अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-4
चाय वाले भैया की कहानी कुछ इस प्रकार है कि इन्होंने अपने नाते-रिश्तेदारों के दबाव में अपने दोनों बच्चों- रमेश और उमेश को सीबीएसई के स्कूल में दाखिला दिला दिया, पर न तो उन्हें और ना ही उनके बच्चों को इंग्लिश मीडियम वाली पढाई समझ में आती है। बस रिश्तेदारों का दाबाव और अपने बच्चों को कामयाब बना देने का जूनून है कि हैसियत ना होने के बावजूद भी उन्होंने अपने बच्चों को सीबीएसई से संबंध इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिल करवा दिया। इंग्लिश मीडियम के स्तर के अनुरूप अपने बच्चों को बनाने की होड़ में न केवल उनका सारा धन ही इंग्लिश मीडियम के हवन-कुंड में स्वाहा हो गया अपितु बच्चों का बचपन भी इस इंग्लिश-देवी को प्रसन्न करने की बलि चढ़ गया। आइए, इसे जानने के लिए आगे का वृतांत पढ़ते हैं।
जब शोधकर्ता ने रमेश और उमेश की माँ से बच्चों की पढाई के बारे में
जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने बताया कि वे इस स्कूल की पढाई से न केवल असंतुष्ट
हैं बल्कि उनके अनुसार स्कूल में चलने वाली गतिविधियाँ उनकी समझ के बाहर भी हैं।
जब शोधकर्ता ने पूछा कि आप किस आधार पर कह सकते हैं कि बच्चों की पढाई ठीक नहीं चल
रही है। तो उन्होंने सिर्फ़ इतना भर कहा की बच्चों के अच्छे नम्बर नहीं आते हैं।
जब से सीबीएसई स्कूल में डाला है, तब से बच्चे खींच-तान कर ही पास
हो पा रहे हैं। जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि क्या बच्चे घर आकर स्कूल की पढाई के
बारे में विचार-विमर्श करते हैं। इस पर माँ का कहना था, “हमें
तो इस स्कूल की पढाई-लिखाई इंग्लिश में होने की वजह से समझ में आती नहीं है। इसलिए
हम पढाई के बारे में विचार-विमर्श नहीं कर पाते हैं। हमने बच्चों का ट्यूशन लगा
रखा है, ट्यूशन के शिक्षक ही पढाई-लिखाई को देखते हैं। हमने
स्कूल के बाद भी ट्यूशन की व्यवस्था कर रखी है। बच्चे सिक्सथ क्लास (छठी कक्षा) से
इस स्कूल में आए हैं। इससे पहले वे हरियाणा बोर्ड के ही हिंदी मीडियम प्राइवेट
स्कूल में थे।” जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि कि हिंदी
मीडियम से इंग्लिश मीडियम में परिवर्तन से उत्पन्न असंतुलन को कैसे भरा। इस पर
जबाब था कि दाखिले के एक वर्ष पूर्व ही बच्चों का इंग्लिश का ट्यूशन, इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर के पास लगवा दिया था।
रमेश और उमेश के पिता पढ़े-लिखे नहीं हैं पर उनका का मानना है कि
सीबीएसई स्कूल सबसे बेकार हैं (नोट करें फरीदाबाद, हरियाणा के
गाँव-देहात के इलाकों में सीबीएसई स्कूल
का अर्थ ही इंग्लिश मीडियम स्कूल होता है तथा हरियाणा बोर्ड स्कूल का अर्थ
हिंदी माध्यम स्कूल होता है) चाय बेच कर सीबीएसई इंगलिश माध्यम स्कूल में पढ़ाने
वाले इस पिता का कहना है, “इन स्कूल में पढने वाले बच्चों को
पढ़ना-लिखना तो कुछ आता नहीं है। इंग्लिश मीडियम की वजह से घमंड करते हैं सबसे
ज्यादा। पर इन स्कूलों में पैसे जाते हैं सबसे ज्यादा। छोटी क्लास में तो फिर भी
चल जाते हैं पर बड़ी क्लास के बच्चे तो कती (बिलकुल भी) कामयाब नहीं हैं।” जब शोधकर्ता ने इसके पीछे का कारण जानना चाहा तो पहले तो कारण के रूप में
इंग्लिश बताया। पर फिर पलट कर कहा, “ इंग्लिश है क्या चीज !
आज की डेट में जो दो क्लास पढ़ लेता है वह ‘इंग्लिश टू
इंग्लिश’ बोल लेता है। बस बच्चे में दिमाग होना चाहिए।”
पर जब आगे कुरेदा तो उन्होंने कहा, “आज के समय
में एक भेड़-चाल शुरू हो गई है, हर कोई अपने बच्चों को बेहतर
से बेहतर स्कूल में दाखिला करवाना चाहता है। जितने बड़े स्कूल में पढ़ते हैं उतनी
ज्यादा शान। मेरे बच्चे अच्छे-खासे हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ते थे। पर पब्लिक
(लोगों) ने हमें जीने नहीं दिया। लोगों ने कहना शुरू किया कि हिंदी मीडियम में
क्यों पढ़ाते हो? इंग्लिश मीडियम में क्यों नहीं पढ़ाते?
हिंदी मीडियम में क्या रखा है? हिन्दी मीडियम
वालों का क्या भविष्य है? इंग्लिश मीडियम के बच्चे ही आगे
कामयाब होते हैं। मैं तो सुन कर रह जाता था पर उनकी माँ (अपनी पत्नी की तरफ़ इशारा
करते हुए) ने भी जब बोलना शुरू कर दिया। तो मुझे सोचने पर विवश होना पड़ा। लोग
मुझसे भी अधिक इससे बोलते। लोग बोलते- “अरे! क्या करोगे पैसे
जोड़ के? दो ही तो लडके हैं। सीबीएसई (इंगलिश मीडियम) स्कूल
में डालो।
अपने बच्चों की दिनचर्या का वर्णन करते हुए कहा, “मेरे बच्चे स्कूल से आएँगे, खाना-वाना खा कर सीधे
ट्यूशन जाएँगे। पहले इंग्लिश की ट्यूशन जाएँगे, फिर मैथ और
साइंस की। ट्यूशन से छः-साढ़े-छः बजे तक आएँगे, आकर स्कूल और
ट्यूशन का काम करेंगे। वे कहीं-भी इधर-उधर आते-जाते नहीं हैं.... जिस दिन इंग्लिश
मीडियम में डाले उससे एक साल पहले इंग्लिश का ट्यूशन लगवा दिया था। क्योकि इंग्लिश
मीडियम में इंग्लिश चाहिए ज्यादा। मतलब सभी विषय इंग्लिश में होने की वजह से
इंग्लिश हार्ड होती है। इसलिए मैंने पहले से ही ट्यूशन लगवा दिया। जिस दिन से
इंग्लिश मीडियम में डाले हैं मेरे बच्चों का एक दिन का भी ट्यूशन नहीं छूटा है....
पर फिर भी अच्छा रिजल्ट नहीं आता। अब यदि ट्यूशन वाले से बात करूँ तो वह कहता है
स्कूल वाला नहीं पढ़ाता है, स्कूल वाले से बात करूँ तो वह
कहता है- ट्यूशन वाला नहीं पढ़ाता है। अब इनकी पढाई तो हमारे समझ की है नहीं,
न ही हमें इंग्लिश समझ में आती है। हम तो पैसे ही खर्च कर सकते हैं।
पर पैसा खर्च कर कर भी कुछ रिजल्ट न मिले तो हम कहाँ जाएँ। मेरा पैसा काफी मेहनत
का है। सुबह चार बजे चारपाई छोड़ देता हूँ और रात के आठ-नौ बजे तक लगा रहता हूँ।”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि क्या आपके बच्चे जो स्कूल में पढाया
जाता है वो घर में डिस्कस करते हैं। इस पर उस विवश पिता का जबाब था, “डिस्कस तो तब करें जब हम कुछ जानते हों। इनकी पढ़ाई इंग्लिश में है और हम
ठहरे हिन्दी वाले। हमारे लिए तो इनकी पढाई काला अक्षर भैस बराबर ही है।”
इसी क्रम में जब बच्चों से बातचीत की तो उनका कहना था।
“समझाने के लिए मैडम हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं
का प्रयोग करती हैं पर लिखवाने के लिए सिर्फ़ इंग्लिश का ही प्रयोग कर सकते हैं।”
• “मैडम
अधिकतर बुक के ही उदाहरण लेती हैं, बहुत कम होता है जब बुक
के बाहर के उदाहरण लिए जाएँ।”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि क्या आप स्कूल में जो पढाई होती है
उसका बाहर के वातावरण के साथ लिंक जोड़ पाते हो?
उत्तर मिला - “हमारी टीचर हमें पढ़ा देती है।
उनके पढ़ाने के बाद हम उदाहरणों को अपने आसपास के परिवेश में ढूँढ़ने का प्रयास
करते हैं। पिछले प्रिंसिपल के समय मे तो यह संभव नहीं था। पर जब से नयी प्रिंसिपल
आई है, अंग्रेजी को लेकर रोक-टोक कुछ कम हो गयी है और इस
कारण अब टीचर हिंदी में स्कूल के बाहर के उदाहरण भी देने लगे हैं। जब इंग्लिश पर
जोर था तब टीचर सिर्फ़ बुक के ही उदाहरण दे पाते थे।”
जब शोधकर्ता ने अंग्रेजी में पढ़ने के फायदे जानने चाहे तो इसके जबाब
में रमेश का कहना था, “इंग्लिश जानते हैं तो किसी से बात कर सकते हैं।”
जब इसके बारे में अच्छे से खुलासा करने के लिए कहा तो उसने कहा, “बाहर के किसी शख्स या विदेशी व्यक्ति से बातचीत करने में इंग्लिश सहायक
है।” उसके अनुसार विदेश में (रूस, जापान
जर्मनी आदि) सभी जगह इंग्लिश ही बोली जाती है।
जब शोधकर्ता ने इसके आगे इंग्लिश मीडियम में पढ़ने का महत्व जानना
चाहा तो उसका जबाब था, “जॉब के लिए इंग्लिश जरुरी है। आगे पढाई करनी हो तो
इंग्लिश की ज़रूरत पड़ती है।”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि ये जानकारी आपको किससे मिली तो उसका
कहना था, “टीचर से (ट्यूशन और स्कूल दोनों के), स्कूल की असेंबली में भी यही बताया जाता है।”
इनके केस को और निकट से समझने के लिए इनके दोनों ट्यूशन के शिक्षकों
से बातचीत की गयी।
मैथ और साइंस पढ़ाने वाले शिक्षक के अनुसार- “इनकी इंग्लिश इतनी कमजोर है कि समझ तो ये लेते हैं पर समझ लेने के बाद भी
लिख नहीं पाते हैं और यही इनके फेल होने या कम नंबर आने का कारण है।”
शोधकर्ता ने पूछा, “मैथ में तो इंग्लिश का प्रयोग
कम होता है।”
मैथ और साइंस शिक्षक, “कुछ तो होता ही
है। दिक्कत वहीं से शुरू होती है।”
इस विषय में जब अंग्रेजी के शिक्षक से बात की तो उन्होंने बताया
-
“इन लोगों का अंग्रेजी का स्तर छठी कक्षा तक समझ लो
पूर्णतः शून्य था। पर छठी कक्षा से इन्हें अब सभी विषय अंग्रेजी में ही पढने होते
हैं। बस यही समस्या है। इंग्लिश नहीं आती तो कुछ भी नहीं आता। जानते समझते सब कुछ
हैं। पर इंग्लिश में लिख नहीं पाते। इस वजह से फेल होते हैं।” शोधकर्ता ने भी पाया कि बच्चे विज्ञान की संकल्पनाओं को अच्छी तरह से
व्यक्त कर पा रहे थे।”
उन्होंने आगे कहा, “इंग्लिश इनकी ही नहीं, इस इलाके के सभी बच्चों की समस्या है। मेरे पास तो ट्यूशन आते हैं किसी
तरह इंग्लिश में पास करा दो। अब जब इंग्लिश ही नहीं आती, तो
इंग्लिश मीडियम में मैथ, साइंस, सोसल
साइंस कैसे पढेगे?”
“बच्चे इस योग्य हैं नहीं कि इंग्लिश में पढ़ सकें। पर
इस फ्रिंज इलाके (ग्रामीण और शहरी इलाके का सीमावर्ती क्षेत्र) के लोगों की इच्छा
है कि उनके बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ें। सारी समस्या का कारण यह ही है।”
निष्कर्ष –
·
बच्चे
अच्छे खासे हिन्दी माध्यम में पढ़ते थे। पर समाजिक दबाव में उन्हें अंग्रेजी
माध्यम सीबीएसई स्कूल मे दाखिल करवाया गया।
·
इंग्लिश
माध्यम में डालते ही बच्चे पिछड़ने लगे। बच्चों पर ट्यूशन का दबाव बढ़ गया। फिर भी
बच्चे फेल हो रहे हैं।
·
स्कूल वाले
शिक्षक ट्यूशन वाले शिक्षकों पर दोषारोपण करते हैं।
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स्कूल की
शिक्षा माँ-बाप की समझ से बाहर है। न ही बच्चे अपनी पढ़ाई के बारे में उन्हें कुछ
बता ही सकते हैं।
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