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अध्याय-1 इंग्लिश मीडियम एजुकेशन : समाज में एक बढ़ता क्रेज

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गाँधी से लेकर टैगोर तक कोई भी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी पढ़ाने के खिलाफ़ नहीं था और न ही लेखक अर्थात् मैं ही हूँ। पर जब शिक्षा के माध्यम की बात आती है, तो  माध्यम के रूप में  हर मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षाविद ने    मातृभाषा को ही बेहतर माना है। तो ये अंग्रेजी माध्यम की भेड़ चाल क्यों है?????????????????? "अप्रैल 2012 में NUEPA द्वारा प्रो . अरुण सी . मेहता के नेतृत्व में प्रकाशित DISE की एक रिपोर्ट 'Elementary Education in India: Progress towards UEE' प्रकाशित हुई।   यह रिपोर्ट प्राथमिक स्कूलों के स्तर पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के संदर्भ में किये गए शोध पर आधारित थी। इस शोध में यह अनुसंधान किया गया था कि 6-14 साल के कितने प्रतिशत बच्चे स्कूलों में जाते हैं। साथ ही यह भी जांच किया गया कि वे किस भाषा - माध्यम के स्कूलों में जाते हैं। यह रिपोर्ट उजागर करती है कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। 2002-03 से लेकर 2010-11 के आठ सालों के दौरान इंग्लिश मीडियम निजी स्कूलों में पहली से लेकर आठवीं तक के दाखिले की वृ...
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क्यों बढ़ती हैं सिर्फ जरूरी सामानों की कीतमतें ? www.internationalnewsandviews.com /why-the-rise-of-just-kitmten-groceries/ INVC NEWS – अश्विनी कुमार ‘ सुकरात – पहले प्याज , फिर दाल , अब तेल ऐसा लग रहा है कि इस त्योहारी मौसम में इनसब जरूरी खाद्य पदार्थों के माध्यम सेबाजार आम आदमी को निचोड़ने का कोई भी मोर्चा छोडना नहीं चाहता है । एक खबर के अनुसार सिर्फ दाल ही नहीं सभी खाद्य पदार्थ , शिक्षा , स्वास्थय , आम जरूरत की हर एक चीज महंगी हो रही है । यह खबर उद्योग मंडल एसोचेम की रिपोर्ट पर आधारित है । अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमते में जबर्दस्त गिरावट आयी है । पर वह गिरावट घरेलू बाजार में देखने को नहीं मिलती । “ सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षा और स्वस्थय सुविधाओं की भारी तंगी के चलते मध्यम  वर्ग के लोगों को निजी विद्यालयों , कालेजों अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है ।जिसकी लागत काफी ऊंची है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओ का आधारमूल्य ही इतना ऊँचा है कि इन सेवाओं को खरीद पाना हर एक  के बुते की  बात नहीं। ” अर्थात जरूरी पदार्थों के बाजार की ये तमाम संस्थाएं अपने ग्राह...