‘अंग्रेजी माध्यम संस्कृति’ (इंग्लिश मीडियम कल्चर) को बढ़ावा देने वाले साँस्कृतिक कारकों की खोज
अर्थव्यवस्था
के आईने से ‘अंग्रेजी माध्यम संस्कृति’ (इंग्लिश मीडियम कल्चर) को
बढ़ावा देने वाले साँस्कृतिक कारकों की खोज में अब तक हमने देखा कि किस प्रकार देश
की अर्थव्यवस्था की उत्पादन संरचना में बदलाव आया और उत्पादन संरचना परम्परागत
कृषि आधारित से आधुनिक उद्योग और सेवा पर आधारित हो गयी है। रोज़गार संरचना में
कोई विशेष बदलाव ना आने की वजह से आय की असमानता तेजी से बढ़ी है। ज्ञान आधारित
अर्थव्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन के लिए औपचारिक शिक्षा की भूमिका से इंकार नहीं
किया जा सकता है। इस नयी अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण पदानुक्रम को निर्धारित करने
में औपचारिक शिक्षा की अहम भूमिका है। जनसंख्या का एक बहुत ही छोटा-सा नगण्य तबका
आर्थिक रूप से सुरक्षित संगठित क्षेत्र में कार्यरत है, शेष गैर-संगठित क्षेत्र में
मात्र गुजारा ही कर पा रहा है। शिक्षा व्यवस्था पर नियन्त्रण का अर्थ है-
अर्थव्यवस्था, राजव्यवस्था
ही नहीं, सम्पूर्ण समाज व्यवस्था पर
साँस्कृतिक नियंत्रण हासिल करना। आय की असमानता को बनाने में आय वितरण की शर्तों
का भी अहम योगदान होता है। चूँकि आय वितरण की शर्ते तय करने का अधिकार चंद हाथों
तक ही सीमिटा हुआ है अतः ये चंद हाथ ही न केवल देश की अर्थव्यवस्था, अपितु
सम्पूर्ण समाज व्यवस्था, संस्कृति की धुरी भी बन गए हैं। इन्हीं के हाथ में औपचारिक शिक्षा
व्यवस्था की बागडोर भी है। इनकी संस्कृति ही श्रेष्ठ माने जाते हैं। इनके के
तौर-तरीके अपनाने को बाकी वर्ग बाध्य हो जाता है। तो शिक्षा के केन्द्र में इनकी
भाषा क्यों न हो? कौन हैं
ये लोग? ये सब
कुछ कैसे सम्भव हो पाता है? आइए, इस पर विचार करें।
1950 के दशक में प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने भारत के
संदर्भ में ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रतिपादन किया था। अपने अध्ययन में
श्रीनिवास ने पाया की तथाकथित निम्न कहलाने वाली जातियों के लोगों में, आर्थिक
स्थिति में आये सुधार के साथ, तथाकथित उच्च कहलाने वाली जातियों के मूल्यों एवं
तौर-तरीकों को अपनाने की प्रवृति पाई जाती है। श्रीनिवास का यह अध्ययन दक्षिण भारत
के गाँवों में किया गया था। तब से अब तक देश की नदियों में बहुत पानी बह चुका है, समाज बदल
चुका है। आज कृषक समाज का आलम यह है कि उसके हिस्से में देश की अर्थव्यवस्था की आय का
सबसे कम हिस्सा और देश की जनसंख्या का सबसे अधिक बोझ है। गाँवों का देश कहलाने वाले इस देश
के गाँवों के लोग बदहाली की स्थिति में हैं और किसी-भी कीमत पर गाँवों से मुक्त
होना चाहते हैं। लोग लगातार गाँवों से शहरों की तरफ़ पलायन कर रहे हैं। कृषि की
प्रधानता का यह आलम है कि छोटे-मोटे किसान तो किसी-भी कीमत पर कृषि को छोड़ने को
तैयार ही बैठे हैं। खेतीहर मज़दूरों की बात तो छोड़िए अब सीमान्त किसानों की
स्थिति यह हो गयी है कि वे खेती से अपना गुजारा नहीं कर सकते। क्या सामन्ती
मूल्य अब भी आदर्श हो सकते हैं? समाज में आदर्श वह होता है जिसके पास समाज को
प्रभावित करने की शक्ति होती है, जो समाज की धुरी पर विराजमान होता है। उसी के
तौर-तरीकों को अपनाया जाता है। किसी जमाने में धनुर्धर योद्धा भी समाज के आदर्श
होते थे। पर क्या अब भी वे प्रासंगिक हो सकते हैं?
समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास साहब कहते हैं कि निम्न कहलाने वाली
जातियों में उच्च कहलाने वाली जातियों के तौर-तरीकों को अपनाने की प्रवृति देखी
गयी है। इसका अर्थ यह है कि निम्न कहलाने वाली जातियाँ कहीं-न-कहीं उच्च कहलाने
वाली जातियों के तौर-तरीकों को ही श्रेष्ठ मानती हैं और आर्थिक और समाजिक हैसियत
में बदलाव के साथ उन संस्कारों को अपनाने का प्रयास करती हैं। अब इस ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा को पुनः परिभाषित करने
की ज़रूरत है। आज समाज का आदर्श ऊँची जातियाँ नहीं, अपितु शहरी उच्च एवं उच्च-मध्यम वर्ग की
जीवन शैली है। अनुपात कम ज्यादा हो सकता है पर इसमें सभी जातियों एवं धर्मों के
लोग शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, एक और वर्ग है, जो भारत जैसे देश के लोगों के लिए, वास्तविक
कम और काल्पनिक अधिक है। वह है, अमेरिकी और यूरोपीय समाज का काल्पनिक-आभासी
स्वरूप। जिसके तौर-तरीकों को अपनाने की अभिलाषा से शायद ही कोई मध्यम-वर्गीय युवा
अछुता रहा हो। अमेरिकन एवं ब्रिटिश स्टाइल की अंग्रेजी सिखाने वाली कोचिंग के बाहर
खड़े लोगों की भीड़ और अमेरिकी एम्बेसी एवं ब्रिटिश हाई कमीशन के बाहर खड़े, वीज़ा
चाहने वालों की लाईन देख लीजिए। आप आसानी से इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि
अमेरिका का ग्रीनकार्ड-होल्डर बनना, आज के मध्यम वर्ग का सर्वोत्तम ख्वाब़ है। इस ख्वाब़
के पहले पायदान पर यदि अमेरिका (यूएसए) आता है, तो दूसरे पर ब्रिटेन और तीसरे पर
कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे अंग्रेजी भाषी मुल्क ही आते हैं। शेष पश्चिमी देशों को बिना
जाने-समझे अंग्रेजी के तराजू में तौल दिया जाता है। एक आम धारणा है, “बिना
अंग्रेजी जाने,
बाहर के समाजों में ‘सर्वाइव’(जिन्दा) ही नहीं कर सकते हैं।” मैं एक दफ़े कक्षा
में पढ़ा रहा था। मैंने अपने विद्यार्थियों को कहा कि सीखने का सबसे अच्छा माध्यम
अपनी भाषा ही होती है। इसलिए हमें अपनी भाषा में ही सीखना चाहिए, न कि
अंग्रेजी में रट्टा लगाना चाहिए। एक विद्यार्थी ने तपाक से कहा, “अपनी भाषा में
सीख कर हम ‘नासा’ नहीं जा सकते हैं। ‘नासा’ में काम करने वाले एक तिहाई कर्मचारी
भारतीय ही हैं। वे सभी अंग्रेजी सीखे थे, तब ही वे वहाँ काम करते हैं। नासा छोड़िए,
अपनी भाषा में तो हम किसी एमएनसी में भी काम नहीं कर सकते। बिना इंग्लिश के तो कोई
गवर्नमेंट (सरकारी) नौकरी भी प्राप्त नहीं कर सकता।” कुछ ऐसी ही बात गाँव भिडूकी
के बस स्टैंड पर खड़े विद्यार्थी ने कही। उसके अनुसार, “इंग्लिश मीडियम स्कूल में
पढ़ने से इंग्लिश बोलनी आ जाती है। बिना अंग्रेजी सीखे हम कुछ नहीं कर सकते।”
“मानो अंग्रेजी कोई भाषा न हुई, राम बाण दवा हो गयी हो। देश की सभी समस्याओं का एक ही
इलाज आजकल समझाया जाता है, वह है अंग्रेजी। अंग्रेजी के बिना न तो नौकरी ही सम्भव
है और न ही हाई-सोसायटी में अड़जेस्ट कर पाना।” रेस्ट ऑफ़ वर्ल्ड अर्थात् भारत के
बाहर तो अंग्रेजी के बिना साँस भी नहीं ले सकते हो। ये कुछ ऐसे मिथ या भ्रामक
धारणाएँ बना दी गई हैं, जिन्होंने आज
भारतीय समाज को जकड़ रखा है। तथाकथित निम्न जातियों से तथाकथित उच्च कहलाने वाली
जातियों के सामंती, साँस्कृतिक मूल्यों, अर्थात् तौर-तरीकों को अपनाने की बात बीते जमाने की बात
होगी। अब तो जमाना ‘हाई-फाई सोसायटी’ का है। अतः इस जमाने के आदर्श सामंती मूल्य
नहीं,
अपितु उच्च एवं उच्च मध्यम वर्गीय सामाजिक मूल्य ही हैं। आज हमारे समाज के खुद के
मूल्य पश्चिमी समाजों से प्रभावित हैं और यह पश्चिमी समाज वास्तविक कम एवं
काल्पनिक-आभासी अधिक है।
समाजशास्त्री श्रीनिवास ने जिस तरह ‘संस्कृतिकरण’ की
अवधारणा को लिया है वह एक अधूरे सत्य को ही व्यक्त करता है। सत्य तो यह है कि जो
ताकतवर है, रूतबे वाला है वह ही श्रेष्ठ है और उसी के मूल्य, तौर-तरीके अपनाने
योग्य हैं। ‘संस्कृतिकरण’ वह
प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज का कमजोर कहलाने वाला वर्ग ताकतवर समझे जाने
वाले वर्ग के साँस्कृतिक मूल्यों को अत्मसात करता है। उस जैसा बनना, उसका सपना
होता है। इसमें से कुछ भी सोच समझ कर नहीं होता। सब कुछ स्वतः ही होता जाता है।
कमजोर वर्ग खुद ही ताकतवर पक्ष के साँस्कृतिक मूल्यों के पक्ष में दलीलें देने
लगता है। इस प्रकार वह अपनी स्थिति को और भी अधिक हीन और ताकतवर वर्ग की स्थिति को
अधिक मजबूत करता जाता है।
अब इन सब बातों को भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़ों के माध्यम से देखते हैं।
वर्ष 1950-51 से वर्ष 2011-12 के बीच हुई आर्थिक संवृद्धि (ग्रोथ) के साथ हुए
संरचनात्मक परिवर्तन के फलस्वरूप प्रक्रिया-आधारित सेवा-क्षेत्र तथा
औद्योगिक-क्षेत्र का कुल आय में लगभग 86% हिस्सा हो गया है। देश की घरेलू आय में
कृषि क्षेत्र का अपना हिस्सा महज 14% पर ही सिमट गया है। यह स्थिति वर्ष 1950 के
दशक से पूर्णतः भिन्न है, जब समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने दक्षिण भारत के
गाँव में अध्ययन किए थे और उस अध्ययन के आधार पर ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रतिपादन किया था। तब कृषि
का अर्थव्यवस्था की जीडीपी में 59% हिस्सा था। आज स्थिति उसके ठीक विपरीत है। आज
59% हिस्सा कृषि-क्षेत्र नहीं, अपितु सेवा-क्षेत्र का है। अब सवाल उठता है कि
अर्थव्यवस्था में आए इस बदलाव का सम्बन्ध ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारण से कैसे है? जैसा की हम अर्थव्यवस्था
की व्यावसायिक संरचना के विश्लेषण के दौरान देख चुके हैं, जहाँ जीडीपी अर्थात् आय की संरचना में
आमूलचूल परिवर्तन आया है, वहीं रोज़गार संरचना में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है।
कार्यशील आबादी का 52% हिस्सा और कुल जनसंख्या का लगभग 60-65% हिस्सा, अब भी
कृषि और संबध कार्यों पर निर्भर है। इस प्रकार 14% आय अर्जित करने वाले कृषि
क्षेत्र देश की आबादी का लगभग 60% जनसंख्या का बोझ झेल रहा है। कृषि क्षेत्र की
जीडीपी में लगातार गिरती तुलनात्मक स्थिति तथा सेवा और औद्योगिक क्षेत्र की जीडीपी
में बढ़ती तुलनात्मक स्थिति जन-साधारण को कृषि को छोड़ कर उद्योग एवं सेवा क्षेत्र
में जाने को प्रेरित करती है। अब पिछले 10-15 वर्षों में कृषि की वृद्धि दर को
देखें तो यह लगभग स्थिरता (स्टेगनेशन) की हालत में ही है। दो दफ़े तो यह ऋणात्मक
भी रह चुकी है। अतः जब कृषि ही बदहाल है तो उस पर आधारित समाज का आदर्श भी बदल रहा
है। गाँव से शहरों की तरफ़ पलायन के बाद हर वर्ग के लोग सेवा क्षेत्र तथा औद्योगिक
क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहते हैं। जैसाकि पिछले अध्याय में हमने देखा कि इस
क्षेत्र में भी गैर-संगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले मज़दूरों के हिस्से में
कुछ-भी नहीं आ रहा है। मोटी कमायी तो बस संगठित क्षेत्र के उँचे-उँचे पदों पर
कार्यरत लोगों तक ही सिमट कर रह जाती है। इन लोगों के पास ही पैसा है, पावर है और
रुतबा है। अतः संगठित क्षेत्र में रोज़गार के लिए दो तरह की समस्याएँ आती हैं। एक
तो यह कि संगठित क्षेत्र सबको खपा पाने की स्थिति में ही नहीं है। ये तो
अर्थव्यवस्था का मैनीपुलेशन अर्थात् जोड़-तोड़ या हेरफेरी है, जिसकी वजह से आय का
वितरण छोटे-से नव धनाड्य वर्ग की तरफ़ हुआ है। जो आकर्षित तो बहुत करता है पर सबको
समाहित नहीं कर सकता। अतः रोकने के लिए एक बैरिकेटर लगाना भी जरूरी है। और
अंग्रेजी! जी हाँ! अंग्रेजी ही वह बैरिकेटर है जिससे सबको आसानी से रोका जा सकता
है। अतः अंग्रेजी इस पंगु पूँजीवादी समाज के लिए स्तरीकरण का हथियार है। एक किसान,
एक मजदूर साल भर खट कर जितना कमाता है, उससे कई गुना ज्यादा एक शेयर ब्रोकर कम्पयूटर के एक
क्लिक से कमा लेता है। कामगारों की उत्पादकता को दर्शाने वाले भारत सरकार के
आर्थिक सर्वेक्षण के आँकड़े (चित्र संख्या 4) तो कम-से-कम यही दर्शा रहे हैं।
सरकार द्वारा टैक्स के रूप में इकट्ठा किए फण्ड से छठवें के बाद सातवें वेतन आयोग
के अनुसार वेतन प्राप्त करने को तैयार बैठे सरकारी क्षेत्र में कार्यरत एक
प्रोफेसर, एक आईएएस अधिकारी की आय देश के कामगारों की औसत वार्षिक सालाना आय से
20-30 गुना से भी कहीं ज्यादा है। अतः यह शुद्ध जोड़तोड/हेराफेरी अर्थात्
मैनीपुलेशन की आय नहीं तो और क्या है? समाज में इसके भी ऊपर एक क्रीम है, जिसके
हाथ में सारा मैनीपुलेशन है। वह है, सट्टेबाजों, ब्रोकरों, राजनेताओं, मीडिया, नेताओं और
बड़े पूँजीपतियों का छोटा-सा तबका। इनकी आय का कितना हिस्सा काला और कितना सफेद है
और कितना देश में और कितना विदेशों में जमा है, इसका तो हम अंदाज़ भी नहीं लगा
सकते हैं। इतनी बेतहाशा आय इन लोगों को इसलिए प्राप्त हो रही है क्योंकि देश के
आय-वितरण को तय करने का अधिकार भी इसी वर्ग के चंद लोगों के हाथों में है। ये चन्द
लोग ही सत्ता के उन केन्द्रों पर विराजमान हैं, जहाँ से आय-वितरण की शर्तें तय
होती हैं। इस वर्ग ने ही जोड़ तोड़ / हेराफ़ेरी / मैनीपुलेशन के द्वारा इस देश में
खाते-पीते प्रोफेसरों, नौकरशाहों, निजी कम्पनियों के उच्च अधिकारियों, छोटे-मोटे
व्यापारियों आदि का एक छोटा-सा उच्च-मध्यम वर्ग तैयार कर रखा है। यह उच्च-मध्यम
वर्ग ही देश की आर्थिक संवृद्धि / ग्रोथ का फायदा भी ले रहा है। यह वर्ग ही उनकी
सत्ता को साँस्कृतिक संरक्षण प्रदान करने का भी काम करता है। नवउदारवाद के बाद की
अर्थव्यवस्था का तो सारा लाभ ही इस ‘हाई-फ़ाई वर्ग’ तक सिमट कर रह गया है। पर सवाल
उठता है कि इस आय को आप किस आधार पर सही ठहरा जा सकते हैं? इतना तो निश्चित है कि
जोड़तोड़/हेराफ़ेरी/मैनीपुलेशन के इस चक्र-व्यूह को तोड़े बिना आय-वितरण की
असमानता को तोड़ा ही नहीं जा सकता।
पर सवाल यह उठता है कि इस
जोड़तोड़/हेराफ़ेरी/मैनीपुलेशन के सिस्टम को बनाये रखने में ऊपर के ‘अंग्रेजी मीडियम
कल्चर’ की
क्या भूमिका हो सकती है? इस कल्चर की वजह से देश की बहुसंख्यक आबादी के पास एक झूठी उम्मीद के
सिवाय कुछ-भी शेष नहीं बचता है। झूठी उम्मीद यह है कि, “यदि हम-भी इनकी तरह अंग्रेजी मीडियम से
पढ़-लिख कर अंग्रेजी भाषी हो जाएँगे तो हम भी कामयाब हो जाएँगे।” और
कामयाब न होने पर यह स्पष्टीकरण भी मिल जाता है कि आप इसलिए कामयाब नहीं
हो सके क्योकि आपको अंग्रेजी नहीं आती।
‘न नौ मन तेल होगा और न
राधा नाचेगी’ के सिद्धान्त पर ही देश की अधिकांश जनसंख्या को
अंततः संतोष भर करना पड़ता है कि हम इसलिए कामयाब नहीं हो पाए क्योंकि हम इनकी तरह
अंग्रेजी भाषी नहीं बन पाए। गुलाम मानसिकता के समाज में अंग्रेजी 90% आबादी को
दबाने का और 10% तक सारी सुविधाओं को समेटे रखने का काम बड़ी कुटिलता से निभा रही
है। बहुसंख्यक आबादी को दबाने का काम अंग्रेजी कैसे करती है इस बिन्दु पर आगे
चर्चा करेंगे, पर
उससे पहले हम कुछ दूसरे बिन्दुओं पर भी विचार भी कर लें।
परम्परागत अर्थव्यवस्था में पदार्थ अर्थात् वस्तु के आधार पर काम का विभाजन
होता था। वहीं आधुनिक अर्थव्यवस्था में प्रक्रिया के आधार पर काम का विभाजन होता
है। आगे बढ़ने से पहले इन दोनों के फ़र्क को समझना आवश्यक है। पदार्थ के आधार पर
काम के विभाजन का अर्थ यह है कि एक व्यक्ति या उसका परिवार पदार्थ बनाने की सारी
प्रक्रिया को खुद ही अंजाम देता है। जैसे कुम्हार का परिवार मटके बनाने की सारी
प्रक्रिया को खुद ही अंजाम देता है। एक छोटे स्तर का दर्जी कपड़े को काटने से लेकर
पोशाक सीने तक की प्रक्रिया को पूरा करता है। इसी प्रकार, परम्परागत अर्थव्यवस्था के तमाम परम्परागत
पेशों में व्यक्ति और उसका परिवार, वस्तु अथवा सेवा बनाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया को अंजाम
देता था। यह बात आज भी लगभग सभी परम्परागत पेशों के संदर्भ में देखी जा सकती है।
यह बात जितनी भारतीय समाज पर लागू होती है, उतनी ही यूरोपीय और अफ्रीकी समाज पर भी। इस
प्रकार,
कृषि ही नहीं अपितु तमाम परम्परागत व्यवसायों में व्यक्ति अपने परिवार और समुदाय
के साथ खेलते-कूदते, क्रिया-प्रतिक्रिया करते हुए ही कार्य करने में पारंगत हो
जाता था। आधुनिक प्रक्रिया आधारित अर्थव्यवस्था में भी बहुत-से पेशे ऐसे हैं, जिन्हें
करने वाले अपने वरिष्ठ साथियों का अनुसरण करते हुए सीख जाते हैं। मैकेनिक का काम
सबसे अच्छा उदाहरण हो सकता है। दो-तीन साल किसी वरिष्ठ ‘उस्ताद’ के साथ
काम करके नए कारीगर अपने काम में परांगत हो जाते हैं। फिर भी आधुनिक तकनीक एवं
प्रक्रिया आधारित उद्योगों को सुचारू रूप से चलाने के लिए औपचारिक शिक्षा रूपी
व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती ही है। आधुनिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी औद्योगीकरण
के साथ ही एक बड़े पैमाने पर शिक्षा की औपचारिक व्यवस्था के रूप में स्कूलों,
कॉलेजों, व्यवसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों और विश्वविद्यालयों का प्रादुर्भाव हुआ।
यूरोप में मध्य युग में भी स्कूल होते थे। पर उनका काम लोगों को चर्च में
बाईबल पढ़ने के लिए लैटिन भाषा सिखाना भर था। इसलिए इन स्कूलों को ग्रामर स्कूल
भी कहा जाता था। उन दिनों बाईबल लैटिन भाषा में ही होती थी। ग्रामर स्कूल इस लैटिन
को ही सिखाने का कार्य करते थे। इंग्लैंड़ में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण यूरोप में रोमन सम्राज्य के
दिनों में सम्पर्क भाषा के रूप में लैटिन भाषा ही प्रयोग होता था। उन दिनों
इंग्लैंड़ का तो अभिजात्य वर्ग भी अंग्रेजी भाषी नहीं, अपितु फ्रेंच भाषी ही था। ओल्ड अंग्रेजी के
नाम पर जाने जाने वाली उस काल की अंग्रेजी वहाँ के जर्मनी से विस्थापित हो कर बसे
आदिवासी ही प्रयोग करते थे। ये तो प्रोटेस्टेंटे मूवमेंट था, जिसके बाद बाईबल जैसे
ग्रंथ का भी इंग्लैंड़ की जन-सामान्य की भाषा में अनुवाद हुआ। जी हाँ! पंद्रहवीं
सोलहवीं शताब्दी तक अंग्रेजी वहाँ के अभिजात्य वर्ग की नहीं,
जन-सामान्य की भाषा ही मानी जाती थी। ये तो जन आंदोलन थे, जिन्होंने कुलियों और गँवारों की भाषा के
रूप में पहचानी जाने वाली अंग्रेजी को शासन-प्रशासन की धुरी में लाकर खड़ा कर
दिया। इंग्लैंड में लोकतंत्र के प्रादुर्भाव के साथ ही वहाँ की लोक भाषा इंग्लिश
का शासन-प्रशासन में उपयोग सुनिश्चित हो सका और समय के साथ वहाँ के एलीट वर्ग ने
भी अंग्रेजी को अपनाया। इंग्लैंड के जाहिल और गँवारों की भाषा अंग्रेजी का औपचारिक
शिक्षा में प्रयोग शुरू होने के बाद ही जन-जन तक शिक्षा पहुँच पाई। आज भी अंग्रेजी
भाषा पर लैटिन और ग्रीक के प्रभाव को अंग्रेजी के शब्दकोश के माध्यम से महसूस कर
सकते हैं। यहाँ तक कि अंग्रेजी को लिखने के लिए भी रोमन/लेटिन अल्फाबेट अर्थात्
वर्णमाला का ही प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी के अधिकतर तकनीकी शब्द लैटिन
अथवा ग्रीक भाषा के हैं। परिष्कृत शब्दों
के रूप में फ्रेंच का प्रभाव भी अंग्रेजी पर साफ-साफ दिखता है।
जन-भाषाओं को औपचारिक शिक्षा के केन्द्र में लाने की एक वजह औद्योगिक
क्राँति भी थी। औद्योगिक क्राँति के साथ छोटे पैमाने पर चलने वाले परम्परागत
उद्योगों का पतन हुआ और प्रक्रिया आधारित आधुनिक उद्योगों का प्रादुर्भाव हुआ।
औद्योगिक क्राँति के बाद पैदा हुई आधुनिक व्यवस्था को जिस पैमाने पर कुशल
तकनीशियनों, कारीगरों, इंजिनियरों, शासन-प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने वाले
अधिकारियों की ज़रूरत थी, उसे समाज में स्वतः चलने वाली अनौपचारिक शिक्षा से पूरा
नहीं किया जा सकता था। उसे पूरा करने के लिए ही औपचारिक शिक्षण संस्थानों की ज़रूरत
पड़ी। इस प्रकार स्कूल, कॉलेज, तकनीकी संस्थान खुलने लगे। बड़े पैमाने पर पैदा हुई
औपचारिक शिक्षा की ज़रूरत को संभ्रांत तबके की नाफ़ीस भाषा में चलने वाले स्कूलों
से पूरा नहीं किया जा सकता था। अतः शिक्षण केन्द्रों की नाफ़ीस भाषा को इंग्लैंड
की जन-भाषा ने प्रतिस्थापित कर दिया। इस प्रकार इंग्लैड़ की जन-भाषा अंग्रेजी का
प्रयोग जन-शिक्षण में सुनिश्चित हो सका।
हम ऊपरी तौर पर देखें तो भारतीय
समाज भी परम्परागत से आधुनिक समाज में परिवर्तित हो रहा है। आधुनिक ज्ञान
आधारित समाज को संचालित करने के लिए कुशल जागरूक नागरिकों की ज़रूरत को, औपचारिक
शिक्षा व्यवस्था के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार आधुनिक
स्कूली-विश्वविद्यालयी शिक्षा व्यवस्था का भारत में उदय एक प्रगतिशील कदम ही माना
जा सकता है। पर समस्या यह है कि इस पवित्र साधन का अपवित्र उद्देश्य के लिए प्रयोग
किया गया। भारत में इस आधुनिक स्कूली-विश्वविद्यालयी शिक्षा व्यवस्था का
प्रादुर्भाव भी औपनिवेशिक काल में ही हुआ। अंग्रेजों के काल में स्थापित इस शिक्षा
व्यवस्था का उद्देश्य सचेत, जागृत और कुशल नागरिकों को पैदा करना कदापि नहीं था।
क्लर्क पैदा करने वाली व्यवस्था के नाम से जानी जाने वाली इस शिक्षा व्यवस्था का
उद्देश्य अंग्रेजों के शासन को बनाये रखने में सहायकों-सहयोगियों एवं आज्ञाकारी
नागरिकों का एक वर्ग तैयार करना था। इसका किसी भी प्रकार से कल्याणकारी उद्देश्य
नहीं था। इस शिक्षा व्यवस्था के संस्थापक मैकाले ने तो स्पष्ट कहा था कि इस शिक्षा
के माध्यम से ऐसे लोगों को तैयार करेंगे जो रंग रूप से तो भारतीय हों पर सोच-समझ
और विचार से अंग्रेजी व्यवस्था के भक्त हों। फिर ट्रिकल डाउन फार्मूला अर्थात् रिस-रिस कर नीचे तक पहुँचाने के
सिद्धान्त से यह वर्ग शिक्षा के
मूल्यों को नीचे तक पहुँचाएगा। इस फार्मूले से जो बिचौलिया सहयोगी वर्ग पैदा हुआ,
वह ही अंग्रेज शासकों और शासितों के बीच की कड़ी के रूप में काम कर रहा था। इन
सहयोगियों में अंग्रेज अफसरों के कार्यालयों में काम करने वाले क्लर्क और अधिकारी
ही नहीं,
अपितु अंग्रेजी शासन का विरोध करने वाले तमाम आंदोलनकारी और समाज सुधारक की छवि
वाले लोग भी शामिल थे। अंग्रेजी शासन का सबसे बड़ा सहयोग था, उनका विरोध करने के
लिए भी अंग्रेजी भाषा का प्रयोग। अंग्रेजों के समय में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के
बाद क्राँतिकारी आंदोलनों को छोड़ दें तो स्वतंत्रता की लड़ाई जीतने के बाद भी
सुधार और सत्ता हस्तांतरण के लिए जो आंदोलन हुए, उन सब का नेतृत्व इस अंग्रेजी भाषी
बिचौलिये सहयोगी वर्ग ने ही किया। उन आंदोलनों के दौरान भारतीय नेताओं और
अंग्रेजों के बीच संवाद का माध्यम अंग्रेजी ही रहा। अघोषित तौर पर यह नियम स्थापित
हो गया कि नेतृत्व उसके हाथ में रहेगा जो अंग्रेजी में अपनी बात कहेगा। यह अंग्रेजों
के काल में अंग्रेज सरकार से सत्ता हस्तांतरण की लड़ाई लड़ने वाले वर्ग के द्वारा
अंग्रेज शासकों के साथ किया गया सबसे बड़ा सहयोग था। यदि किसी व्यवस्था का विरोध
करने वाला वर्ग, उस
व्यवस्था के तौर-तरीकों को ही अपना लेता है, तो यह उस व्यवस्था की सबसे बड़ी जीत
है। वर्ष 1951 की जनगणना के अनुसार मुश्किल से 18% आबादी ही साक्षर थी। उसमें से
चंद नगण्य ही ‘मैट्रिकुलेशन’ की दहलीज को पार कर कॉलेज तक पहुँचे थे। पर
स्वतंत्रता से पूर्व सत्ता हस्तांतरण के प्रयास में जुटे काँग्रेस, मुस्लिम लीग और
तमाम बड़ी पार्टियों का लगभग सारा-का-सारा शीर्ष नेतृत्व इंग्लैण्ड-अमेरिका से
शिक्षा ग्रहण करके आया हुआ अंग्रेजी भाषी ही था। इनका अंग्रेजों के साथ व्यक्तिगत
घनिष्ठ संबंध भी था। उस वक्त उच्च शिक्षा का माध्यम सिर्फ़ अंग्रेजी ही था। इस
प्रकार भारतीय कॉलेजों से पढ़ कर निकलने वाला युवा वर्ग भी अपने वरिष्ठ साथियों के
प्रभाव से अछूता नहीं था। अंग्रेजी बोलने वाले लोगों के रूतबे की वजह से धीरे-धीरे
समाज का युवा वर्ग अंग्रेजी रंग में रंगता गया। एक तरफ़ अंग्रेजों का विरोध और
दूसरी तरफ़ अंग्रेजी और अंग्रेजि़यत का आत्मसातीकरण, दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ चल रही थीं।
अंग्रेजी प्रतीकों, वस्तुओं का त्याग और अंग्रेजी का प्रयोग दोनों साथ-साथ चले।
स्वयं महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में इसका उल्लेख करते हुए कहा है कि हमारी
काँग्रेस के काम-काज की भाषा अंग्रेजी है। हमारा युवा वर्ग सही अंग्रेजी जानता न
हो पर प्रयोग अंग्रेजी का ही करता है। जनता ने भी अघोषित तौर पर अंग्रेजी भाषी
नेतृत्व को ही मान्यता दे रखी थी। शायद इसलिए कि ये लोग ही अंग्रेजों से बात कर
आज़ादी दिला सकते हैं। अतः सत्ता हस्तांतरण के बाद सत्ता के सभी केन्द्र इसी
मुट्ठी भर अंग्रेजी भाषियों के हाथ में ही आ गए और फिर धीरे-धीरे उन तक ही सिमट
कर रह गए। आज आप विश्वविद्यालयों की बात करें या न्यायालयों की, कोर्ट का बार रूम
हो या संसद और संविधान सभा का गलियारा, जिम्मेदार नौकरशाह हो या वफ़ादार फौज के
आला अफ़सर, स्वतंत्रता के समय सत्ता के तमाम केन्द्रों पर यह छोटा-सा अंग्रेजी
भाषी वर्ग ही छाया हुआ था। उस वक्त उस
छोटे-से वर्ग का ही अंग्रेजी भाषी कल्चर था। इस छोटे-से वर्ग के कल्चर ने एक
सिस्टम पैदा किया, जिसे हम अंग्रेजी भाषी व्यवस्था अर्थात् इंग्लिश मीडियम सिस्टम कह सकते हैं। इसके बाद कुछ भी घोषित तौर पर
करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। बस इस वर्ग की सुविधा ने ही सब कुछ स्वतः करवा दिया।
शासक वर्ग की सुविधा के फलस्वरूप ही यह इंग्लिश मीडियम सिस्टम चल पड़ा। आम
जनता का झुकाव तब तक इस दिशा में नहीं गया था जब तक अंग्रेजी को रोज़गार से जोड़ा
नहीं गया था। परोमेश आचार्य के अनुसार आम जन का झुकाव तब अंग्रेजी की तरफ़ बढ़ा जब
सार्वजनिक नौकरियों के दरवाजे उनके लिए खुले पर साथ में अंग्रेजी की अनिवार्यता की
शर्त भी लगा दी गई। विश्वविद्यालयों के दरवाजे खुले तो पर अंदर बैठने की हिम्मत
वही कर सकता है, जो अंग्रेजी समझ सकता है। बाकी तो दो लाईन सुन कर ही बाहर भाग
आयेगा। इसका अर्थ साफ है कि सत्ता के केन्द्र सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी भाषियों के लिए आरक्षित कर दी गयी।
भारतीय भाषाएँ सर न उठा सकें, इसके लिए भाषा के नाम पर उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारत
भाषी लोगों से लड़ाया भी गया। इस प्रकार भारतीय भाषाओं में भेद पैदा कर अंग्रेजी
को स्थापित किया गया। सिर्फ़ भारतीय भाषाओं का ज्ञान रखने वाले चपरासी तो बन सकते
हैं पर अफसर नहीं। प्राथमिक स्कूल के शिक्षक तो हो सकते हैं पर विश्वविद्यालयों के
प्रोफ़ेसर नहीं। सेना के जवान तो हो सकते हैं पर कर्नल-जनरल नहीं। अर्थात् उस
मुट्ठी भर सत्ता में आए अंग्रेजी भाषी लोगों की बदौलत ही यह मूल्य स्थापित हो सका।
इन मुट्ठी भर लोगों की सुविधा ने ही अंग्रेजी मीडियम कल्चर को पैदा किया। इस
प्रकार स्वतंत्रता से पूर्व का बिचौलिया सहयोगी वर्ग स्वतंत्रता के बाद ‘पावरफुल
एलिट वर्ग / शक्तिशाली संभ्रांत वर्ग’ में तब्दील हो गया। इस ‘पावरफुल
एलिट वर्ग / शक्तिशाली संभ्रांत वर्ग’’ के हाथों में ही हमेशा सत्ता की धुरी
रही है। इसमें सभी आते हैं - खानदानी नेता, खिलाड़ी, अभिनेता, सत्ताधारी-विपक्षी,
कॉग्रेसी-भाजपाई-कम्युनिस्ट, मीडिया के बॉस, कम्पनियों के जनरल, फौज के कर्नल, ऊँचे ओहदे वाले नौकरशाह, भ्रष्ट
ईमानदार, टॉप विश्वविद्यालयों के इंटेलेक्चुअल माने जाने वाले प्रोफेसर, स्कूली
पाठ्यचर्चा लिखने वाली पूरी टीम, अर्थात् हर क्षेत्र का टॉप/सर्वोच्च व्यक्ति इसमें
समाहित है। कहने को इस वर्ग के लोगों का एक-दूसरे से प्रत्यक्ष सम्बन्ध न हो, एक
दूसरे के घोर विरोधी भी हों, परंतु एक बात पर ये सभी लोग एक जुट हैं, वह है -
अंग्रेजी भाषा का प्रयोग। यह वर्ग यह मानता है दूसरों को मनवाता है कि बिना
अंग्रेजी उद्धार संभव नहीं। ये बात तथाकथित दलितों का संभ्रांत/एलीट वर्ग भी कहता
है और तथाकथित कम्युनिस्टों का संभ्रांतवर्ग भी। अंग्रेजी दक्षिण पंथियों की
सुविधा है, तो
वांमपंथियों की भी। पूँजीपतियों को ग्लोबलाइजेशन का साधन लगती है तो नेताओं
को इंटरनैशनलिज़्म का। मैं पुनः यहाँ पर एक व्यक्तिगत अनुभव को साझा करना
चाहूँगा। एक रोज मैं शिक्षा अधिकार मंच
के कार्यकर्ताओं की बैठक में गया था। उस बैठक में विश्वविद्यालय के कुछ
प्रोफेसर भी थे। बातचीत के दौरान एक और साथी आ गये जो केरल से थे। केरल के साथी
पिछले लम्बे समय से दिल्ली में रह रहे हैं। जैसे ही केरल के साथी ने बताया कि वे
केरल से संबंधित हैं, विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने अपनी तरफ़ से कहा, “चूँकि हमारा एक मित्र केरल से है, अतः कोई
साथी यहाँ हो रहे विचार-विमर्श का अंग्रेजी अनुवाद भी करे।” जबकि केरल के साथी ने
अपनी पूरा परिचय मलयालम लहजे के साथ हिन्दुस्तानी शैली में दिया और अपनी तरफ़ से
अनुवाद की कोई माँग भी नहीं रखी। उनके चेहरे पर तो कहीं-भी हिन्दुस्तानी के प्रयोग
को लेकर आपत्ति के भाव भी नहीं थे। पर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसरों के चेहरों की
सिलवटें उतर नहीं रही थीं। मैं वर्तमान में जिस स्कूल में काम कर रहा हूँ, वहाँ का
आधे से ज्यादा स्टाफ दक्षिण के राज्यों से है और विद्यार्थी निम्न मध्यमवर्गीय
प्रवासी कॉलोनियों से हैं। स्कूल अंग्रेजी मीडियम होने के बाद भी विद्यार्थी,
स्टाफ़ और स्कूल में आने वाला अभिभावक वर्ग समान्य हिंदी की मिली-जुली
हिन्दुस्तानी का प्रयोग ही करता है। जैसा कि एक ट्रेन यात्रा के दौरान मिले दो
यात्रियों की बातचीत का वर्णन करते हुए बताया था कि किस प्रकार भारत उत्तर-दक्षिण,
पूर्व-पश्चिम के लोगों ने अपनी हिंदी की मिली-जुली हिन्दुस्तानी शैली का विकास
किया है। उनके साथ विचारविमर्श करने हेतु उनकें अधिकारी भी मिली जुली भाषा का ही
प्रयोग करते हैं। उन तकनीशियनों के अनुसार अधिकारी वर्ग की अपनी मीटिंग अंग्रेजी
मिश्रित हिंग्लिश भाषा में ही होती है।
अतः अंग्रेजी कहीं-न-कहीं ऊपर के तबके की ज़रूरत मात्र है। भारत में उच्च वर्ग की
सम्पर्क भाषा बेशक अंग्रेजी हो, पर जन-सामान्य तो हिंदी की हिन्दुस्तानी शैली की खोज कर
ही लेता है। एलिट, शहरी उच्च शिक्षा प्राप्त उच्च मध्यम वर्ग ही मिल कर एक सिस्टम
को बनाता है। इसे ही हम इंग्लिश मीडियम सिस्टम कह सकते हैं। इस सिस्टम के
इर्द-गिर्द जैसे-जैसे नव हिंग्लिश अर्थात् हिंग्रेजी भाषी वर्ग जमता जाता है।
वैसे-वैसे समाज पर अंग्रेजी अर्थात् अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ता जाता है। सत्ता और
अधिक अंग्रेजी भाषियों के नियंत्रण में
आती जाती है। इस वर्ग ने ही व्यवस्था के हर केन्द्र के लिए मानदण्ड भी तय करने प्रारम्भ
कर दिए हैं। परीक्षा चाहे नौकरियों की हो या विश्वविद्यालय में दाखिले की, हर जगह
अंग्रेजी छाई रहती है। कौन-सा काम अंग्रेजी में होगा और कौन सा हिन्दुस्तानी
भाषाओं में, यह
सब इंग्लिश मीडियम सिस्टम का शक्तिशाली संभ्रात (पावरफ़ुल एलिट) वर्ग ही
तय कर रहा है।
अब परम्परागत से आधुनिक अर्थव्यवस्था में हुए बदलाव में औपचारिक शिक्षा की
भूमिका का फिर से विश्लेषण करते हैं।
आधुनिक उद्योगों के साथ आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का भी प्रादुर्भाव हुआ। चूँकि उद्योग अब प्रक्रिया
आधारित हो गए हैं अतः हर प्रक्रिया हेतु विशिष्टतापूर्ण शिक्षा के बिना आधुनिक
व्यवस्था को चला पाना संभव ही नहीं है। औद्योगिक समाज का पूरा-का-पूरा पदानुक्रम
शैक्षिक योग्यता पर आधारित है। डॉक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन, कम्युटर ऑपरेटर
ड्राईवर आदि तमाम प्रकार की पदव्यवस्था हेतु अलग-अलग तरह की शिक्षा व्यवस्था और
प्रशिक्षण केन्द्र बन गए हैं। यदि यह तय कर दिया जाए कि कौन-सी शिक्षा किस
भाषा-माध्यम में होगी, तो यह भी तय हो जाएगा कि समाज का कौन-सा वर्ग कौन-सा काम करेगा। औपचारिक
शिक्षा व्यवस्था पर नियंत्रण का अर्थ है, प्रक्रिया आधारित समाज व्यवस्था पर
नियंत्रण कायम करना। शिक्षा की धुरी में किसी भाषा विशेष को रखने का अर्थ अवसर को
उस भाषा विशेष को बोलने वालों तक सीमित करना। चूँकि भाषा को ज्ञान, योग्यता,
पुस्तकों की उपलब्धता आदि से जोड़ा जा सकता है तो उसके पीछे की राजनीति को तोड़ना
आसान नहीं है। औपचारिक शिक्षा को भाषा विशेष में संचालित करने के चार फयदे हैं। उस
भाषा विशेष को न जानने वाले लोग उस बुर्ज में आ ही नहीं सकते। दूसरा जो आ जाते हैं
वे वहीं के होकर रह जाते हैं, अर्थात् वे जा नहीं सकते। तीसरा सबसे जबर्दस्त फायदा
यह कि जो बाहर रह जाते हैं वे हमेशा इस प्रयास में लगे रहते हैं कि किस तरह वे उस
बुर्ज में पहुँचेंगे और जब वे वहाँ पहुँच नहीं पाते, तो आसानी से अपनी असफलता का कारण अपने आप
को ही मान लेते हैं। जो किसी तरह से बुर्ज में दाखिल हो पाते हैं, सत्तधीशों
द्वारा उन्हें शेष समाज के लिए तथाकथित रूप से आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया
जाता है।
वर्तमान औपचारिक व्यवस्था के अनुसार अपेक्षाकृत निम्न दर्जे के समझे जाने
वाले कार्यों का शिक्षण-प्रशिक्षण तो हिन्दुस्तानी भाषाओं में सम्भव किया गया है,
जैसे आईटीआई तकनीशियन आदि। पर अपेक्षाकृत उच्च दर्जे की समझे जाने वाली शिक्षा आज
तक अंग्रेजी में ही सम्भव बना कर रखी गई है, जैसे इंजीनियरी, मेडिकल आदि।
स्वाभाविक है उच्च दर्जे के समझे जाने वाले कामों में वे ही रह पाएँगे, जो अपनी
शिक्षा के दौरान ही उस विशिष्ट भाषा में पारंगत हो जाएँगे, जिस भाषा
विशेष में वह शिक्षा उपलब्ध कराई गई हो।
प्रक्रिया आधारित समाज की पदानुक्रम व्यवस्था पूर्णतः शिक्षा, कुशलता
और योग्यता द्वारा निर्धारित होती है। शिक्षा, कुशलता, योग्यता को परिभाषित करने
का अधिकार समाज के वर्चस्व-प्राप्त वर्ग के पास है। वर्चस्व-प्राप्त वर्ग की
सामूहिक संस्कृति पर इंग्लिश मीडियम सिस्टम हावी है। अतः जैसे-जैसे हम समाज
व्यवस्था के उच्च से उच्च शिखर पर जाते हैं, वैसे-वैसे इंग्लिश सिस्टम में समाहित होते
जाते हैं। अतः औपचारिक शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था भी वैसी ही है। जैसे-जैसे हम
उच्च शिक्षा के ऊपरी पायदानों पर जाते हैं, वैसे-वैसे अंग्रेजी की अनिवार्यता की
बाधा कठोर होती जाती है।
उच्च स्तर की शिक्षा हासिल करने के लिए ‘अंग्रेजी भाषा की सुरंग’ से होकर
गुजरना ही पड़ता है। फरीदाबाद स्थित औद्योगिक मज़दूरों की बस्ती आजादपुर-स्लम में
रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया, “अब जातियाँ तो इतना मायने नहीं रखतीं, हाँ
शिक्षा (अहर्ता के संदर्भ में) जरूर मायने रखती है। बड़े पदों तक पहुँचने के लिए
शिक्षा जरूरी है। वह उच्च डिग्री वाली पढ़ाई वही कर सकता है, जिसके पास अंग्रेजी
भाषा का ज्ञान हो।” इस व्यक्ति के
वक्तव्य को स्पष्ट करते हुए एक दूसरे व्यक्ति ने कहा “अच्छे कॉलेज या
यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने की पहली शर्त ही अंग्रेजी है।” फरीदाबाद के स्लम इलाके की एक महिला जो अपने
बच्चे को एक निम्न दर्जे के गैर-मान्यता प्राप्त इंग्लिश मीडियम स्कूल में छोड़ने
जा रही थी,
उसने पूछने पर उसने जबाब दिया, “अंग्रेजी पढ़ेगा तब ही तो बड़ा बनेगा।”
सरकार द्वारा गठित सेनगुप्ता कमेटी रिपोर्ट के अनुसार भी औद्योगिक और सेवा
क्षेत्र में काम करने वाले 92% कामगार असंगठित क्षेत्र से ही हैं। आर्थिक
सर्वेक्षण 2013 के अनुसार यह संख्या 96% कामगार असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। अर्थात्
पिछले दो-तीन वर्षों में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों की संख्या
बढ़ी है। सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार इस देश की 77% आबादी 20 रुपए
प्रतिदिन से कम पर गुजारा करती है। अब जो पहले ही 20 रुपए प्रतिदिन पर गुजारा कर
रहा है,
क्या वह हजारों रुपयों की फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों की ‘चॉइस’ कर पाएगा? उस से
भी बड़ा सवाल, सरकार के शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2010 के कानूनी फार्मूले से यदि किसी भी
तरह 20 रुपए प्रतिदिन से कम पर गुजारा करने वाली 77% आबादी को 25% आरक्षण के आधार
पर कुछ को एडमिशन मिल भी जाता है, तो क्या उस वर्ग का विद्यार्थी और उसका परिवार
इस नए माहौल में स्वयं को समायोजित/एडजस्ट कर भी पाएगा? इन सब प्रश्नों को इस के
पहले के खण्ड में खूब खंगाला गया है। पर एक बार सामाजिक दृष्टिकोण से खंगालते हुए
देखते हैं जब 77% या इससे भी ज्यादा, लगभग 85% आबादी में से कुछ लोग, अंग्रेजी माध्यम की इस शिक्षा व्यवस्था तक
यदि किसी तरह अपनी पहुँच बना भी लेते हैं, तो आखिर उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
हम पहला उदाहरण एक चाय बेचने वाले व्यक्ति के परिवार का लेते हैं। उनकी
आर्थिक स्थिति की तुलना सेवा क्षेत्र में कार्यरत उच्च पदों पर आसीन प्रोफ़ेसरों,
उच्च अधिकारियों, कोर्ट के जजों, हाईकोर्ट तथा सुप्रीमकोर्ट के वकीलों तथा इसी
प्रकार के अन्य रोज़गार युक्त तथाकथित अंग्रेजी भाषा में पारंगत लोगों से नहीं की
जा सकती। आबादी का एक बड़ा हिस्सा तो अल्प आय वाले असंगठित क्षेत्र पर ही निर्भर
है। वह अंग्रेजी भाषा से अछूता भी है। उसकी आमदनी इन बड़े पदों पर काम करने वालों
के मुकाबले नगण्य ही हैं। संगठित क्षेत्र में कार्यरत वर्ग, जिसकी आय असंगठित
क्षेत्र के कामगारों के मुकाबले बहुत ज्यादा है, वह संगठित क्षेत्र वाला वर्ग ही
इस देश में अंग्रेजी भाषी भी है। किसी ज़माने में अलीगढ़ से रोज़गार की तलाश में आए
रामफल उर्फ़ चाय बेचने वाले सज्जन पहले फरीदाबाद की फैक्टरी में मजदूर थे। बीच में
काम छूट जाने की वजह से उन्होंने चाय बेचने का काम शुरू किया। आज उनकी भी इच्छा
अपने बच्चों को अंग्रजी माध्यम में पढ़ा कर बड़ा आदमी बनाने की है। अतः इन सज्जन का
लक्ष्य अपने बच्चों को इन उच्च ओहदों तक पहुँचाना ही है। इसीलिए वे अपने बच्चों से
कहते हैं, “आज की डेट में अंग्रेजी है क्या चीज, जो दो-चार क्लास पढ़ ले, वही बोल
सकता है। जो अंग्रेजी लिख पढ़ सकता है। वह ही आगे बढ़ सकता है।” कुछ ऐसा ही दसवीं कक्षा की छात्रा आरुणी के पिता ने भी
कहा। वे व्यक्तिगत रूप से मातृभाषा को शिक्षा हेतु श्रेष्ठ मानते हैं, पर वे
कहते हैं कि जब वे दफ्तरों, विश्वविद्यालयों
में चारों और इंग्लिश बोलने वालों को ही पाते हैं तो उन्हें लगता है कि
यदि उनके बच्चों को यह बोली नहीं आई तो वे इस उच्च समाज में आने पर हीनभावना के ही
शिकार होंगे। रमेश के पिता अंत में रमेश का दाखिला हिंदी माध्यम में करवाने को
तैयार हैं पर वे साथ ही यह भी कहते हैं, “वह फिर आगे अपनी बहन की भाँति किसी अच्छे
कोर्स में नहीं जा पायेगा, बस भाई की भाँति छोटा-मोटा कोर्स ही कर पायेगा।”
अर्थात् इस परिवार में भी वही छात्र आदर्श है, जो अंग्रेजी की बाधा को पार कर गया। चाहे
वह कितना ही रट्टू-तोता क्यों न हो। वह नालायक है, जो अंग्रेजी की दहलीज़ पर रूक गया हो, अब वह
चाहे कितना भी विचारशील क्यों न हो, उसकी विचारशीलता का कोई मोल नहीं रह गया है।
प्रतिष्ठित माने जाने वाले पदों पर अंग्रेजी भाषी तथाकथित शिक्षित लोग ही
विराजमान हैं। समाज के इस वर्ग के पास पद है, पैसा है और इज्जत भी है। ये वर्ग ही
मिल कर अंग्रेजी माध्यम व्यवस्था (इंग्लिश मीडियम सिस्टम) बनाता है और
इस वर्ग का सामूहिक चेतन-अवचेतन ही अंग्रेजी माध्यम संस्कृति (इंग्लिश मीडियम
कल्चर) को विकसित करता है। अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक काल के बाद विकसित हुई वर्तमान की इस नव-औपनिवेशवादी-व्यवस्था
में अंग्रेजी काल में पैदा हुए अंग्रेजी भाषी लोगों की पीढ़ी ही सत्ता के
केन्द्रों पर विराजमान है। यह वर्ग ही शेष समाज को शोषित भी कर रहा है, संचालित
भी एवं नियंत्रित भी। यही वर्ग शेष समाज को नेतृत्व भी प्रदान करता है। कोई बिरला
भूला-भटका व्यक्ति यदि इस व्यवस्था का भाग बन जाता है, तो धीरे-धीरे उसके लिए भी यह अनिवार्य हो
जाता है कि वह इस अंग्रेजी माध्यम संस्कृति में रम जाए। उदाहरण के लिए, राम मनोहर
लोहिया के अनुयायी मुलायम सिंह यादव किसी जमाने में हिन्दी के कट्टर समर्थक रहे
हैं। वे खुद अंग्रेजी भाषी भी नहीं है। परंतु राजनीति में आने के बाद जो पद और
रुतबा प्राप्त हुआ, उसका फायदा उठा कर उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी को एलीट राजनेताओं के समकक्ष
लाने के लिए अपने पुत्र की सम्पूर्ण औपचारिक शिक्षा एलिट वर्ग के मानदण्डों के
अनुरूप ही करवायी। मिलिट्री स्कूल की एलिट पढ़ाई और फिर ऑस्ट्रेलिया की उच्च
शिक्षा अर्थात् पूरी तरह से एलिट राजनेताओं के अनुरूप संस्कार दिये गए, और अब
उनकी नयी पीढ़ी के पुत्र तो अंग्रेजी के हिमायती हैं ही, श्री मुलायम सिंह भी अंग्रेजी को लेकर
मुलायम पड़ गए हैं। यह कोई छोटे-मोटे नहीं, अपितु रुतबे वाले एक राजनेता की कहानी है।
भारत के संभ्रांत वर्ग की संस्कृति के आगे वह भी नहीं टिक पाया। तो आम लोगों की
औकात क्या है? हर व्यक्ति का सपना है- पद हो, पैसा हो, रुतबा हो, और भारत में
अंग्रेजी इन सब तक पहुँचाने का साधन भी है। यदि कोई एलिट वर्ग तक पहुँच कर भी
अंग्रेजी से अछूता है तो वह एलिट वर्ग का भाग कभी नहीं बन पाएगा। अतः इसी लक्ष्य
को प्राप्त करने हेतु लोग अंग्रेजी भाषी बनने हेतु प्रेरित हो रहे हैं।
घोषित और अघोषित तौर पर उच्च शिक्षा का अंग्रेजी माध्यम होना भी अपने आप
में महत्वपूर्ण कारण है, क्योंकि यह ही उच्च माने जाने वाले पदों तक जाने का
मार्ग प्रशस्त करता है। इस देश के श्रेष्ठ माने जाने वाले तमाम विश्वविद्यालय और
एम्स-आईआईटी जैसे संस्थानों का शिक्षण पूर्णतः अंग्रेजी भाषा में होता है। इन
संस्थानों में दाखिले में सीबीएसई इंग्लिश मीडियम स्कूलों के विद्यार्थीयों की
अधिकता यह भ्रम पैदा करती है कि कामयाबी का रास्ता सीबीएसई का पाठ्यक्रम चलवाने
वाले इंग्लिश मीडियम स्कूलों के बीच से ही गुजरता है। लोगों के अनुभव भी उन्हें
प्रेरित करते हैं कि वे शुरुआत से ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढाएँ।
जैसा कि रमेश के पिता अजय ने अपने अनुभव में बताया, “हमें कॉलेज में क्या पढाया गया, वह कुछ
समझ नहीं आता था।” इसी प्रकार उनके ज्येष्ठ पुत्र ने भी अंग्रेजी माध्यम में
पढ़ाई समझ ना आने की वजह से पहले साल ही बी-फार्मा का कोर्स छोड़ दिया। इस अनुभव को
एम्स के विद्यार्थी अनिल मीणा के मामले से जोड़ कर देखें तो पाते हैं कि अनिल को
भी अंग्रेजी में दिए जाने वाले लेक्चर समझ नहीं आते थे। क्षेत्रीय भाषा माध्यम से
पढ़े हुए इस धुरंधर विद्यार्थी को एम्स में अंग्रेजी में चलने वाली कक्षाएँ ही समझ
नहीं आती थी। फलस्वरूप प्रथम वर्ष में ही सभी विषयों में अनुत्तीर्ण होने के बाद
उसने अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय किया। कुछ ऐसा ही तमिल माध्यम से स्कूल
से शिक्षा ग्रहण करने वासी छात्रा एस. धारिया लक्ष्मी के मामले में हुआ। बी. टेक
की इंजिनियरिंग की इंग्लिश मीडियम कक्षा
उसके समझ के बाहर थी, जिसके कारण एक रोज धैर्य खो कर उसने भी आत्महत्या कर ली। ऐसे अनेकों मामले
हैं और इन मामलों में हरेक जाति, धर्म, क्षेत्र के विद्यार्थी शामिल हैं। एक उच्च स्तर के
अंग्रेजी माध्यम स्कूल से पढ़ कर आए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के
विद्यार्थी को उच्च शिक्षा के अंग्रेजी माध्यम से कोई परेशानी नहीं होती तो
अनुसूचित जाति से संबंधित अनिल मीणा ने ही आत्म हत्या क्यों की? ठीक उसी तरह
दक्षिण भारत के नेताओं ने तो हिन्दी के विरोध में आन्दोलन कर अंग्रेजी के राज को
चिर स्थायी बना दिया, इसीलिए तो तमिल माध्यम के स्कूल से शिक्षा ग्रहण करने वासी छात्रा एस.
धारिया लक्ष्मी ने भी अंग्रेजी माध्यम की वजह से आत्महत्या की !!! इससे स्पष्ट है किसी भी व्यक्ति के लिए उसके परिवेश से
बाहर की भाषा बाधा ही पैदा करेगी। चाहे दुनिया की कोई भी भाषा हो। रमेश के पिता अजय को भी जब पता चला तो वे सब
काम छोड़ कर अपने पुत्र के होस्टल पहुँच गए। उन्होंने अपनी डबडबाई आँखों से मुझे
बताया “जब कुछ दिनों तक इसका फोन नहीं आया, और फोन पर बात करो तो सही से ना
बोलता था, तब हमें कुछ
डाउट-सा हुआ और मैंने उसके कॉलेज में फोन करके उसका रिजल्ट पता किया। जब पता चला
फेल है तो मैं सब काम छोड़ कर उसके कॉलेज भागा और उसी दिन उसका बोरिया-बिस्तर वापस
ले आया।”
नुइपा (NUIPA) के वर्तमान वाइस चांसलर, बेशक कन्नड़ माध्यम से पढ़ कर, उच्च शिक्षा
के दौरान अंग्रेजी पर महारथ हासिल कर चुके हों, पर समान्यतः क्षेत्रीय भाषा माध्यम में
पढने के बाद विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम में चलने वाली उच्च शिक्षा में कामयाब
नहीं हो पाते। इस तरह के अनुभव लोगों में ये विश्वास पैदा करते हैं कि उच्च शिक्षा
में कामयाबी का सफ़र बिना इंग्लिश मीडियम स्कूल की ट्रेन में बैठे संभव ही नहीं
है। निम्न वर्ग का ये भ्रम उच्च वर्ग के इंग्लिश मीडियम सिस्टम को और भी पुख्ता
करता जाता है।
इस बात को लेकर जितने अस्वस्थ माता-पिता हैं, बच्चे उनसे कम परेशान नहीं हैं। बच्चों को
भी अपने भाई-बहनों, आस-पड़ोस, कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाने वाले उनके भाई-बहनों-मित्रों के अनुभव से यह
जानकारी हासिल हो जाती है कि अच्छे माने जाने वाले विश्वविद्यालयों में शिक्षा पूर्णतः
अंग्रेजी में ही होती है। उनमें भी यह विश्वास घर गया है कि उस नए वातावरण में
समायोजित होने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य है। इन मानदंडों की जानकारी बच्चे, बड़े भाई-बहनों और उनके आस-पड़ोस के लोग भी देते
रहते हैं। यह उच्च वर्ग के अंग्रेजी मीडियम कल्चर के अनुरूप किया गया समाजीकरण ही
तो है। जिसमें बच्चों को अंग्रेजी मीडियम व्यवस्था के अनुरूप बनाने हेतु अंग्रेजी
साँचे में ढाला जाता है। इस कार्य मे अंग्रेजी मीडियम स्कूल इस साँचे में ढालने का
काम कर रहे हैं। कुछ माता-पिता ऐसे भी होते हैं जो अपने तुतलाते बच्चों की भाषा का
तथाकथित शुद्धिकरण करने के लिए, उन्हें अंग्रेजी मीडियम पालनाघर (क्रच) में भी डालने
से भी संकोच नहीं करते हैं।
इतना तो अब स्पष्ट हो ही जाता है
कि अंग्रेजी मीडियम स्कूलों के प्रति झुकाव का कारण अंग्रेजी मीडियम सिस्टम का
दबदबा है। इस अंग्रेजी मीडियम सिस्टम दबदबे की वजह से ही राज-व्यवस्था, नौकरी की
परीक्षाओं, विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी छाई हुई है। जीवन लक्ष्य माने जाने
वाले श्रेष्ठ पदों तक पहुँचने के लिए यदि श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों, आईआईटी-एम्स,
यूपीएससी से ‘परमानेंट वीजा’ चाहिए। इंग्लिश मीडियम स्कूल उस वीजे के लिए
‘अंग्रेजी’ रूपी परमानेंट पासपोर्ट प्रदान करने का काम करते हैं।
इस प्रकार अंग्रेजी माध्यम स्कूल चुम्बक तो बना ही दिया गया है पर यह
प्राकृतिक चुम्बक नहीं है। यह बिजली से बने उस कृत्रिम चुम्बक के सामान है, जो तब तक
ही आकर्षण रखता है जब तक इसमें बिजली प्रवाहित होती है। पर यह कृत्रिम चुम्बक, प्राकृतिक चुम्बकों से कही अधिक शक्तिशाली बना
हुआ है। इन कृत्रिम चुम्बकों के प्रभाव से ना केवल बच्चों, अपितु माता-पिता का भी व्यवहार परिवर्तित
होता है। यह कृत्रिम चुम्बक बच्चों के सम्पूर्ण साँस्कृतिक परिवेश में परिवर्तन
लाता है। यही कृत्रिम चुम्बक तय करता है कि बच्चे किस तरह के लोगों से दोस्ती
करेंगे, यही कृत्रिम चुम्बक तय करता है कि किन जगहों पर लोग घूमने जाएँगे, यही
कृत्रिम चुम्बक तय करता है कि बच्चे घर के काम, खेती-बाड़ी, आदि में हाथ बटाएँगे या
नहीं। यह कृत्रिम चुम्बक, विद्यार्थी को उसके सम्पूर्ण साँस्कृतिक परिवेश से काट
कर नष्ट कर देता है और तथाकथित रूप से श्रेष्ठ माने जाने वाले अंग्रेजी सिस्टम के
परिवेश के लिए तैयार करता है। इस प्रकार प्रसिद्ध समाज-विज्ञानी दुर्खाइम की यह
बात स्पष्ट होती है कि स्कूल का काम विद्यार्थी को न केवल सामाजिक भूमिकाओं के लिए
तैयार करना है,
अपितु समाज के मानकों को अपनाने के लिए भी। यह भूमिका और मानक तय करने का काम समाज
का वर्चस्व प्राप्त वर्ग करता है। औपचारिक उच्च शिक्षा की एजेंसी ने, ना केवल
विद्यार्थियों का, अपितु सम्पूर्ण जन-समुदाय का समाजीकरण इस तरह से किया है कि यह एक आम
धारणा बन गयी है कि बिना अंग्रेजी के कामयाबी हासिल हो ही नहीं सकती है। श्रेष्ठ
कहलाने वाले ओहदों तक पहुँचने का पहली शर्त/मानदंड अंग्रेजी ज्ञान ही है। इसलिए जब
कोई अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी अपने बच्चों को दो लाइन
अंग्रेजी के बोलता देखता है तो अपने मुछों को ताव देता है और एक बार अपने आप को
उच्च कहलाने वाले अंग्रेजी भाषी तबके के साथ खड़ा हुआ पाता है।
ग्रामीण क्षेत्र के कुछ जागरूक लोगों का मानना है कि लार्ड मैकाले ही वो
शक्स है जिसने इस देश की मानसिक गुलामी वाली अंग्रेजी माध्यम शिक्षा की नींव रखी।
ग्रामीण क्षेत्र में आज भी यह आम जुमला है - “अंग्रेज चले गए अपनी पूँछ यहाँ
छोड़ गए।” पर वे लोग स्वतंत्रता के बाद
के एलिट वर्ग द्वारा अपने निहित स्वार्थों के लिए बनाए गए इंग्लिश मीडियम
सिस्टम की भूमिका को नहीं समझ पाते।
इंग्लिश मीडियम सिस्टम का मूल कारण उच्च शिक्षा तथा प्रशाशन में
अंग्रेजी का बने रहना भी है। प्रोमेश आचार्य ने अपनी पुस्तक में लिखा कि
स्वतंत्रता के बाद लोगों का झुकाव तेजी से अंग्रेजी की तरफ़ बढ़ा है। इसका उन्होंने
यह कारण स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के बाद, नौकरी और उच्च शिक्षा के जो दरवाजे भारतीय
लोगों के लिए खुले, उन नौकरियों के लिए अंग्रेजी अनिवार्य थी। यही स्थिति हम उच्च शिक्षा के
क्षेत्र में देखते हैं। आज अच्छी माने जाने वाली हर शिक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़
अंग्रेजी में उपलब्ध है। पर जैसा कि न्युपा के उपकुलपति ने कहा कि क्षेत्रीय भाषा
माध्यम से डिग्री कर के भी उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का ज्ञान हासिल किया जा सकता
है। लोगों ने अपने अनुभव से यह मान लिया है कि उच्च शिक्षण संस्थान में सफल होने
के लिए अंग्रेजी पर पकड़ मजबूत होना जरूरी है।
स्वतंत्रता के बाद उच्च शिक्षा की भाषा और प्रशासन की भाषा को अंग्रेजी को
ही बनाये रखा। संविधान के माध्यम से पहले दस वर्ष के लिए अंग्रेजी को लागू रखा।
फिर उत्तर और दक्षिण की भारतीय भाषाओं को बिल्लियों की तरह आपस में लड़वाया और इस
आड़ में उच्च वर्ग तथा सत्ताभोगी की भाषा, अर्थात् अंग्रेजी को समस्त भारत पर थोपने
का कार्य किया जाता रहा और जैसे-जैसे शिक्षा का निजीकरण बढ़ा, वैसे-वैसे
अंग्रेजी का दबदबा भी। क्योंकि बाजार में वही बिकता है, जो दिखता है। अपनी भाषा में पढ़ा कर लोगों
को शिक्षित करना मुश्किल है। पर अंग्रेजी के दो शब्द रटा कर तोते की भाँति बुलवाना
आसान। इस प्रकार वे शिक्षा नहीं शिक्षा का भ्रम पैदा करते रहे हैं। 90% प्रतिशत
निजी स्कूल यही कर रहे हैं। बाकी बचे 10% वो सिर्फ़ उच्च तथा उच्च-मध्यम वर्ग की
संस्कृति को बनाने का काम कर रहे हैं।
ऊपर के कथन को हम बोर्जियो की संस्कृति पूँजी की संकल्पना के आधार पर भी मूल्यांकित कर सकते
हैं। यदि औपचारिक उच्च शिक्षा (श्रेष्ठ कहलाने वाली) का उद्देश्य सिर्फ़ मानव पूँजी
का निर्माण ही नहीं, अपितु साँस्कृतिक पूँजी का
संरक्षण प्रदान करना भी है। इस प्रकार, उसकी भूमिका आर्थिक पूँजी को सीमित हथों में रखना भी
है। श्रेष्ठ समझी जाने वाली औपचारिक उच्च शिक्षा की भूमिका तो ‘साँस्कृतिक
पुनरुत्पादन’ के माध्यम से ‘साँस्कृतिक
पूँजी’ की इमारत को पुख्ता
करना भी है। ‘साँस्कृतिक पुनरुत्पादन’ से तात्पर्य है- समाज के वर्चस्वशाली वर्ग के वर्चस्व को बनाए रखना, जिसके लिए
वर्चस्ववादी वर्ग यह तय करता है कि समाज के उच्च स्तर पर पहुँचने के लिए किस
प्रकार के ज्ञान, कौशल और क्षमता की आवश्यकता है, साथ ही, इस
पूर्व-निर्धारित ज्ञान, कौशल व क्षमता तक पहुँचने के रास्ते को तय करने का
अधिकार वर्चस्व में बैठे वर्ग के हाथों में ही होता है।
जैसा कि कृष्ण कुमार जी की पुस्तक ‘गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद’ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि अंग्रेजी
शिक्षा से सिर्फ़ क्लर्क वर्ग ही तैयार नहीं हुआ, बल्कि तथाकथित शिक्षित कहलाने वाला एक
छोटा-सा वर्ग भी तैयार हुआ, जो
शासन-प्रशासन और शिक्षा-व्यवस्था के शीर्ष पर रहा। स्वतंत्रता के बाद इस वर्ग का
वर्चस्व बना रहा। फलस्वरूप उच्च शिक्षा की भाषा अंग्रेजी ही रही। यह बात महात्मा
गाँधी के शब्दों से और पुख्ता होती है, जब वे वर्ष 1909 हिन्द स्वराज में लिखते हैं- “एक साधारण एम.ए. पास व्यक्ति
भी गलत अंग्रेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे-से-अच्छे विचार प्रकट करने का
जरिया अंग्रेजी है। हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अंग्रेजी में चलता है।” सत्ता के शीर्ष पर यही वर्ग छाया रहा। इसने ही साँस्कृतिक
पूँजी और सामाजिक पूँजी का निर्माण किया। सामाजिक पूँजी के रूप
में एक प्रकार की अंग्रेजी भाषा बोलने वालों का समूह तैयार हुआ। यह समूह बेशक छोटा
है, पर
बहुत शक्तिशाली है। समाज के शेष जन अर्थात् अंग्रेजी ना बोल पाने वाला जन समुदाय, उन मूल्यों को अपने अन्दर समाहित करना चाहता
है। ये जन-सामान्य के नए उपजे साँस्कृतिक मूल्य हैं। बिना अंग्रेजी सफलता हासिल
नहीं हो सकती, यह
उसकी धारणा है। “जो अंग्रेजी बोलेगा वह ही दहाड़ेगा” इस प्रकार का विश्वास लोगों
में बड़ी चतुराई से भर दिया गया है। इस प्रकार, अंग्रेजी भाषा को समाज के स्तरीकरण का आधार
बना दिया गया है। समाज में अलग-अलग वैचारिक स्तर के अलग-अलग समूह होते हैं। जिनका
पदानुक्रम साँस्कृतिक पूँजी के केंद्र से दूरी के आधार पर तय किया जाता है।
इस साँस्कृतिक पूँजी का संरक्षण, आर्थिक
पूँजी तथा राज-सत्ता करती है। इसलिए कोई
वर्ग विशेष आर्थिक रूप से सम्पन्न होता है, तो वह अपनी एकजुटता, साँस्कृतिक
रूप से सम्पन्न वर्ग के साथ करता है।
जैसा कि इस मामले पर लिए गये साक्षत्कार और केस स्टडी के पात्रों का कहना
है विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षण के श्रेष्ठ समझे जाने वाले संस्थानों में
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का ही दबदबा रहता है। इसके आधार पर मूल्यांकन करने पर हम
पाते हैं कि ये उच्च संस्थान(युपीएससी, एम्स, आईआईटी, आदि) ही स्कूलों में पढ़ने
वालों के लिए आदर्श तय करते हैं। यदि हम महात्मा गाँधी की मानें और उनके विचारों
के आधार पर आज की स्थितियों का विश्लेषण करें, तो पाएँगे कि इन देश के 95% स्कूलों में
पढ़ने वाले बच्चे अपनी 90% ऊर्जा अंग्रेजी में रटने में ही खर्च कर देते हैं।
जैसे-जैसे उच्च वर्ग से निम्न वर्ग की तरफ़ जाते हैं, ‘उच्च-वर्गीय-अंग्रेजी’
को पढ़ने का बोझ बढ़ता जाता है। अंततः इस शिक्षण व्यवस्था में, वे ही लोग
कामयाब होते हैं जो अंग्रेजी में महारत हासिल कर पाते हैं और यह पहले से ही तयशुदा
उच्च वर्गीय लोग हैं। समाज में लोगों की छँटनी करने का काम अंग्रेजी कर रही है।
शिक्षा में वास्तविक बोझ शिक्षण का नहीं, पाठ्यक्रम का भी नहीं, विदेशी भाषा के
माध्यम का बना हुआ है।
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