अंग्रेजो की ‘मिल बाट कर खाओं’ की संस्कृति को बचाए रखने का साधन - ‘ इंग्लिश मीडियम सिस्टम’


इंग्लिइं ग्लिश मीडियम सिस्टम सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रखता है। सत्ता का चंद हाथों में सिमटा रहना ही पूँजीवादी शोषण और उसके फलस्वरूप पैदा हुई आर्थिक एवं सामाजिक गैरबराबरी और भ्रष्टाचार का आधार है। इंग्लिश मीडियम शिक्षा संस्कृतिकरण के माध्यम से जनसामान्य के मानस पर साँस्कृतिक ठप्पा लगाने का काम करती है। यह कल्चर एक तरह से शोषण, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार को बनाए रखने वाले इंग्लिश मीडियम को सामाजिक-साँस्कृतिक आधार बनाने का काम करता है। मानसिक गुलाम बनाने की यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो 90% आबादी को अंग्रेजीकरण के भ्रम में बनाए रखती है और ऊपर के 3-5% लोगों को सर्वाधिकार देती है। बीच के 5-7% लोग इंग्लिश मीडियम के भ्रम का प्रसार करने में ऊपर के 1-2% सत्ताधारियों का सहयोग करने का काम करते हैं।  इस इंग्लिश मीडियम सिस्टम का मुख्य कार्य शासक और शासितों में एक अंतर को कायम रखना है और सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रखता है। अतः यह अंतर ही शोषण, गैर बराबरी और भ्रष्टाचार के मैकेनिज्म को चलाए रखने का औजार है।

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 देश का मिडल क्लास चूँकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों के रास्ते शासक वर्ग के इंग्लिश मीडियम सिस्टम का हिस्सा बनने की उम्मीद रखता है और ऊपर की मलाई में कुछ हिस्सेदारी प्राप्त कर लेता है। अपवादस्वरूप ही सही, पर यह सिस्टम कुछ लोग को आरक्षण, चैरेटी आदि के रास्ते भी ऊपर तक पहुँचने का मार्गप्रशस्त करता है, फिर उनको शेष समाज के समक्ष आदर्श के रूप में स्थापित करता है। निचले क्रम के लोग, जो सिस्टम का भाग बन जाते हैं वे ही शेष समाज के बीच इंग्लिश मीडियम की ज़रूरत की वकालत करते हैं, वे ही शेष समाज के समक्ष ऊपर के  ‘टॉप-हाई-फाई इंग्लिश मीडियम क्लास’  को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि हमने पाया कि ये पाँच-सात प्रतिशत इंग्लिश भक्तही हर दल,  हर विचारधारा, हर जाति-धर्म का शीर्ष नेतृत्व करते हैं। अतः ये ही शेष समाज को तथाकथित शेरनी का दूधका स्रोत समझे जाने वाली तथाकथित  इंग्लिश मईया की आराधना का मर्म समझाते हैं। पर ऐतिहासिक कारणों से इस छोटे-से वर्ग में भी ब्राह्मण एवं अगड़ी जातियों के छोटे-से समूह का जो वर्चस्व अंग्रेजों के जमाने में तैयार हुआ, अंग्रेजी के वर्चस्व की वजह से, वह अंग्रेजों के बाद भी बना रहा है। अंग्रेजी का वर्चस्व ही ब्राह्मणवादी अगड़ी जातियों का वर्चस्व है। जब तक अंग्रेजी का या उसके पिछल्लगू के रूप में हिंग्‍लिश का वर्चस्व कायम रहेगा तब तक अंग्रेजों के जमाने में वर्चस्व प्राप्त किए संभ्रांत वर्गी ब्राह्मणों, अगड़ी-पिछड़ी जातियों और संभ्रांत वर्गी ही दलित एवं मुसलमान  का भी वर्चस्व बना रहेगा। कुल मिला कर सभी जाति एवं मजहब के संभ्रांत तबके का। यह सिस्टम गोरे अंग्रेजों के जमाने में तैयार हुआ, पर इसे पुख्ता करने का काम काले अंग्रेजों ने ही किया है। अर्थात् गोरे अंग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण के बाद ही ‘अंग्रेजी राज’ अर्थात् ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की सत्ता पुख्ता हो पाई।  तथाकथित दलित और द्रविड़ नेताओं के हिन्दी विरोध के चलते ही अंग्रेजी की सत्ता अब भी बनी हुई है। अंग्रेजीवादी नेतृत्व की वजह से ब्राह्मणवाद का स्थान ‘नव-ब्राह्मणवाद’ ने ले लिया है। पर कैसे? आइये, इसे समझने के लिए इतिहास के पन्नों को टटोलते हैं।

अंग्रेजों के जमाने में भी तीन-चार लाख से अधिक अंग्रेज एकसमय में भारत की सरजमींन पर कभी भी नहीं रहे। पर उस जमाने में भी ये तीन लाख अंग्रेज तीस करोड़ हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे। कदापि यह यहीं के लोगों के सहयोग के बिना संभव ही नहीं हो पाता। इस सब को संभव बनाने के लिए जरूरी था कि कुछ नियम, कायदे, कानून बनाये जाएँ और उन नियम, कायदे, कानून के आधार पर कुछ लोगों को व्यवस्था का भागीदार बनाया जाए। राजसत्ता का नियंत्रण ब्रिटिश हकुमत के पास रहे, पर उसके आधार पर पैदा हुई व्यवस्था के संचालन में हिन्दुस्तानी लोग भी भागीदारी निभाएँ। सत्ता में हिन्दुस्तानी लोगों की भागीदारी ब्रिटिश हकुमत को जमाए रखने के लिए जरूरी थी। पर जो लोग सत्ता के भागीगार बने, वे लोग ब्रिटिश हकुमत के प्रति वफादार भी रहे, उन्होंने ही ब्रिटिश हकुमत की जड़ों को जमाए रखने का काम किया। ब्रिटिश हकुमत की जड़ें पुख्ता हों, इसके लिए जरूरी था कि हिन्दुस्तानी लोग अंग्रेजों के साँस्कृतिक वर्चस्व को भी स्वीकार करें। भारत की सरजमीं पर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग अंग्रेजों के साँस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने के हथियार के रूप में था।

 प्रारंभिक दौर में ही अंग्रेजों के अत्याचार का कोप किसान, कारीगर और कामगारों पर ही टूटा। कामगार और शासक वर्ग से संबंधों की वजह से सभी मुसलमान अंग्रेजों के शक के घेरे में थे। कामगार, किसान और कारीगर वर्ग ही भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाले कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी था। चूँकि अंग्रेजों से पूर्व न तो व्यापार और न ही उत्पादन पर किसी कम्पनी विशेष का नियंत्रण था। अतः अर्थशास्त्र की भाषा में कहे तो कम-से-कम व्यापार और कुटीर उद्योगों में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति थी। ऐसी स्थिति में कारीगरों को उनके काम के बेहतर दाम मिलने स्वाभाविक थे। (अर्थशास्त्र के पूर्ण प्रतियोगिता सिद्धान्त के आधार पर) अंग्रेजों के आते ही भारत की उपजाऊ जमीन रेगिस्तान में बदलने लगी। शुरूआती दौर से ही अंग्रेजों और भारत के कामगार वर्ग के आर्थिक हित परस्पर विरोधी रहे हैं। अतः अंग्रेजों और कामगार जाति/वर्ग के बीच समन्वय संभव ही नहीं था। अंग्रेजों के प्रारंभिक सहयोगियों में वे भला कैसे शामिल हो सकते थे, जिनके व्यवसाय अंग्रेजी कम्पनी राज ने ही उजाड़ डाले थे? अंग्रेज ही नहीं, तमाम यूरोपीय जातियों ने जिन भी इलाकों पर अपना कब्जा जमाया, वहाँ अपने व्यापारिक हितों के चलते उन इलाकों के कामगारों और किसानों का जम कर अत्याचार किया।

अतः जाति आधारित समाज में अंग्रेजों के कोपभाजन का शिकार सबसे पहले निम्न वर्गीय एवं किसानों से संबंधित जातियाँ ही बनीं। जहाँ मुगलों एवं हिन्दू राजाओं के काल में कारीगरों, कामगारों को पूरा संरक्षण मिला था। किसानों की सुविधा के लिए भी नहरें तक खोदी जाती थीं। कुशल कामगार एवं किसान वर्ग की बदौलत ही भारत विश्व में सोने की चिडिया बन पाया था। अंग्रेजी राज के प्रारंभिक दौर में भला उनके प्रारंभिक सहयोगियों में कारीगरों एवं किसानों से संबंधित कामगार जातियों के लोग कैसे शामिल हो सकते थे? वे लोग, जिनके व्यवसाय अंग्रेजों ने उजाड़ डाले थे? वे लोग, जो अंग्रेजों के अत्याचार की वजह से दो जून की रोटी के लिए मोहताज हो गए थे। भला क्या वे अंग्रेजों के सहयोगी बन सकते थे? ईस्ट इंडिया कंपनी राज के अंतिम दौर (1850 के दशक) में भारत की कृषि पर रिपोर्ट देने वाली एक ब्रिटिश समिति का मानना था कि भारत का किसान ब्रिटेन के किसान से तकनीकी रूप से कहीं अधिक कुशल था। ये तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की कारगुजारी का ही परिणाम था कि कृषि को गर्त में मिलाया गया था। निस्संदेह कामगार वर्ग तो अंग्रेजों का सहयोगी नहीं हो सकता था। अंग्रेजों का सहयोगी कोई परजीवी वर्ग ही बना होगा। आइए! सामाजिक व्यवस्था की जड़ों में उस वर्ग को तलाशते हैं।

हिन्दू समाज में अध्यात्मिक सत्ता ऊँची जातियों के हाथ में होने के कारण ऊँची जातियाँ सामाजिक व्यवस्था के केन्द्र में थीं। सर्राफ़ अर्थात् साहूकार, महाजन धन से संबंधित लेन-देन के कार्य से संबंधित थे। वस्तु विनिमय प्रणाली के बावजूद भी इनकी समाज में अपनी ही अहमियत थी। त्यागी जातियों को छोड़ शेष ऊँची जातियों का पेशा ‘कामगार’ समझे जाने वाले पेशों से संबंधित नहीं था। ये समाज के परजीवी वर्ग थे। अतः ये दोनों अंग्रेजों के आर्थिक हितों को भी प्रभावित नहीं करते थे। न ही अंग्रेजों की कारगुजारी का नकारात्मक प्रभाव ही ऊँची जातियों की आध्यात्मिक सत्ता पर सीधे पड़ रहा था। उल्टे अंग्रेजों के कम्पनी राज में जब किसानों पर लगान को मुद्रा के रूप में अदा करने की अनिवार्यता थोपी गयी तो साहूकारों की स्थिति और मजबूत हुई। हिन्दू-मुस्लिम कामगार जातियों की स्थिति के बदहाल होने के साथ समाज में परजीवी ऊँची जातियों और साहूकारों का दबदबा बढ़ा। ऊँची जातियों की तुलनात्मक सामाजिक स्थिति मुगल-मुसलमान नबाब/बादशाहों के राज में, हिन्दू राजाओं की राज की तुलना में हीन ही हुई थी। हिन्दू जातिवादी परम्परा के अनुसार ऊँची जातियों को कामगार समझे जाने वाली जातियों से श्रेष्ठ समझा जाता था। हालांकि मुस्लिम बादशाहों ने जातिवादी व्यवस्था को तोड़ने के लिए कोई क्रांतिकारी पहल नहीं की थी। पर उन्होंने जाति आधारित वर्ण व्यवस्था को कम से कम बढ़ावा भी नहीं दिया था। मुस्लिम संप्रदाय में जाति के आधार पर किसी तरह का भेदभाव भी नहीं था। वक्त के साथ जातिवादी परम्परा के आधार पर निम्न समझे जाने वाली जातियों ने ही नहीं, अपितु कुछ ऊँची जातियों के भी एक बड़े हिस्से ने भी मुस्लिम संप्रदाय को कबूल लिया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुसलमान बादशाहों से हुए समझौतों के आधार पर कुछ ऊँची जातियों ने मुस्लिम संप्रदाय को कबूल किया था। कुछ मुस्लिम शासकों  ने तलवार के बल पर भी मुस्लिम संप्रदाय के प्रसार का रास्ता अपनाया था। परन्तु तलवार जितना खून नहीं बहाती है उससे अधिक खौफ़ फै़लाती है। अतः शेष  मुस्लिम शासकों के द्वारा सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने के लाख प्रयासों के बावजूद भी उच्‍च जातीय समुदाय में मजहब को लेकर हमेशा डर बना रहा था। मुस्लिम-मुगल काल में जिस तरह से तेजी से मुस्लिम संप्रदाय का प्रसार हुआ, उसको लेकर कुलीन जातियों में आक्रोश होना लाज़मी था। ये सब कुछ दर्शाता है कि मुस्लिम बादशाहों के काल में समाज में जातिवादी वर्चस्व को भी ठेस पहुँची थी। मुगल काल में ऊँची जातियों की सामाजिक स्थिति हीन ही हुई थी। अतः कुछ ऊँची जातियों का रवैया मुगल-मुसलमान शासकों के प्रति नकारात्मक होना स्वभाविक भी था। अंग्रेजों ने भारत की जाति व्यवस्था का पूरा-पूरा फायदा उठाया। अंग्रेजों का प्रारंभिक सामाजिक गठजोड़ कुलीन वर्ग की जातियों साथ ही हुआ था। उन्होंने फूट डालो और राज करो के टैस्ट टयूब में सबसे पहले कुलीन  जाति को ही टैस्ट किया। अंग्रेज इस वर्ग में उनके खोये वर्चस्व को फिर से स्थापित करने की उम्मीद जगा रहे थे। मुगल बादशाहों के विपरीत अंग्रेजों ने भारत की सरजमीं को कभी नहीं अपनाया। अंग्रेजों ने वर्ण-जाति संप्रदाय और छोटे-बड़े रजवाड़ो में बटे समाज में फूट डाल कर राज करने का नायाब तरीका ईजाद किया। कुलीन जातियों की खोज समाज की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में हुई, पर यह कमजोर कड़ी सबसे महत्वपूर्ण थी। साहूकारों-महाजनों ने ही अंग्रेजों के जौक की भूमिका निभाई। अंग्रेजों का उद्देश्य ऊँची जातियों और साहूकारों-महाजनों में से ही छोटा-सा बिचौलिया वर्ग तैयार करना था, जो उनके शोषणतंत्र में सहयोगी बन सके। हालांकि अंग्रेज गाय का माँस खाते थे और कुलीन जातियों के लिए गाय एक पवित्र जीव रही है। कुलीनवादी समाज व्यवस्था में गाय की हत्या पाप है। इसलिए कुलीन जातियों का एक बड़ा तबका धर्म भ्रष्ट होने की आशंका से प्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेजों से दूर भी रहा और उसने अंग्रेजों का विरोध भी किया। पर सभी हितों और मूल्यों से सर्वोपरि आर्थिक एवं राजनीतिक हितों और फायदे के चलते जो लोग अंग्रेजों के साथ जुड़े,  इस छोटे-से तबके ने ही अंग्रेजी राज की नींव को पुख्ता करने का काम किया। उच्‍च जातियों को अंग्रेज शुरू में मुस्लिम शासकों से मुक्ति दिलाने वाले फरिश्ते ही प्रतीत हुए होंगे। अंग्रेजों के सहयोग से प्रारंभिक समाज सुधार आन्दोलन भी उच्चवर्गीय जातियों ने ही शुरू किया। अतः उच्चवर्गीय जातियाँ ही अंग्रेजों के प्रारंभिक सहयोगी थीं। कुलीन जातियों में से ही अंग्रेजों को सत्ता में भागीदारी निभाने वाले प्रथम सहयोगी मिले। एक और महत्वपूर्ण कारण था जिसकी वजह से अंग्रेज और कुलीन वर्ग करीब आया। कुलीन जातियों का पेशा पूजा-पाठ से जुड़ा हुआ था। हिन्दुओं के धर्म ग्रंथ संस्कृत भाषा में थे। इस धर्म ग्रंथों के अध्ययन हेतु संस्कृत भाषा का ज्ञान अनिवार्य था। गाँव-गाँव में पाठशाला होने के बावजूद भी संस्कृत सीखने की अनिवार्यता कुलीन जातियों को ही थी। इस वर्ण के लोग ही संस्कृत जैसी परिष्कृत भाषा को सीख सकते थे। अतः वे ही संस्कृत में लिखे ग्रंथों के गूढ़ रहस्य को अंग्रेजों को समझाने में सहायक बन सकते थे। अंग्रेजों ने जितना देशी आर्थिक संसाधनों को लूटा, उससे कम दोहन ज्ञान क्षेत्रों का नहीं किया। बिना उन ग्रंथों को समझे, भारतीय समाज के इतिहास को समझना भी कठिन था। यह सब कुछ कुलीन जातियों के सहयोग के बिना संभव ही नहीं था। अतः ये ही लोग न केवल राजनीतिक व्यवस्था के भागीदार बने बल्कि औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था और अंग्रेजी भाषा के प्रचारक भी बने। उच्‍च जातियों के वे लोग जो अंग्रेजों के संपर्क में आए उनके लिए एक परिष्कृत भाषा से दूसरे परिवेश की परिष्कृत भाषा को सीखना भी तुलनात्मक रूप से आसान था।

अंग्रेजों के दूसरे सहयोगी वर्ग व्यापारियों का था और जातियों में बँटे समाज में उस वर्ग की शिनाख्त कोई कठिन काम न थी। जातिवादी व्यवस्था के अनुसार व्यापार करने पर अधिकार  ऊँची जातियों का था। अंग्रेजों को न केवल भारत में अपने व्यापार की जड़ों को फैलाने के लिए इस वर्ग के सहयोग की ज़रूरत थी, अपितु भारत के बाहर चीन आदि देशों से व्यापार के लिए भी इनका सहयोग चाहिए था। अंग्रेजों का चीन के साथ होने वाला अफीम का व्यापार बिना इन जातियों के सहयोग के बिना संभव ही न था और बिना अफीम के चीन और तिब्बत को घुटनों के बल बैठाना भी असंभव था। एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापार के प्रसार में उन्होंने ऊँची जातियों का सहयोग हासिल किया। इंग्लैड के औद्योगीकरण में सहायक उद्योगों और व्यापार पर ऊँची जातियों आधिपत्य भी अंग्रेजी राज में उनकी अंग्रेजों के सहायकों की भूमिका के कारण ही संभव हुआ।

1773 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी पर ब्रिटिश गवर्नमेंट का प्रत्यक्ष नियंत्रण कायम हुआ। उसके बाद से ही बंगाल में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए बंगाल के लोगों का सहयोग हासिल करने की कवायत शुरू हो गयी थी। कार्नवालिस की अध्यक्षता में कंपनी प्रशासन द्वारा जमींदार वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए 1793 में भूमि का स्थायी बंदोबस्त संपन्न किया था। यह कम्पनी प्रशासन और भारतीय जमींदारों के बीच हुए लम्बे समझौते के बाद ही संभव हो सका। इस बन्दोबस्त के तहत, जो मुगलकाल के कर अधिकारियों को ही भूमि का स्थायी मालिक बना दिए गए, इस प्रकार जमींदारों के रूप में ब्रिटिश हकुमत के प्रति वफादार परजीवी वर्ग मिला। जमींदारों एवं व्यापारियों और साहूकारों के सहयोग के बिना अंग्रेजी राज को लंबे समय तक बनाए रखना संभव ही नहीं था। बड़े जमींदारों ने अपने नीचे अपनी बिरादरी के छोटे जमींदारों की फौज खड़ी की,  वह ही लठैतों के माध्यम से लगान वसूलने का काम करता था। बड़े जमींदार और रईस लोग खुद अंग्रेजों की संगत में शहरों में रहते थे। अतः अंग्रेजों के फायदे का हिस्सेदार वर्ग समाज का संभ्रांत एलीट तबके के रूप में स्थापित हुआ। इनसे ही बंगाल का भद्रलोक कायम था। यही वर्ग अंग्रेजों के शासन को स्थायी बनाने वाला सहयोगी-सहभागी वर्ग था।

श्रम से जुड़ा पेशा न करने वाली उच्‍च जातियों में से ही छोटा-सा तबका ही अंग्रेजों का प्रारंभिक सहयोगी और अंग्रेजी सत्ता का भागीदार भी बना। इन जातियों से संबंधित छोटा-सा तबका न केवल अंग्रेजों के शोषण और अत्याचार से बचा रहा, अपितु वही अंग्रेजों के शह पर आम जनता से लगान और ब्याज वसूलता था। अंग्रेजों द्वारा नियुक्त ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारी और बंगाल के जमींदारों और साहूकारों का रिकॉर्ड उठा कर देख लो लगभग सभी तथाकथित उच्च जातियों के ही थे। एक भी जमींदार या उप जमींदार श्रम आधारित जातियों से संबंधित नहीं था। अतः उन्होंने भारत मे पाँव जमाने के लिए की भारत की जाति व्यवस्था का पूरा-पूरा फायदा उठाया।  उन्होंने एक तरह से उच्‍च जातियों को सत्ता का भागीदार बना कर उनके माध्‍यम से ही सत्ता का संचालन किया। अप्रत्यक्ष तौर उन्होंने परजीवी वर्ग को समाज का दमन करने की पूरी-पूरी छूट दी। उन्होंने सीधे आम भारतीयों से कोई पंगा नहीं लिया। न ही उनके पास इतनी ताकत ही थी। न ही वे इतनी तादाद में आये थे। उन्होंने भारतीयों के माध्यम से ही भारतीयों का शोषण किया। जी हाँ! उन्होंने नियम, कायदे कानूनों की ऐसी व्यवस्था डिजाईन की कि वे भारतीयों के माध्यम से ही भारतीयों पर शासन कर सकें। जाति और मजहब उनके लिए महत्वपूर्ण हथियार था। जाति और मजहब को उन्होंने समाज को बाँटे रखने के लिए प्रयोग किया। जातिवादी और मजहबवादी वैमनस्य अंग्रेजों के जमाने की देन है। यहाँ तक कि उन्होंने सेनाओं के रेजीमेंट भी जाति और धर्म के नाम पर ही गठित किये।

अंग्रेजों से पूर्व ग्रामीण व्यवस्था आत्मनिर्भर और अंत:संबंधित थी। समाज में जाति का संबंध पुश्तैनी-व्यवसायिक पेशों से था। अर्थशास्त्र की भाषा में, यह श्रम का उत्पाद आधारित विभाजन था। औद्योगीकरण के पूर्व लगभग हर समाज में इस प्रकार की कोई-न-कोई व्यवस्था थी। इसका आधार इतना भर था कि परिवार के संरक्षण में व्यक्ति आसानी से पारिवारिक पेशे को अपना लेता था। भारत में शादी-ब्याह के नियमों ने जाति व्यवस्था को ज्यादा कठोर बनाया था। जाति विशेष के सभी लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति एक जैसी होती थी और काफी हद तक जाति विशेष के पेशे पर निर्भर करती है। व्यक्ति का सामाजिक ओहदा काफी हद तक जाति विशेष द्वारा ही होता है। मुगल-मुस्लिम काल में कुलीन जातियों की स्थिति निम्न ही हुई थी और साथ ही विकृत भी। अंग्रेजों ने पहले भारतीय समाज के इस जाति एवं मजहब आधारित विभाजन के अंतर को और अधिक बढ़ाया। जाति के माध्यम से सामाजिक अंतर को बढ़ाया। मजहबों को एक दूसरे के प्रतिद्वंदी के रूप में खड़ा किया। इस प्रकार सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देना ब्रिटिश हकुमत का सर्वप्रमुख सिद्धान्त रहा। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम खेती, कुटीर उद्योगों और कारीगरी से जुड़े लोगों को उजाड़ा। खेती, कुटीर उद्योगों और कारीगरों के उजड़ने का अर्थ है, श्रम से जुड़ी (हिन्दू-मुस्लिम दोनों की) जातियों की स्थिति को बद से बदतर करना। इस काम में ब्राह्मणों और महाजनों का सहयोग हासिल किया। वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव में अज्ञानता होती है। अज्ञानता के अंधेरे में अंधविश्वास का तांडव होना लाज़िम है। अंधविश्वास के वातावरण में धर्म के ठेकेदारों का वर्चस्व स्वभाविक है। अंग्रेज इस स्वभाविक वर्चस्व का फायदा उठाने से कैसे चूक सकते थे। भारतीय समाज का शोषण और अत्याचार गैर-श्रमिक पेशे वाली जातियों के वर्चस्व प्राप्त तबके के सहयोग के बिना संभव ही नहीं था। कुछ मुस्लिम जमींदारों को छोड शेष जमींदार भी इस वर्ग से ही सम्बंधित थे। जमींदार ही नहीं, ब्रिटिश कम्पनी के भारतीय बाबू और अधिकारी भी उच्च वर्ण के हिन्दू अथवा उच्च वर्ग के मुस्लिमों से ही संबंधित थे। इसका कदापि अर्थ यह नहीं है कि इन जातियों के सभी लोगों को अंग्रेजों से फायदा मिल रहा था।  उन्होंने समाज के विभिन्न जाति और मजहब के बीच के अंतर को बढ़ाया। फिर हर जाति और मजहब एक दूसरे के विरूद्ध वर्टीकल (लंबरूप) रूप से एकजुट होने के लिए प्रेरित किया। उनकी आर्थिक एवं राजनीतिक नीति का परिणाम था कि हर मजहब और जाति में अमीर और गरीब वर्ग तैयार हुआ। चंद लोग सामाजिक एवं आर्थिक रूप से संपन्न हुए। प्रत्येक वर्टीकल ग्रुप के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से संपन्न लोगों को अपना सहयोगी बनाया। यह संपन्न तबका ही परस्पर विरोधी नेतृत्व के रूप में उभरा। पहले उच्च जाति के हिन्दुओं के ऊपरी तबके का सहयोग लिया और इसमें से एक नेतृत्वकारी वर्ग तैयार किया। फिर मुसलमानों के उच्च तबके के नेताओं को हिन्दुओं के प्रतिद्वंदी के रूप में खड़ा किया। समाज, जहाँ  हॉरिजेन्टल (क्षैतिज) रूप में अमीर और गरीब, साधन और साधनहींन के रूप में विभाजित था। पर अंग्रेजों ने बड़े सफाई के साथ समाज का विभाजन वर्टीकल (लंबरूप) रूप में करने में सफलता हासिल की। यह वर्टीकल (लंबरूप) विभाजन का ही परिणाम था कि नेतृत्व शीर्ष लोगों के हाथ में केन्द्रित रहा और नीचे का समाज जाति और धर्म के आधार पर बँटा हुआ था। अंग्रेजों के राज में जो मजहबी और जातीय भेदभाव बढ़ा, उसी का परिणाम भारत के विभाजन विभाजन के रूप में सामने आया।

अंग्रेजों को भारत की जाति और धर्म की व्यवस्था से न तो लगाव था न ही द्वेष था। न ही वे स्थाई रूप से बसने के लिए ही यहाँ आये थे। उनका उद्देश्य तो अपना उल्लू सीधा करना भर था। उनका उद्देश्य था, अपना व्यापारिक फायदा और इंग्लैड का औद्योगिक विकास। इंगलैड की समृद्धि की अनिवार्य शर्त भारत की तबाही थी। उनका उद्देश्य भारत को कच्चे माल की मंडी में तब्दील कर देना था। इसके लिए राजनीतिक स्थिरता अनिवार्य थी। राजा-नबाबों की आपसी रंजिश ने अंग्रेजी घास को उगने लायक भूमि उपलब्ध करवायी। तो जाति और धर्म में बँटे समाज ने फूट डालो और राज करो की नीति के प्रसार के अनुकूल वातावरण प्रदान किया। जहाँ शुरू के दौर में उन्होंने कुलीन जातियों को अपना सहयोगी बनाया था। वही बाद के दौर में हर जाति और धर्म के संभ्रांत, परन्तु परस्पर विरोधियों में से नेतृत्वकारी में से सहयोगियों को तलाशा।

अब तक के विश्लेषण में पाया गया कि अंग्रेजों से पूर्व के काल में भारत को सोने की चिडिया बनाने वाले कामगार वर्ग ही अंग्रेजों के कोपभाजन का प्रथम शिकार था। इंग्लैड की अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए भारत के कुटीर उद्योगों और पारम्परिक खेती की तबाही अनिवार्य शर्त थी। हिन्दुस्तान के कच्चे माल को लूटने के लिए रेलवे का प्रसार किया गया और शुद्ध मुनाफा कमाने के लिए चाय के बागान लगाए गए। अंग्रेजों ने इसी प्रकार के ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को पोषित करने वाले बहुत से उद्योगों और खनन कम्पनियों को भी स्थापित किया। पर इंग्लैड की अर्थव्यवस्था को पोषित करने वाले ये सब उद्योग स्थानीय परजीवी वर्ग के सहयोग के बिना संभव नहीं थे। उन्होंने स्थानीय संसाधनों को शोषित करने वाली ‘जौंक-कम्पनियों’ को यही के लोगों के सहयोग से स्थापित किया। अंग्रेजी भाषी उच्च जातियों के भी उच्च वर्ग से संबंधित जमींदार-साहूकार-महाजन ही उनके इन नव उदित उद्योगों की स्थापना में सहभागी थे। इन दोनों ही कामों में लगे बंधुआ किस्म के मजदूर कोई और नहीं अपितु बदहाल हुई कृषि और कुटीर उद्योगों के उजड़ने से बेरोजगार हुए लोग थे।

दरिद्रता का प्रकोप बहुआयामी होता है। अर्थिक बदहाली सामाजिक विवशता के रूप में सामने आती है। आर्थिक रूप से दरिद्र होते ही व्यक्ति सामाजिक रूप से बहिष्कृत और निष्कासित होने लगता है। हालांकि कामगार और कृषक वर्ग में सभी जातियों के लोग थे। पर बहुलता निचले क्रम की जातियों की ही थी, वहीं अंग्रेजों का सहभागी परजीवी ठेकेदार तथाकथित संभ्रांत जातियों से संबंधित था। अंग्रेजी राज के प्रारंभिक दौर में कृषक और कुटीर उद्योगों के कामगारों का शोषण अपने चरम पर था। जो पिछड़ी जातियों के शोषण के रूप में परिलक्षित हुआ। क्योंकि अंग्रेज तो पीछे से निर्देशित करने वाले थे, आगे तो साहूकार, महाजन और उच्च वर्णीय ही थे। जाति व्यवस्था का मूल आधार जहाँ मनुवादी वर्ण व्यवस्था थी। अशिक्षा और अज्ञानता ने इसे और भी अधिक क्लिष्ट बना दिया था। समाज में प्रचलित अंधविश्वास और उस अंधविश्वास पर आधारित परम्पराओं का ही प्रतिफल जातीय शोषण था। अंग्रेजों ने इस अंधविश्वास पर आधारित परम्परा का पूरा-पूरा फायदा उठाया। अंग्रेजों ने अपने तलवार की ताकत उन पर ही दिखायी, जो उनके आर्थिक हितों के आड़े आ रहे थे और तब तक ही दिखायी, जब तक उन्होंने उनके आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाया। अंग्रेजों ने उन्हें साथ लिया जो उनके आर्थिक हितों को स्थापित करने में सहयोगी हो सकते थे। जातियों में बटे समाज में ऐसे लोगों को चिंहित करना आसान ही था। अतः अंग्रेजी राज के प्रारंभिक दौर में  कायस्थ और ब्राह्मण जाति के संभ्रांत लोग उनके करीबी बने। अंग्रेजों के द्वारा भारतीय किसानों का शोषण करने के लिए जमींदारों-नम्बरदारों और साहूकारों की जो फौज खड़ी की गयी उस फौज के सिपाहसलार इन्हीं दो जातियों से संबंधित पुराने राजा और महाराजा ही थे। मुसलमानों में भी उच्च जाति से संबंधित शेख-पठान आदि जो पुराने नबाब थे समझौते के तहत जमींदार बने। परिणामस्वरूप भारत की सरजमीं हिन्दू-मुस्लिम दोनों के उच्च वर्ण का छोटा सा तबका अंग्रेजों का वफादार बना और फिर अंग्रेजों के संपर्क में आने की वजह से यही तबका स्थानीय रईस वर्ग के रूप में भी स्थापित हुआ। 1958 के पैरामाउंसी के समझोते के साथ देशी रजवाड़ो की राजभक्ति भी ब्रिटिश राजगद्दी के प्रति सुनिश्चित हो गयी। राजसत्ता को बचाए रखने के इस समझौते के साथ ही वे न केवल अंग्रेजों के शोषण तंत्र के सहभागी बने, बल्कि अंग्रेजी कल्चर के वाहक भी बन गए। समय के साथ इन रजवाड़ों के द्रोणाचार्य भी अंग्रेज बन गए। ब्रिटिश समाज के साथ संपर्क की वजह से ही यह तबका अंग्रेजीवादी बना। अतः नबाब, राजाओं, जमींदारों, बड़े साहूकार-व्यापारियों, कुलीन जातियों का छोटा-सा संभ्रांत वर्ग ही अंग्रेजी राज का चाटुकार और परिणामस्वरूप अंग्रेजीभाषी भी बना। आर्थिक रूप से संपन्न तबका ही औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने हेतु विलायत (इंग्लैड) भी जा सकता था। यही वर्ग वहाँ से आते वक्त अपने साथ अंग्रेजी भाषा और कल्चर लाद कर लाता था। जब अंग्रेजी भाषा को शिक्षा, राज-काज और रोजगार से जोड़ दिया गया तो सत्ता के केन्द्रों पर एक खाता-पीता अंग्रेजों का वफादार वर्ग धीरे-धीरे छाने लग गया।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के अंग्रेजों के साथ घनिष्ठ संबंध थे। “उन्होंने कैम्ब्रिज से "बार ऐट लॉ" की उपाधि ली और अंग्रेजी न्यायालयों में वकील के रूप में कार्य प्रारम्भ किया।”  राजनीति में आने से पूर्व ही वकालत से बेशुमार दौलत पैदा कर ली थी और अपने जमाने के सबसे महंगे वकीलों में थे। अंग्रेजी कल्चर से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने पुत्र जवाहरलाल नेहरू की प्रारंभिक शिक्षा और परवरिश घर पर ही अंग्रेज शिक्षक एवं परिचायकों के माध्यम से दिलवायी। जी हाँ!  उनके पुत्र जवाहर की देखभाल करने वाली दायी अर्थात् परिचारिका तक अंग्रेज थी। जिन दिनों देश बदहाली में था, अकाल आना आम बात थी, उस जमाने में वे इतने रईस थे कि अंग्रेजों को अपने घर पर शिक्षक और परिचायकों आदि के रूप में नियुक्त कर सकते थे। इतनी दौलत आयी कहाँ से। यदि हम मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू के पारिवारिक परिवेश को देखें तो पायेंगे कि उनके परिवेश में अंग्रेजीयत हावी थी। अंग्रेजों के साथ घनिष्ठता पूर्ण संबंध के बिना न तो वकालत को चमकाना संभव था और न ही देशी-विदेशी संभ्रांत तबके में रूतबा हासिल कर पाना ही। 1909 में वे ग्रेट ब्रिटेन की प्रिवी कौंसिल में मुकदमे की पैरवी करने का अनुमोदन प्राप्त करके अपने कानूनी कैरियर के शिखर पर पहुंच गये। उन्होंने बड़े-बड़े जमींदारों के मुकदमों की पैरवी प्रिवी कौंसिल में की। यह तो मात्र एक उदाहरण है। उस दौर के जितने भी प्रतिष्ठित लोग थे वे अंग्रेजी कल्चर में रमे हुए थे। अंग्रेजी राज ने समाज को दो तरह के वर्गों में विभक्त कर दिया। एक था छोटा-सा साधन संपन्न तबका और दूसरा पूर्ण कंगाल। जी हाँ! अंग्रेजों ने महज भारत को लूटा ही नहीं, अपितु लूटने के लिए एक बिचौलिया रईस वर्ग भी तैयार कर दिया। भारत साधन संपन्न वर्ग के सहयोग से ही शेष समाज को कंगाल किया गया। साधन संपन्न वर्ग के अंग्रेजों के साथ गठजोर के साथ साँस्कृतिक मिलाप हुआ। और इस मिलाप ने ही भारतीय उपमहाद्वीप में इंग्लिश मीडियम कल्चर को पैदा करने लायक ज़मीन तैयार की। कोई इस मुखालफत में हो कि अंग्रेजों ने क्लर्क पैदा करने के लिए अंग्रेजी शिक्षा थोपी थी। तो वह उस भ्रम को त्याग दे। अंग्रेजों ने अंग्रेजी के माध्यम से एक सत्ता में सहभागिता निभाने वाला ‘संभ्रांत-उच्च-वर्ण’ की बहुलता वाला ‘संभ्रांत अंग्रेजी भाषी वर्ग’ तैयार किया। जाते-जाते उनको ही राजसत्ता सौप कर गये।  (नोट- मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू से सम्बंधित तथ्य विकिपीडिया से प्राप्त किया गया है।)

प्रारंभिक दौर के विपरीत, बाद के दौर में अंग्रेजों ने औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से हर जाति और मजहब के क्रीमीलेयर को अंग्रेजी भाषी बनाने का प्रयास किया था। अंग्रेजों ने इस उद्देश्य के लिए स्वायत पाठशाला व्यवस्था को भंग कर राज्य नियंत्रित स्कूल व्यवस्था की स्थापना की। औपचारिक शिक्षा के प्रसार में कुछ रजवाडे़ भी आगे आये। पर चूँकि इनके खुद के संस्कार पर अंग्रेजीयत हावी हो चुकी थी। अतः इन सबके द्वारा संचालित स्कूलों से भी अंग्रेजी ही “ट्रिकल डाउन” हुई। इस प्रकार भारत में अंग्रेजों के शोषणतंत्र का सहभागी ही अंग्रेजी भाषा का प्रचारक बना। उस वर्ग ने ही अंग्रेजी ज्ञान को आधुनिकता के पर्याय के रूप में स्थापित किया। जबकि यूरोप में आधुनिकता के साथ जन-भाषाओं को शिक्षा और राजकाज में स्थान मिला।

विकिपीडिया के अनुसार, “1912 में एक ब्रिटिश सर्वेक्षण के अनुसार ब्राह्मणों ने तमिलनाडु की पुरुष जनसंख्या का केवल 3.2 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व किया है, परंतु ब्रिटिश अधिकारियों के नीचे कार्यरत 83.3 प्रतिशत उप जज, 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर के और 76.2 प्रतिशत प्रशासनिक पदों पर ब्राह्मण विराजमान हैं। मद्रास विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले सड़सठ (67) प्रतिशत ब्राह्मण थे।”  अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि बिना अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति के क्या यह संभव था? सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजों ने अपने प्रारंभिक दिनों में जिन्हें सहभागी बनाया उन्हें ही अंतिम दिनों में शेष समाज का प्रतिद्वंदी के रूप में दर्शाया। यह शेष समाज को जाति और मजहब पर बाँटे रखने की ही चाल का हिस्सा थी।

 अब कुछ उदाहरण हम समाज सुधारकों का भी ले सकते हैं। 1803-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी में काम कर चुके राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है। भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह माने जाते हैं। पर उनके आलोचकों का मानना है कि उन्होंने अपनी जमींदारी को चमकाने के लिए अंग्रेजों को खुश करने का काम किया और वे अंग्रेजों के अदृश्य सिपाही थे। अंग्रेज अधिकारियों के साथ उनके संबंध इतने प्रगाढ़ थे कि अंग्रेजों ने उन्हें बंगाल में जमींदारी प्रदान की थी। या यूँ समझ लें कि 11 वर्ष काम कर जमींदारी खरीदने लायक दौलत कमा ली थी। यह नेता ही शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजी एवं अंग्रेजीयत के प्रारंभिक प्रसारकों में से एक था।  (नोट- तथ्य विकिपीडिया से प्राप्त किए)

ईस्ट इंडिया कम्पनी में काम कर चुके और 1857 के विद्रोह के वक्त अंग्रेजों को संरक्षण देने वाले, सर सैय्यद अहमद खान 1858 के बाद के ब्रिटिश राज में मुसलमानों (वर्टिकल ग्रुप) के नेता थे। सैय्यद अहमद खान ईस्ट इण्डिया कम्पनी में काम करते हुए काफ़ी प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 1857 के विद्रोह के विषय पर असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द नामक किताब तक लिखी। जिसमें उन्होंने उन कारणों को उजागर किया जिसके कारण विद्रोह प्रारंभ हुआ था। उन्हें भारत के मुसलमानों की आधुनिक उर्फ अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत का जनक माना जाता है। उनके द्वारा स्थापित मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएण्टल कालेज की स्थापना की थी। यही बाद में विकसित होकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना गया। उनके प्रयासों से अलीगढ़ क्रांति की शुरुआत हुई, जिसमें शामिल मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओं ने भारतीय मुसलमानों का राजनैतिक भविष्य सुदृढ़ किया। ये अपने समय के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता थे और 1857 में अंग्रेजों के प्रति वफादारी दिखा चुके, ने भारत के मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार के प्रति वफ़ादार रहने की नसीहत दी। पर सबसे बड़ी बात एंग्लो अर्थात् अंग्रेजी के वर्चस्व को स्थापित करने वाले अंग्रेजों के द्वारा पैदा किये,  इस कद्दावर नेता ने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की सामूहिक भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। (नोट- तथ्य विकिपीडिया से प्राप्त किए)

आर्य समाज द्वारा संचालित ङीएवी संस्था इसका बेहतर उदाहरण है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज का लक्ष्य भारतीय समाज को बौद्धिक, वैचारिक एवं आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित करना था। उन्होंने "वेदों की ओर वापस" जाने का आह्वान किया। वेदों की सही समझ शिक्षा के बिना संभव नहीं थी। स्वामी दयानन्द का विश्वास था कि शिक्षा के प्रसार के द्वारा ही देश के कोने-कोने में जागृति आयेगी।विकिपीडिया पर स्वामी दयान्द के विचार धारा पर उनकी मृत्यु के तीन साल बाद उनके अनुयायी हंसराज ने उनके नाम पर स्कूल की स्थापना की। हंसराज खुद मिशनरी स्कूल में पढ़े थे और खराब आर्थिक स्थिति के बावजूद भी बीए तक शिक्षा हासिल की थी। हंसराज ने जिस स्कूल की स्थापना की उसका नाम ही दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालय (डीएवी) था। जिसका वास्तविक लक्ष्य वैदिक शिक्षा का प्रसार करना था। पर अंग्रेजों के कट्टर विरोधी अपने जीवन में ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के प्रयास को विफल कर देने वाले महात्मा हंसराज भी राजकाज की भाषा बन जाने के बाद एंग्लो अर्थात् अंग्रेजी को नकार नहीं सके। (नोट- तथ्य विकिपीडिया से प्राप्त किए)

ये चारों ही मामले दर्शाते है कि अंग्रेजी का प्रसार करने वाले लोगों का अंग्रेजों से किसी न किसी प्रकार का संबंध स्थापित हुआ था। हंसराज के डीएवी को छोड़ दें तो शेष किसी न किसी रूप में अंग्रेजों से आर्थिक फायदे के लिए जुड़े थे। सर सैय्यद अहमद खान और राजा राम मोहन राय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारी रह चुके थे। तो मोती लाल नेहरू अंग्रेजी कोर्ट के ही नहीं, ब्रिटिश पार्लियामेंट की प्रिवी कौंसिल में भी वकील थे। मोती लाल तो अंग्रेजों से इतने प्रभावित थे और उनके संबंध इतने घनिष्ठ थे कि उन्होंने अपने पुत्र की परवरिश तक अंग्रेज परिचायिकाओं के संरक्षण में ही करवायी।

विकिपीडिया के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसम्बर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। इसके संस्थापक महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) ए. ओ. ह्यूम थे जिन्होंने कलकत्ते के व्योमेश चन्द्र बनर्जी को अध्यक्ष नियुक्त किया था। अपने शुरुआती दिनों में कांग्रेस का दृष्टिकोण एक कुलीन वर्ग की संस्था का था।कुलीन यानी वे लोग जो बड़े जमींदार थे और अंग्रेजीदां थे। एनसीईआरटी आगे स्पष्ट करता है,  शुरू-शुरू में कांग्रेस में अंग्रेजीदां, अगड़ी जाति, ऊँचले मध्यम वर्ग और शहरी एलीट(अभिजन) का बोलबाला था।ये दोनों तथ्य  प्रमाणित  करते हैं कि अंग्रेजों की रूचि भारत की समाज व्यवस्था को बदलने में नहीं अपितु अपने हिमायती अंग्रेजीदां शीर्ष वर्ग को समाज के नेतृत्व के रूप में स्थापित करने में थी। वह वर्ग जिसे उन्होंने खुद तैयार किया था। स्वदेशी असहयोग आन्दोलनों के दौर में ही कांग्रेस और जनता के बीच गठजोड़ संभव हुआ। आक्रोश तो जनता में था पर उस आक्रोश को आंदोलन की दिशा में परिवर्तित करने का काम कांग्रेस ने किया। “यह स्मरण रखना चाहिए कि सभी राष्ट्रवादी आंदोलनों की तरह से भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन अनिवार्य तौर पर बुर्जवा आंदोलन ही था। यह विकास की स्वाभाविक ऐतिहासिक अवस्था को निरूपित करता है और इसे श्रमजीवी वर्ग का आन्दोलन समझना अथवा ऐसा सोच कर उसकी आलोचना करना गलत है।” यूजीसी नेट (2010)... अतः जनता में आक्रोश होने के बावजूद भी उसे दिशा कांग्रेस का बुर्जवा नेतृत्व दे रहा था। पर नेतृत्व भी गांधी के सक्रिय रूप से जुड़ने से पूर्व तक केवल शहरों तक ही केन्द्रित था। मध्यम वर्ग ही बुर्जवा एलीट क्लास की विचारधारा को अपना पाया था। भारत के धारातल,  अर्थात् भारत के गाँव से कांग्रेस को जोड़ने का काम गांधी ही कर पाये थे। धीरे-धीरे विविध विचारधारा और विविध आर्थिक वर्गों के लोग कांग्रेस से जुडे। “गांधी जी ने राष्ट्रवादी कार्यवाही के जरिये करोडों लोगों को बदल डालने की चेष्टा की और उन्हें बदलने में सामान्य तौर पर सफल भी हुए।.. गांधी जी ने लोगों को राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर सोचने के लिए प्रेरित भी किया और प्रत्येक गाँव और प्रत्येक शहर नये विचारों तथा नई आशाओं, जो लोगों में मर गयी थी, पर तर्क और बहस के साथ गूँजने लगा। यह सब अदभुत मनोवैज्ञानिक परिवर्तन था।” अतः गांधी जी के प्रयास से लोग कांग्रेस के साथ जुड़े पर शीर्ष नेतृत्व का चरित्र वही था जो शुरूआत में बना हुआ था। जनता आन्दोलनों में भाग लेती थी पर वर्गीय चेतना के अभाव में, इस प्रकार इस आन्दोलन का नेतृत्व अंग्रेजी भाषी एलीट तबके तक ही सीमित था। गांधी जी ने भी इस बारे में कभी विचार नहीं किया। “गांधी जी राष्ट्रवादी स्तर पर काम करते थे, उन्होंने वर्गों के आपसी संघर्षों के बारे में नहीं सोचा।” इसी का परिणाम था कि एक तरफ़ उन्होंने लोगों को संगठित किया दूसरी तरफ़ बिडला जैसे उद्योगपति से भी सहायता ली। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ढ़ांचे में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया। शीर्ष नेतृत्व का वर्गीय चरित्र वही था जो 1885 में कांग्रेस की स्थापना के वक्त बना हुआ था। चूँकि कांग्रेस में अंग्रेजी मिजाज के लोग ही हावी थे, अतः कांग्रेस के काम-काज पर भी यही भाषा हावी थी। वर्गीय चेतना के अभाव में लोग कांग्रेस, अंग्रेज और नव उदित पूँजीपति वर्ग के बीच के संबंध को समझ नहीं पा रहे थे।  गांधी जी ने 1905 में हिन्द स्वराज में कांग्रेस की आलोचना करते हुए लिखा है कि कांग्रेस के काम-काज की भाषा अंग्रेजी थी। तीस वर्ष बाद हिन्द स्वराज पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्द स्वराज में कही गयी किसी भी बात में फेर बदल करने की आवश्यकता महसूस नहीं करते हैं। सिर्फ़ कांग्रेस ही नहीं, कांग्रेस की प्रतिक्रिया में अंग्रेजों के प्रोत्साहन से खड़ी की गयी मुस्लिम लीग का वर्गीय चरित्र भी वही था जो कांग्रेस का था।

अंग्रेजों के जमाने में पैदा हुए उच्च एवं एलीट वर्ग का तौर तरीका और रहन सहन उनके अंग्रेज सहभागियों के समान ही था। उनके रहन सहन के तौर तरीके अपने ही समुदाय के अन्य लोगों से कटे हुए थे। लेकिन यह भी एक चमत्कार ही था कि वे अपनी-अपनी जातियों और मजहब के स्थापित नेता थे। अतः राजा राम मोहन राय हो, या सर सैय्यद अहमद खान हो, या मोतीलाल-जवाहरलाल हो. जिनके अंग्रेजों के साथ करीबी रिश्ते कायम हुए, वे ही रईस बने और वे ही उनकी भाषा और संस्कृति को आत्मसात कर पाये। सबसे बड़ी बात, वे ही अंग्रेजी राज के खिलाफ़ होने वाले आन्दोलनों के नेता थे। अपने अपने जातीय और मजहबी समूह के स्थापित नेता भी वे लोग ही बने। वे ही अपने अपने वर्ग के स्थापित नेता थे।

अंग्रेजी कम्पनी राज के जमाने में, राजकाज और प्रशासन में भी छोटा सा क्रीमी-वर्ग अंग्रेजों का वफादार सेवक बना था। अतः अंग्रेजी कानून के दरबार में इस पहले अल्पसंख्यक अंग्रेजी भाषी क्रीमी-वर्ग का दबदबा अन्त तक बना रहा। उस वर्ण से संबंधित छोटे से ग्रुप का सामाजिक वर्चस्व राजकाज में अंग्रेजी राज में ही स्थापित हुआ। जब तक अंग्रेजी रहेगी तब तक इस ऊपरी वर्ग का वर्चस्व भी बना रहेगा। बाद के दौर में, अन्‍य लोग भी अपने जातियों और मजहबों के नेताओं के मार्गदर्शन में अंग्रेजी भाषी बनने के लिए प्रेरित हुए। पर अंग्रेजी भाषी वर्ग में ऊँची जातियों के मुकाबले अन्य जाति वर्णों के लोगों की संख्या नगण्य ही रही है। बाद के दौर में भारतीय अंग्रेजी भाषी वर्ग में अंग्रेजों के विरोधी और हिमायती दोनों तरह के लोग शामिल थे। पर ये दोनों अंग्रेजी भाषी समाज के ऊपरी तबके से ही संबंधित रहे। अंग्रेजों के दौर में भी इंग्लैड से पढ़ कर आये हुए रईस लोग, कुछ हद तक सरकारी दफ्तरों के अधिकारी-कर्मचारी और कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक ही अंग्रेजी भाषी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश के क्षितिज पर छायी रही कांग्रेस, मुस्लिम लीग आदि का शीर्ष नेतृत्व ही विलायत से पढ़ कर आया अंग्रेजी भाषी वर्ग था।

अंग्रेजी राज को कल्याणकारी चेहरा दिखाने के लिए 1850 से ही “डिप्रेस्ड क्लास”(वंचित तबका) की बात की पर हकीकत में गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1935 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए विशेष व्यवस्था की गयी। वह इस वर्टीकल वर्ग के नये उभरे अंग्रेजी भाषी शिक्षित वर्ग का सहयोग प्राप्त करने की कवाय़त भर थी। 200 साल के अंग्रेजी राज के अंतिम दौर में भी समाज का एक बहुत छोटा सा तबका ही अंग्रेजी भाषी बन पाया था। चूँकि वह ही अंग्रेजों से संवाद कर सकता था। अतः वह ही तथाकथित बुद्धिजीवी एवं नेतृत्वकारी वर्ग के रूप में भी स्थापित हुआ था। स्वतंत्रता से पूर्व के दौर में अंग्रेजों के साथ लम्बे संबंधों की वजह से, अनुसूचित जाति और जनजाति के मुकाबले ब्राह्मण और कायस्थ जातियों से सम्बंधित लोगों का जो वर्चस्व अंग्रेजी गलियारे में बना हुआ था, वह भारतीय संविधान में अंग्रेजी भाषा की व्यवस्था की बदौलत कायम रहा।  मुसलमानों एवं पिछड़ी जाति में भी उच्च दर्जे के लोग ही अंग्रेजी भाषी हो सके हैं। इन लोगों ने अपने अपने समुदाय में अंग्रेजी के प्रसार का पूरा प्रयास किया है। पर जैसा कि शिक्षा शास्त्रीय विश्लेषण में पाया कि भाषा का संबंध परिवेश से है, न की किताबों से। अर्थात् बिना परिवेश के भाषा को सीखना संभव ही नहीं है। अपने-अपने ‘वर्टीकल-वर्ण-वर्ग’ के नेताओं के लाख प्रयासों के बावजूद भी “शेरनी का दूध” माने जाने वाली अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हर समुदाय के नगण्य तबके तक ही ट्रिकल डाउनहो पाया था। पर जो इस दूध को पी जाता है, वह सामाजिक वर्चस्व को प्राप्त कर लेता है। आज भी अगड़ी जातियों के मुकाबले अनुसूचित जाति और जनजाति का नगण्य तबका ही अंग्रेजी भाषी है। पर जो है वह शीर्ष नेतृत्व का सहभागी है। उसने रहन-सहन भाषा का तौर-तरीका एलीट वर्ग वाला ही अपनाया है और एलीट-ब्राह्मणवादी-भारतीय-अंग्रेजी कल्चर के प्रसार में लग गये। जितना जोर उन्होंने अंग्रेजी के प्रसार पर लगाया उसका आधा जोर भी दलितों की भाषा को राजसत्ता की भाषा बनाने में लगाया होता तो राजसत्ता के चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाता। उन्होंने शासक वर्ग की भाषा को दलित भाषाओं से अधिक महत्व इसलिए दिया, क्योंकि कहीं न कहीं वह उनके नेतृत्व को स्थिरता दे रही है और सत्ता का भागीदार बनाए रखने में सहायक है।

1950 में लागू हुए भारतीय संविधान की धारा 341 तथा 342 के अनुसार दलित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। पर उसी संविधान की धारा 343 और 348 राजकाज और न्याय व्यवस्था से दलित पिछड़े वर्ग की बोली के स्थान पर अंग्रेजी के वर्चस्व को बना कर शासन तंत्र में तथाकथित दलित, पिछड़े जातियों के निचले क्रम को ही नहीं अपितु सभी जातियों के निचले वर्ग के सभी लोगों की भूमिका को सीमित कर रख दिया है। संविधान द्वारा उपलब्ध आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद भी, इन जातियों से संबंध एक छोटे से वर्ग को ही आरक्षण का फायदा मिल पाया। जो अंग्रेजी की बाधा को पार कर पाया वह व्यक्ति ही सत्ता के गलियारे की आवाज भी बन पाया। अंग्रेजी के वास्तविक राजभाषा बन जाने की वजह से अंग्रेजी भाषी छोटे से वर्ग का दबदबा ही स्वतंत्रता उपरांत भी राजव्यवस्था पर बना रहा। कमोबेश यह स्थिति सिर्फ़ दलित जातियों की ही नहीं है, अपितु तमाम दूसरी जातियों एवं मजहब के निचले क्रम के लोग सत्ता के गलियारे से बाहर ही है। अन्ततः अंग्रेजी के वर्चस्व का खामियाजा भारत के सभी जाति, मजहब क्षेत्रीय बोली बोलने वाले निचले क्रम के लोगों को भुगतना पड़ा है। अंग्रेजों के जमाने में जो अंग्रेजी भाषी वर्ग तैयार हुआ था। यह वर्ग ही उस वक्त शासन व्यवस्था का भागीदार बना था। वह ही अंग्रेजों की सत्ता का प्रतिद्वंदी भी बना था।.. और 1947 में हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद वह वर्ग ही राज सत्ता पर कायम हुआ। उदाहरण पंडित जवाहर लाल नेहरू के पिता पंडित मोती लाल नेहरू उस जमाने के प्रसिद्ध वकील थे। एक तरफ़ यह नेहरू परिवार कांग्रेस को नेतृत्व प्रदान कर रहा था। मोतीलाल नेहरू ने 1923 में स्वराज पार्टी भी बनायी। 1928 में कांग्रेस द्वारा स्थापित भारतीय संविधान आयोग के भी वे अध्यक्ष बने। और दूसरी तरफ़ वे अंग्रेजों की प्रिवी काउंसिल में जमींदारो के हक में पैरवी किया करते थे। अर्थात् उनके केस लड़ते थे। अंग्रेजों के लिए राजस्व उगाहने वालों के सहयोगी थे। भारत में स्वतंत्रता के बाद सत्ता की मलाई इसी सहयोगी-प्रतिद्वंदी वर्ग को मिल पायी।

1951 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 18% से कम थी। जब साक्षरता का यह हाल है तो स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा की क्या स्थिति रही होगी। पाठक खुद ही कल्पना करें। चूँकि अंग्रेजी भारत की साँस्कृतिक परिवेश की भाषा तो है नहीं कि बिना स्कूल कॉलेज जैसी औपचारिक व्यवस्था के सीखी जा सकती हो। अतः जन सामान्य (आम आदमी) चाहे वह रहने वाला उत्तर का हो या दक्षिण का, पूर्व का हो या पश्चिम का, अंग्रेजी किसी की भी सुविधा की भाषा नहीं थी और न है। उस दौर में भी यह उन शीर्ष लोगों की तो सुविधा की भाषा थी, वे जो शिक्षा ग्रहण करने विलायत(इंग्लैड और यूएसए) जा सकते थे। इंग्लैड प्रवास की वजह से अंग्रेजी उनके लिए सहज हो गयी थी। बाद के दौर में भी उसी वर्ग से संबंधित लोगों तक ही सिमटी रही। चूँकि उच्च शिक्षण संस्थानों पर भी यही वर्ग छाया रहा है। अतः उच्च शिक्षा की भाषा भी अंग्रेजी बनी रही है। अंग्रेजी की विवशता को लेकर रवीन्द्र नाथ टैगोर गांधी जी को 1918 में एक पत्र में लिखते है कि अंग्रेजी में ग्रहण किए विचारों को हमने अपने दिमाग में प्राकृतिक रूप से आत्मसात कर लिया है। अर्थात् अब हम अपने विचारों को प्राकृतिक रूप में अंग्रेजी में ही व्यक्त कर सकते हैं। अतः हिन्दी (तमाम भारतीय भाषाएं) हमारे लिए एक विकल्प के रूप में ही रहेगी। प्रॉब्लम ऑफ़ हिंदी नामक पुस्तक में छपा यह पत्र स्पष्ट करता है कि यह उच्च वर्ग की विवशता ही थी जिसकी वजह से सत्ता हस्तांतरण के बाद भी उच्च शिक्षा और राजकाज की भाषा अंग्रेजी बनी रही। अंततः राजसत्ता को सीमित वर्ग तक समेटे रखने का काम किया। हालांकि टैगोर ने नयी पीढ़ी से उम्मीद की थी कि वे वक्त के साथ हिन्दुस्तानी को आत्मसात कर लेंगे। पर स्वतंत्र भारत के नये दौर में भी उच्च वर्ग की नयी पीढ़ी ने भी अंग्रेजी का दामन थामे रखा। अतः उच्च वर्ग की नयी अंग्रेजी भाषी पीढ़ी की सुविधा के लिए अंग्रेजी राजकाज और उच्च शिक्षा की भाषा बनी रही है। उच्च शिक्षा के मंदिर में वह ही टिक पाया जो अंग्रेजी और अंग्रेजीयत को आत्मसात कर पाया। पर देश में ही उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाला तबका भी उच्च शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता की वजह से कुछ हद तक काम काज की अंग्रेजी सीख पाता था। साँस्कृतिक परिवेश की भाषा न होने की वजह से अंग्रेजी उच्च वर्ण के भी उच्च वर्ग तक ही सीमित रही। अंग्रेजी का वर्चस्व ही उच्च वर्ण के उच्च वर्ग के वर्चस्व का आधार बनाए रखा। अंग्रेजी ही ब्राह्मणवादी वर्चस्व का आधार है। अनुसूचित जाति की पृष्ठभूमि के बाबासाहेब डॉ. बी आर अम्बेडकर सरीखे लोग तो अंग्रेजी भाषियों में उस दौर में भी बस अपवादस्वरूप ही थे। दलित एवं निम्न वर्ग के लोगों की सबसे बड़ी बाधा अंग्रेजी ही रही है। अंग्रेजी की अनिवार्यता की वजह से कॉलेज भी उच्च वर्ण के भी उच्च वर्ग के विद्यार्थी ही पहुँच पाते थे। भारत में अंग्रेजी इसी उच्च वर्ण के वर्चस्व वाली भाषा बनी रही। अंग्रेजी के अधिकारिक भाषा बनने का सीधा फायदा इसी वर्ग को हासिल हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी नौकरशाही अंग्रेजों के सहयोगी अंग्रेजी भाषियों के हाथ में ही रही। इनकी सुविधा के लिए शासन प्रशासन में अंग्रेजी को संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद तक के लिए (वस्‍तुत: अनंत काल के लिए) कायम रखा गया। आज भी इस देश में शीर्ष वर्ग की ही सुविधा की भाषा अंग्रेजी है। बस अंतर यह आया है कि इस अंग्रेजी भाषी वर्ग में धीरे-धीरे गैर सवर्ण जातियों की भी हिस्सेदारी दर्ज हुई है। यही वर्ग धीरे धीरे अंग्रेजी भाषी एलीट वर्ग के रूप में स्थापित हुआ। हर जाति-वर्ण के एलीट! वे सभी अपने-अपने वर्ण के आइडियल (आदर्श) बन गये है। अपने वर्ण के लोगों को अंग्रेजी भाषी बनने हेतु प्रेरित भी करते हैं। इस एलीट वर्ग की ही आपसी संपर्क की भाषा अंग्रेजी है। इस प्रकार सत्ता पर इंग्लिश मीडियम कल्चर वाले वर्ग का, जो नियंत्रण अंग्रेजों के समय में था, वह आज भी बना हुआ है। चूँकि अंग्रेजी ज्ञान और सत्ता को सीमित वर्ग तक समेटे रखती है। जब ज्ञान सीमित वर्ग के पास होता है तो शेष समाज के पास उस पंडित वर्ग का अनुसरण करने के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचता। समाज का एक सीमित वर्ग ही ‘ज्ञान’ को जानता है। यह वर्ग अपने आप में वर्ण का रूप लेता है और अपने-अपने समुदाय में पंडित के रूप में भी स्थापित होता है। क्योंकि अब इसमें हर जातियों अर्थात् वर्टीकल वर्ग (SC,ST,OBC, सामान्य श्रेणी) के ब्राह्मण शामिल है। ब्राह्मणों का कार्य ज्ञान और सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रखना था। नव ब्राह्मण वर्गभी ज्ञान और सत्ता को अंग्रेजी भाषी उच्च वर्ग के लोगों तक ही समेटे रखता है। शेष जनों के पास आँख बन्द कर अपने-अपने वर्ण के वर्चस्व प्राप्त लोगों को का अनुसरण करने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं बच जाता है। अंग्रेजी भाषी वर्ग ही ज्ञाता है और शेष समाज उनका अनुसरणकर्ता है। अतः शेरनी का दूधसमझे जाने वाली इस भाषा का वर्चस्व ही नवब्राह्मण वादी वर्चस्वहै।  यह ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ ही वास्तव में ब्राह्मणवादी कल्चर है। चूँकि कुछ लोग ही श्रेष्ठता को हासिल करते हैं और शेष समाज से ऊपर रहते है। अतः यह ही “वीआईपी कल्चर” के रूप में भी स्थापित होता है। यह इंग्लिश मीडियम वीआईपी वर्ग ही सम्पूर्ण राजव्यवस्था को इंग्लिश मीडियमकी धुरी पर नचा रहा है। इस प्रकार राजव्यवस्था, उच्च शिक्षा व्यवस्था और पूँजीव्यवस्था का नियंत्ररण 1-2% अंग्रेजी भाषी लोगों के हाथ में बना रहता है। पर हकीकत यह भी है कि आम आदमी चाहे वह उत्तर का हो या दक्षिण का, पूर्व का हो या पश्चिम का, अंग्रेजी उसके समझ के बाहर की ही बात है। और इस कारण राजसत्ता उसके समझ के बाहर है। जी हाँ! अंग्रेजी इस देश के 90% लोगों के समझ के बाहर ही है। इस कारण राजकाज, न्यायव्यवस्था के तौर-तरीके भी उन लोगों की समझ के बाहर ही है। शहरी उच्च मध्यम वर्ग के लिए स्थापित कॉलोनियों में रहने वाले मुस्लिम, अजा (SC) , अजजा (ST), अपिव (OBC) और सामान्य श्रेणी के इंडियन को छोड दें तो शहरी स्लम, अनाधिकृत और निम्न मध्यम वर्गीय कॉलोनियों एवं ग्रामीण परिवेश में रहने वाले मुस्लिम, अजा (SC) , अजजा (ST), अपिव (OBC) और सामान्य श्रेणी के भारतवासियों के लिए यह “शेरनी का दूध” किसी श्राप से कम नहीं है। देश की 90% आबादी “शेरनी का दूध” हजम नहीं कर सकती है। हाँ, सत्ताधारी वर्ग में कुछ हद तक औपचारिक शिक्षा की बदौलत अंग्रेजी सीख कर इक्का-दुक्का निम्न मध्यम वर्ग का व्यक्ति भी शामिल हो जाता है। पर अंग्रेजी के जाल में फंस कर उलझना ही है। यह ठीक उसी तरह है कि मछुआरे के जाल से कुछ मछलियाँ बच निकले। पर जो जाल में फंस गयी वह तो पकती ही है। यदि कुछ एक लोग आरक्षण या औपचारिक शिक्षा की वजह से अंग्रेजी भाषी तबके का हिस्सा बन भी जाते हैं। पर यह संपूर्ण समाज की सच्चाई व्यक्त नहीं करता है। यदि नीचे के क्रम के कुछ लोगों को ऊपर के क्रम में शामिल होने के लिए रास्ता दे तो ऊपर की सत्ता सुरक्षित भी नहीं रह सकती है। अतः समाज को वर्टीकल रूप से बांट कर अनुसूचित जाति एवं जनजाति और आर्थिक एव सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग(जाति) को दिया आरक्षण कोई कृपा या सामाजिक उद्धार का साधन नहीं अपितु सत्ता को अंग्रेजी भाषी वर्ग तक सुरक्षित रखने का साधन है। मुस्लिम, अजा (SC) , अजजा (ST), अपिव (OBC) में से भी छोटे से वर्ग को अंग्रेजी भाषी बनाना, अंग्रेजों के जमाने से सत्ता में बैठे अंग्रेजी भाषी एलीट ब्राह्मणों, कायस्थों के लिए एक अनिवार्य शर्त है। अतः सत्ताधारी वर्ग अंग्रेजी भाषी समुदाय में हर सामाजिक तबके को शामिल करने की कवायत में जुटा है। इक्का-दुक्का लोग आरक्षण जैसी सीढ़ियों के सहारे चढ़ कर अंग्रेजी भाषी वर्ग में शामिल हो भी जाएं तो अधिकतर अनिल मीणा, विजय, नीतीश की तरह रास्ते में ही ढेर हो जाएंगे। पर जो इस वर्ग में शामिल हो जाएंगे, वे शेष समाज के लिए आदर्श बन जाएंगे। आरक्षण की सीढ़ियों के सहारे चढ़ कर आये लोग भी, अंततः अंग्रेजी भाषी वर्ग के ही अंश बन कर रह जाएंगे। इन नए लोगों का साँस्कृतिकरण भी तेजी से ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ के अनुरूप होता है। बेशक वे इस सिस्टम में पहले से बैठे लोगों से हीन स्थिति में हो, पर जिस समाज से आए है उसके वे आइडियल होंगे। सिस्टम के वर्चस्व को और अधिक उठाने में ही योगदान करेंगे। यह नव अंग्रेजी भाषी वर्ग आम जनता और सिस्टम के बीच की खाई को और अधिक बढ़ाने का काम करता है।

राजनीतिशास्त्र का स्थापित सिद्धान्त है कि सत्ता व्यक्ति और संस्थाओं को भ्रष्ट बनाती है। 15 अगस्त 1947 को हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद से सत्ता के तमाम केन्द्रों अर्थात् विश्वविद्यालय, न्याय, नौकरशाही, मीडिया, राजनीति पर 4-5% अंग्रेजी भाषियों का वर्चस्व बना रहता है। ऐसे में सत्ता का दुरुपयोग होने से कौन रोक सकता है। सत्ता, उस सत्ता को नियंत्रित करने वाली तमाम एजेंसी सब तो इस इंग्लिश मीडियम सिस्टम का ही भाग है। चूँकि न केवल ऑफिसियल इंग्लिश ही लोगों के समझ के बाहर है अपितु उस ऑफिसियल इंग्लिश के अनुवाद के अनुरूप एसी (वातानुकूलित) कमरों में बैठ कर गढ़ी गयी, अनुवाद की ऑफिसियल हिन्दी भी आम आदमी के ऊपर से ही जाती है। इस प्रकार विश्वविद्यालय, न्यायव्यवस्था, पूँजीव्यवस्था और इन सब को साकार रूप देने वाली राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था जैसी एजेंसियाँ सत्ता के गलियारे में क्या गुल खिलाती है, यह आम जनता के समझ के बाहर की बात है। इंग्लिश मीडियम सिस्टम के रहते आम जनता की भागीदारी असंभव ही नहीं नामुमकिन भी है। भ्रष्टाचार एक साँस्कृतिक क्रिया है, जो सत्ता के दुरूपयोग की ताकत के साथ हासिल होती है। यूरोप में मध्ययुग में जब अध्यात्म की सत्ता पर चर्च का एकाधिकार था, बाईबल आम जनता की भाषा से अलग सिर्फ़ लैटिन में छपी होती थी और वह भी चर्च में चैन से बांध कर रखी जाती थी। पादरी ही बाईबल की गूढ़ बातों को प्रकट करने का अधिकारी था। आम जनता की भाषा से परे की भाषा में छपी बाईबल गूढ़ रहस्य से कम नहीं होती थी। ये अंधकार का वह दौर था, जब पादरी खुले आम लोगों को स्वर्ग के टिकट तक बेचते थे। पादरियों द्वारा चर्च में रखैलें रखना आम बात थी। राजसत्ता न केवल चर्च को संरक्षण देती थी अपितु राजा द्वारा एकत्र टैक्स का एक भाग चर्च को बिना रोक टोक के जाता था। चर्च इसके बदले में राजा को भगवान का प्रतिनिधि घोषित करता था। यह सब इस कारण संभव था क्योंकि अध्यात्म की सत्ता चर्च के पादरियों तक ही सीमित थी। वे मनचाहे तरीके से बाईबल का वर्णन कर सकते थे। अंधविश्वास के व्यापकता की वजह से जन समान्य परलोक के डर से चर्च के पादरी की बात को आँख बंद कर स्वीकार करता था। यही कारण भारत में ब्राह्मण वादी वर्चस्व का भी रहा है। वेदों का ज्ञान संस्कृत भाषा में अंकित है और उस भाषा का अध्ययन करने का अधिकार सिर्फ़ ब्राह्मणों को ही था। चूँकि उस ज्ञान को हासिल करने और उसका वर्णन करने का अधिकार एक सीमित जाति-वर्ण तक सीमित था। अतः वह उसे मनचाहे तरीके से वर्णन कर सकता था। उसने भी वही किया जो यूरोप के पादरी वर्ग ने किया। ब्राह्मणों ने राजा को भगवान का प्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया और बदले में राजा ने इनको संरक्षण प्रदान करने का काम किया। मध्ययुग में यूरोप में पादरियों ने और भारतीय समाज में ब्राह्मणों ने अज्ञानता के अंधेरे में अध्यात्म की सत्ता का प्रयोग शेष समाज को दबाए रखने के लिए ही किया। दोनों ने अध्यात्मिकता को हथियार के रूप में प्रयोग किया। और दोनों की सत्ता को शक्तिशाली बनाने का काम भाषा ने किया। चूँकि यूरोप की आम जनता के लिए लैटिन समझ के बाहर थी। तो भारत में संस्कृत पंडित जी की भाषा और फारसी मौलवी जी की भाषा से ज्यादा कुछ नहीं रही। पुनर्जागरण काल के बाद बाईबल का अनुवाद तो यूरोप की जन भाषाओं में हुआ। पर भारत में संस्कृत में छपे वेदों उपनिषदों को शायद ही जनभाषाओं में अनुवाद हुआ हो। एक प्रतिष्ठित स्कूल के प्राचार्य के अनुसार, “आपके पास अपने वेदों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद नहीं है। जर्मनी के पास संस्कृत की पुस्तकों का जर्मन अनुवाद है और यूएसए के पास अंग्रेजी अनुवाद है।” संस्कृत में छपे ज्ञान का जनसामान्य की भाषा में वर्णन न होने की वजह से आम जन ने संस्कृत भाषा के ज्ञान स्रोत को “बाय पास” करने का ही कार्य किया है। आज आम आदमी की नज़र में संस्कृत भाषा का अर्थ पूजा-पाठ के समय पंडितों के द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा के रूप में है। आप-हम जैसे लोग पंडित के मंत्र खतम होने पर स्वाहाका उच्चारण भर करते हैं। कुछ विशेष विचारधारा के चिंतक संस्कृत के ग्रंथों अच्छा घोषित करते हैं, तो कुछ दूसरे विचारधारा के लोग उन्हीं ग्रंथों को फिजूल और जन विरोधी घोषित करते हैं। पर आम आदमी न तो उसके अच्छे के बारे में जानता है, न बेकार के बारे में, वह तो सिर्फ़ अपने वर्टीकल वर्ग विशेष के नेता की विचारधारा के अनुरूप उसे स्वीकार करता है अथवा अस्वीकार। हकीकत में वह सिर्फ़ उसको बाय पास करने का ही काम कर रहा होता है। कुछ लोगों के अनुसार संस्कृत ग्रंथों में हमारा प्राचीन ज्ञान है। पर वह क्या है? कितना सही है, कितना गलत। किसी को पता नहीं है? यदि ज्ञान आम आदमी की भाषा में होता तो आम आदमी उस पर चर्चा करता। और इस चर्चा में या तो ज्ञान स्थापित होता या ज्ञान सही नहीं है तो उसे अमान्य घोषित कर, उस ज्ञान से पृथक नए ज्ञान की स्थापना होती।  इस प्रकार आधुनिक ज्ञान का सृजन होता। पर संस्कृत के ग्रंथों का संस्कृत में रह जाने की वजह से वह हो न सका। यूरोप में पुनर्जागरण काल का प्रारंभ बाईबल के जन भाषाओं में अनुवाद के साथ हुआ। धर्म ग्रंथों के आलोचनात्मक मूल्यांकन के बाद ही विज्ञानवाद का उदय हुआ। सामाजिक विज्ञानवाद को जन भाषाओं में व्यक्त करने के फलस्वरूप हुआ।

अंग्रेजी राज के फलस्वरूप समाज से कटी भाषा संस्कृत और फारसी का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया। यूरोप की तरह हमने मौलिक सामाजिक चिंतन के द्वारा अपने आदिज्ञान को परिवर्तित एवं परिवर्धित नहीं किया। वर्तमान भारतीय समाज व्यवस्था किसी क्रांति का परिणाम नहीं है। हमारे आधुनिक यूरोपिये ज्ञान को  वॉया इंग्लैंड इम्पोर्ट (आयात) किया है। ...और इंग्लिश मीडियम के रैपर में लिपट कर आया ज्ञान इतना अधिक उच्च दर्जे का है कि आम आदमी की समझ से बाहर है। ज्ञान जन भाषाओं में न होने के कारण ऊपरी जन तक ही सीमित है। इंग्लिश मीडियम सिस्टम की वजह से भारतीय समाज ने सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ‘बायपास’ करके ‘नव-ब्राह्मणवाद’ की व्यवस्था को अपनाया है। मतलब साफ है कि शराब तो वही रही, बस बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप बोतल बदल दी गयी है। अर्थात् मूल्य वही रहे बस रूप रंग परिवर्तित हो गया। ..और संस्कृत एवं फारसी के स्थान पर नव-ब्राह्मणवादी व्यवस्था में इंग्लिश को ज्ञान की परिष्कृत भाषा के रूप में स्थापित किया है। मनु की ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने जहाँ ज्ञान को संस्कृतभाषी ब्राह्मणों तक समेटे रखा था। वही मैकाले के नव-ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भी ज्ञान की सत्ता को छोटे से इंग्लिश मीडियम वर्ण अर्थात् इंग्लिश-हिंग्लिश जाति के लोगों तक समेटे रखने का काम किया है। “ब्राह्मणवादी संस्कृति” का स्थान “इंग्लिश मीडियम कल्चर” ने ले लिया। नवब्राह्मणों के रूप में इंग्लिश भाषी जज-वकील, प्रोफेसर, डॉक्टर और सरकारी अधिकारी जैसे आधुनिक ब्राह्मण पैदा हुए। ये मैकाले के मानस पुत्र ही “इंग्लिश मीडियम सिस्टम” के अंग्रेजीमय ज्ञान की सत्ता के दलाल है। कानून की पुस्तकों में क्या छपा है, ये सिर्फ़ वकीलों के समझ की बात है। बिना वकील के सहारे आम आदमी अदालत में खड़ा तक नहीं हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में तो ‘फ़्लूएंट इंग्लिश’ बोलने वाला वकील ही दलील कर सकता है। वकील जो लिख देता है, आम आदमी की  भूमिका उसके नीचे अंगूठा या हस्ताक्षर भर करने की होती है। जैसे वकील रटा देता है,  वैसा ही बयान लोग अदालत में दे देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे पंडित जी जैसे-जैसे कहने को बोलते है, वैसे-वैसे यजमान बिना विचार के बोलता जाता है। लेखक ने व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में वकीलों के सामने लोगों को सादे पेपर पर हस्ताक्षर करते हुए देखा है। सरकार के रहस्यमय दस्तावेजों में क्या छपा होता है यह आम जनता के समझ से बाहर की बात होती है। सेठ जी जहाँ कह देते है, किसान वही अंगूठा लगा देता है। लेखक अब पाठकों से जानना चाहता है कि ऊपर की घटनाओं में क्या फर्क है। एक “पंडित जी” के मंत्र पढ़ने के बाद “यजमान” ने स्वाहः का उच्चारण किया है, और दूसरा सामान्य साक्षर व्यक्ति भी वकील द्वारा अंग्रेजी में तैयार किए गये पेपर पर आँख बंद कर हस्ताक्षर कर देता है। यह ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ही ‘नव ब्राह्मणवाद’ है। जो ज्ञान को एक सीमित वर्ग तक समेटे रखता है। और ज्ञान का सीमित वर्ग तक सिमटा रहना ही भ्रष्टाचार  का स्रोत्र है। जब अध्यात्म का ज्ञान चर्च तक सीमित था तो चर्च भ्रष्ट हो गयी। जब यह ज्ञान पंडितों तक सीमित रहा तो पंडित भ्रष्ट हो गये। आज के बाबाओं के किस्से भी अध्यात्म के अंधकार का ही परिणाम है। आधुनिक ज्ञान भी सीमित वर्ग तक है। अतः यह ‘इंग्लिश मीडियम ज्ञान’ ही ज्ञान से समाज से काटे रखता है। ज्ञान सामाजिक चर्चा का भाग नहीं बनता इसलिए यह ही अज्ञानता का अंधेरा कायम रखने वाली दीवार है।

यहाँ तक की कोर्ट, दफ्तरों आदि की बात तो छोड़ो, स्कूल में क्या चल रहा है, यह माँ-बाप तक नहीं जानते हैं। होना यह चाहिए था कि स्कूलों-कॉलेजों मे पढ़ाये जाने वाला ज्ञान-विज्ञान पर सामाजिक चिंतन होना चाहिए, उस पर संवाद होना चाहिए। पर इंग्लिश मीडियम सिस्टम एक अभेद दीवार के रूप में औपचारिक ज्ञान को सीमित वर्ग तक समेटे रखने का काम करती है। चूँकि यह ज्ञान स्कूल-विश्वविद्यालय रूपी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की औपचारिक भाषा में ही प्रतिस्फुटित होता है। अतः ज्ञान-विज्ञान पर जो सामाजिक बहस और चिंतन होना चाहिए था और ज्ञान-विज्ञान के निर्माण में जो सामाजिक भूमिका होनी चाहिए थी, वह अवरूध रहती है। इंग्लिश मीडियम इस सामाजिक चिंतन की संभावना को ही खत्म कर देता है। ऐसी अवस्था में, जब महज रोजगार हासिल करने के उद्देश्य से व्यक्ति विश्वविद्यालय के स्थापित ज्ञान को ग्रहण करता है। तो व्यक्ति ज्ञान के वास्तविक मर्म को बाय-पास करता जाता है। मतलब स्पष्ट है, अर्हता हासिल करने के लिए प्राप्त ज्ञान की उपयोगिता अर्हता हासिल करने के साथ लगभग खत्म हो जाती है। फलस्वरूप विज्ञान विषय का एम.एस.सी. शनि महाराज को शनिवार को तेल चढ़ाने का काम करता है। या फिर ज्योतिषों के सामने हाथ पसारे बैठा रहता है। इंग्लिश मीडियम रूपी इस नव ब्राह्मणवादी व्यवस्था में ज्ञान को सीमित वर्ग तक समेटे रखने के अतिरिक्त भी एक विशेषता है। वह यह है, इसकी समग्रता, पुराने ब्राह्मणवादी व्यवस्था में जहाँ एक ही जाति अर्थात् ब्राह्मणों के पास ही ज्ञान की धरोहर थी। वहीं वर्तमान नयी व्यवस्था में आरक्षण के माध्यम से सभी वर्टीकल वर्गों, जैसे अनुसूचित जाति (SC), जनजाति (ST), अन्य पिछडा वर्ग (OBC) के सभी सामाजिक वर्गों अर्थात् ज्ञान के पुरोहितों का तबका तैयार किया गया है। जो इंग्लिश की अनिवार्यता की शर्त को पूरा कर सकता है, वह नवब्राह्मण बन सकता है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस जाति-धर्म से संबंधित है। पर नवब्राह्मण वर्ग तैयार करने के लिए भारतीय राजव्यवस्था ने संविधानिक मशीनरी का प्रयोग कर आरक्षण का प्रावधान तक किया है। सभी जाति-धर्मों को इसमें सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार इस नयी व्यवस्था को समग्रता का स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। देखने में लगता है कि यह सिस्टम सबके लिए है, पर हकीकत यह है कि यह ज्ञान को एक सीमित अंग्रेजी भाषी वर्ग तक ही समेटे रखने का कार्य करता है। हर जाति और धर्म के संयोजन के बाद भी इसका वर्गीय स्वरूप अंग्रेजों के जमाने में पैदा हुए एलीट वर्ग तक ही केन्द्रित है। जब ये सिस्टम ही पाँच-सात प्रतिशत लोगों का है तो उस पर आधारित व्यवस्था भ्रष्ट क्यों न हो? इस प्रकार इंग्लिश मीडियम सिस्टम ही भ्रष्टाचार का मूल कारण है। क्योंकि यह सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रखने की ताकत रखता है। जब तक सत्ता चंद हाथों में है, उसका दुरूपयोग होता ही रहेगा। कोई अरविंद केजरीवाल या आम आदमी पार्टी उसके दुरूपयोग को रोक नहीं सकती है। जनता को बरगलाये रखने का काम मीडिया करेगा। अर्थात् भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए हर मुहिम के बावजूद भी भ्रष्टाचार कायम रहेगा। इंग्लिश मीडियम सिस्टम की वजह से 90% आबादी अर्थात् आम आदमी को तो पता ही नहीं चलता कि सत्ता के गलियारे में क्या पक रहा है और सत्ता छोटे से एलीट वर्ग तक सीमित रहती है। एक रोज उड़ती-उड़ती खब़र आएगी, घोटाला हो गया, दूसरे दिन की खब़र होगी कि जहाँ दस्तावेज रखे थे, उस सरकारी भवन में आग लग गयी। फिर खबर आएगी जाँच में कुछ भी हासिल नहीं हुआ। आम आदमी तक समग्र नहीं मीडिया से छनछन कर ही खबर पहुँचेगी। ..और जब मीडिया इतनी ताकतवर हो तो वह भी खबरों की दुकानदारी क्यों न करे। संसद और विधानसभा कानून बनाती है। पर वे क्या खबर बनाती है यह आम आदमी की समझ के बाहर है। कहने को हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद होता है। पर वह इतना अधिक क्लिष्ट होता है कि आम भारतीय की समझ से वह बाहर की ही बात होती है। ये सब कैसे होता है इसे समझने के लिए आइये भारतीय संविधान पर गौर करें।

संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी संघ की राजभाषा है। पर उसी अनुच्छेद 343 के खंड (2) के अनुसार इस संविधान के लागू होने से पंद्रह वर्ष की अवधि तक (यह अवधि आज तक समाप्‍त नहीं हुई है) संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग ठीक उसी रूप में किया जाता रहेगा जैसा उसके प्रारंभ से ठीक पहले किया जाता रहा है। अर्थात् अंग्रेजी राज में जैसे अंग्रेजी का प्रयोग होता था, वैसे ही सत्ता हस्तांतरण के बाद, संविधान लागू होने के बाद भी चलता रहेगा। इस पंद्रह वर्ष की अवधि में एक तो सम्पूर्ण शीर्ष व्यवस्था अंग्रेजी में ही चलती रही। दूसरा हिन्दी को गैर हिन्दीभाषी इलाकों में थोपने की राजनीति कुछ इस प्रकार की गयी कि 15 वर्ष से पूर्व ही, स्थाई तौर पर काम-काज की अधिकारिक भाषा अंग्रेजी ही बन गयी। संविधान की धारा 344 के आधार पर गठित भाषा आयोग की सिफारिश के आधार पर जब 13 अप्रैल, 1963 को इंग्लिश को स्थाई तौर पर संघ की अधिकारिक भाषा बनाने का बिल संसद में रखा जा रहा था। उस वक्त बड़ा जन समूह इस बिल का विरोध करने के लिए संसद के बाहर जमा था। 16 अप्रैल, 1963 को कांग्रेस संसद सदस्यों की बैठक में जवाहर लाल नेहरू ने बिल के पक्ष में वोट डालने के नाम पर व्हिप जारी करते हुए, कांग्रेस जनों को अंग्रेजी के महत्व का पाठ भी पढ़ाया। इसका एक कारण, दक्षिण के तमिल-तेलगू आदि गैर हिन्दीभाषी राज्यों में हिन्दी को थोपने का विरोध भी जोरों पर चलाया गया था। उन्हीं दिनों टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपा आगे दिया कार्टून हिन्दी विरोध की पोल खोलता है। नेताओं की रुचि इंग्लिश को स्थाई बनाने में थी, न कि दक्षिण भाषी राज्यों की भाषा को अधिकारिक बनाने में थी। सवाल यह उठता है कि जब संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था का कामकाज छः अधिकारिक भाषाओं में एक साथ हो सकता है, तो क्या भारत में तथाकथित हिन्दी के साथ तमिल-तेलगु, पंजाबी-कश्मीरी, गुजराती-आसामी में नहीं हो सकता। तीस हजार वर्ग किलोमीटर में फैला, सवा करोड़ की आबादी वाला एक छोटा सा देश है बैल्जियम। इस छोटे से मुल्क में एक नहीं, दो नहीं, तीन अधिकारिक भाषाओं में कामकाज होता है, डच, फ्रेंच और जर्मन। तो भारत में यह असंभव कैसे हो गया है? संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषाओं में तो किसी भी तरह का संबंध नहीं है। पर विश्वविद्यालय अर्थात् ज्ञान व्यवस्था द्वारा तथाकथित द्रविड, गैर द्रविड भाषाओं में विभक्त इस समाज का साँस्कृतिक संदर्भ तो कम से कम एक ही है। भारत की उत्तर और दक्षिण की भाषाओं की वाक्य संरचना भी एक ही है। आम आदमी चाहे उत्तर का हो या दक्षिण का, उसे आपसी संपर्क की भाषा को विकसित करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। यदि कोई अल्प साक्षर व्यक्ति दक्षिण से उत्तर आता है या उत्तर से दक्षिण, तो कुछ समय में आपसी संपर्क से नयी संपर्क भाषा विकसित कर लेता है। तो सत्ता में बैठे वर्ग के प्रोफेसर या जज या अधिकारी को दिक्कत क्यों होती है? नीचे दिया कार्टून स्पष्ट करता है कि हिन्दी विरोधी आंदोलन का केन्द्र इंग्लिश अर्थात् अंग्रेजी राज का अंधेरा कायम रखने के लिए था न कि उत्तर और दक्षिण भारतीयों में समानता की स्थिति को बनाने के लिए था। जिसका फायदा सिर्फ़ उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम में बसे मैकाले पुत्र को ही हुआ, न कि इन्हीं क्षेत्रों में बसे 99% तमिल, तेलगु आदि भाषाओं को बोलने वाले आम हिन्दुस्तानियों को।


संविधान लागू होने बाद सिर्फ़ संविधान के कागजी प्रावधान के अलावा किसी भी दूसरे स्तर पर सरकार की तरफ़ किसी भी प्रकार का ठोस प्रयास भारतीय भाषाओं के लिए नहीं किया गया था। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा पर अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा। भारतीय भाषाओं के आंदोलन में लोग ऊपर की राजनीति के प्रभाव में आपस में ही लडते-भिड़ते रहे। सब कुछ दो बिल्ली और बंदर की कहानी जैसा ही था। बिल्लियां रोटी के बटवारे को लेकर आपस में लड़ती रहती है। बंदर रोटी खाता रहता है। अंततः बिल्लियों के पास बंदर का मुंह ताकने के सिवा कुछ भी हासिल न हुआ। भाषा की राजनीति का भी यही परिणाम निकला। आज आम आदमी उत्तर का हो या दक्षिण का, उसके पास मैकाले पुत्रों का मुंह ताकने के सिवा कुछ भी शेष नहीं बचता है। मैकाले पुत्र ही सत्ता के हर शीर्ष पर बैठे हैं। प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित प्रोफेसर अपने ज्ञान को अंग्रेजी में टंकित करेगा। फिर उसका कोई उसका अनुवाद हिन्दी में करेगा। हिन्दी ही नहीं, तमाम दूसरी भारतीय भाषाओं के हिस्से में अनुवाद के सिवा कुछ भी हासिल न हो सका। मूल काम अंग्रेजी में होगा अनुवाद भारतीय भाषाओं में होगा। भारतीय भाषाएं अनुवाद की ही भाषा बन कर रह गयी हैं। पर यह अनुवाद की भाषा कुछ इस प्रकार की होती है कि थोड़े बहुत अंग्रेजी साक्षर व्यक्ति को भी अनुवाद की हिन्दुस्तानी से आसान अंग्रेजी लगने लगती है। इस प्रकार शासन व्यवस्था का कामकाज आम आदमी के समझ के बाहर की बात हो जाती है। रही सही कसर संविधान की धारा 348 ने निकाल दी। अनुच्छेद 348 के अनुसार,

“उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा--(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद् विधि द्वारा उपबंध न करे तब तक--

(क) उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी,

(ख) (i) संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के,

(ii) संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेशों के, और

(iii) इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के, प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।”

(2) खंड(1) के उपखंड (क) में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगाः

परंतु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी।

(3) खंड (1) के उपखंड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान-मंडल ने, उस विधान-मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड के पैरा (iv) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहाँ उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।” (भारत के संविधान से साभार)

अब जरा रेखांकित हिस्से को गौर से पढ़े तो पाएंगे कि देश के संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार इस देश की वास्तविक अधिकारिक भाषा अंग्रेजी ही है। संसद की भाषा का वर्णन करने वाला अनुच्छेद 120 में साफ और स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि अनुच्छेद 348 के उपबंधो के अधिन रहते हुए संसद  में कार्य हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जाएगा।। इसी प्रकार विधानसभाओं की भाषा का वर्णन करने वाला अनुच्छेद 210 के अनुसार भी अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधानमंडल में कार्य राज्य की राज-भाषा या राजभाषाओं में या हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जाएगा। जबकि अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय की भाषा अंग्रेजी होगी। अतः अनुच्छेद 348 ही संसद विधानसभाओं एवं राज्य और केन्द्र की कार्यपलिका(पीएमओ एवं सीएमओ) की भाषा का निर्धारण करती है। कोई संविधान के अनुच्छेद 345 के अनुसार राज्य कामकाज की भाषा अपनी क्षेत्रीय भाषा बना भी ले, तो उसे धारा 210 के अनुरूप अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत करना ही पडेगा। इसी प्रकार केन्द्र सरकार हिन्दी में कामकाज करने के कितने भी बवंडर कर ले। हिन्दी में किए कामकाज को अंग्रेजी में अनुवादित करना ही पडेगा। धारा 348 के अनुसार अंग्रेजी अनुवाद को ही प्राधिकारिक दस्तावेज का दर्जा हासिल है। किसी भी वाद की स्थिति में प्राधिकारिक भाषा(अंग्रेजी) में छपी प्रति ही प्रयोग होगी। अतः संसद और देश की तमाम विधानसभाएं और केन्द्र एवं राज्य सरकारें अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज करें भी तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के मांगने पर अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत करना ही पडेगा। वही अनुवाद ही अधिकारिक रूप से मान्य होगा। व्यवहार में अनुच्छेद 348 का परिणाम यह निकला कि मूल कामकाज अंग्रेजी में होता है और जनता को बरगलाये रखने के लिए भारतीय भाषाओं में तो महज अनुवाद का ड्रामा होगा। अनुवाद के अनुरूप भारतीय भाषाओं का परिष्कृतिकरण किया जाता है। इसलिए ही गांधी जी द्वारा प्रतिपादित हिन्दुस्तानी के स्थान पर परिष्कृत हिन्दी को राजभाषा बनाया गया। यह राजभाषा हिन्दी भी आमजन की भाषा से काफी परे है। और हाथी के दिखाने वाले दांत के रूप में काम करती है। देखने में यह भ्रम पैदा होता है कि यह हिन्दी बैल्ट की भाषा है। पर हकीकत यह है कि राजभाषा हिन्दी महज अनुवाद हेतु विकसित परिष्कृत मानक हिन्दी है। महात्मा गांधी ने जिस बोलचाल की हिन्दुस्तानी की वकालत की वह आम बोलचाल की हिन्दी ही थी। उसमें भारत की तमाम भाषाओं के लिए स्थान हासिल  था। संविधान सभा में मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता हिन्दुस्तानी के पक्ष में खड़े थे। पर संविधान सभा में हुई लम्बी बहस के बाद उस हिन्दुस्तानी की संभावना को नकार दिया गया। हकीकत में अंग्रेजी को स्थापित करने का काम ही समाज से कटी इस राजभाषा ने किया है। जिसे लोग भ्रमवश होकर राष्ट्रभाषा समझ बैठते हैं। जहाँ हिन्दुस्तानी में हर क्षेत्र के लिए संभावना थी। पर इस मानक हिन्दी को कृत्रिम व्याकरण के नियमों से जकड़ा जमीनी भाषा से पूरी तरह से काट दिया है। इस काम में राजव्यवस्था को विश्वलिद्यालयी व्यवस्था का भी सहयोग हासिल होता है। संविधान का अनुच्छेद 120, 210, 343, 344, 345, 346, 351 अप्रत्यक्ष तौर पर और अनुच्छेद 348 प्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेजी के वर्चस्व को स्थापित करता है। संसद विधायिका और सरकारें जन दबाव में आ भी जाए, तो भी सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी में कामकाज के दबदबे को बनाए रखेगी। चूँकि देश की सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था एकीकृत है। सुप्रीम कोर्ट का संविधान द्वारा प्राप्त अंग्रेजी भाषा का भाषाई वर्चस्व सिर्फ़ न्यायव्यवस्था पर ही नहीं, अपितु संपूर्ण राजव्यवस्था, पूँजीव्यवस्था और समाजव्यवस्था पर लागू होता है। यह वर्चस्व सिर्फ़ भाषा का नहीं अपितु उस भाषा का प्रयोग कर सकने वाले ‘सामाजिक समूह’ का भी हो जाता है। राजसत्ता पर अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के माध्यम से मैकाले वंशज अर्थात् एलीट और उच्च मध्यम वर्ग के वर्चस्व को शेष समाज पर स्थापित करता जाता है। ये विशेषाधिकार उन्हें दूसरों से अलग कर देता है और उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनकी सत्ता को शेष समाज पर स्थापित करता है। जब सत्ता का संकेन्द्रण चंद हाथों में हो तो वे उसे वे इसे अपने फायदे के लिए इस्तमाल क्यों न करे?  अतः अपवादों को छोड दें तो, सत्ता के गलियारे में बैठा हर व्यक्ति मलाई मारने के लिए ही वहाँ है। और क्यों न हो? इंग्लिश उसे विशेषाधिकार देती है। आम आदमी से हट कर एक अलग पहचान देती है। अंग्रेजी भाषा देश में पावर और रूतबे का प्रतीक है। इंग्लिश सिस्टमसाँस्कृतिक जगत का भाग “कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा नहीं हो सकता है”। इंग्लिश सिस्टम का भाग बनने के लिए व्यक्ति का मैकालीकरण होने की शर्त अनिवार्य है। जब तक संपूर्ण साँस्कृतिक परवरिश ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ में न हो तब तक उस व्यक्ति की भाषा परिष्कृत अंग्रेजी नहीं हो सकती है।  कोर्ट में चलने वाली कार्यवाही आम आदमी की समझ के बाहर ही होती है। अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में अनुवादित कानून की पुस्तकों की भाषा इतनी क्लिष्ट होती है कि लगता है ये या तो गीता की तरह भगवान के पावन वचन हो या ये भी कुरान की आयतों की तरह, किसी और ही दुनियां से छप कर आयी हो। शायद कार्यवाही उनकी अपनी भाषा में होती तो वे खुद भी पैरवी कर सकते थे। पर चूँकि कार्यवाही की भाषा ही उनके समझ के बाहर है,  अतः वे मुकदमा लड़ने के नाम पर सिर्फ़ वकीलों को “भेट-अशर्फी” चढ़ाने के सिवा कुछ और नहीं कर सकते हैं। आम आदमी कोर्ट से बचना ही चाहता है। पर फंस जाए तो उसके पास वकीलों के सामने ब्लैंक पेपर (सादे कागज) पर हस्ताक्षर करने के सिवा कुछ भी शेष नहीं बचता है। क्योंकि शेष कार्यवाही उसके समझ के बाहर ही होती है। अब आप समझ ही सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की एक एक घंटे की फीस लाखों में क्यों होती है। एक लोअर कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील के अनुसार साधारण हिंदी मीडियम से पढ़ा-लिखा वकील तो लोअर कोर्ट में ही प्रेक्टिस कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने के लिए फ़्लूएंट इंग्लिश आनी चाहिए। जब तक इंग्लिश मजबूत न हो आप सुप्रीम कोर्ट में कदम नहीं रख सकते हो।भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद अंततः फ़्लूएंट इंग्लिश बोलने और लिख सकने वालों को ही विशेष ज्ञानी के रूप में स्थापित करता है। जब फ़्लूएंट इंग्लिशबोलने वाला व्यक्ति ही ज्ञानी है, औहदे वाला है, सत्तावान है तो वह भ्रष्ट क्यों न हो? अंग्रेजी के डर से डरे दुबके लोगों का वह शोषण क्यों न करे? गैर बराबरी को पैदा करने का काम समानता की बात करने वाला भारतीय संविधान करता है। सत्ता का चंद हाथों में केन्द्रण सिर्फ़ व्यक्ति नहीं संस्थाओं को भी भ्रष्ट बनाता है। सत्ता छोटे से फ़्लूएंट इंग्लिशबोलने वाले वर्ग के पास है। जो मुश्किल से 50 लाख की आबादी भी पार नहीं कर पाता होगा। (शायद 50 लाख कुछ ज्यादा ही लिखा गया है।) इस वर्ग को फ़्लूएंट इंग्लिशकी सत्ता भ्रष्ट आचरण और शोषण को बनाए रखने का पूरा-पूरा अधिकार देती है। अपवाद होते हैं। पर उन अपवादों के सहारे सिस्टम नहीं चलता है। अतः इंग्लिश मीडियम सिस्टम को तोड़े बिना भ्रष्टाचार, शोषण और गैरबराबरी के सिस्टम को तोड़ा नहीं जा सकता है। इंग्लिश की दीवार सत्ताधारी वर्ग की गतिविधियों पर पर्दा डालने का ही काम करती है। अतः भ्रष्टाचार और इंग्लिश मीडियम सिस्टम में चोली-दामन का संबंध है।

यह इंग्लिश मीडियम सिस्टम गैर बराबरी को भी पुख्ता करता जाता है। जैसा कि निम्नस्तर के माने जाने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूल के प्राचार्यों ने भी इस बात की पुष्टि की, कि उनके स्कूलों में तेजी से ग्रामीण इलाकों तथा निम्न एवं निम्न माध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों का दाखिला करा रहे हैं। वही दिल्ली के स्लम के बच्चों को एलीट क्लास जैसी शिक्षा देने की प्रतिबद्धता के साथ खुले गुड स्मार्टन इंग्लिश मीडियम स्कूल में नवीं कक्षा के बाद फेल होने वाले विद्यार्थियों में अधिकतर विद्यार्थी स्लम के ही हैं। जी हाँ! ग्रामीण, कस्बाई, निम्न मध्यमवर्गी विद्यार्थी में अधिकतर विद्यार्थियों को “सिर्फ़ स्कूल नहीं खतरा शिक्षा व्यवस्था” सिस्टम से आउट कर देती है। जहाँ प्रतिष्ठित अथवा हाई-फाईकहलाने वाले निजी स्कूल में वे ही माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न हो। वही मध्य स्तर के निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों ने निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों को समेट रखा है। इस प्रकार जितने वर्ग उतने ही प्रकार के स्कूल अर्थात् हर वर्ग की अपनी आर्थिक हैसियत के हिसाब से स्कूल। जब स्कूल वालों से पूछा कि जब शिक्षा शास्त्र के सभी सिद्धान्त परिवेश की भाषा की वकालत करते हैं तो आप अपने स्कूलों मे परिवेश की क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं। इस पर उनका सीधा सा जबाब था, “स्कूल में ताला लगवा दें क्या?” जब शासन-प्रशासन, न्याय, उच्च शिक्षा व्यवस्था, पूँजीव्यवस्था सब तरफ़ अंग्रेजी भाषा स्थापित रहेगी तो ऐसी स्थिति में स्कूली व्यवस्था परिवेश की बोली-भाषा में कैसे चल सकती है। स्कूलों का अंग्रेजी माध्यमीकरण व्यवस्था न भी करे तो लोग कर देंगे। ऐसा ही एक वाद 1993 से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जिसमें कर्नाटक की सरकार चाहती है कि निजी स्कूलों में भी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा अर्थात् परिवेश की भाषा में हो। सरकार संविधान की धारा 350A का हवाला भी देती है। जबकि निजी स्कूल एसोसिएशन चाहता है कि उन्हें इंग्लिश मीडियम में स्कूलों को चलाने की इजाज़त दी जाए। उसके अनुसार यह लोगों का अधिकार हो, वे तय कर सके कि उनके बच्चे किस भाषा माध्यम में अध्ययन करे। वे मौलिक अधिकारों का हवाला देते हैं। निजी क्षेत्र बिना लाभ की संभावना के कोई कदम नहीं उठाता है। इस स्कूलिंग बिजनेस में मांग के विश्लेषण के पश्चात् ही वह कूदता है। निजी स्कूलों की पूरी मांग इंग्लिश मीडियम की बैसाखी पर टिकी है। अर्थात् इस वाकिये से भी स्पष्ट हो जाता है कि इंग्लिश का क्रेज किस तरह लोगों पर हावी है। पर सच्चाई एक और भी है जो हमनें शैक्षिक विश्लेषण के दौरान पाया कि भाषा सीखने के लिए परिवेश की आवश्यकता होती है। सिर्फ़ स्कूल की बदौलत भाषा नहीं सीखी जा सकती है। आर्थिक रूप से संपन्न माता-पिता किसी तरह अपने धन के बल पर बेशक कृत्रिम परिवेश उपलब्ध करवा सकते हो। पर गरीब व्यक्ति झूठी उम्मीद ही ढ़ोता रहता है। इस विशेष माध्यमी व्यवस्था में अधिकतर ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र और निम्न एवं निम्न मध्यम वर्ग के विद्यार्थी ढ़ेर ही होते हैं। यह इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था सिर्फ़ ऊपर के तबके को ही मौका देती है। उच्च शिक्षा तक सिर्फ़ उच्च वर्ग की ही पकड़ रहती है। और वही फिर उच्च माने जाने वाले औहदों तक पहुँच पाती है। एक ऐसा वर्ग सिस्टम के शीर्ष पर सवार होता है जिसकी परवरिश परिवेश से काट कर की गयी है। वह आम स्कूलों में नहीं पढ़ा वह खास स्कूलों में पढ़ा है। वह सरकारी स्कूल के बच्चों की तरह बस के पायदानों पर सफर कर स्कूल नहीं पहुँचा, वह तो ए.सी बसों में सफर कर के वहाँ तक पहुँचा है। ऐसी बसें, जिसमें बैठने के बाद न तो बाहर धूप गर्मी ही अंदर आ सकती है न ही दबे कुचले लोगों की चीख-पुकार। यदि हमारा एजुकेशन सिस्टम (शिक्षा व्यवस्था) सिर्फ़ ऐसे लोगों को मौका देता जो जमीनी हकीकतों से कटे रहे हैं। और जब ये जमीनी हकीकतों से कटे लोग सर्वोच्च सत्ता सिस्टम पर सवार होते हैं, तो उस सिस्टम की नीतियाँ दबे कुचले लोगों के उद्धार के लिए कैसे बन सकती है? उनके सारे कामकाज अपने इंग्लिश मीडियम सिस्टम को बचाए रखने के लिए होंगे। चलिए जरा हम फिर से संवैधानिक संदर्भों को लेते हैं।

 

संविधान के अनुच्छेद 126, 127, 223, 224, 233 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति का वर्णन है। अनुच्छेद 16 के अनुसार इन नियुक्तियाँ पर अवसर की समानता का सिद्धान्त भी लागू होता है। नियुक्तियाँ भी राजनैतिक आधार पर नहीं शैक्षिक और अनुभव के आधार पर की जाती है। हर भारतीय नागरिक को, जिसे कानून का ज्ञान है और पर्याप्त अनुभव रखता है, वह इन पदों तक पहुँच सकता है। अतः इन पदों तक पहुँचने का समान अवसर दिया जाता है। परन्तु अब संविधान की धारा 348 को नियुक्तियों से जोड़ते है। इस धारा के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की अधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। तो बिना अंग्रेजी भाषा में पारंगत व्यक्ति, चाहे उसे कानून का कितना भी ज्ञान हो, क्या इन पदों तक पहुँच सकता है? संविधान की धारा 120 और 210 में तो साफ कहा गया है कि संविधान की धारा 348 के अनुरूप ही संसद एवं विधानसभाएं कानून बनाए। अर्थात संविधान की धारा 348 सर्वोपरि है। ...अर्थात अंग्रेजी सर्वोपरि है । ..अर्थात अंग्रेजी बोलने वाले सर्वोपरि है।


......................................................................................................................................यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। अंग्रेजी की अनिवार्यता निम्न, निम्न मध्यमवर्गीय, गरीब-ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े व्यक्ति को सिस्टम से आउट करती है। इस परिवेश का व्यक्ति कभी ख्वाब में भी ऐसे सर्वोच्च पदों की कल्पना नहीं कर सकता है। अंग्रेजी का उपबंध गैर अंग्रेजी भाषी को सर्वोच्च न्यायालय से बाहर करता है और अपने सिस्टम को ऊपर के 5% अंग्रेजी भाषी लोगों के लिए खोलता है। जब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की व्यवस्था अंग्रेजी केन्द्रित है तो कानून की शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ संस्थान आम लोगों की भाषा में कानून की पढ़ाई कैसे करवा सकते हैं। “छुट भैया कॉलेज” बेशक क्षेत्रीय माध्यमों में चलते हो पर कानून की शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ संस्थान इंग्लिश मीडियम ही है। यही हाल समस्त सिस्टम का है। मेडिकल की पढ़ाई इंग्लिश मीडियम में होने से डॉक्टरी की शिक्षा अंग्रेजी भाषी मध्यम वर्ग तक सिमटती है। यूपीएससी ने सिविल सर्विस की परीक्षा के तरीके को बदलकर हिन्दी माध्यम तथा क्षेत्रीय माध्यमों से आने वाले अभ्यार्थियों के लिए एक झटके में दरवाजा खोल दिया है। स्वतंत्रता के बाद भी ये परीक्षाएं अब तक अंग्रेजी में ही ली जाती थी। यूपीएससी की अधिकतर परीक्षाएं अंग्रेजी में ही होती है। पर लम्बे आन्दोलनों के बाद सिविल सर्विस की परीक्षा को हिन्दुस्तानी  माध्यम  से लेने की व्यवस्था की गयी। यूपीएससी सिविल सेवा के प्रश्न-पत्र को सभी हिन्दुस्तानी भाषाओं में तो नहीं, पर मानक अनुवाद की हिन्दी के लिए दरवाजा खोलने को विवश हुआ। नतीजा क्या निकला? सिविल सेवा में तेजी से हिन्दी बैल्ट के ग्रामीण परिवेश के अभ्यार्थियों का प्रवेश बढ़ा। सोचिए यदि तमाम भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए ये दरवाजे खुल जाते तो क्या होता?!! हिन्दी माध्यम से बढ़ता परिवेश इंग्लिश मीडियम सिस्टम के लिए चिन्ता का कारण थी। इसको रोकने के लिए यूपीएससी को कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। सिर्फ़ 15 अंक का अंग्रेजी के प्रश्न प्रश्नपत्र डाले। अभ्यार्थियों का इसके आगे कहना है कि प्रश्नों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद भी ढ़ंग से नहीं होता है। वह कुछ इस प्रकार का गूगल अनुवाद होता है कि उस अनुवाद से आसान अंग्रेजी में छपा भाग ही लगता है। भ्रम की स्थिति में अंग्रेजी में छपे प्रश्न को ही ठीक माना जाता है। अभ्यार्थियों का आगे कहना है कि सिविल सेवा अभिवृति परीक्षा(CSAT) के नाम पर जो नयी व्यवस्था IIM-CAT की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को ध्यान में रख कर की गयी है। IIM-CAT में पहले ही इंग्लिश माध्यम वाले उच्च मध्यमवर्गी विद्यार्थियों का ही दबदबा रहा है। इंग्लिश मीडियम सिस्टम आरक्षण की ऐसी व्यवस्था है जो साधन संपन्न लोगों को तो अधिक अवसर उपलब्ध कराती है और साधनहींन को सिस्टम से बाहर करती जाती है। इस प्रकार सत्ता को चंद हाथों अर्थात् एक छोटे से वर्ग तक ही समेटे रखती है। अतः इस वाकये से भी स्पष्ट होता कि इंग्लिश मीडियम सिस्टम गैर बराबरी ओर भ्रष्टाचार शोषण का वाहक है।

आइए, इंग्लिश मीडियम सिस्टम और शोषण की व्यवस्था की व्यवस्था के संबंध को देखें। चलिए विचार करते हैं। शोध के दौरान एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा, “जब काम के दौरान हमें अंग्रेजी की कोई खास ज़रूरत नहीं पडती, तो ये कम्पनी वाले इंटरव्यू में अंग्रेजी पर इतना जोर क्यों देते है। Introduce yourself.  यहां तक की अपना परिचय भी अंग्रेजी में रटना पडता है।” यह तो महज एक वाकया है। कम्पनी का मालिक खुद अंग्रेजी में पारंगत हो या न हो। काम के दौरान कही अंग्रेजी ज़रूरत पड़ती हो या न हो। पर उसकी कोशिश रहेगी कि कम्पनी में नौकरी की अभिलाषा से आने वाले नवागंतुकों को अंग्रेजी के तराजू पर ही तौला जाए। समान काम के लिए एक व्यक्ति जो अंग्रेजी जानता है उसको अधिक और जो अंग्रेजी कम जानता अथवा नहीं जानता है उसको कम तनख्वाह मिलती है। निजी स्कूलों में तो यह आलम है कि अंग्रेजी के शिक्षक को संस्कृत, हिन्दी के शिक्षक से अधिक वेतन पाता है। स्कूल के सभी महत्वपूर्ण पदों पर उसको ही रखा जाता है। खैर ये तो हुई स्कूलों की बात, शायद व्यवस्था के अनुरूप स्कूलों का मार्केटिंग स्टैंड रहा हो। पर जैसा कि हम देखते है कि इंग्लिश मीडियम औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की वजह से समाज का एक बड़ा तबका शिक्षा व्यवस्था से बाहर होते जाता है। ये देश की कुल आबादी का 85-90% के बराबर है। चूँकि इस बड़े तबके को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है अतः वह देश की मुख्य धारा से भी कटा हुआ है। अब आप सोचिए, इस देश की 90% के लगभग आबादी मार्जिनलाईज़्ड है अर्थात् हाशिए पर है। जिसके लिए इस देश के कानून कोई अर्थ नहीं रखते, नीतियाँ कोई मायने नहीं रखती। हर कोई अपने-अपने हिसाब से चपत लगाता जाता है। पुलिस और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पड जाए, तो पुलिस और वकील मिलकर ही उसके कपड़े उतार देते हैं। क्योंकि अंग्रेजी भाषा में लिखा कानून उसकी समझ के बाहर का विषय है। और संस्कृतनिष्ट और फारसीनिष्ट जो अनुवाद है, वह उसके आम बोलचाल की भाषा से कही मैच नहीं खाता है। ले देकर उस व्यक्ति के पास पुलिस और वकील के सामने कोरे काग़ज पर हस्ताक्षर करने के सिवा कुछ शेष नहीं बचता। तथ्यरी कानून, तथ्यरी मजदूरों की समझ से बाहर है। न ही घरेलू मजदूरों को ही अपने अधिकारों का ज्ञान  है। वह तो हमेशा डरा सहमा रहता है कि वह किसी लफड़े में न फंस जाए। और ऐसी स्थिति में उसे कण्ट्रोल अर्थात् नियंत्रित करना बड़ा ही आसान है। कम्पनियों के मालिक वर्ग मनचाही शर्तें मजदूर वर्ग पर थोपता रहता है और मजदूर ज्ञान के अभाव में चुपचाप उसे मानता रहता है। फरीदाबाद में मजदूरों के बीच काम करने वाले एक मजदूर संगठन की मांग है कि श्रम कानूनों को तथ्यरियों में लागू करो। बड़ी अटपटी सी मांग लगती है। देश का श्रम कानून ही इस देश की फैक्ट्रियों में लागू नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र बड़े धडल्ले से कानून की परवाह किए बिना इस देश की जीडीपी को बढ़ाने में लगा हुआ है। इससे बड़ा मजाक इस देश की कानून व्यवस्था का क्या होगा। अब आप कहेंगे कि इसका इंग्लिश मीडियम व्यवस्था के साथ क्या संबंध है। चूँकि मजदूर वर्ग के विद्यार्थी अंग्रेजी के बैरिगेटर को पार कर नहीं पाते। वे अंग्रेजी की पहली दहलीज पर ही लुढ़क जाते हैं।  जो इंग्लिश मीडियम कल्चर के उच्च एवं मध्यमवर्गीय लोग अंग्रेजी के बैरिगेटर को पार कर के ऐसी संस्थाओं मे पहुंचते हैं जिनकी जिम्मेदारी कानूनों को बनवाने और लागू करवाने की होती है, वे मजदूरों के प्रति  संवेदनशील नहीं होते हैं। कानून बनवाने वाले नेता बेशक वोट गरीब, मजदूर, किसानों से लेते हों पर उनकी खुद की उठ-बैठ पूँजीपति वर्ग के साथ ही है। ठीक उसी प्रकार जिस अफसर को श्रम कानून को लागू कराने की जिम्मेदारी होती है। उसका मजदूर वर्ग से कोई सरोकार नहीं होता। वह भी अपने कैरियर ग्राफ को उठाने के लिए मजदूरों से ज्यादा तथ्यरी मालिकों से सरोकार रखता है। मजदूर जिसकी समज से कानून भी बाहर होता है और कानून को लागू करवाने वाले भी। अंग्रेजी के ज्ञान से अनभिज्ञ मजदूर आँख मुंदकर यूनियनों पर भरोसा करता है। और मजदूर यूनियन वाले भी मजदूरों की अज्ञानता से फायदा उठाने से नहीं चूकते हैं। वे हक की लड़ाई तो मजदूरों की लड़ते है, लेकिन बाद में वे तथ्यरी मालिकों से मिल जाते हैं। यूनियनों की स्थिति तो ये हो गयी है कि अधिकतर यूनियन मालिकों के ऐजेंट के रूप में तब्दील हो चुकी हैं। सीधी सी बात है, ज्ञान के अभाव का हर एक फायदा उठाता है और जब तक ज्ञान परिष्कृत भाषा में उपलब्ध रहेगा, समाज का एक बड़ा वर्ग अज्ञानता के अंधेरे में रहेगा। इंग्लिश मीडियम सिस्टम ज्ञान को एक सीमित वर्ग तक ही रखने का काम करता है। ज्ञान का संस्कृतनिष्टकरण एवं फारसीनिष्टकरण बची-खुची संभावना को खत्म कर देती है। अज्ञानता के अंधेरे में डूबे समाज का शोषण आसान है। अतः इंटरव्यू के दौरान जब इंटरव्यू लेने वाला अभ्यार्थी को Introduce yourself कहता है और आपसे अपेक्षा रखता है कि आप अपना परिचय अंग्रेजी में ही दे तो वह शोषण के तंत्र को आरोपिक कर रहा होता है। उसे मालूम है कि अंग्रेजी उसके शोषण के तंत्र को चिरस्थाई बनाए रख सकती है। इंग्लिश मीडियम सिस्टम का जमा पानी भ्रष्टाचार की सड़ांध पैदा करता है अपितु गैर बराबरी की दीवार को मजबूत करते जाता है। इंग्लिश मीडियम की बदौलत पैदा भ्रष्टाचार और गैरबराबरी शोषण तंत्र को स्थायित्व प्रदान करने का काम करती है। अतः इंग्लिश मीडियम सिस्टम भ्रष्टाचार, गैरबराबरी को पुख्ता करने की व्यवस्था है।

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हिन्दी विरोधी आन्दोलन : उठाते कुछ जायज सवाल

दक्षिण भारत के बहुत से संगठन आज भी हिन्दी थोपे जाने का विरोध कर रहे है । कारण स्पष्ट है हिन्दी उत्तर भारतीयों के वर्चस्व का भय पैदा करती है । जब बैलजीयम, स्वीटजरलैंड जैसे छोटे-छोटे देश एक से ज्यादा भाषाओं में एक साथ में एक साथ काम कर सकते है । तो भारत के साथ समस्या क्या है? कही संविधान की धारा 343(1) अंग्रेजों की फुट डालों और राज करों नीति को ही तो वढ़ावा नही दे रही है? आइये विचारते है!!  

भारत को आर्थिक एवं तकनिकी सहायता प्रदान करने वाले इस्राइल, जापान, डेनमार्क, स्वीडन, बैलजियम जैसे छोटे- छोटे देशों का सम्पूर्ण शिक्षा तंत्र एवं राज व्यवस्था अपनी-अपनी भाषाओं में ही संचालित होती है । बैलजियम जैसा छोटे से देश का संचालन तीन भाषाओं में होता है । बैलजियम में भाषायी भेदभाव को खतम करने हेतू वहाँ के लोगों ने सरकार का एक और स्तर बनाया है । वह है सांस्कृतिक सरकार का । इस सांस्कृति सरकार में 1% के जर्मन भाषी लोगों को भी शिक्षा और प्रशासन की वे ही सुविधाएं प्राप्त है जो 60% के स्पैनिश को । सांस्कृतिक सरकार यह सुनिश्चित करती है कि सभी भाषा-भाषियों को उनके उनके सांस्कृतिक पृष्टभूमि के अनुरूप विकास के अवसर मिले । बैलजियम की इस प्रतिबधता को देखते हुए ही यूरोपीय युनियन ने उसकी राजधानी बेरूसला को युरोपीय युनियन की राजधानी बनाया है । युरोपीय युनीयन का लक्ष्य यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका की तर्ज पर यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ यूरोप को विकसित करना है । इसलिए युरोपीय युनियन ने अभी जनसंपर्क हेतू युरोप की 24 भाषाओं को मान्यता भी दी है । भविष्य में और भी भाषा-बोलियों को मान्यता देने की संभावना है । फ्रांस के तो कहने ही क्या? फ्रांसीसी क्रांति के बाद जो समता, समानता, बन्धुत्व, साम्प्रदाय निरपेक्षता, मानव अधिकारवाद के मूल्यों की जो नींव रखी वह भाषायी समता में भी देखने को मिलती है । फ्रांस मे आंचलिक क्षेत्र की बोली-भाषा को भी उतना ही महत्व प्राप्त है जितना की पेरिस में बोले जाने वाली फ्रेंच को । 1917 की साम्यवादी क्रांति के बाद 5 करोड़ की आबादी वाले भूतपूर्व सोवियत संघ ने संघ की 52 भाषाओं को शिक्षा और शासन-प्रशासन का माध्यम बनाया था । पूरे विश्व में इंग्लिश का प्रचार प्रसार करने वाले यूनाइटेड किंगडम-ब्रिटेन अपने देश के आंचलिए क्षेत्रों एवं स्कौटलैंड, आयरलैण्ड को अपने अपने साथ बनाएं रखने के लिए वहाँ की स्थानीय बोली-भाषाओं को मान्यता देनी पड़ती है। क्वीन इंग्लिश का दबदबा अपने देश में ही नहीं चल पाता । जपान, जर्मनी. इस्रायल, स्वीडन में जब विज्ञान, मेडिकल, इंजिन्यरिंग सभी विषयों की शिक्षा एवं प्रशासनिक सेवा उनके देश में बोले जाने वाली सभी भाषाओं में उपलब्ध कराती है, तो भारत की दिक्कत क्या है ? जब ये सभी देश दूनिया में किसी भी भाषा में छपे दस्तावेज का अनुवाद स्व भाषा में कर कर अपने देशवासियों को उपलब्ध करा सकते है । तो भारत के साथ समस्या क्यों है ? तो भारत में दुनिया के किसी भी हिस्सें का ज्ञान वाया लंदन एवं वाशिंगटन की खिड़की से ही क्यों आता है ? क्या आपकों नहीं लगता इस तरह भारत में विश्व भाषा के रूप में प्रचारित अंग्रेजी ने हमें शेष विश्व ज्ञान कोष से काट दिया है ? शेष विश्व का वह ही ज्ञान भारत आ सकता है जिसे इंग्लिश बोलने वाले साढ़े चार देश ज्ञान मानते हो । दूसरा मूल भाषा से अंग्रेजी मे अनुवाद के दौरान यदि त्रुटी हो जाए तो वह वैसे ही आगे बढ़ेगी।

दो स्तरिये है - भेद भाव

जैसे ही मानक-हिन्दी और अंग्रेजी में से किसी एक के चुनाव की बात आती है । दक्षिण के राज्य तथाकथित-विश्वभाषा-अंग्रेजी के साथ खड़े हो जाते है । ऐसा क्यों ?

1.   पहला कारण तो यह है कि व्यवस्था ने हिन्दी और इंग्लिश में से एक को चुनने का अधिकार दिया है । न कि उस राज्य की क्षेत्रिएं भाषा/भाषाओं और अंग्रेजी के बीच चुनाव का मौका दिया है ।

2.   हिन्दी का राजभाषा होना, हिन्दी भाषी राज्यों के वर्चस्व का स्वभाविक एवं जायज भय पैदा करता है ।

3.   अंग्रेजी एक रूप में दोनों क्षेत्र के लोगों को एक करती है । वह है –

                                         I.            अंग्रेजी बीना किसी भेद-भाव के दोनों क्षेत्र गैर एलिट वर्ग को पंगु बनाती है । और अज्ञानता तो कायम रख ज्ञान के स्तर पर लगभग एक पायदान पर ला खड़ा करती है ।

                                      II.            दोनों क्षेत्र के एलिट वर्ग को अंग्रेजी एक करती है । एलिट चाहे उत्तर का हो या दक्षिण का, अंग्रेजी दोनों क्षेत्र के एलिट वर्ग की सत्ता का संरक्षण करती है ।

अब चुकीं आन्दोलनों का नेतृत्व मुख्यतः एलिट वर्ग के हाथों में रहा है अतः अंग्रेजी की गूंज तो सुनाई देती है और इस बीच क्षेत्रिएं भाषाओं का मर्म कही दबा दिया जाता है । पर सच्चाई यह ही है, गैर-हिन्दी भाषी राज्यों के लोग दो स्तर पर भेद भाव के शिकार है । एक अंग्रेजी की वजह से और दूसरा तथाकतित-मानक-राजभाषा-मानक-हिन्दी की वजह से । अंग्रेजी की मार से गैर हिन्दी भाषी राज्यों के लोग तथाकथित हिन्दी भाषी राज्य के लोगों से कम पीड़ित नहीं है । यह बात अध्याय 14 (इंग्लिश मीडियम शिक्षा और आत्महत्या’) में दिये गये प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया जा चुका है । अंग्रेजी माध्यम की वजह से होने वाली आत्महत्याओं के मामले तमिलनाडु से अधिक इसलिए है क्योंकि इन राज्यों के ग्रामीण-कस्बाई-दलित-निम्नमध्यमवर्गीय-  विद्यार्थियों पर अंग्रेजी में माहारत हासिल करने का राजनीतिक दबाव भी है । अतः हिन्दी का भय अंग्रेजी को कायम रखे हुए है ।

स्वभाविक प्रश्न है-

Ø    राजभाषा हिन्दी ही क्यों???

Ø    क्या तमिल, तेलगू, मलयालम, बंग्ला, पंजाबी, बाहर  से आयी है ?????

"Hindi is as much foreign to non-Hindi speaking people as English [is] to the protagonists of Hindi"

यह उक्ति 8 मार्च 1958 को हुए अखिल भारतीय भाषा सम्मेलन में कही गयी। जो गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के थोपे जाने के भय को दर्शाती है । इसके बाद का प्रयास यह होना चाहिए था कि संविधान की धारा 343(1) में संशोधन कर भारत की तमाम भाषाओं को समान दर्जा दिया जाता । उच्च शिक्षा और शासन में भारत की सभी भाषाएं शामिल होती । पर हुआ उसका उलटा । चुकीं नैतृत्व एलिट वर्ग के हाथ में था, अतः माँग अंग्रेजी के पक्ष मे आयी । ..और इसका परिमाम यह निकला कि 1963 के राज भाषा कानून के तहत अंग्रेजी को ठीक उसी प्रकार 1965 के बाद लागू रखा गया जिस प्रकार 1947 से पूर्व लागू थी । 14(अब 22 है।) प्रमुख भाषाओं को सांस्कृतिक, शिक्षा एवं राज्यों की राज भाषा के लिए मान्य माना गया, पर  संघ की भाषा नाम के लिए हिन्दी और व्यवहार के लिए अंग्रेजी ही रही । 1968 राज भाषा संकल्पना के अनुसार

            (क)  कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्त्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों जैसी कि स्थिति हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाए, संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यत होगा; और

            (ख)  कि परीक्षाओं की भावी योजना, प्रक्रिया संबंधी पहलुओं एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केन्द्रीय  सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी ।

 

वो कौन सी सेवाएं है जो सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में ही संभव है ? ..और क्यों ? स्पष्ट नहीं है । सचाई तो यही है की युपीएससी की अमुमन सभी परीक्षाएं एवं साक्षत्कार अंग्रेजी में ही होती है । स्वतंत्रता के 32 वर्षों बाद 1979 में लम्बे संघर्ष के बाद ही कही जाकर युपीएससी ने सिर्फ सिवील सेवा की परीक्षा के लिए भारतीय भाषाओं के नाम पर हिन्दी के लिए दरवाजें खोले । प्रश्नपत्र मुलतः अंग्रेजी में छपेगा, हिन्दी में उसका कृत्रिम अनुवाद भर होगा और तमिल, तेलगु, मलयालम, पंजाबी, बंग्ला, असमीया आदि माध्यम के अभ्यार्थी अंग्रेजी और हिन्दी में छपे प्रश्नपत्रों को पढ़ कर यदि समझ पाये तो तमिल, तेलगु, मलयालम, पंजाबी, बंग्ला, असमीया आदि में जबाब देगे । दबाव किस क्षेत्र के लोगों पर ज्यादा है ? आर्थिक सेवा, वन सेवा, इंजिनियरिंग सेवा, चकित्सा सेवा, की परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकती है । संतोषजनक निष्पादनहेतु अंग्रेजी की अनिवार्यता के आधार पर यदि भारतीय भाषा माध्यम से पढ़े लोग आर्थिक नीति बनाएगें तो, क्या आर्थिक विकास ही रूक जाएगा ? संतोषजनक निष्पादन के आधार पर ही यदि पूछा जाए कि भारतीय भाषा माध्यम में चकित्सा सेवा की पढ़ायी होगी तो क्या देश में महामारी फैल जाएगी? तमिल, तेलगू, मलयालम, बंग्ला, माध्यम से पढ़े इंजिनियर ने रेलवे का पुल बना दिया तो निश्चित तौर पर वह ढ़ह जाएगा । संतोषजनक निष्पादन के आधार पर देखे तो भारतीय भाषा माध्यम के लोग रक्षा सेवा में चले गये तो भारतीय सेना का नेतृत्व निष्क्रिय हो जाएगा । (नोट- अब से कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय रक्षा सेवा के लिए ली जाने वाली एनडीए एवं सीडीएस की परीक्षाएं सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में होती थी । अब भारतीय भाषा के नाम पर हिन्दी के लिए दरवाजे खोल पर अंग्रेजी की अनिवार्यता के साथ । एसएसबी का साक्षत्कार अंग्रेजी में बोलने वाला ही पास कर पाएगा)

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चलिए इस भेद भाव को समझने के लिए हम जन-जन का विश्वविद्यालय कहलाने वाले इग्नू() की वेबसाइट खोलते है । वेबसाइट देखने मात्र से जो बात स्पष्ट होती है वह यह कि इस तमिल, तेलगु, पंजाबी, बंगाली, संथाली, असमीया जन की वेबसाइट दो ही भाषाओं में है । एक अंग्रेजी और दूसरा हिन्दी । अब जरा दोनों भाषाओं की साइट को गौर से देखे ।आप पाएगें की जितने भी महत्वपूर्ण घोषणओं, सूचनाओं, एवं समाचारों  लिंक है वे सिर्फ अंग्रेजी में है । अब सवाल उठता है कि फिर हिन्दी की वेबसाइट किस लिए है? जी जनाब ! हाथी के खाने वाले दातों से दिखाने वाले दातों की कीमत ज्यादा होती है?

अब जरा इग्नू के कोर्स को देखे – इग्नू के कोर्स अंग्रेजी और हिन्दी को छोड किसी दूसरी भारतीय भाषा में उपलब्ध ही नहीं है । और हिन्दी और अंग्रेजी की तुलना करे तो तमाम महत्वपूर्ण कोर्स सिर्फ अंग्रेजी में ही उपलब्ध है । एम.एड, एम.ए शिक्षा शास्त्र का स्वअध्ययन सामग्री सिर्फ अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। जब आपति उठाई गयी तो सिर्फ हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों को हिन्दी में लिखने की छुट दी गयी । हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों से उम्मीद की जाती है कि वे अंग्रेजी मे समझें और हिन्दी में जबाब लिखे । शायद बडे आन्दोलनों के बाद ही हमारी राजव्यवस्था के कान पर जू रेंगे कि इस देश में हिन्दी के अलावा तमिल, तेलगु, पंजाबी, बंगाली, संथाली, असमीया, उडीया, नागा भाषी लोग भी रहते है, वे भी अंग्रेजी से पीडित है और हिन्दी से भयभीत । हिन्दी का भय दिखा कर ये व्यवस्था अंग्रेजी को चीरस्थायी बनाए हुए है । 

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