‘मातृभाषा’ का अर्थ ‘माता की भाषा’ नहीं होता
बच्चे की ‘मातृभाषा’ अथवा ‘मदरटंग’ क्या है? इस बात को लेकर बहुत मतभेद हैं। भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष 1994 से लंबित भाषा नीति का मुद्दा संवैधानिक बेंच को स्थानांतरित किया गया है और संविधान पीठ के समक्ष निम्नलिखित प्रश्नों को उठाया गया है-
(1)
मातृभाषा से क्या तात्पर्य है? यदि यह वह भाषा है जिसके साथ बच्चा सहज महसूस करता है तो इसे तय करने का अधिकार किसे हो?
(2)
क्या एक छात्र या माता-पिता या एक नागरिक को
प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का एक माध्यम का चयन करने का अधिकार है?
(3)
किसी भी तरह से मातृभाषा को थोपने से क्या
संविधान के अनुच्छेद 14, 19,
29 और 30 के तहत मौलिक अधिकार प्रभावित होता है?
(4)
सरकार से मान्यताप्राप्त स्कूलों में, क्या सरकारी सहायताप्राप्त
स्कूलों और निजी और गैर-सहायताप्राप्त स्कूलों दोनों का समावेश किया सकता है?
(5)
क्या राज्य द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 350ए के अनुसार प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के
माध्यम के रूप में मातृभाषा को चुनने के लिए भाषाई अल्पसंख्यकों को मजबूर किया जा
सकता है?
अब यदि उक्त प्रश्न
संख्या 4 को छोड़ दें तो शेष प्रश्न बच्चे की मातृभाषा को लेकर गंभीर चिंतन की
आवश्यकता को इंगित करते हैं। मातृभाषा को समर्पित इस अध्याय में कुछ बिन्दु तो
ऐसे भी हैं, जिनका
‘औपचारिक एवं अनौपचारिक वातावरण’ वाले अध्याय में जि़क्र हो चुका है। फिर भी विषय
के तुलनात्मक महत्व को देखते हुए उन बिन्दुओं का इस पाठ में पुनः उल्लेख करते हुए, शोध के आधार पर इस बिंदु पर गंभीरता से अध्ययन करने का प्रयास किया गया
है। यहाँ फिर से उनका उल्लेख करते हुए मातृभाषा से संबंधित कुछ और नये आयामों को
तलाशने का प्रयास भी किया जा रहा है।
एक बच्चा, परिवेश की बोली-भाषा कैसे
आत्मसात करता है। इस बिंदु को लेकर एक बच्चे पर उसके उम्र की एक से ढाई वर्ष की
अवस्था में, उसे दो अलग-अलग परिवेशों में ले जाकर उसके
व्यवहार का अवलोकन किया गया तथा यह पता लगाने का प्रयास किया गया कि बच्चा परिवेश
की भाषा-बोली को किस प्रकार ग्रहण करता है। इसके अतिरिक्त,
यह भी जानने का प्रयास किया गया है कि बच्चा परिवेश की बोली-भाषा को आत्मसात
करता है अथवा सीखता है।
जैसा कि हम पहले भी ‘औपचारिक एवं अनौपचारिक वातावरण’ के अध्याय में अनौपचारिक
वातावरण के प्रभाव का जिक्र करते हुए देख चुके हैं कि व्यक्ति अपने परिवेश की
बोली-भाषा को सीखता नहीं है अपितु परिवेश की संस्कृति के साथ सामंजस्य स्थापित
करने की प्रक्रिया में आत्मसात करता चला जाता है। इस प्रकार,
परिवेश की बोली-भाषा महज एक भाषा नहीं, अपितु समस्त
साँस्कृतिक ज्ञान को प्रतिबंबित करती है। उसी क्रम को, इस
अध्याय में आगे बढ़ाते हुए जन्म से लेकर दो साल तक की अवधि में बच्चे की भाषा सीखने
की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया। जिसके मुख्य निष्कर्षात्मक बिन्दु इस प्रकार
हैं-
शोधकर्ता ने यह जानने का प्रयास किया कि बच्चा जिन शब्दों को बोल
नहीं पाता है, क्या
उन्हें समझ भी नहीं पाता है? या उन्हें समझ सकता है?
शोधकर्ता ने इसके लिए कुछ प्रयोग किये। शोधकर्ता ने जब बच्ची से पूछा कि आपके
खिलौने कहाँ हैं? तो वह खिलौने उठा लाई। जबकि वह सवा साल की
अवस्था में ‘खिलौने’ शब्द का उच्चारण
नहीं कर पा रही है। इसी प्रकार, चम्मच लाने को कहा गया, जो उसकी पहुँच के बाहर रखा है। तो उस चीज को देने हेतु अपनी माँ को इशारे
से ‘उइ–उइ’ कहा। यह ‘उइ–उइ’
शब्द बच्चे ने अपनी सुविधा अनुसार खुद गढ़ा है। जब भी कोई वस्तु जो
उसके पहुँच के बाहर हो तो उसे लेने हेतु वह ‘उइ–उइ’ या इसी प्रकार के कुछ और शब्दों का प्रयोग
करती है। इस प्रकार ‘उइ–उइ’
की ध्वनि या उच्चारण एक
प्रकार से ‘वह या उस’ के
स्थान पर प्रयोग कर रही है। अतः ‘उइ–उइ’ एक प्रकार से उसके द्वारा गढ़ा गया
सर्वनाम है। इसी प्रकार, जब एक रोज उसे चिड़ियाघर ले जाया
गया तो वह वहाँ के जानवरों को देख कर काफी उत्तेजित हुई और हर नए जानवर को देख कर
‘गोदा-गोदा’ बोलती ‘गोदा’ शब्द उसके परिवेश में कहीं प्रयोग
नहीं होता। उसने यह शब्द खुद गढ़ लिया है।
इस प्रकार, ‘गोदा-गोदा’ शब्द उसके द्वारा किया गया ‘संज्ञा’ का आविष्कार है। इस प्रकार हम
देखते हैं कि बच्चा न केवल बोलना सीखने से पहले ही मूर्त वस्तुओं के लिए प्रयोग
किए जाने वाले शब्दों को सीख अथवा आत्मसात कर चुका होता है तथा नए शब्दों का सर्जन
भी करता है।
उस बच्चे की दोस्ती कुत्ते से है। वह कुत्ते को कालू कह कर
पुकारता है। जब उसने पहली बार बकरी को देखा तो उसे कालू ही कहता है। लेकिन
दो-तीन दफ़े देखने के बाद उसने कहा ये कालू न (नहीं) है। यानि जो देखा उसका
अन्तःविश्लेषण किया। इस प्रकार बच्चे में तुलना करने की भी क्षमता होती है और उसे
बोली-भाषा के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है।
शोधकर्ता ने अपने अनुसन्धान में यह भी पाया कि सवा-डेढ़ साल का बच्चा
बेशक कुछ ही शब्द बोलता हो, पर वह
उन सभी शब्दों को समझता है, जिनके भौतिक अस्तित्व से वह
परिचित है। शोधकर्ता ने इस बात को परखने के लिए अपनी डेढ़ वर्ष की पुत्री को
जुराबें दी तथा जब उन्हें बाल्टी में रखने के लिए कहा तो उसने बाल्टी में और जब
जूतों में डालने को कहा तो जूतों में और जब अपनी माँ को दे कर आने को कहा, तो वह माँ को देकर आई। इस प्रकार जो वस्तुएँ उसके संज्ञान में हैं, उन वस्तुओं के नामों का उच्चारण करने पर उसने उन्हीं को उठाया। प्रयोग को
थोड़ा कठिन बना कर जब बाल्टी की तरफ़ इशारा करके जुराबों को जूतों में रखने को कहा
गया, तो कुछ देर सोच कर उसने उस वस्तु को चुना, जिसका नाम उसने सुना, अर्थात् जूता।
इन दो प्रयोगों को देखने
के बाद हम कह सकते हैं कि बच्चा सचेत अवलोकनकर्ता होता है। वह जिज्ञासावश अपने आस-पास के वातावरण में छुपे
रहस्यों को खोजना चाहता है। किसी भी नई चीज को गौर से देखता है। ताकि उसकी छवि को
अपने मष्तिष्क में बैठा सके। मनोवैज्ञानिक जेम्स ब्रूनर के अनुसार इस अवस्था का
बच्चा, अपने
मानस में, अपने परिवेश की वस्तुओं की छवि, प्रतिबिम्ब के रूप में निर्मित करता है। वहीं मनोवैज्ञानिक पियाजे के
अनुसार डेढ़–दो वर्ष का बच्चा अभी सेंसरी मोटर स्टेज में है, अतः वे सारी वस्तुएँ, जिनको वह छूकर, देखकर महसूस
(सेंसेशन) कर सकता है, उनके लिए प्रयुक्त शब्दों को भी समझ
जाता है। वह अमूर्त कल्पना की स्थिति में तो नहीं है, पर वह
विभिन्न वस्तुओं के बीच तुलना तो कर ही सकता है। इस अवलोकन का व्यवहारवाद के ओपरेट
कंडीशनिंग के आधार पर यदि हम विशलेषण करें तो पाते हैं कि जब हम किसी एक वस्तु
को एक खास शब्द के साथ सम्बन्धित करते हैं तो बच्चा भी सुन-सुन कर उस वस्तु को, उस शब्द-विशेष के साथ सम्बन्धित करता है। खिलौना बोलने पर खिलौना
ही लाता है, यानि इस शब्द-विशेष के लिए उसके मस्तिष्क में
छवि निर्मित है। बाल्टी और जूतों
की भी एक समझ है और इन दोनों वस्तुओं में अंतर भी कर सकता है। इसी प्रकार, चम्मच लाने को कहने पर चम्मच की ही तरफ़ इशारा करता है, ना की कटोरी की तरफ़। इसी प्रकार, कटोरी
कहने पर चम्मच की तरफ़ इशारा नहीं करता। सबसे बड़ी बात यह कि उसे किसी ने
बताया है कि यह चम्मच है, यह कटोरी है और यह बाल्टी है या यह
जूता और जूराब है। इन सबको बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी। बच्चा, अपने परिवेश के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया में स्वतः ही इन
सबको आत्मसात करता जाता है। अब शोधकर्ता जो लिखने जा रहा है उसके बाद संज्ञानात्मक
क्षमता पर मनोवैज्ञानिकों को पुनः शोध करना पड़ेगा। घर में कोई वस्तु इधर-उधर हो गई है, इस बात को लेकर बहस चल रही है,” किधर गई? किधर गई?” डेढ़-दो वर्ष का बच्चा चुपचाप लाकर पकड़ा
देता है। वह ना केवल उस वस्तु को शब्द के माध्यम से पहचानता है, अपितु उसकी तुलनात्मक ज़रूरत को भी समझता है। इस वाकये से यह स्पष्ट हो
जाता है कि बच्चे की भाषा समझने की क्षमता उसके बोलने से कहीं ज्यादा
व्यापक है। वह ना केवल बोलने से पूर्व भाषा को समझता है। अलग-अलग प्रकार से किये
संबोधनों के आधार पर भौतिक परिवेश की वस्तुओं में भेद भी करता है।
जब उसी बच्चे को डेढ़-पौने दो वर्ष की अवस्था में औरंगाबाद
(महाराष्ट्र) में रखा गया। जहाँ उसे बहुभाषी वातावरण मिला, यहाँ उसको घर में उसकी नानी उससे
भोजपुरी बोलती, उसके मामा हिंदी और पड़ोस के लोग मराठी। बच्चे
ने तीनों भाषाओं के शब्दों को सीखा, घर के अन्दर प्रयोग होने
वाली वस्तुओ के लिए भोजपुरी बाहर के लिए मराठी। जैसे थाली के लिए ‘छिपी’ शब्द का उच्चारण बाहर जाने की ज़िद्द के
लिए ‘बहरी’, वहीं बाहर जाने के
बाद ‘भूर’। ‘भूर’ बाहर घूमने के लिए प्रयोग होने वाला मराठी शब्द
है वही ‘बहरी’ भोजपुरी बोली की
अभिव्यक्ति है।
बच्चे का पिता अक्सर अपने अनुसंधान की वज़ह से पढ़ाई में व्यस्त
रहता है। बच्चा देखता है कि जब भी उसका पिता किताब खोलता है तो कहता है, “मैं
पढ़ाई कर रहा हूँ।” बच्चा धीरे-धीरे किताब को ही पढ़ाई समझ लेता है और किताब
को ही पढ़ाई कहने लगता है। क्रिया(वर्ब)शब्द पढ़ाई को बार बार सुनने के बाद
बच्चे ने पुस्तक को ही पढ़ाई सनझ लिया । जब वह खेल-कूद के दौरान दूसरे बच्चों के
सम्पर्क में आता है तो धीरे-धीरे उनके सम्पर्क में आकर बुक बोलने लगता है।
इस प्रकार किताब के लिए पढ़ाई और बुक का प्रयोग करना सीख जाता है।
जब अपने पिता को किताब बोलते हुए सुनता है तो आसानी से बिना सिखाए किताब भी बोलना सीख जाता है।
इससे भाषा सीखने की
प्रक्रिया में सामाजिक परिवेश की भूमिका स्पष्ट होती है। अपने परिवेश के भौतिक एवं
सामाजिक वातावरण के अनुरूप भाषाओं को सीखता है। भाषा की जो दीवार हिन्दी, उर्दू,
पंजाबी, मराठी की व्यवस्था ने खींच रखी है, उससे बच्चा अनजान है। बच्चा अपने परिवेश से
सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया में, बिना किसी भेदभाव
के अपने शब्दकोश में अपने परिवेश की समस्त भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों को स्थान
देता जाता है। जैसा कि हम जानते हैं उत्तरी ध्रुव के पास रहने वाली एस्कीमो
प्रजाति के बच्चे छोटी उम्र में बर्फ के लिए 30 से अधिक शब्दों का प्रयोग करना
सीख जाते हैं, रेगिस्तान में रहने वाला बच्चा हवा के लिए
अनेकों शब्दों को जानता है। इन शब्दों की समझ उसके जीवन को बनाये रखने की लिए
जरूरी है। संस्कृति और प्रकृति के सम्बन्धों को उजागर करने के लिए आपको समुद्र तट
की सैर कराते हैं। गोवा से सम्बन्ध रखने वाली एक शिक्षिका ने बताया कि जितने
मुहावरे समुद्र को लेकर तटीय इलाको में हैं शायद ही और कहीं होंगे। इससे
स्पष्ट होता है कि प्रकृति और संस्कृति का जुड़ाव कितना गहरा है। व्यक्ति, परिवेश की बोलियों को सामाजिक सम्पर्क के दौरान आत्मसात करता जाता है।
परिवेश की बोलियों को औपचारिक रूप से सीखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वे स्वतः ही आत्मसात होती जाती हैं। बच्चे को वह भाषा जबरदस्ती या
औपचारिक रूप से सिखानी पड़ती है, जो उसके परिवेश में होती ही
नहीं है।
इस प्रकार, प्राकृतिक रूप से जैविक क्षमता
के रूप में, बच्चा
क़ाबलियत लेकर तो पैदा होता, अर्थात् “शिशु
में विभिन्न प्रकार के व्यवहार तथा अनुभवों को भाषा के माध्यम से व्यक्त करने की
क्षमता रहती है।” लेकिन वह सामाजिक अन्तःक्रियाओं के दौरान
ही काबिल बनता है। जन्म के साथ ही यदि किसी बच्चे को जंगल में छोड़ दिया जाये तो
वह कभी भी सामाजिक मानव के समान भाषा का प्रयोग नहीं कर पायेगा। परिवेश के अनुरूप काबिल बनाने की प्रक्रिया को
ही समाजीकरण कहते हैं। इस प्रकार समाजिककरण की प्रक्रिया के दौरान एक बच्चा अपने
परिवार, समुदाय क्षेत्र के सामाजिक-साँस्कृतिक मूल्यों के
अनुरूप आचरण करने, बोलने-बतियाने की प्रक्रिया को आत्मसात
करने के दौरान ही परिवेश की तमाम बोलियों को भी आत्मसात भी करता जाता है। व्यक्ति
का चलना, उठना-बैठना, बोल-चाल, सुख-दुःख में शामिल होना आदि सब कुछ
सामाजिक-साँस्कृतिक-परिवेश से आता है और उसके साथ आती है इन सब क्रियाओं के
दौरान प्रयुक्त भाषा। इसी प्रकार, बोली-भाषा भी
समाजिक-साँस्कृतिक-परिवेश का ही उत्पाद है।
जहाँ एक सामाजिक-साँस्कृतिक-परिवेश में बच्चा भोजपुरी बोली बोलना सीखता है, दूसरे सामाजिक-साँस्कृतिक-परिवेश
में हरियाणवी बोली हो सकती है, तीसरे सामाजिक-साँस्कृतिक-परिवेश में जर्मन, चौथे में रूसी बोली तो पाँचवे में
अंग्रेजी बोली। दिल्ली के झुग्गी-झोंपड़ी एवं कच्ची बस्तियों के बच्चे, एक साथ बहुत-सी भाषाओं के पुट बोलना सीख जाते हैं। कारण स्पष्ट है स्लम
में देश के भिन्न-भिन्न इलाकों के लोग आकर बसे हुए हैं। मसला पानी के झगड़े का हो
या किसी सुख-दुख का, स्लम के लोगों की आपसी अन्तःक्रियाएँ
होती ही रहती हैं। इस कारण बच्चे तेजी से ना केवल एक दूसरे की संस्कृति को जान
जाते हैं अपितु एक दूसरे की भाषाओं को भी सीख जाते हैं। यह तथ्य लेखक ने अपनी
पुत्री के अवलोकन के सन्दर्भ में भी देखा कि दिल्ली में अपने पंजाबी पड़ोसी के बच्चों
के साथ खेलते हुए बहुत-से पंजाबी शब्दों का या तो उच्चारण करने लगी या उच्चारण का
प्रयास करने लगी। जब महाराष्ट्र के जिला औरंगाबाद स्थित उसके ननिहाल भेजा गया तो
वहाँ भी काफ़ी जल्दी ही दिल्ली वाली बोली के साथ भोजपुरी एवं मराठी को भी अपना
लिया। जैसा कि पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है ननिहाल के लोग बिहार से प्रव्रजित
हैं तथा वो लोग अमूमन घर में हिन्दी अथवा भोजपुरी बोली का प्रयोग ही करते हैं पर
बच्चे पर नकी भाषा के प्रभाव तथा आसपास के परिवारों की भाषा का प्रभाव भी देखने
को मिलता है। इसका कारण स्पष्ट है खाने-पीने की ज़रूरत पूरा होने के बाद बच्चा
मुक्त होकर आसपास के छोटे-बड़े बच्चों के साथ खेलता है। इस खेल की प्रक्रिया के
दौरान वह बोली-भाषा का प्रयोग करता है। आसपास के दूसरे बड़ों के साथ भी सम्पर्क में
आता है और सम्पर्क में आने की प्रक्रिया के दौरान परिवेश की भाषा को ग्रहण करता
जाता है। इस प्रकार, हर बच्चा अपने परिवेश की भाषा-बोली
को आत्मसात करता जाता है। भाषाओं का जो
विभाजन औपचारिक रूप से हमारी समाज व्यवस्था के संचालकों ने किया है, वह विभाजन अनौपचारिक साँस्कृतिक वातावरण में देखने को नहीं मिलता।
साँस्कृतिक भाषाएँ अर्थात् बोलियाँ नदी के समान होती हैं जो बहती हैं, मिलती हैं, संगम होता है और फिर आगे बढ़ जाती हैं।
जबकि औपचारिक भाषाएँ एक त्तालाब के सामान जड़ हो जाती हैं। ये भाषाएँ राज-व्यवस्था,
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के द्वारा बनाई गई मोटी और मजबूत दीवारों के द्वारा आपस
में बँटी हुई हैं। इन दीवारों में एक दीवार लिपि की है। मिथ प्रचलित है कि
देवनागरी हिन्दी की लिपि है, गुरूमुखी पंजाबी की लिपि है तो उर्दू की पहचान ही फारसी लिपि है। ये कोरी
बकवास है। लिपियों का अपना इतिहास बोली-भाषाओं के मुकाबले नगण्य ही रहा है। ये
दीवार शब्दकोशों के माध्यम से भी तैयार की गयी है। ये हिन्दी का शब्द है तो यह
उर्दू का और ये अंग्रेजी का। भारत सरकार और तमाम राज्य सरकारों ने तो बकायदा
तकनीकी शब्दों के लिए विभाग भी तैयार कर रखा है। जिसके अधिकारी ए.सी. कमरों में
बैठ कर शब्दों की खोज करते हैं। अब जैसे कम्पयूटर के लिए संगणक शब्द का प्रयोग।
जबकि आज हर व्यक्ति कंप्यूटर से परिचित है। ग्रामीण इलाकों में भी कंप्यूटर के लिए
कमपूटर शब्द का प्रयोग होता है। पर नहीं, जब तक
भारी-भरकम शब्दों का अविष्कार नहीं होगा तब तक हमारी भाषाई पहचान कैसे बनेगी। एक
दीवार व्याकरण के सख्त नियमों की भी है, जबकि किसी-भी भाषा
के व्याकरण के नियम नहीं होते, परम्पराएँ होती हैं और
परम्पराएँ तो पगडंडियाँ होती हैं। परंतु राज्य व्यवस्था ने औपचारिक शिक्षा
व्यवस्था के द्वारा उसे बाकायदा पक्की कंकरीट की सड़कों में तब्दील कर दिया है।
उदाहरण के तौर पर, आम बातचीत में हिंदी-उर्दू का कोई भेद
नहीं है। यह जैसे भारत में बोली जाती है वैसे ही पाकिस्तान में भी बोली जाती है।
व्यवस्था ने इसे पहले तो लिपियों के आधार पर बाँटा, फिर इस
औपचारीकरण की प्रक्रिया में हिंदी को अधिक
संस्कृतनिष्ठ बनाने का प्रयास किया गया और उर्दू को फारसीनिष्ठ बनाने का प्रयास
किया गया। पर हकीकत में आमबोलचाल की भाषा न तो संस्कृतनिष्ठ है न फारसीनिष्ठ। हिन्दी/हिन्दुस्तानी
एक बहती हुई नदी के समान है, जिसके एक किनारे को हिंदी नाम दिया गया तो दूसरे को उर्दू नाम दे दिया
गया है। सच्चाई यह है कि किनारे नदी नहीं होते, नदी किनारों
के बीच बहती जरूर है, पर नदी और किनारे में एक जबर्दस्त
फ़र्क होता है- वह है नदी निरंतर गतिमान होती है और किनारे स्थिर रहते हैं। लोग
व्यवस्था द्वारा पैदा किये गए भ्रम से किनारों को ही नदी समझ बैठते हैं। जिसे आप
हिन्दी और उर्दू नाम देते है, उसका वास्तव में कही अस्तित्व ही नहीं है। आप जिसे
हिंदी और उर्दू कहते हैं, वह हिन्दी और उर्दू की छिछली राजनीति है। यह राजनीति
इंसानों को न केवल हिन्दू-मुस्लिम में बाँटे रखती है अपितु भारत पाकिस्तान के बीच की वास्तविक सीमा रेखा
यही है। किनारों को नदी घोषित करना राजनीति नहीं तो क्या है? राष्ट्रवाद, मजहबवाद,
क्षेत्रवाद की छिछली राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं है। ऐसी राजनीति की जाती है
ताकि लोग किनारों तक तो आएँ पर प्यासे ही रह जाएँ। लोग भाषा के आधार पर बँटे
रहें। हिन्दी/हिन्दुस्तानी, वह नदी है जो सतलुज, गंगा, नर्मदा, कावेरी के किनारों को तोड़ कर
सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में बहती है।
यूनिवर्सल ग्रामर अर्थात् सार्वभौमिक व्याकरण की संकल्पना
भाषाविद् नोमस् चोमस्की के दिमाग की उपज है। उनके अनुसार मनुष्य के व्याकरण संपन्न
होने की योग्यता उसके मस्तिष्क में ही निहित है। अर्थात् प्राकृतिक रूप से मानव व्याकरणीय
योग्यता से संपन्न है। अतः मानव की भाषा के रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता बिना
पढ़ाए-लिखाए और बिना सिखाए ही प्रकट होती है। अर्थात् व्याकरण/ग्रामर सीखने के
लिए उसे किसी स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं है। पहले भी कुछ प्रयोगों के आधार पर
यह वर्णित किया जा चुका है कि स्कूल की दहलीज़ पर कदम रखने से पूर्व ही एक बच्चा
महज तीन साल की अवस्था में अपनी भाषा के व्याकरण को सीख चुका होता है और वह पूर्ण
क्षमता के साथ भाषा के व्याकरण का प्रयोग कर रहा होता है। वास्तव में व्याकरण एक
परम्परा है। जो किसी भी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होता है और संस्कृति के अनुरूप
ढलने की प्रक्रिया के दौरान ही आत्मसात हो जाता है। चोमस्की ने भी परंपरागत
व्याकरण के विपरीत, सार्वभौमिक
व्याकरण की व्याख्या हेतु संज्ञानात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। इस प्रकार, मनुष्य का संज्ञान उसकी अपने परिवेश अर्थात् इस संसार को समझने में सहायक
है। मनुष्य इस दौरान जो अनुभूति ग्रहण करता है वही मनुष्य के द्वारा इस दूनिया को
समझने का आधार भी है। अतः भाषा के व्याकरण के नियम मौन रूप में मानव मन के अवचेतन
में ही समाहित हैं। यही कारण है कि मनुष्य अपने परिवेश की बोली-भाषा में जितनी
सहजता के साथ अभिव्यक्ति करता है, उतनी किसी और भाषा में नहीं
कर सकता। जैसाकि समाजशास्त्री श्याम चरण दूबे भी मानव और संस्कृति नामक पुस्तक में व्याख्या करते हैं कि मानव संस्कृति
में पैदा तो होता है पर संस्कृति के साथ पैदा नहीं होता। संस्कृति को
तो मानव भौतिक-सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश के साथ सामंजस्य स्थापित करने के दौरान
ही अत्मसात करता जाता है। कोई मनुष्य जितना ही किसी साँस्कृतिक परिवेश के निकट
होता है, उतना ही उस संस्कृति की बोली-भाषा के भी निकट होता
है। साँस्कृतिक परिवेश की बोली-भाषा के व्याकरण का प्रयोग तो हर कोई करता है पर
उसकी व्याख्या नहीं कर पाता। अतः सार्वभौमिक व्याकरण भी मनुष्य के साँस्कृतिक
मूल्यों को समाहित करने की संज्ञानिक क्षमता का ही सिद्धांत है न कि महज सतही
व्यवहार का। भाषा की क्षमता मानव मस्तिष्क
की आंतरिक संरचना से संबंधित है, पर बोली-भाषा की काबिलियत
सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश का ही उत्पाद होता है। हर संस्कृति के कुछ खास
तौर-तरीके होते हैं जो संस्कृति-विशेष में आने के साथ ही समाहित होते जाते हैं।
मैं अब एक बच्चे का
नहीं, अपने एक
मित्र का उदाहरण देना चाहूँगा। मेरे ये मित्र बिहार से संबंधित हैं और बीस साल की
जिन्दगी बिहार में गुजारने के बाद दिल्ली आए। उसके बाद की दस-बारह साल की जिन्दगी
उन्होंने दिल्ली और आस-पास के इलाके में गुजारी। अतः इस दौरान कभी-भी आगरा से आगे
दक्षिण में नहीं बढ़े। जिन्दगी में पहली दफ़े उनको भोपाल में काम करने का मौका
मिला। वे भोपाल गए, दो-तीन महीने वहीं गुजारे और फिर एक रोज
जब उनसे मिलने के विषय में बातचीत चल रही थी, तो उन्होंने
जबाब में कहा, “मैं दिल्ली आता हूँ तो ‘अपन’ मिलते हैं।” पाठकों
को बता दें कि ‘हम’ के स्थान पर ‘अपन’ शब्द का प्रयोग मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के इलाके में ही होता है। अपन शब्द का प्रयोग अमूमन
उत्तर भारत और पूर्व में बिहार-उप्र में
नहीं होता। यह वाकया बताता है कि किसी व्यक्ति का परिवेश कितनी जल्दी उस पर असर
डालता है। महज दो-तीन महीने में ही ‘अपन’, ‘नाके’ जैसे शब्द उनके शब्दकोष
का भाग बन गए। आजकल वे इन शब्दों का प्रयोग न केवल भोपाल में अपितु दिल्ली और
बिहार में भी करते हैं। अतः भाषा-बोली का आत्मसातीकरण, वह
प्रक्रिया है जो आजीवन चलती रहती है। लोगों के आपसी संम्पर्क के साथ प्रवाहित होती
है। यह तो छूत के रोग के समान है, जो बड़ी तेजी-से लोगों के
बीच फैलता है। इस रोग को फैलने से रोकने
का जिम्मा राज-व्यवस्था ने विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं को भी सौंपा है। इसीलिए
विश्वविद्यालयों में भाषा के अलग-अलग विभागों की स्थापना की गई है।
पर सच्चाई यह है कि
मनुष्य अनादिकाल से प्रव्रजन करता रहा है। सिन्धु घाटी सभ्यता के समय में भी लोगों
का संपर्क दूसरी सभ्यता के लोगों से होता रहा है। जब विभिन्न सभ्यता एवं संस्कृति
का आपसी समागम होता है तो नई संस्कृति का उदय भी होता है। संस्कृति एक निरंतर बहने
वाली नदी है एक नदी दूसरी से मिलती और वह संगम नयी नदी को जन्म देती जाती है और
फिर दोनों मिल कर अठखेलियाँ करती हुई आगे बढती जाती हैं। कोई भी संस्कृति कभी भी स्थिर नहीं रहती। स्थिरता
सडान्ध लेकर आती है। पुनर्जागरण काल की संस्कृति जब मध्य युग की संस्कृति से टकराई
तो नई संस्कृति का जन्म हुआ। फलस्वरूप यूरोप में भी समानता की लोकतान्त्रिक
संस्कृति का उदय हुआ। इसी क्रम में इंग्लैंड में भी जाहिलों और गँवारों की भाषा
मानी जाने वाली अंग्रेजी को लैटिन और फ्रेंच के स्थान पर राज-काज, चर्च और विश्वविद्यालय में
स्थान मिला। इंग्लैण्ड के आम जन की बोली इंग्लिश का व्यवस्था में स्थान मिल जाना
कोई आसान काम नहीं था। इसके लिए इंग्लैण्ड के लोगों ने एक लम्बा संघर्ष किया है।
आज भी अंग्रेजी भाषा के रूप में स्थापित है। पर उसके बावजूद आज भी अंग्रेजी पर
लैटिन तथा फ्रेंच के वर्चस्व का प्रभाव देखने को मिलता है।
अतः स्पष्ट होता है कि
तीन साल की अवस्था में ही व्यक्ति अपने परिवेश की बोली को उसके सम्पूर्ण व्याकरण
के साथ अपने परिवेश के सामाजिक- साँस्कृतिक
सन्दर्भों की बदौलत सीख चुका होता है। सीखने की यह प्रक्रिया ताउम्र चलती
रहती है। जैसे-जैसे वह नए परिवेश के सम्पर्क में आता जाता है। वैसे-वैसे उसकी
साँस्कृतिक बोली को भी अपने अंदर समाहित करता जाता है। अतः भाषा, सिꅂखाने का विषय ही नहीं है यह तो स्वतः ही आत्मसात
होते रहने वाली प्रक्रिया है। पर आगे सवाल यह उत्पन्न होता है कि जब तीन साल की
अवस्था में बच्चा अपनी भाषा का सम्पूर्ण व्याकरण को सीख चुका होता है तो स्कूल आने वाले बच्चे को भाषा
सिखाने की ज़रूरत ही क्या है? तमाम दस्तावेज भाषा-शिक्षण पर
इतना जोर क्यों देते हैं? जैसाकि महान भाषाविद चैमोसकी के
माध्यम से भी स्पष्ट हो चुका है कि भाषा सीखने की क्षमता सार्वभौम रूप से हर एक
में होती है और स्वतः आत्मसात भी होती रहती है। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा
इसलिए किया जाता है ताकि व्यवस्था अपनी आवश्यकतानुसार मानकीकृत भाषा को लोगों पर
थोपती है। इस प्रकार बोली-भाषा का मानकीकरण कर परिष्कृत भाषाओं को तैयार किया जाता
है। परिष्कृत भाषाओं पर समाज के ऊपरी तबके का दबदबा होता है। अतः यह परिष्कृत भाषा
व्यवस्था ऊपरी तबके के दबदबे को बनाने में
सहायक है। इसलिए परिष्कृत भाषा में ही व्यवस्था औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था को
संचालित करने पर बल देती है। यह अंग्रेजी
माध्यम, हिन्दी माध्यम, मराठी गुजराती माध्यम सब व्यवस्था का पदव्यवस्था को अभिव्यक्त
करती है।
बोली-भाषा, संस्कृति और
मानव अनुभूति
पर इस बिन्दु पर चर्चा
से पूर्व पंजाबी भाषा में विविधता दर्शाते साभार प्राप्त इस चित्र को देखे । देश
के विभाजन के बाद पंजाब बटा, पर पंजाबी नहीं । हाँ दोनों तरफ की सरकारे प्रयास कर
रहीं है। एक संस्कृतनिष्ट बनाने की तो दूसरी फारसी निष्ट । पर भाषा का संबंध भूगोल से है न की राजनीतिक
सीमाओं से............. आइये चर्चा को आगे बढ़ाते है ।
मौखिक एवं सांकेतिक
बोली-भाषा के माध्यम से लोग अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। चूँकि दूनिया के
एक हिस्से में विकसित साँस्कृतिक संदर्भ दूसरों से भिन्न रहा है। अतः उनकी
बोली-भाषा भी भिन्न रही है। इसलिए दुनिया में सभी लोग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल
भी नहीं करते हैं। किसी भी भाषा को उसके साँस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के बिना समझा ही
नहीं जा सकता। अब सवाल यह उठता है कि भाषा के साँस्कृतिक परिपेक्ष को समझे बिना
क्या किसी भाषा को सीखा जा सकता है?
साँस्कृतिक
संदर्भों के बिना भाषा निरर्थक है। बोलियों के माध्यम से लोग एक-दूसरे के करीब आते
हैं और अपनी अनुभूतियों को साँझा करते हैं। इस प्रकार, संस्कृति ही भाषा का निर्माण
करती है और भाषा का मूलबिन्दु भी है। संचार और यातायात के साधनों के विकास के साथ
दुनिया की विभिन्न सस्कृतियाँ एक-दूसरे के करीब आईं। उनके करीब आने के साथ
अनुभूतियाँ भी साँझी हुईं और भाषाओं के शब्दकोशों में नए-नए शब्द जुड़ते चले गए।
बिना साँस्कृतिक संदर्भ के भाषा को समझना नामुमकिन नहीं तो सतही एवं कठिन जरूर है।
परन्तु जब व्यक्ति नए साँस्कृतिक परिवेश में जाता है तो उस साँस्कृतिक परिवेश के
साथ सामंजस्य बैठाने की प्रक्रिया में भाषा विशेष को सीखता जाता है। इस संबंध में
की गई केस स्टडी में हमने देखा कि श्री ज्योति संग जी ने डेढ़ से दो वर्ष में बिना
किसी भाषा शिक्षण क्लास के उस नई भाषा को सीखा, वहीं श्री
रवि रंजन एवं श्री लालबहादुर वर्मा जी ने भाषा शिक्षण टूल का प्रयोग करके भी 1-2
वर्ष का समय लिया। वहीं भारत में अंग्रेजी सीखने के उद्देश्य से अंग्रेजी माध्यम स्कूल में जाने वाले
विद्यार्थी 12 क्लास तक अंग्रेजी पढ़ कर भी अंग्रेजी नहीं सीख पाते और अंग्रेजी न
आने की वजह से शेष विषयों में भी पिछड़ते जाते हैं। कारण स्पष्ट है विद्यार्थियों
के पास साँस्कृतिक सन्दर्भ ही नहीं होता। इसके फलस्वरूप, न
भाषा सीख पाते हैं और न उनमें पढ़ाये जाने वाले विषय ही। चूँकि जब भाषा ही नहीं
आती तो उस भाषा में समझाए जाने वाले विषय कैसे आत्मसात कर सकेंगे? अतः हमारे ग्रामीण, कस्बाई और शहरों के निम्न एवं निम्नमध्यम वर्गीय
इलाकों से आने वाले विद्यार्थी अन्तत: इंग्लिश मीडियम स्कूलों में अंग्रेजी में
पढ़ाए गए पाठों को तोतों की तरह ही रटने के लिए मजबूर हो जाते हैं और इसके
फलस्वरूप पिछड़ते जाते हैं। पर सवाल उठना
स्वभाविक है कि भाषा की वजह से ये वर्ग ही क्यों पिछड़ता है? उच्च वर्ग के
विद्यार्थी क्यों नहीं? चूँकि उच्च वर्ग के लोगों को उनका परिवेश अंग्रेजी के
मामले में तुलनात्मक रूप से कुछ बेहतर स्थिति प्रदान करा देता है। अतः वे यहाँ कुछ
बढ़त हासिल कर लेते हैं पर उनका ज्ञान भी मौलिक नहीं रह पाता है। तो मौलिक ज्ञान किसका
होगा? इसका जबाब लेखक विश्व ज्ञान अनुक्रम में देगा।
फिलहाल
सुप्रीमकोर्ट द्वारा पूछे गए सवालों का ऊपर के विश्लेषण के आधार पर जबाब देंगे।
प्रश्न - मातृभाषा से क्या तात्पर्य है? उत्तर - परिवेश की बोली
ही बच्चे की मातृभाषा है। व्यवस्था के संरक्षक विश्वविद्यालयों ने भाषाओं में जो
विभाजन कर रखा है उसका हकीकत में कहीं कोई अस्तित्व मनुष्य के परिवेश में नहीं है।
बच्चा भी अपने भौतिक-समाजिक-साँस्कृतिक परिवेश को रचनात्मक एवं सृजनात्मक तरीके
से जानने की क्रिया के दौरान ही परिवेश की बोली से साक्षात होता है। परिवेश से
संवाद ही परिवेश की बोली-भाषा को सिखने की प्रक्रिया है। बच्चे के साँस्कृतिक
परिवेश में जो भी बोली-भाषा या भाषाएँ बोली जाती हैं। उसे बच्चा बड़ी ही सहजता के
साथ आत्मसात करता जाता है। परिवेश में परिवर्तन आने पर नये परिवेश की बोली-भाषा को
भी समय के साथ आत्मसात कर लेता है। मदरटंग जिसके लिए मानक हिन्दी में मातृभाषा
शब्द का प्रयोग होता है। वह मातृभाषा भाषा न होकर बोली होती है। उसे मातृभाषा
कहने के स्थान पर मातृबोली कहना ज्यादा उचित होगा। क्योंकि भाषा व्यवस्था द्वारा तैयार की गयी एक बेलोच
संकल्पना है जबकि बोली बिना भेदभाव
के बहता झरना है। अतः मातृबोली में एक या एक से अधिक भाषाओं का भी मिश्रण
हो सकता है। मातृबोली परिवेश
परिप्रेक्ष्य होती है।
प्रश्न - यदि यह वह भाषा है जिसके साथ बच्चा सहज
महसूस करता है तो इसे तय करने का अधिकार किसे हो?
उत्तर - जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है बोलने की क्षमता जरूर जैविक गुण है
परन्तु बोली-भाषा कोई जैविक गुण नहीं है। मानव समाज की हर पीढ़ी में समाज-संस्कृति
के अनुरूप समाजीकरण के दौरान समाहित होती है।
मातृभाषा माता-पिता की भाषा नहीं होती है। यह तो परिवेश की बोली होती है। इत्तिफ़ाकन
यदि माता-पिता और बच्चे का परिवेश एक जैसा ही हुआ तो माता-पिता और बच्चे की बोली
एक होगी परन्तु यदि दोनों अलग हैं तो उसमें भी बदलाव आएगा। अतः माता-पिता क्या
किसी को भी यह तय करने का अधिकार नहीं है कि बच्चे की मातृभाषा/बोली क्या है।
सिर्फ़ बच्चे का परिवेश देख कर ही पता लगाया जाना चाहिए कि बच्चे की
मातृभाषा अर्थात् मातृबोली क्या है। अतः
मातृबोली को तय करने का अधिकार न तो माता-पिता का है न स्कूल का और न ही सरकार का।
स्कूल बच्चे का परिवेश पता लगाए और उस परिवेश में आने वाले लोग (माता-पिता सहित
आस-पड़ोस के सभी) जिस बोली-भाषा का प्रयोग कर रहे होते हैं, उस भाषाई मिश्रण को ही
बच्चे की मातृबोली अथवा मातृभाषा के रूप मे स्वीकार किया जाना
चाहिए। स्पष्ट है कि माता-पिता, स्कूल और सरकार बच्चे की मातृबोली को स्वीकार
करें और न ही तय करे।
प्रश्न - क्या एक छात्र या माता-पिता या एक नागरिक को प्राथमिक स्तर पर
शिक्षा का एक माध्यम का चयन करने का अधिकार है?
उत्तर - यदि शिक्षण रचनात्मक और सृजनात्मक उद्देश्य के लिए है तो प्राथमिक
ही नहीं, उच्च शिक्षा में भी परिवेश की क्षेत्रीय
बोली-भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य बोली भाषा का प्रयोग वर्जित होना चाहिए। पर यदि
शिक्षण का उद्देश्य व्यवस्था के अनुरूप प्यादों को तैयार करना है तो हर एक को
व्यवस्था के अनुरूप ढलने में जो भाषा सहायक हो सकती है, उसे चुनने का अधिकार होना
चाहिए। जब अंततः व्यवस्था के खाके मे फिट होने के लिए अंग्रेजी को ही अपनाना है तो
प्राथमिक स्तर क्या बच्चे को पैदा होते ही किसी अंग्रेजी माध्यम क्रेच में डालने
का भी अधिकार भी होना चाहिए।
प्रश्न - किसी भी तरह से मातृभाषा को थोपने से
अनुच्छेद 14, 19,
29 और संविधान के 30 के तहत मौलिक अधिकार प्रभावित होता है?
उत्तर - निसंदेह हर व्यक्ति अपने परिवेश की बोली-भाषा में ही सहज होता है।
परन्तु जब तक व्यवस्था के शीर्ष पर कोई भाषा विशेष हावी रहेगी। लोग उसके पीछे
भागेंगे ही। चूँकि वर्तमान में अंग्रेजी ही “भारत देट इज इंडिया” के हर तरह के
सत्ताधारी (ज्ञान, राजनीति, पूँजी और न्यायव्यवस्था) की सत्ता को सुरक्षा प्रदान
करने वाली न केवल ‘अधिकारिक’ अपितु “साँस्कृतिक एवं समाजिक पूँजी” को संरक्षित
करने वाली भाषा है। और तो और माननीय
सुप्रीमकोर्ट और देश के अधिकतर हाईकोर्ट की अधिकारिक भाषा भी अंग्रेजी ही है। अतः
अंग्रेजी के प्रति मोह स्वभाविक है। लोग इसलिए अंग्रेजी माध्यम की तरफ़ नहीं भागते
कि उनके बच्चे अंग्रेजी में अधिक सहज महसूस करते हैं। अपितु वे इसलिए अंग्रेजी
माध्यम की तरफ़ भागते हैं क्योंकि अंग्रेजी कहीं-न-कहीं उन्हें सत्ता व्यवस्था के
साथ कदम-ताल मिलाने का सुख भी प्रदान करती है। अतः मातृभाषा के साथ थोपना शब्द का
प्रयोग ही अनुचित है। थोपी तो व्यवस्था ने समाज पर अपनी ‘साँस्कृतिक एवं समाजिक’
भाषा अंग्रेजी है। उसमें हमारी न्याय व्यवस्था
भी शामिल है। व्यवस्था के अन्य शीर्ष बिन्दुओं के साथ वर्तमान न्याय
प्रणाली में अंग्रेजी की अनिवार्यता की वजह से भी लोग मजबूर है। इस मजबूरी की वजह
से ही वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दाखिला दिलाते हैं। मातृभाषा की वजह से संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 29 और
30 के तहत मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं होते? मातृभाषा के लिए
थोपना शब्द का प्रयोग गलत किया जा रहा है। थोपा तो इस देश में अंग्रेजी को गया है। इस थोपने वाले संस्थाओं में न केवल
औपचारिक शिक्षा के शीर्ष केन्द्र, दाखिले एवं नौकरियों की परीक्षा लेने वाली कैट
एवं यूपीएससी जैसी संस्थाएँ भी शामिल हैं। अतः मातृभाषा की वजह से नहीं, अंग्रेजी और परिवेश से कटी मानक-कार्यालयीन भाषा को थोपने से संविधान के
अनुच्छेद 14, 19, 29 और 30 के तहत
मौलिक अधिकार प्रभावित होता है। अतः अंग्रेजी को तुरन्त प्रभाव से समाप्त किया
जाए। और मानक-कार्यालयीन भाषा के स्थान पर मिली-जुली हिन्दी/ हिन्दुस्तानी के
प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए। भारत की हर भाषा-बोली का शासन व्यवस्था में एक-समान
स्थान सुनिश्चित होना चाहिए।
प्रश्न - क्या राज्य संविधान के अनुच्छेद 350ए के अनुसार प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के
माध्यम के रूप में मातृभाषा को चुनने के लिए भाषाई अल्पसंख्यकों को मजबूर किया जा
सकता है?
उत्तर - भाषा को मजहब और जाति से जोड़ कर देखना ही गलत है। हर बच्चे को
उसके परिवेश के अनुरूप प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है। अतः
बच्चे को स्कूल की भाषा नहीं, स्कूल को बच्चे के परिवेश की भाषा का ज्ञान हासिल करना अनिवार्य हो। कोई
भी बच्चा तब ही रचनात्मक एवं विवेचनात्मक तरीके से सीख सकेगा, जब वह दबाव मुक्त
हो। आज बच्चे के ऊपर सबसे बड़ा दबाव भविष्य में प्रयोग की जाने वाली भाषा का है।
जब तक किसी भाषा विशेष का दबदबा सत्ता के शीर्ष केन्द्रों से बना रहेगा। तब तक बच्चा
स्वच्छंद / स्वतंत्र होकर अपने परिवेश
की बोली में सीख नहीं पायेगा। लेखक यहाँ
एक विद्यार्थी का उदाहरण देना चाहेगा, जो जब गाँव में था तो उसके शिक्षक उसकी
ग्रामीण बोली के स्थान पर शहरी हिन्दी/हिंग्रेजी और अंग्रेजी के प्रयोग पर बल देने
को कहते थे। जब दिल्ली शहर आया तो उसके ऊपर अंग्रेजी को सँवारने का दबाव आया। अतः
इन सब प्रसंगों से स्पष्ट है कि अंग्रेजी का दबदबा संविधान के अनुच्छेद 14,
19, 29 और 30 के साथ अनुच्छेद 350A को भी
प्रभावित करता है। अंग्रेजी की अनावश्यक अनिवार्यता के कारण नागरिकों के लगभग सभी
मौलिक अधिकारों का भी हनन होता है।
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