भाषा के शुद्धिकरण एवं संस्कृतिकरण के साधन के रूप में विद्यालय
‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रतिपादन समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने किया है। श्रीनिवास के अनुसार संस्कृतिकरण’ वह प्रक्रिया है जिसमें निम्न समझी जाने वाली जातियाँ उच्च समझी जाने वाली जातियों के तौर-तरीकों को अपनाती हैं। परंतु शोधकर्ता ने अपने इस शोध में पाया कि जातियों का ‘संस्कृतिकरण’ नहीं अपितु निम्न वर्ग का ‘सांस्कृतिक चलन’ उच्च एवं सम्भ्रांत वर्ग की तरह हो रहा है। वे समाज का उत्कृष्ट भाग माने जाने वाले सम्भ्रांत वर्ग के रहन-सहन, बोल-चाल को अपनाना चाहते हैं। ‘हाई सोसाइटी’ में जाकर उसके अनुरूप आचरण करने और उनके कदम-से-कदम मिला कर चलने के लिए इंग्लिश जरूरी है, ऐसा माहौल आजकल बना दिया गया है।
शोध के दौरान प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर
स्पष्ट होता है कि अंग्रेजी समझ में आने वाली भाषा हो या ना हो, पर स्टेटस
की भाषा तो अवश्य ही बना दी गई है। यही अंग्रेजी के माध्यम से संस्कृतिकरण का
आधार भी है।
आइए तनिक विचार करें -
शोधकर्ता पुस्तक के पाठकों से पूछना चाहता
है कि तथाकथित-सरकारी-शहरी-हिन्दी यदि हमारी राजभाषा उर्फ राष्ट्रभाषा है तो
भिडूकी की ब्रज प्रभावित हिन्दी, बुन्देलखंडी-हिन्दी आदि क्या है? इसी प्रकार तमिल
तेलगू मलयालम असमीया क्या ये सब गैर-राष्ट्र भाषाएँ है? गाँव में खुले सीबीएससी संस्था के स्कूल के प्रचार्य द्वारा यह कहा जाना
कि इस गाँव के लोगों को तो राष्ट्रभाषा (राजभाषा) हिन्दी भी बोलनी नहीं आती। यह
किस बात को प्रमाणित करता है? छठी-सातवीं क्लास के दाखिले
में बच्चों की भाषा किस तरह बाधा बन कर उभरती है। इस स्कूल में चतुर्थ श्रेणी और
हैल्पर से आगे उसी गाँव का कोई व्यक्ति
क्यों नहीं नियुक्त हो सकता? जब कि गाँव में बी. ए. बी एड तो
दूर प्रतिष्ठिक संस्थाओ से इंजिनियरिंग पी एच डी करे लोग भी है। उससे भी बड़ा
प्रश्न, जब शिक्षक के पद पर नहीं हो सकता तो चतुर्थ श्रेणी और हैल्पर के पद पर उस
गाँव का कोई व्यक्ति कैसे नियुक्त हो जाता
है? चतुर्थ श्रेणी और हैल्पर के पद पर काम करने वालों को भी
तो स्कूल वाले फरीदाबाद-दिल्ली से बुला सकते थे। पर उन्होंने गाँव वालों को इन पदों पर क्यों नियुक्त किया है?
भिडूकी गाँव में गैर मान्यता के आधार पर
चलने वाले ‘सेमी-मीडियम’ (अर्थात् हिन्दी-अंग्रेजी दोनों माध्यम)
स्कूल के प्रबंधक ने भी कहा कि शहरी इलाकों के शिक्षक की हिन्दी शुद्ध होती है।
जबकि भाषा अपनी संचित विरासतों से समृद्ध होती है। भारतीय उपखंड की सभी भाषाएं एक
दूसरे की पूरक है न कि प्रतिद्वंद्वि। अतः हिन्दी भारत की सभी बोलियों का मिला
जुला रूप है। गांधी जी ने उसके लिए हिन्दुस्तानी शब्द का प्रयोग किया है। गांधी जी
कि हिन्दुस्तानी हिन्दी और उर्दू में विभक्त नहीं है और उसमें तमिल तेलगू समेत सभी
भाषाओं का ही मिला जुला स्वरूप है।
ये 90 दिनों में अंग्रेजी सीखाने का दावा करने वाले विज्ञापन
किस सांस्कृतिक प्रभाव की वजह से खुल रहे है । जिसदिन पहली दफा इंग्लिश स्पीकिंग
कोर्स की की पुस्तक हाथ में लिया था उस रोज ये उम्मीद पाली थी कि अगले दो साल में
अंग्रेजी बोलने में अंग्रेजों को मात देगे । दो साल क्या, यहाँ तो बीस साल बाद भी
जहाँ से चले वही खडे है । किन सांसस्कृतिक कारकों प्रभावं से गली-गली में इंगलिश
स्पीकिंग की दुकान खुल रही है जरा विचार करे ? ग्रामीण, कस्बाई,
मघ्यन एवं निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के दर्द क्या है? आइये
विचार करते है ।
ऐसा नहीं है कि यह एक-तरफा क्रिया है, खुद गाँव
के अभिभावक नहीं चाहते कि उनके बच्चे हिन्दी और उसकी बोलियों का इस्तेमाल करें।
जैसा कि पलवल के इंटरनैशनल कहलाने वाले स्कूल के प्राचार्य से शोधकर्ता की वार्ता
के दौरान अभिभावक ने आते ही प्राचार्य से यह माँग रखी कि प्राचार्य उसके बच्चों की
भाषा को सुधारने पर विशेष ध्यान दें। निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने वाला ग्रामीण अभिभावक
भी अंग्रेजी और शहरी उच्च वर्गीय संस्कृति के अनुरूप अपने बच्चे का
व्यक्तित्व-निर्माण करवाना चाहता है। फरीदाबाद स्थित सामान्य दर्जे के स्कूल
प्राचार्य ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, “जिस माता-पिता के पास पैसा आ गया है वो अपने बच्चों को हाई
सोसाइटी में भेजने लगा है और पैसे के बल पर विशिष्ट कहलाने वाले प्राइवेट स्कूलों
में भेजने लगा है।” यहाँ हाई सोसाइटी का अर्थ क्या है? यदि नहीं समझ आता तो
बड़े-बड़े शहरों में पब्स-बार में चलने वाली पार्टी का एक नजारा ले ले। फ्रिंज
इलाके के अवलोकन में यह बात निकल कर आई कि नव-धनाड्य हुए माता-पिता का अपने बच्चों
को निजी स्कूलों में भेजने का प्रथम उद्देश्य ही ‘तथाकथित भाषा शुद्धिकरण एवं संस्कृतिकरण’ ही है। विशिष्ट समझे जाने वाले निजी स्कूल में अपने
बच्चों को भेजने की प्रमुख वजह यही है। जब धनाड्य वर्ग इस दिशा में कदम बढ़ाएँगे
तो उनसे विपन्न उनके पडोसी कैसे पीछे रहेंगे?
इसी क्रम में एक नया सवाल पैदा हुआ कि लोगों
को इस संस्कृतिकरण की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? ..और अंग्रेजी माध्यम की
वर्चस्वपूर्ण व्यवस्था के रहते क्या समाज के सभी वर्ग एवं गाँव-शहर सभी क्षेत्र के
लोगों को समातामूलक समान औपचारिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करवाने वाली समान स्कूली
शिक्षा की व्यवसस्था संभव भी है?
आइये विचार करते हुए आगे बढ़ते है।
इसका जबाब है स्कूल ही बच्चे का भविष्य तय
करता है। पर कैसे?
इस बात को समझने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था
के ढाँचे को देखना होगा।
किसी भी देश का स्कूली ढाँचा उसकी सामाजिक
व्यवस्था का प्रतिबिम्ब होता है। स्कूल की दशा, अर्थव्यवस्था की दशा ही तय करती है।
शोधार्थी अंजनी कुमार ने भी अपने शोध में पाया कि स्कूल में विद्यार्थियों का
झुकाव कला-विषयों से तेजी से हट रहा है। विद्यार्थी कला जैसे विषयों को गंभीरतापूर्वक
नहीं लेते। यह बात इस शोध के दौरान भी देखने को मिली। शिक्षकों का कहना है कि
विद्यार्थी कला ही नहीं संस्कृत, हिन्दी जैसे विषयों को भी गंभीरता से नहीं लेते।
आरुणी जब अपने दोस्तों के घर जाती है और वहाँ जब उनके परिवार के लोगों को पंजाबी
में बोलते पाती है तो आरुणी उस ओर ध्यान भी नहीं देती। क्या बोलते हैं, क्या नहीं
बोलते, इससे कोई मतलब नहीं ऱखती। उसके लिए तो अंग्रेजी ही महत्वपूर्ण है, वह अंग्रेजी
भाषा को मजबूत करने के इंग्लिश फिल्में भी देखती है। मॉल आदि में जाती है। वहाँ
लोग कैसे बोलते हैं उसे बड़े ध्यान से देखती है। क्यों? अरूणी के अपने शब्दों में,
“पंजाबी जानेगे तो क्या फायदा होगा। इंग्लिश जानेगे तो कल को जॉब में, यूनिवर्सिटी
में फायदा होगा” स्पष्ट है अंग्रेजी फायदा पहुँचाने की भाषा तो बना ही दी गई है।
जब बात फायदे और नुकसान की आ जाती है तो स्पष्टतः इस बात से जुड़ा कोई आर्थिक पेंच
भी होगा। इस आर्थिक पेंच को समझने के लिए हम भारतीय अर्थव्यवस्था के ढाँचे का
विश्लेषण करेंगे।
भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना में हुआ परिवर्तन का भाषा
शुद्धिकरण पर प्रभाव
अर्थव्यवस्था के आईने में साँस्कृतिक झलक की तलाश में संलग्न अतरिक्त पृष्ठ
देखें। उसके बाद ही हम समझ पाएँगे कि एम. एन. श्रीनिवास की निम्न से उच्च जातियों
की तरफ़ होने वाली ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा को निम्न से उच्च वर्ग की तरफ़ साँस्कृतिक
अवधारणा से बदलने की क्यों जरुरत है। शोधकर्ता यह नहीं कहता कि शेष भारत में भी यह
बात लागू होगी पर शोधकर्ता इतना तो कहता है कि जिस क्षेत्र में उसने यह शोधकर्ता
किया वहाँ तो यही बात उभर कर आई है। इस बात को स्पष्ट करने से पूर्व अर्थव्यवस्था
की तस्वीर प्रस्तुत करने वाले इन आँकड़ों को देखना होगा।
वित्त वर्ष 2011-12 में, एक तरफ़ जहाँ अर्थव्यवस्था की संवृद्धि (ग्रोथ) के साथ
सेवा क्षेत्र तथा औद्योगिक क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में योगदान बढ़ कर लगभग 83% का
है। सेवा क्षेत्र का अपना योगदान 59% है। कृषि क्षेत्र का अपना योगदान महज 17% है।
यह स्थिति वित्त वर्ष 1950-51 से पूर्णतः भिन्न है। वह वर्ष जब समाजशास्त्री एम.
एन. श्रीनिवास ने अपने दक्षिण भारत के गाँवों में किये गए शोध-अनुसन्धान के आधार
पर ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रतिपादन किया था। तब कृषि का योगदान 59% के लगभग था। आज
स्थिति उसके ठीक विपरीत है। 59% का योगदान कृषि-क्षेत्र नहीं, अपितु सेवा-क्षेत्र
कर रहा है। अर्थव्यवस्था में आए इस बदलाव का सम्बन्ध ‘संस्कृतिकरण’ से कैसे है? इस बात को समझने के लिए हमें अर्थव्यवस्था
की व्यावसायिक संरचना को भी देखना होगा। जहाँ जीडीपी अर्थात् उत्पादन की संरचना
में आमूलचूल परिवर्तन आया है, वहीं रोजगार संरचना में कोई विशेष बदलाव नहीं आया।
अभी-भी देश की जनसंख्या का लगभग 55-60% हिस्सा कृषि क्षेत्र पर निर्भर है।
इस प्रकार 18% आय अर्जित (= जीडीपी) करने वाला कृषि क्षेत्र 60% जनसंख्या
निर्भर है। कृषि क्षेत्र की जीडीपी में लगातार गिरती तुलनात्मक स्थिति तथा सेवा और
औद्योगिक क्षेत्र की जीडीपी में बढती तुलनात्मक स्थिति, जन-साधारण को कृषि-क्षेत्र को छोड़
सेवा-क्षेत्र में जाने को प्रेरित करती है। आप पिछले 10 वर्षों में कृषि की वृद्धि
दर को देखें, जो
कि लगभग स्थिरता (स्टेगनेशन) की हालत में है। दो दफ़े तो यह ऋणात्मक भी रही है।
अतः जब कृषि ही बदहाल है तो उस पर आधारित समाज का आदर्श भी बदला। गाँवों से शहरों
में पलायन के बाद सभी वर्गों के लोगों ने सेवा-क्षेत्र तथा औद्योगिक-क्षेत्र में
हाथ आजमाया। पर इसमें भी उसे मिला निम्न दर्जे का कार्य, क्योंकि उपरी दर्जे (अफसर स्तर) पर कार्य
के योग्य होने हेतु शिक्षित, कुशल होने की ज़रूरत है। उच्च स्तर की शिक्षा हासिल
करने के लिए ‘अंग्रेजी भाषा की सुरंग’ में से होकर गुजरना पड़ता है। आजादपुर स्लम में रहने
वाले एक व्यक्ति ने बताया, “अब जाति तो नहीं मायने रखती, हाँ
क्वालिफिकेशन (अहर्ता) जरूर मायने रखती है। उच्च डिग्री वाली पढाई वही कर सकता है,
जिसके पास अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हो।” इस व्यक्ति के वक्तव्य से यह स्पष्ट होता
है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने की पहली शर्त ही अंग्रेजी है।” फरीदाबाद के स्लम
इलाके की एक महिला, जो अपने बच्चे को एक निम्न दर्जे के गैर-मान्यता वाले स्कूल में छोड़ने जा
रही थी,
उसने पूछने पर जबाब दिया, “अंग्रेजी पढ़ेगा तब ही बड़ा बनेगा।”
जैसाकि सेन और गुप्ता कमेटी से भी स्पष्ट किया है कि औद्योगिक और सेवा
क्षेत्र में काम करने वाले लोग अधिकतर असंगठित क्षेत्र से हैं। आर्थिक सर्वेक्षण
की इस रिपोर्ट को देख कर भी यह पता लगता है कि 85% लोग असंगठित क्षेत्र में हैं, जिनकी
आमदनी काफी कम है। उदाहरण के तौर पर एक मामले में चाय बेचने वाले भैया भी सेवा
क्षेत्र में हैं, पर उनकी आर्थिक स्थिति सेवा क्षेत्र में कार्यरत उच्च पदों पर काम करने
वाले प्रोफ़ेसर, उच्च अधिकारी, कोर्ट के जज, हाईकोर्ट तथा सुप्रीमकोर्ट के वकीलों तथा
इसी प्रकार के अन्य रोजगारयुक्त लोगों से काफी कम है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा
अल्प-आय वाले असंगठित क्षेत्र पर निर्भर करता है। इस के पास आमदनी का नगण्य हिस्सा
है। संगठित क्षेत्र में कार्यरत वर्ग, जिसके पास आय का बड़ा हिस्सा है वह अंग्रेजी
बोलने वाला शिक्षित वर्ग है। किसी ज़माने में अलीगढ़ से रोजगार की तलाश में आए रामफल
उर्फ चाय बेचने वाले सज्जन, पहले फरीदाबाद की फैक्टरी में मजदूर थे। बीच में काम
छूट जाने की वजह से उन्होंने चाय बेचने का काम शुरू किया। आज उनकी भी इच्छा अपने
बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा कर अफ़सर बनाने की है। अतः इन सज्जन के
लिए अपने बच्चों को इन पदों तक पहुँचाना ही लक्ष्य है। तभी वह अपने बच्चों से कहते
है,
“आज की डेट में अंग्रेजी है क्या चीज, जो दो-चार क्लास पढ़ ले, वही बोल सकता है।” यही कारण व्यक्तिगत रूप
से मातृभाषा को शिक्षा हेतु श्रेष्ठ मानने वाले अर्पिता के पिता का है। जब वे
अपने नए दफ्तर में चारों और इंग्लिश बोलने वालों को ही पाते हैं तो उन्हें लगता है
यदि उनके बच्चों को यह बोली नहीं आई तो वे इस उच्च समाज में आने पर हीनता के शिकार
होंगे। रमेश के पिता अंत में रमेश का दाखिला हिन्दी माध्यम में करवाने को तैयार
हैं पर वे साथ में यह हिदायत भी देते है, “वह फिर आगे अपनी बहन की भाँति किसी
अच्छे कोर्स में नहीं जा पाएगा, बस भाई की भाँति छोटा-मोटा कोर्स ही कर पायेगा।”
सेवा-क्षेत्र के प्रतिष्ठित समझे जाने वाले पदों पर अंग्रेजी भाषा को बोलने
वाले तथाकथित शिक्षित लोग विरजमान हैं। हर व्यक्ति का सपना इन पदों तक पहुँचना है
और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही वे अंग्रेजी भाषा को अपनाने हेतु मज़बूर
हो गए हैं।
इसलिए उच्च शिक्षा-रूपी दूसरा कारण, पहले से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ही उच्च पदों तक का
रास्ता प्रशस्त करता है। देश के सर्वोच्च विश्वविद्यालय और आई.आई.टी. जैसे
संस्थानों में शिक्षण-कार्य पूर्णतः अंग्रेजी भाषा में होता है और इन संस्थानों
में लगातार सीबीएसई अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की कामयाबी समाज में ये भ्रम पैदा
करती है कि कामयाबी का रास्ता सीबीएसई का पाठ्यक्रम चलवाने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूलों से होकर ही गुजरता है। दूसरा, लोगों के
अपने अनुभव भी उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे शुरू से अपने बच्चों को अंग्रेजी
माध्यम में ही पढायें। जैसा कि रमेश के पिता अजय ने अपने अनुभव में बताया कि हमें
कॉलेज में क्या पढाया गया कुछ समझ में नहीं आता था। इसी प्रकार उनके ज्येष्ठ
पुत्र ने भी अंग्रेजी की वज़ह से पढाई समझ ना आने के कारण पहले साल में ही
बी.फार्मा का कोर्स छोड़ दिया। एम्स (AIIMS) के विद्यार्थी
का मामला देखें तो उसमें भी अनिल को अंग्रेजी में दिए जाने वाले लेक्चर समझ नहीं
आते थे। फलस्वरूप, प्रथम वर्ष में ही सभी विषयों में फेल
होने के बाद उसने अपनी जीवन-लीला समाप्त करने का निर्णय किया। कुछ ऐसा ही तमिल
माध्यम स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा एस. धारिया लक्ष्मी के मामले में हुआ।
अंग्रेजी माध्यम में दी जाने वाली शिक्षा उसके समझ के बाहर लगी और धैर्य खो कर उसने आत्महत्या कर ली। यह
कोई पहला मामला नहीं है। रमेश के पिता अजय को भी जब पता चला तो वे सब काम छोड़ अपने
पुत्र के होस्टल पहुँचे। उन्होंने डबडबाई आखों से शोधकर्ता को बताया “जब कुछ दिनों
तक इसका फोन नहीं आया, फोन पर बात करो तो सही से नहीं बोलता था, तब हमें कुछ डाउट-सा हुआ और मैंने उसके कॉलेज में फोन कर उसका रिज़ल्ट
पता किया। जब पता चला फेल है तो मैं सब काम छोड़ इसके कॉलेज भागा और उसी दिन उसका
बोरिया-बिस्तर वापस ले आया।” नुइपा (NUIPA) के वर्तमान वी. सी. ने बेशक कन्नड़ माध्यम से पढ़ कर, उच्च शिक्षा के
दौरान अंग्रेजी में महारथ हासिल की हो, पर ये सभी मामले
बताते हैं कि विरले ही विद्यार्थी क्षेत्रीय भाषा माध्यम में पढने के बाद उच्च
शिक्षा में कामयाब हो पाते हैं। ये सभी अनुभव लोगों में यह विश्वास पैदा करते हैं
कि उच्च शिक्षा में कामयाबी का सफर बिना अंग्रेजी के संभव नहीं है।
इस बात को लेकर जितने अस्वस्थ माता-पिता हैं, बच्चे उनसे कम परेशान नहीं हैं। बच्चों को भी अपने भाई-बहनों, आस-पड़ोस, कॉलेज, यूनिवर्सिटी
जाने वाले उनके उम्र में बड़े (भाई-बहन समतुल्य) उनके आदर्शों के अनुभवों से यह
जानकारी प्राप्त होती है कि अच्छे विश्वविद्यालयों में शिक्षा पूर्णतः अंग्रेजी
में होती है। उनमें भी यह विश्वास घर गया है कि उस नए वातावरण में एडजस्ट
(समायोजित) करने हेतु भी अंग्रेजी की ज़रूरत है। इन मानदंडों की जानकारी उनके बड़े
भाई-बहन और उनके आस-पड़ोस के आदर्श देते रहते हैं। यह भी एक तरह का व्यवस्थाजनित
समाजीकरण ही है, जिसमें बच्चे नई व्यवस्था के साथ तालमेल
बैठाने हेतु अपने तौर-तरीके में बदलाव लाते हैं। अर्पिता तथा रमेश की बहन भावना के
केस में यही देखने को मिला। कुछ जागरुक माता-पिता, जैसे-
विशाल, कच्ची उम्र से ही बच्चे का प्राथमिक समाजीकरण इस नई
व्यवस्था के अनुरूप करता है।
तो एक बात निश्चित है कि माता-पिता और बच्चे (यदि निर्णय
लेने की स्थिति में हैं तो) दोनों ही, अंग्रेजी माध्यम
स्कूल का ही चुनाव करना चाहते हैं। पर इसके पीछे का कारण स्वयं अंग्रेजी माध्यम
स्कूल नहीं है बल्कि राज-व्यवस्था, नौकरी की परिक्षाओं, विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी छाई हुई है। लोगों को लगता है कि जीवन का
लक्ष्य माने जाने वाले पदों तक पहुँचने के लिए विश्वविद्यालय से वीजा लगता है।
अंग्रेजी माध्यम स्कूल उस वीजे के लिए
‘अंग्रेजी’ रूपी पासपोर्ट प्रदान करने का काम करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्र के कुछ जागरूक लोगों का मानना है कि लार्ड मैकाले वो शख्स
है,
जिसने इस देश में मानसिक गुलामी की नींव रखी। “अंग्रेज चले गए पर अपनी पूँछ यहाँ
छोड़ गए।” यह ग्रामीण क्षेत्रों का आम जुमला है। पर वे लोग स्वतंत्रता के बाद की
सरकारों को भी नहीं बख्शते।
नरेश के वक्तव्य को हम बोर्जियो की संस्कृति पूँजी की संकल्पना से
मूल्यांकित कर सकते हैं। औपचारिक उच्च (श्रेष्ठ कहलाने वाली) शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़
मानव पूँजी का निर्माण ही नहीं, अपितु साँस्कृतिक पूँजी का संरक्षण भी है। श्रेष्ठ समझी
जाने वाली औपचारिक उच्च शिक्षा की
भूमिका तो ‘साँस्कृतिक पुनरुत्पादन’ के माध्यम से ‘साँस्कृतिक पूँजी’ का निर्माण करना है। ‘साँस्कृतिक पुनरुत्पादन’ से तात्पर्य, समाज के वर्चस्वशाली वर्ग के वर्चस्व को बनाये रखने के
लिए है। वर्चस्ववादी वर्ग यह तय करता है कि समाज के उच्च स्तर पर पहुँचने के लिए
किस प्रकार के ज्ञान, कौशल, क्षमता की आवश्यकता है और ज्ञान, कौशल, क्षमता तक
पहुँचने के रास्ते को तय करने का अधिकार वर्चस्व में बैठे वर्ग के हाथों में है।
जैसाकि कृष्ण कुमार की पुस्तक शिक्षा और राष्ट्रवाद को पढने से स्पष्ट होता है कि अंग्रेजी शिक्षा
से सिर्फ़ क्लर्क वर्ग ही तैयार नहीं हुआ बल्कि तथा कथित शिक्षित कहलाने वाला एक
छोटा-सा वर्ग भी तैयार हुआ, जो शासन, प्रशासन
और शिक्षा-व्यवस्था के शीर्ष पर था। स्वतंत्रता के बाद इस वर्ग का वर्चस्व बना
रहा। फलस्वरूप उच्च शिक्षा की भाषा अंग्रेजी ही बनी रही। इस बात को महात्मा
गाँधीजी के शब्द और पुख्ता करते हैं, जो वे हिन्द स्वराज में वर्ष 1909 में लिखते हैं, “एक साधारण
एम. ए. पास व्यक्ति भी गलत अंग्रेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे-से-अच्छे विचार
प्रकट करने का जरिया अंग्रेजी है। हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अंग्रेजी में चलता
है।” सत्ता के शीर्ष पर यही वर्ग छाया रहा। इस संस्कृति पूँजी ने सामाजिक पूँजी का
निर्माण किया। इस सामाजिक पूँजी ने अंग्रेजी भाषा बोलने वालों का एक समूह तैयार
किया। यह समूह बेशक छोटा है पर शक्तिशाली है। समाज के शेष जन, अर्थात्
अंग्रेजी ना बोल पाने वाला जन-समुदाय, उनके मूल्यों को अपने अन्दर समाहित करना चाहता है। यह
जन-सामान्य के नए उपजे साँस्कृतिक मूल्य हैं। बिना अंग्रेजी के सफलता हासिल नहीं
हो सकती यह उसकी धारणा है। “जो अंग्रेजी बोलेगा वह ही दहाड़ेगा” (अजित का पिता)।
“जो बालक (व्यक्ति ) अंग्रेजी पर मजबूत पकड़ रखता है, वह ही कामयाब होगा।” यह उसका विश्वास है।
इस प्रकार अंग्रेजी भाषा समाज के स्तरीकरण का आधार बना दी गई है। समाज में अलग-अलग
वैचारिक स्तर के अलग-अलग समूह होते हैं। जिनका पद-क्रम सांस्कृतिक पूंजी के केंद्र से दूरी के आधार पर तय किया जाता है।
इस सांस्कृतिक पूंजी का संरक्षण आर्थिक पूंजी तथा राज-सत्ता करती है। इसलिए कोई वर्ग-विशेष आर्थिक रूप से
संपन्न होता है तो वह अपनी एकजुटता सांस्कृतिक रूप से संपन्न वर्ग के साथ करता
है।
जैसा कि मामले में एक व्यक्ति का कहना है कि विश्वविद्यालय एवं उच्च
शिक्षण की श्रेष्ठ समझी जाने वाले संस्थाओं में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का ही
दबदबा रहता है। इसके आधार पर मूल्यांकन करने पर हम पाते हैं कि ये स्कूल ही शेष
90% स्कूलों में पढ़ने वालों के लिए आदर्श तय करते हैं।
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