीने के माध्यम के रूप में प्रयोग भी किया हो।
भाषा तथा संस्कृति के सम्बन्धों को समझने हेतु कुछ विशेष साक्षत्कार
उन लोगों के हैं, जो जब अपने मूल साँस्कृतिक परिवेश में थे तब उन्हें दूसरे
साँस्कृतिक परिवेश की भाषा का कोई ज्ञान हासिल ही नहीं था। उस भाषा को उस नए
सामाजिक, साँस्कृतिक
परिवेश में जाकर ही सीखा। एक डेढ़ वर्ष के बच्चे की केस स्टडी भी है जो अपनी
प्रथम भाषा को सीखने की प्रक्रिया में है।
इस बात को एक्सप्लोर करने अर्थात्
खोजने हेतु निम्नलिखित व्यक्तियों
से भिन्न-भिन्न तरीकों से केस स्टडी की गई -
1) ज्योतिसंग जी, जिन्हें भारतीय साँस्कृतिक
परिवेश में हिन्दुस्तानी, पंजाबी आदि भाषाएँ आती हैं। स्कूल-कॉलेज में पढ़ कर
अंग्रेजी का ज्ञान भी हासिल कर लिया। पर जर्मनी जाकर ही पता चला कि यहाँ कोई अंग्रेजी नहीं जानता और
थोड़ा बहुत कोई जानता भी है, तो वह अंग्रेजी में बात ही नहीं करता।
2) डॉ. लाल बहादुर वर्मा
जी जिन्होंने भारत में रहते हुए हिन्दी, अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हासिल किया।
पूर्वांचल के होने की वजह से अवधी और भोजपुरी उनकी रगों में थी। पर फ्रांस के
एयरपोर्ट पर उतर कर ही पहला फ्रेन्च शब्द सुना और तीन वर्ष पश्चात् फ्रेंच में ही
अपनी पोस्ट डोक्टरेट रिसर्च प्रस्तुत की। अब तक अनेकों पुस्तकें फ्रेंच से हिन्दी
में अनुवादित कर चुके हैं।
3) रवि रंजन जी ने तो कभी
रूसी के बारे मे सोचा भी न था। पर आजकल रूसी भाषा में ही सपने देखते हैं। वह तो
इत्तिफ़ाक था कि भारत के किसी भी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला नहीं हुआ। फिर उन्होंने
रूस से इंजीनियरिंग करने की सोची।
4) ईराक में पैदा हुए
पले-बढ़े अब़ास ख़िद़र साहब, जिन्होंने ईराक में अपनी ख़ुर्द ज़ुबान में लिखना
शुरू किया। पर सद्दाम के डर से जर्मनी भागे। एक बार तो उम्मीद ही छोड़ दी कि वे अब
लिख भी पाएँगे। फिर एक रोज जब उन्हें लगा कि रात को उन्होंने जर्मन में स्वपन देखा
है तो उन्होंने जर्मन में लिखना प्रारम्भ किया।
ज्योति संग जी-
ज्योतिसंग 1970 के दशक में ज़मीन के रास्ते 9 महीनों की लम्बी यात्रा
के पश्चात् जर्मनी पहुँचे। अपने इस प्रवास के दौरान सिर्फ़ भारत से अफगानिस्तान तक
की यात्रा ही उन्होंने वायु मार्ग से की, इसके आगे की यात्रा
हेतु उन्होंने सड़क मार्ग, रेल मार्ग का प्रयोग किया। उनके ही शब्दों में, “सड़क मार्ग में, मैंने सिर्फ़ बस की सवारी ही नहीं की
अपितु इक्का-तांगा जो मिला उससे अपनी यात्रा को आगे बढाया। इस दौरान पश्चिम एशिया
तथा पूर्वी यूरोप के कई देशों के बॉर्डर को भी पार किया। अलग-अलग देशों में
अलग-अलग भाषाओं का भी सामना किया। जब संपर्क स्थापित करने का कोई रास्ता ना बचता
तो इशारों की भाषा से भी काम चलाया जाता था। इस प्रकार लम्बी परन्तु कठिन यात्रा
के उपरांत मैं जर्मनी पहुँचा।”
ज्योतिसंग जी से जब पूछा गया कि जर्मनी जाने से पूर्व भारत में क्या
करते थे? और जर्मनी जाने की योजना किस प्रकार अंजाम दिया?
इस पर ज्योतिसंग जी का जबाब था, “जर्मनी जाने से
पूर्व मैं भी वही कर रहा था जो देश के अन्य मेरी उम्र के युवा करते हैं, अर्थात् पढ़ाई पूरी करके, मैं एक कंपनी में काम करता था। जर्मनी जाने का
फैसला एकाएक लिया फैसला था, जिसकी कोई योजना तय नहीं थी। बस मैं रोज की दिनचर्या से ऊब गया था। एक
रोज जब मेरे पास 1500 रुपये इकट्ठे हो गए तो मैंने अपने घर में अपनी जर्मनी जाने
की इच्छा व्यक्त की और निकल पड़ा।”
शोधकर्ता ने आगे पूछा, “पर जर्मनी ही
क्यों? फ़्रांस, जापान, इंग्लैण्ड भी तो जा सकते थे।”
ज्योति संग जी “ये तो मेरे लिए भी कहना मुश्किल
है। हमारा परिवार बँटवारे
(भारत-पाकिस्तान) के समय पश्चिमी पाकिस्तान से भारत आया था। मेरी खुद की पैदाइश
भारत की ही थी। पर जब से होश संभाला तब से मन में एक इच्छा थी कि उस सरज़मीं को
देखूँ जहाँ मेरे पुरखे रहते थे। पर भारत
पाकिस्तान की 1971 की लड़ाई के बाद पाकिस्तान जाने का रास्ता बंद हो गया। इसी क्रम
में बचपन से एक और इच्छा पैदा हो गयी थी कि जर्मनी जाना है। शायद अन्दर की प्रेरणा
रही हो, कुछ कह नहीं सकता”। “बस एक रोज मन में आया, सूटकेस उठाया और चल दिया। पासपोर्ट तो पहले से था ही। हाँ, वीज़ा की व्यवस्था रास्ते भर करते रहे।”
शोधकर्ता ने आगे पूछा- “कभी आपके मन में नहीं आया कि अलग-अलग देश अलग-अलग भाषाएँ किस प्रकार पार
पाएँगे।”
ज्योति संग जी, “जैसा कि आज भी हर हिन्दुस्तानी
के दिमाग में एक भ्रम है कि अंग्रेजी पूरी दुनिया में बोली और समझी जाती है। हमारे
दिमाग में भी यही था। हालाँकि मेरी शिक्षा यहीं फरीदाबाद के सरकारी स्कूल में ही
हुई। हमारे समय में प्राइवेट स्कूलों का कोई ऐसा चलन भी ना था। चलन नहीं था क्योंकि
लोगों के पास पैसे भी नहीं थे। अंग्रेजी भी छठी कक्षा के बाद ही शुरू होती थी। पर
दुनिया देखने की इच्छा ने मुझे अंग्रेजी सीखने को प्रेरित किया। मैं समझता था कि
दुनिया के दूसरे मुल्कों में भी लोग हमारी तरह अंग्रेजी पढ़ते होंगे और अंग्रेजी
की दो-चार लाइनें बोल कर खुद को शहंशाह समझते होंगे।”
शोधकर्ता ने आगे जानना चाहा, “तो आपको प्रवास के
दौरान अंग्रेजी भाषा का फायदा हुआ?”
“ये मेरा भ्रम था, जो इस यात्रा
के दौरान टूटा। जब आप हवाई-जहाज से यात्रा करते हैं। तो आपको
आभास नहीं होता। उसमें आपको अटैंड करने वाली ‘ट्रेंड’
होस्टेस होती है। हवाईअड्डे का स्टाफ़ भी ‘ट्रेंड’ होता है। पर जब आप
ज़मीन के रास्ते यात्रा करते हैं तो आपका सामना ज़मीन के लोगों से होता है और ये
लोग ना तो ट्रेंड होते हैं, ना ट्रेंड लोगों की तरह नकली
मुस्कान और बनावटी भाषा लिए हुए होते हैं। अतः इस प्रवास में मुझे इन्हीं लोगों से
रूबरू होना पड़ा। हर तरह के लोग, कुछ ने गाली दी तो कुछ ने
प्यार भी जताया। इस प्रक्रिया में वो भाषा काम में आई जो हर देश के एक विशेष किस्म
के लोग इस्तेमाल करते हैं- वो है गूँगों की भाषा। अर्थात् अफगानिस्तान से जर्मनी
तक की यात्रा में ‘इशारों की भाषा’ ने
ही ज्यादा साथ दिया।”
शोधकर्ता ने विचार-विमर्श को गति देने के लिए कहा, “फिर जर्मनी में काम कैसे चला? क्या इंग्लिश ने आपको
सहायता प्रदान की?”
“जर्मनी में पहले तो कोई इंग्लिश जानता नहीं और यदि
कोई जानता भी तो बोलने को तैयार नहीं। बड़ी
अजीब-सी स्थिति हो गई थी मेरी। वही इशारों की भाषा से काम चलता रहा। पर आश्चर्य तब
हुआ जब बिना किसी कोचिंग के, मैं कुछ ही दिनों में कुछ शब्द बोलना सीख गया। शब्द
मानों खुद-ब-खुद मेरे अन्दर आकर बस रहे थे। हर रोज जर्मनी के कुछ ज्यादा करीब आ
जाता। वहाँ पर मेरी जिन्दगी को सहारा एक जर्मन छात्रा ने दिया जिसकी रुचि
हिंदू-माइथोलॉजी (पुराण-विद्या) में थी। इस रुचि की वज़ह से उसे भी कुछ-कुछ हिंदी
आती थी और मेरी हालत उस वक्त कुछ साधुओं जैसी हो गई थी। कपडे़ फटे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई। पर जब मैंने बताया कि मैं ग्रेजुएट हूँ तो उसे आश्चर्य
हुआ। मैंने उसे रामायण और महाभारत की कहानियों का सार बताया। वह अगले दिन मुझे
अपने साथ अपने विश्वविद्यालय ले गई। वहाँ भारतीय माइथोलॉजी में रुचि रखने वाले
विद्यार्थियों का एक समूह था। वहाँ रामायण की कहानी सुनाई,
जिसका उसने जर्मन अनुवाद उन छात्रों को समझाया। वार्ता के अंत में उसने मेरा परिचय
उन छात्रों से करवाया और फिर क्या था, मेरे रहने और खाने की
समस्या हल हो गई। रहने के लिए उन्हीं छात्रों के होस्टल में जगह भी मिल गई और खाने
के लिए ‘कूपन’ भी।” (नोट : जर्मन सरकार उन दिनों विद्यार्थियों को मैस में भोजन के मुफ्त कूपन
उपलब्ध कराती थी) और पढ़ाने के काम के रूप में भारतीय माइथोलॉजी की कक्षा, सब एक साथ मिल गया।”
कुछ देर रुक कर ज्योति संग ने आगे साँस खीचते हुए कहा, “जर्मनी में वो विद्या काम नहीं आई, जो मुझे कॉलेज से
मिली थी। वहाँ वो विद्या और कला काम आई जो मुझे घर-परिवार से विरासत के रूप में
मिली थी।” ज्योति संग जी ने बताया कि रामायण, महाभारत आदि की कहानियाँ उन्होंने माँ-दादी से सुनी थीं और उसे कलात्मक
रूप से प्रस्तुत करने की कला पिता से सीखी
थी। मेरे पिता रंगमंच के कलाकार थे तथा रामलीला में भी भाग लेते थे।”
शोधकर्ता ने वापस उन्हें विषय पर लाने के लिए पूछा, “फिर जर्मन भाषा कैसे सीखी। क्या जैसे भारत में इंग्लिश सीखने के लिए
इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स ‘ज्वाइन’ करते
हैं। उसी प्रकार आपने जर्मन स्पीकिंग कोर्स ज्वाइन किया।”
ज्योति संग- “नहीं! कोई कोर्स ज्वाइन करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हर
रोज सुबह उठने के साथ लगता कि आज कुछ नया सीख लिया है। ठीक उसी तरह जैसे एक बच्चा
सीखता है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे मैं उनकी संस्कृति को समझता गया वैसे-वैसे उनकी
भाषा भी सीखता गया।”
शोधकर्ता ने फिर कुरेदा,
“तो फिर क्या आपने जर्मन सीखने हेतु किसी संस्था में दाखिला
नहीं लिया?”
“नहीं, अगले दो वर्ष तक कोई
नहीं। इस बीच मैं अच्छा खासा जर्मन बोलने लग गया था। जर्मन में ही रामायण और
महाभारत के किस्से भी सुनाया करता था। पर दो साल बाद जब मैंने यूनिवर्सिटी में
कोर्स ज्वाइन किया। जिसका उदेश्य जर्मन सीखना कम और जर्मनी की सरकार छात्रों को जो
फायदे प्रदान करती है वो लेना अधिक था।”
शोधकर्ता- “तो फिर इस कोर्स से कुछ तो फायदा हुआ ही होगा।”
ज्योति संग जी- “फायदा! यदि मैं आर्थिक फायदे की
बात करूँ तो हाँ, विद्यार्थियों को मिलने वाले फ्री कूपन, पार्ट
टाइम वर्क परमिट, आदि आदि, पर भाषा के विषय में बात कहूँ तो
नहीं।” थोडा रुक कर, “देखो! दो सालों
के अन्दर जो जर्मन मैंने सीखी, वह लोगों से संपर्क के जरिये
सीखी, मतलब वह स्ट्रीट की भाषा थी। ये
जर्मन मैंने उन छात्रों के बीच रहकर तथा इधर-उधर के लोगों से संपर्क में आकर सीखी, इस शहर-उस शहर जो मैंने
प्रोग्राम किये, इन सब के दौरान जो लोगों से बातचीत हुई, उससे
सीखी। यह स्ट्रीट की जर्मन थी। पर जब मैंने यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तो वहाँ
जो सिखाया गया, वह स्थापित मानक जर्मन था। उस जर्मन में जर्मनी के एक कोने से
दूसरे कोने की विविधता, मेल और प्रेम गायब था। पूर्व की
जर्मन पर रूसी भाषा का प्रभाव दिखता है। तो पश्चिम की जर्मन पर फ्रेंच का। पर
विश्वविद्यालय की जर्मन में ये दोनों ही गायब होती हैं।”
एक बार रुक कर, “जर्मनी ही नहीं, किसी भी देश का, कोई भी विश्वविद्यालय संस्कृति की
भाषा नहीं सिखा सकता। भाषा सिखाने का जो
कारोबार है वह महज स्थापित भाषा को सिखाने तक ही सीमित है। हिंदुस्तान में हिंदी
और अंग्रेजी सिखाने का जो कारोबार है वह क्या है? स्कूल-कॉलेजों
की हिंदी लोगों द्वारा बोले जाने वाली आम बोलचाल की भाषा से भिन्न है और हमारे
यहाँ पढ़ाई जाने वाली इंग्लिश भी इंग्लैण्ड, अमेरिका में
बोली जाने वाली इंग्लिश से भिन्न है। दुनिया का कोई भी विश्वविद्यालय साँस्कृतिक
भाषा को नहीं सिखा सकता। ”
डॉ. लाल बहादुर वर्मा जी
डॉ. लाल बहादुर वर्मा का संक्षिप्त परिचय यह है कि वे इतिहास के एक
प्रतिष्ठित विद्वान हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होने के पश्चात्
सामाजिक रूप से सक्रिय हैं। फ्रेंच की बहुत-सी मूल पुस्तकों को हिंदी में अनुवादित
कर चुके हैं।
डॉक्टर लाल बहादुर वर्मा जिन दिनों गोरखपुर विश्वविद्यालय में थे। उन
दिनों (वर्ष 1967 में) उन्हें फ्रांस सरकार से पोस्ट डॉक्टरेट रिसर्च हेतु
फैलोशिप प्राप्त हुई। तीन साल के फ़्रांस प्रवास के दौरान ना केवल उन्होंने अपना
रिसर्च कार्य पूरा किया अपितु अपनी रिसर्च को उस भाषा में लिखा जिससें वो तीन साल
पूर्व तक परिचित भी नहीं थे।
शोधकर्ता ने उनकी बाकी
उपलब्धियों को पीछे रख उन्होंने फ्रेंच भाषा पर जो अल्पकाल में पकड़ हासिल की उसके
बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाही।
शोधकर्ता- “क्या आपको फ्रांस जाने से पूर्व फ्रेंच भाषा का
ज्ञान था?”
डॉ. वर्मा, “नहीं मुझे फ्रांस जाने से पूर्व फ्रेंच भाषा का कोई
ज्ञान नहीं था। यह भाषा पूर्णतः फ्रांस
प्रवास के दौरान ही सीखी। सिर्फ़ सीखी ही नहीं, तीन साल बाद
अपना रिसर्च थीसिस भी उसी भाषा में जमा कराया।”
शोधकर्ता- “आपको फ्रेंच भाषा सीखने में कुल कितना समय लगा?”
डॉ. वर्मा, “चूँकि यह पहले से ही तय था कि मुझे अपना काम फ्रेंच
में ही करना है। अतः सीखने की प्रक्रिया तो एअरपोर्ट पर उतरने के साथ ही शुरू हो
गई थी। पर विश्वविद्यालय में जिस प्रकार से सामाजिक एवं साँस्कृतिक संदर्भो के साथ
सिखाया गया तथा जो सामाजिक सम्पर्क स्थापित हुआ, उसने सीखने में गति प्रदान की, इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय में भी भाषा सिखाने हेतु विशेष तकनीक का
प्रयोग भी होता था, जैसे ऑडियो-विजुअल साधनों का प्रयोग, उच्चारण
सिखाने के लिए ऑडियो। पहले हम बोलते फिर उसी का उच्चारण सुनते और गलती को सुधार कर
फिर से उच्चारण करते। इस प्रकार अगले 9
महीने में इस योग्य हो गए कि फ्रेंच में काम करने लगे। मैं ही नहीं, मेरे साथ के दूसरे स्कॉलर थे, वे सभी।
शोधकर्ता- “क्या सिखाने के दौरान इंग्लिश या किसी अन्य भाषा का भी प्रयोग हुआ?”
डॉ. वर्मा, “सिखाने की प्रक्रिया में किसी भी दूसरी भाषा का
प्रयोग वर्जित था। हमने सीधे फ्रेंच से ही फ्रेंच सीखनी थी। संपर्क करते गए,
जानते गए और सीखते गए। इस प्रक्रिया में क्लास रूम से कहीं ज्यादा
भूमिका क्लास रूम के बाहर के वार्तालाप की भी थी। सब जानते थे कि ये नए हैं,
इसलिए सभी सहयोग भी करते थे और बाहरी लोगों के लिए भी अपनी ज़रूरत पूरा करने हेतु
फ्रेंच के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। ”
शोधकर्ता- “तीन वर्ष बाद आपने थीसिस किस भाषा में लिखी तथा क्या
उस दौरान कोई दिक्कत आई?”
डॉ. वर्मा, “मैंने अपनी थीसिस फ्रेंच में प्रस्तुत की, 9 महीने बाद जब अनुसन्धान का काम शुरू किया,
वह पूर्णतः फ्रेंच में ही था। थीसिस लिखने
में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। हाँ ! प्रूफ रीडिंग के दौरान जरूर मैंने थोड़ी मदद
ली। देखिये, थोडा गैप तो बना ही रहेगा। एक वो जो शुरू से वहाँ रह रहे हैं और दूसरे
हम जो इस संस्कृति से उस में गए हों।। निस्संदेह एक जो वहाँ शरू से रह रहे हैं,
उनकी भाषा पर पकड़ हमसे बेहतर ही होगी। ”
शोधकर्ता- “यदि फ्रेंच सीखने और इंग्लिश सीखने में तुलना करनी हो तो।”
लाल बहादुर वर्मा जी, “बात फ्रेंच और
इंग्लिश की नहीं है। बात किस तरह सीखे, इसकी है। हम भारत में
इंग्लिश कैसे सीखते हैं। हम उसे अनुवाद करते हुए सीखते हैं। अंग्रेजी के ग्रामर में
शब्दों को भरते हुए सीखते हैं, जैसे I के साथ Have लगेगा He और She के साथ has हम महज ऊपरी तौर पर भाषा को जानते हैं। पर हम वहाँ प्रयोग करते हुए सीखते
हैं तो सीखना आसान हो जाता है। इस सीखने की प्रक्रिया में मोची, नाई, धोबी, बच्चा, बूढ़ा हर एक हमारा गुरू होता है। पर हम भारत में अंग्रेजी कैसे सीखते हैं? हम सीखते हैं पुस्तकों से, एक अंग्रेजी का जानकार
है। वो हमें सिखा रहा है और हम उसे रट रहे हैं। इसलिए 15-20 साल पढ़ने के बाद भी
इंग्लिश में हमारी समस्या बनी रहती है।”
शोधकर्ता- “फ़्रांस प्रवास के दौरान कुछ विशेष अनुभव।”
डॉ. वर्मा- “हिंदुस्तान में हमें यूरोप का वही साहित्य मिल पाता
है जो इंग्लिश में अनुवादित है या इंग्लिश में ही छपा। हम इंग्लिश अनुवाद को ही
सत्य मानते हैं। पर वास्तविक स्थिति उससे भिन्न है। यूरोप के साहित्य
(ज्ञान-विज्ञान) का एक अंश ही अंग्रेजी में अनुवादित है। उसमे भी बहुत सी खामियाँ
हैं।”
रवि रंजन जी
रवि रंजन 1991 में कंप्यूटर इन्जीनियरिंग में एम् टेक का कोर्स करने
के लिए रशियन एम्बेसी के माध्यम से रशिया
गए थे। कोर्स के पश्चात् उन्होंने वहीं नौकरी की। बाद में वहीं से बिज़नेस भी शुरू
किया। बीच-बीच में वे भारत आते रहते हैं पर मूलतः अब वे रूस में ही रहते हैं।
रवि रंजन के अनुसार, “जैसा कि भारत में आम धरना है
कि कंप्यूटर इन्जीनियरिंग जैसा कोर्स सिर्फ़ अंग्रेजी में ही हो सकता वहाँ हमें यह
कोर्स रूसी भाषा में करना था। रूस में सारी शिक्षा नर्सरी से विश्वविद्यालय तक
रूसी भाषा में ही है। अब विदेश से आने वाले विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी की
व्यवस्था है। पर उस वक्त ऐसा कुछ भी नहीं था। आपको रूसी भाषा सीखनी ही पड़ती थी।”
शोधकर्ता- “तो आपने यह
भाषा कैसे सीखी?”
रवि रंजन, “कोर्स का प्रथम वर्ष का मुख्य फोकस रूसी-भाषा सीखना
ही था। हमें क्लास रूम तथा बाहर के लोगों से बातचीत के द्वारा ही भाषा सीखनी थी।
विश्वविद्यालय की क्लास में ऑडियो विजुअल साधनों का भी प्रयोग होता था। इस काम
में हमारे रूसी साथियों से भी काफी मदद मिल जाती थी। नए लोगों से सम्पर्क, उन्हें
और उनके तौर तरिकों को जानने और समझने की जिज्ञासा, नए लोगों से दोस्ती ने हमारे
काम को आसान कर दिया। वरना क्लास रूम की गतिविधि तो पकाऊ (उबाऊ) ही थी। इस प्रकार एक साल के बाद हम उस स्थिति में आ गए
कि हम रूसी भाषा में ही एम टैक का कोर्स कर सके। हमनें एक साल में रूसी भाषा पर एक
अच्छी खासी पकड़ भी हासिल कर ली थी। हम वो सब रूसी में व्यक्त कर सकते थे, जो हमने
भारत में हिन्दी और अंग्रेजी में पढ़ा और सीखा था। मैं समझता हूँ कि रूसी सीखने की
प्रक्रिया में क्लासरूम से ज्यादा भूमिका क्लासरूम के बाहर के लोगों से बातचीत
की ही रही होगी। क्लास रूम की भूमिका तो बस ‘कैटलिस्ट’
के समान ही थी, जो सीखने की क्रिया को थोड़ी गति प्रदान करता है।
सीखने के पीछे का मकसद इस नए संसार को एक्सप्लोर करना ही रहा होगा। क्लासरूम से
सीखना तो उबाऊ ही था।”
शोधकर्ता- “क्या आपने रूस जाने से पूर्व भारत में ही रूसी भाषा
का किसी प्रकार का ज्ञान हासिल किया था?”
रवि रंजन, “नहीं ! बिलकुल नहीं रूसी का ज्ञान रूस में जाकर ही
हुआ। हो भी कैसे सकता था। भारत में घर पर मैथिली बोलते थे। स्कूल में हिंदी,
इंग्लिश के अलावा कभी किसी और भाषा के बारे में बताया ही नहीं गया
है। यही समझ में आता था कि इंग्लिश के सहारे दुनिया चलती है। वहाँ जाने तक हमारे दिमाग में रूसी का
कोई आईडिया ही नहीं था।”
शोधकर्ता- “रूस में रहते हुए आपको कितने साल हो गए हैं तथा आज आप
रूसी भाषा के साथ कैसा महसूस करते हैं?”
रवि रंजन, “आज रूस में रहते हुए मुझे 21 वर्ष हो चुके हैं। आज
स्थिति यह है कि मैं रूसी भाषा के हर उतार-चढ़ाव को समझता हूँ। जहाँ रूसी भाषा के
साथ मेरे सम्बन्धों का सवाल है, आज इसके साथ सम्बन्ध इतने
गहरे हो चुके हैं कि रात को सपने भी रूसी में ही आते हैं। यहाँ तक कि सपने में जब
कभी घर परिवार के लोग दिखते हैं तो वे भी
रूसी परिधानों को पहने होते हैं और रूसी भाषा में ही मुझसे बातचीत भी करते हैं।
मुजफ्फरपुर भी रूस जैसा ही लगता है। हाँ ! पर जागृत अवस्था में तो घर-परिवार वालों
से मैथिली और हिंदी में ही बातचीत होती है।”
इसी क्रम में उनके भाई रजनीश ने बताया, “भैया! जब
गुस्सा जाते हैं तो हमसे भी रूसी बोलने लगते हैं। हमें याद दिलाना पड़ता है अभी आप भारत के लोगों से बातचीत कर रहे हो।”
शोधकर्ता- “रूसी भाषा के बिना आप रूस में कितना काम चला सकते हैं।”
रवि रंजन, “रूसी के बिना आप बाज़ार से एक साधारण इन्टरनेशनल
ब्रांड का कोक तक नहीं ले सकते। बैंक, स्कूल दफ्तर हर जगह
रूसी में ही काम-काज होता है। रूस में स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा
रूसी में ही है। अंग्रेजी की व्यवस्था तो बाहर वालों के लिए ही है। मेरी महिला
साथी बैंक में इकोनॉमिस्ट है तथा वह अपना सारा काम-काज रूसी में ही करती है।”
इदास ख़ीदर साहब
इदास ख़ीदर ईराकी मूल के जर्मन हैं। लिखने का शौक बचपन से ही था।
अपनी युवा अवस्था के दिनों में, जब उन्होंने अपनी कलम को धार देना प्रारंभ किया
था। उन दिनों ईराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के भी बुरे दिन भी चल रहे थे।
राष्ट्रपति के सैनिक हर दूसरे व्यक्ति को शक की निगाह से देखते। लिखने पढ़ने वालों
से तो विशेष खौफ़ रहता था। इस कारण वे अकसर गिरफ्तार भी हुए। बार-बार की यातना के
बाद उन्होंने ईराक छोडने की सोची। और फिर बिना वीज़ा के एक देश से दूसरे देश का
सफ़र शुरू हो गया। जो अंत में जर्मनी में जाकर रुका। उनका लक्ष्य तो स्विडन जाना
था। पर जर्मनी की पुलिस ने आगे के सफ़र की संभावना खतम कर दी। इस प्रकार तीन-चार
साल जर्मनी में ही गुजार दिए। इस बीच उन्होंने जर्मन भाषा सीख ली। पर उन्होंने एक
लेखक के रूप में समाज में स्थापित होने की संभावना छोड़ दी। पर फिर क्या एक रोज
सुबह उठने के बाद महसूस हुआ कि रात का स्वप्न जर्मन में देखा है। फिर क्या अगले
दिन ही उन्होंने फिर-से कलम उठा ली और
जर्मन में लिखने लगे। आज जर्मनी के वे स्थापित लेखकों में से एक हैं। (इदास ख़ीदर
की आत्म कथा से मिली जानकारी से साभार)
इन चारों मामलों में
तुलनात्मक अध्ययन करने पर निम्नलिखित तथ्य सामने आते हैं –
जहाँ ज्योति संग जी ने जर्मन भाषा
में बिना किसी कोर्स के महज़ लोगों से संपर्क एवं समझ के माध्यम से जर्मन का ज्ञान
हासिल किया। वहीं, डॉ. लाल बहादुर वर्मा एवं रवि रंजन के केस में
विश्वविद्यालय में चलाये जाने वाले कोर्स की भी कुछ हद तक भूमिका थी। भाषा सिखाने
के लिए विश्वविद्यालय में आडिओ-विजुअल साधनों का प्रयोग भी किया गया। पर इन सब की
भूमिका कैटलिस्ट से ज्यादा नहीं थी। कोई कैटलिस्ट, वह तत्व
होता है जो किसी क्रिया को गति प्रदान
करने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है।
और जैसा कि रवि ने भी बताया
विश्वविद्यालय के कोर्स की भूमिका तो महज़ ‘कैटलिस्ट’ की ही थी और क्लास उबाऊ भी लगती थी। अर्थात् भाषाई समझ तो सामाजिक
अंतःक्रिया का ही परिणाम था। यही बात डॉ. लाल बहादुर वर्मा जी के केस में देखने को
मिली। लोगों से बात कर के जो समझ प्राप्त हो सकती है वह पुस्तकों से नहीं।
पुस्तकों से सिर्फ़ शब्द और उसके शब्दकोष के अर्थ ही हासिल कर पाएँगे, परन्तु संस्कृति में उसी को सम्पूर्ण साँस्कृतिक भाव, विश्वास मूल्यों, के साथ जीते हुए हासिल किया जाता
है। जो भाषा यहाँ पर किताबों को रट कर थोड़ा-बहुत सीखते हैं। वह वहाँ पर मूल्यों व
परम्पराओं के साँस्कृतिक सन्दर्भ को कुरेदते हुए सहजता से आत्मसात करते हैं।
चूँकि प्राथमिक समाजीकरण उस भाषा
में नहीं होता अतः उस संस्कृति के मूल निवासियों के टोन तथा द्वितीयक भाषा के रूप
में अपनाने वालों की भाषा में अंतर तो रहता है, पर समय के साथ यह
अंतर दूर होता जाता है। भाषा विशेष के समाजिक साँस्कृतिक सन्दर्भों को समझाना ही
उस भाषा विशेष को सीखाना होता है। जैसे-जैसे परिवेश के साथ सहज होते जाते हैं,
वैसे-वैसे भाषा आत्मसात होती जाती है।
पर भाषा सीखने की यह प्रक्रिया
भारतीय स्कूलों में अंग्रेजी सिखाने की प्रक्रिया से आसान है, क्योंकि इसमें व्यक्ति सामाजिक, साँस्कृतिक वातावरण
में जाकर वातावरण के माध्यम से भाषा का ज्ञान हासिल करता है।
भारतीय परिवेश में 20-20 साल तक
अंग्रेजी पढ़ने पर अपनी अधिकतर उर्जा लगा देने के बाद भी व्यक्ति अंग्रेजी में
अटकता है। इसके पीछे का कारण सिर्फ़ इतना भर है कि वह बिना साँस्कृतिक संदर्भ के
भाषा सीख रहा होता है। इस कारण वह सिर्फ़ रटने की क्रिया भर कर रहा होता है।
उच्च मध्यमवर्गी विद्यार्थियों के
मुकाबले ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्गीय विद्यार्थियों का ‘इंग्लिश
मीडियम एजुकेशन’ में पिछड़ने की मूल वज़ह भी परिवेश में अंग्रेजी भाषा के संदर्भों
का अभाव ही है। जहाँ उच्च वर्ग के कृत्रिम परिवेश में इंग्लिश भाषा के होने की
वजह से वे तुलनात्मक रूप से ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्गीय विद्यार्थियों के मुकाबले इंग्लिश को आसानी
से ग्रहण कर पाते हैं। फलस्वरूप वे अंग्रेजी में चलने वाले पाठ्यक्रम को आसानी से
समझ पाते हैं।
ज्योतिसंग जी के मामले में यह बात
और भी स्पष्ट होती है कि भाषा, मात्र औपचारिक रूप से ही सिखाने का विषय ही नहीं है, भाषा तो सामाजिक साँस्कृतिक वातावरण के संपर्क से स्वतः आत्मसात होने वाला
ज्ञान है, जिस प्रकार हमारा भौतिक शरीर समय के साथ नए
वातावरण के साथ ढल जाता है, उसी प्रकार हमारा मन भी धीरे
धीरे नए साँस्कृतिक वातावरण के अनुरूप ढलने लगता है। और जैसा रवि और इदास खीदर के
मामले में देखा एक लम्बे अंतराल के बाद स्वप्न भी उस नए परिवेश की भाषा में आने
लगते हैं।
और जब आप नयी भाषा सीख जाते हैं, तो उस भाषा को सीखने के पहले के ज्ञान को भी उस नयी भाषा में व्यक्त कर
सकते हैं। जैसा कि इदास खीदर के मामले में देखा कि लेखन का जो गुण उन्होंने ख़ुर्द
भाषा में हासिल किया था, वह भाषा को आत्मसात करने के बाद इस नयी भाषा में भी बना
रहा। व्यक्ति का पुराना कौशल, नयी भाषा के साथ जाता नहीं
है।
विश्वविद्यालय की भाषा शासक वर्ग
की शासन की जरूरतों को पूरा करने का साधन मात्र होती है। अतः यह मानक-भाषा सपाट
होती है। बिलकुल उच्च इंजीनियरिंग तकनीक से बनी सड़क के समान। जो किसी खास मंजिल पर
जाने के लिए तैयार की जाती है। पर स्ट्रीट की भाषा पहाड़ी पगडंडियों के सामान होती
है, जो संस्कृति के गर्भ से खुद-ब-खुद पैदा होती जाती
है। कौन पहली बार चला उस रास्ते पर, यह पता नहीं, पर लोग चलते गए और रास्ता बनता गया। स्ट्रीट की भाषा कुछ पगडंडियों के
सामान ही होती है।
नए साँस्कृतिक परिवेश में बिना किसी
कोचिंग के भाषा सीखने में ठीक उतना ही समय लगता है जितना कि एक बच्चा एक-दो शब्द बोलने
से एक वाक्य बोलने में लेता है अर्थात्
डेढ़ से दो वर्ष का समय।
यक्ष प्रश्न
परिवेश में जाकर सीखने
पर दुनिया की कोई भी भाषा मात्र 1-3 साल में स्वभाविक रूप से सीखी जा सकती है। तो
भारत में जिन्दगी के 20 साल स्कूल और कॉलेज में अंग्रेजी/अंग्रेजी माध्यम में पढाई कर कर
भी अंग्रेजी में दिक्कत क्यों आती है ??????
जबाब- भाषा कभी पढ़ कर
नहीं आती । किसी व्यक्ति की भाषा उसके परिवेश का प्रतिफल है न कि स्कूल एवं कॉलेज
की पढ़ाई का ।
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