अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के प्रति झुकाव
विचारणीय मुद्दा –
इस अध्याय में हम उन सामाजिक,
साँस्कृतिक कारकों की खोज करेंगे, जिनकी वजह से जन-सामान्य का झुकाव एकाएक अंग्रेजी
माध्यम स्कूलों के प्रति तेजी से बढ़ा है।
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हमने अब तक के विश्लेषण में पाया कि
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में निम्न मध्यम-वर्गीय एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे
रचनात्मक एवं विवेचनात्मक रूप से कुछ भी सीख नहीं पा रहे हैं। यह बात न केवल
माता-पिता को पता है अपितु बच्चे भी जानते है। एक बच्चे के शब्दों में, “हमें अपनी भाषा में समझाया जाता तो कोई भी विषय बेहतर तरीके से समझ आ जाता, पर इंग्लिश में पढ़ाने की वजह से हम सिर्फ़ रटते हैं। जो रटते हैं, वही एग्ज़ाम में लिख कर आ जाते
हैं।”
एक अभिभावक के शब्दों में कहें तो. “मेरे बच्चे हरियाणा बोर्ड (हिन्दी मीडियम) में अच्छे पढ़ रहे थे। पर जब से
सीबीएसई (इंग्लिश मीडियम) स्कूल में डाला है तब से दिक्कत है। हमें ये सीबीएसई
वाली पढ़ाई तो समझ में आती नहीं है। स्कूल वाला कहता है, ट्यूशन वाला नहीं पढ़ाता, ट्यूशन वाला कहता है स्कूल वाला नहीं पढ़ाता। माँ-बाप तो पैसे ही खर्च कर
सकते हैं। बाकी बालकों की अपनी किस्मत है।” इन दो उक्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि
माता-पिता और बच्चों दोनों को मालूम है कि ये अंग्रेजी माध्यम वाली पढ़ाई उनकी समझ के बाहर की है। फिर भी
दाँव लगाने को तैयार हैं। ये अंग्रेजी माध्यम शुद्ध जुआ है। इसमें हारने की
संभावना अधिक और जीतने की संभावना नग्णय ही है। पर फिर भी लोग अंग्रेजी का दाँव
खेल रहे हैं। इससे पहले के खण्ड में हमने शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोण से समस्या का
विश्लेषण किया था। इस खण्ड में हम समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से समस्या के कारकों
का विवेचन करेंगे। अब हम उन सामाजिक, आर्थिक और
साँस्कृतिक कारकों को तलाशने का प्रयास करेंगे, जो
समस्या के लिये जिम्मेदार हैं।
शोध प्रक्रिया के दौरान, अंग्रेजी
माध्यम स्कूलों में दाखिले को प्रेरित
करने वाले अग्रलिखित कारक उभर कर आए हैं। ये वो कारक हैं जिनकी वजह से अंग्रेजी
माध्यम का जुआ खेला जाता है। स्कूल
व्यक्ति की आर्थिक हैसियत का सूचक है।
Ø
औपचारिक शिक्षा को लेकर माता-पिता, बड़े भाई-बहन, आस-पड़ोस वालों के अपने व्यक्तिगत
अनुभव।
Ø
बच्चे के भविष्य की दिशा स्कूल ही तय करता है।
Ø
स्कूल,
बच्चे की भाषा के शुद्धिकरण का साधन है।
Ø
स्कूल संस्कृतिकरण का साधन है।
स्कूल व्यक्ति की आर्थिक हैसियत का सूचक है।
नर्सरी कक्षाओं में ही निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दाखिले के लिए मची मार-काट इस बात
की गवाह है कि व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, अधिकांश का सपना अपने बच्चों को अंग्रेजी
माध्यम के निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाना ही है। स्कूल के मामले में उसकी एक
‘चॉइस’ (पसंद) है, वह है अंग्रेजी माध्यम
स्कूल। आज उच्चवर्ग तथा उच्च मध्यम-वर्ग का शायद ही कोई विरला व्यक्ति होगा, जो अपने
बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला करवाता हो। तमिलनाडू राज्य के एक आईएएस अधिकारी
ने जब अपने बच्चे का दाखिला सरकारी स्कूल में करवाया तो यह खब़र मीडिया में चर्चा
का विषय बनी। शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने भी इस पर फ्रंट लाइन जैसी
प्रतिष्ठित पत्रिका में आलेख भी लिखा। उन्होंने लेख के माध्यम से कॉमन स्कूल
सिस्टम के मुद्दे को फिर से उछालने का
प्रयास किया। पर 1960 के दशक में कोठारी आयोग की रिपोर्ट में दी गयी कॉमन स्कूल
की संकल्पना खुद सरकार की ही
कारगुज़ारी की वजह से किस प्रकार विलुप्त हुई, यह अलग-से विचारणीय विषय है। आज सरकारी
क्षेत्र में भी स्कूलों की बहुस्तरीय व्यवस्था है। शोधकर्ता यहाँ स्पष्ट कर देना
चाहता है कि जब हम सरकारी स्कूल की बात कर रहे हैं तो इसमें विशिष्ट वर्ग के लिए
खोले गए केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों, सैनिक स्कूलों आदि को शामिल नहीं कर रहे हैं। एक तो, ये स्कूल
सब के लिए हैं ही नहीं, दूसरे, ये सरकारी स्कूलों की संख्या का नगण्य हिस्सा भर हैं।
हम सरकारी स्कूलों में सामान्य सरकारी स्कूलों को शामिल करते हैं, न कि इन
मुखौटा/विशिष्ट स्कूलों को। वैसे पिछले दिनों नव-उदारवाद के प्रभाव में सरकारी
स्कूलों में भी शिक्षाशास्त्र के सिद्धान्तों को नकारते हुए उनका अंग्रेजी माध्यमीकरण
बढ़ा है।
अब यदि हम समाज की वर्गीय संरचना के आधार पर
विश्लेषण करें, तो
पाते हैं कि उच्च तथा उच्च मध्यम-वर्ग के
लगभग सभी बच्चे,
विशिष्ट माने जाने वाले अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में जा रहे हैं। वहीं निम्न
मध्यम-वर्ग तथा निम्न-वर्ग के माता-पिता का भी सपना अपने बच्चों को सीबीएसई का
पाठ्यक्रम चलाने वाले अंग्रेजी माध्यम
स्कूलों में ही दाखिला करवाने का है। सीबीएसई शब्द, ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र में अंग्रेजी
के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है। यदि लोग उच्च दर्जे के स्कूलों तक नहीं
पहुँच सकते तो ऐसी अवस्था में वे निम्न दर्जे के गैर-मान्यताप्राप्त स्कूलों में
अथवा राज्य बोर्ड से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं। अपने बच्चों
को सरकारी स्कूल में सिर्फ़ उसी अवस्था में भेजते हैं, जब वे आर्थिक रूप से पूर्णतः असक्षम हों। परन्तु जैसे ही आर्थिक स्थिति में सुधार
आता है, वे
अपने बच्चों को अपेक्षाकृत निम्न दर्जे के स्कूलों से निकाल कर ऊपरी के दर्जे के
स्कूलों ने डालते हैं। वैसे शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2010 के तहत मिले 25% आरक्षण से बहुतों को बड़ी उम्मीदें हैं। पर उच्च–वर्ग के 10% लोगों के लिए खुले ये स्कूल, 85% आबादी को अपने अंदर कितना समाहित कर पाएँगे, य़ह एक
यथार्थ प्रश्न है। पर हम उससे भी बड़े प्रश्न पर विचार कर रहे हैं कि इन स्कूलों
में पढ़ने की चाहत में पहुँची, देश की 85% जनसंख्या, अर्थात् निम्न वर्ग, निम्न मध्यम-वर्ग,
ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे जब कुछ सीख ही नहीं पाते तो दाखिले के लिए भागते ही क्यों
हैं?
ऐसी प्रवृतियाँ शोध के दौरान भी देखने को
मिलीं। जैसाकि गाँव गडखेरा के निवासी नेत्रपाल ने बताया, “उनके
गाँव के सरकारी स्कूल में सिर्फ़ आर्थिक
रूप से कमजोर एवं पिछड़े वर्ग के बच्चे ही शेष रह गए है। जिसमें से अधिकतर दलित
जातियों के हैं। परिवार दलित जाति का हो या अगड़ी जाति का, यदि उसकी थोड़ी-भी आर्थिक हैसियत अच्छी है
तो वे लोग अपने बच्चों को निम्न दर्जे के ही सही, परंतु निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में ही
भेजते की कोशिश करते हैं। जैसे ही आर्थिक स्थिति में और सुधार दिखता है, वे अपने बच्चों को सीबीएसई से सम्बद्ध निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजने का प्रयास करने लगते हैं।
हमारे इलाके में सीबीएसई शब्द का अर्थ ही- अंग्रेजी माध्यम स्कूल होता है।” गाँव भिडूकी
के लोगों ने बताया, “लोग कर्ज लेकर भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के
स्कूलों में डाल रहे हैं।”
यह बात शोधकर्ता द्वारा फरीदाबाद के आस-पास
के गाँवों में किए अवलोकन के बाद और भी पुख्ता हो जाती है कि फरीदाबाद में नए
टाउनशिप ग्रेटर फरीदाबाद तथा नोएडा के तर्ज पर औद्योगिक क्षेत्र के विकास के साथ
जमीनों के मूल्य तेजी कई गुणा बढ़े, जिसका फायदा इस क्षेत्र की छोटी-से-छोटी
ज़मीन पर खेती करने वाले किसान को हुआ। जमीन बिकी और पैसा आया। इस पैसे की वजह से आर्थिक स्थिति में जो सुधार
हुआ,
उसका नतीजा यह देखने में आया कि लोगों ने अपने बच्चों को तुलनात्मक रूप से पिछड़े
माने जाने वाले स्कूलों से निकाल कर अपेक्षाकृत बेहतर माने जाने वाले स्कूलों में
डालना प्रारम्भ कर दिया।
परन्तु पलवल जिले के भिडूकी गाँव में कुछ ऐसे केस भी पता चले, जब
माता-पिता ने अपने बच्चों को निम्न स्तर के अंग्रेजी माध्यम विद्यालय से निकाल
कर वापस हिन्दी मीडियम के सरकारी विद्यालय में डाला है। पूछने पर तर्क दिया, “पैसा
भी बर्बाद करो, कुछ समझ में भी ना आये तो क्या फायदा।” शायद इसका एक कारण कर्ज़ का बोझ भी है। परन्तु ऐसे केस
अपवाद स्वरूप ही देखने को मिले। एक बार अंग्रेजी माध्यम में डाल देने के बाद, उसमे
पढ़ाते रहना समाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है। बेशक बच्चों को विषय समझ में
आये या नहीं, पर
पढ़ाना अंग्रेजी माध्यम स्कूल में
ही है। यह माता-पिता ही नहीं अपितु बच्चों की
प्रतिष्ठा से जुड़ा मुद्दा भी है।
मध्यम स्तर के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के
प्राचार्यों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनके स्कूलों में तेजी से ग्रामीण
इलाकों तथा निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों का दाखिला करा रहे हैं।
जहाँ प्रतिष्ठित अथवा ‘हाई-फाई’ कहलाने वाले निजी स्कूलों में वे ही माता-पिता अपने
बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न हों। वहीं मध्यम स्तर के निजी
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने निम्न-मध्यम
वर्ग के बच्चों को समेट रखा है। इस प्रकार, जितने वर्ग उतने ही प्रकार के स्कूल, अर्थात्
हर वर्ग की अपनी आर्थिक हैसियत के हिसाब से स्कूल। जब स्कूल वालों से पूछा गया कि
आप क्षेत्रिय भाषाओं में स्कूल क्यों नहीं चलाते? तो उनका जबाब था, “स्कूल
में ताला लगवाओगे, क्या?”
जहाँ तक माता-पिता का सवाल है, जैसा कि
हमने पाया कि हर मामले में किसी-न-किसी रूप में स्कूल, परिवार की आर्थिक स्थिति को दर्शाने का
साधन है। ग्रामीणों के साथ हुई समूह-वार्ता में भी लोगों का मानना है कि स्कूल
लोगों के बीच ईर्ष्या का एक प्रमुख कारक है। विद्यार्थियों ने भी समूह-वार्ता में
बताया कि उनके माता-पिता अपनी
महत्वाकांक्षाओं का ठीकरा बच्चों के सर ही फोड़ रहे है। साथ ही यह भी बताया कि यदि
कोई माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालना भी चाहें तो उसके रिश्तेदार
और परिचित-संबंधी उन्हें ताने देते रहते हैं।
रमेश की माता जी के शब्दों में, “सरकारी
स्कूल में एक तो मास्टर आते ना, या आवें तो दूसरे कामों में लगे रहते हैं (सरकारी
कागजों को पूरा करने के लिए)। ऐसे में, वहाँ भेजने पर तो बालक गाली-गलौच ही सीख
सके हैं। सरकारी स्कूल में आजकल बच्चे जा किसके रहे हैं। इन स्कूल में
सिर्फ़ गरीबों तथा मवालियों के बच्चे पढ़न जावे हैं। जो जाते हैं वे खिचड़ी और
वज़ीफ़े भर के लिए जावे हैं।”
वहीं चाय बेचने वाले सज्जन का कहना है, “मेरे
बच्चे अच्छे-खासे हरियाणा बोर्ड के स्कूल में पढ़ रहे थे पर मुझे पब्लिक
(रिश्तेदारों और जानकारों) ने जीने ना दिया। डेली (प्रतिदिन) ताने देते। कोई कुछ
तो कोई कुछ कहता। बोलते यदि बच्चों का भविष्य बणाणा है तो सीबीएसई में डालो। अरे
क्या करोगे पैसे जोड़ के?”
अर्थात् यदि कोई अपने बच्चों को सरकारी अथवा
हिन्दी माध्यम के स्कूल में पढाता है, तो आर्थिक उलाहनों का शिकार होता है। उसे या तो लोग
कंजूस या आर्थिक रूप से कंगला घोषित करते हैं। इसी तरह की स्थिति आरूणी की माँ के
केस में भी देखने को मिली, जब उसने अपनी बहन के बच्चों की भाँति अपने बच्चों को भी
क्रिश्चियन स्कूल में डलवाने की जिद की। विपिनचंद्र ने तो साफ कह दिया कि वह हर
कीमत में अपने बच्चे को प्रतिष्ठित ब्राँड के स्कूल में ही डालेगा।
उच्च-मध्यम वर्ग के बच्चे किस प्रकार सरकारी
स्कूल के अनुभव से अछूते हैं, इस बात का पता इससे लगता है कि जब अति-विशिष्ट कहलाने
वाले स्कूल के बच्चों से शोधकर्ता ने सरकारी स्कूल के बच्चों के बारे में पूछा तो
उन्होंने कुछ इस प्रकार का से जबाब दिया मानों वे उनके परिवेश के बाहर की व्यवस्था
हो। उनका जबाब कुछ इस प्रकार था, “सुना है सरकारी स्कूल के बच्चे ‘रूड़ भाषा’
का इस्तेमाल करते हैं।”
यह जवाब किसी-भी तरह से उनकी अनुभव-सम्पन्नता
को नहीं दर्शाता। यह वाक्य स्पष्ट करता है कि एक ही क्षेत्र में दो अलग-अलग
स्कूलों के बच्चे एक-दूसरे की व्यवस्थाओं से अछुते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है
कि उच्च वर्ग को सरकारी और हिन्दी माध्यम के द्वंद्व से गुजरना ही नहीं पड़ता।
उनके लिए उच्च स्तर के माने जाने वाले प्राइवेट स्कूलों में स्थायी रूप से आरक्षण
उपलब्ध है।
औपचारिक शिक्षा के सम्बन्ध में माता पिता
एवं अन्य बडे लोगों के अपने-अपने अनुभव-
औपचारिक शिक्षा को लेकर जन-सामान्य के अपने
व्यक्तिगत अनुभव भी स्कूल के चुनाव को प्रभावित करते हैं। बच्चों के लिए स्कूल का
चुनाव करने में इस बिंदु ने एक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका सबसे क्रूर रूप
अभिभावक विपिनचंद्र के केस में दिखा, जिसने अपने बच्चे का ‘तथाकथित भाषा-शुद्धिकरण’ करने
के लिए उसे डेढ़ वर्ष की अवस्था में
इंग्लिश मीडियम पालनाघर (क्रच) में दाखिला दिलवा दिया। अंग्रेजी माध्यम का
क्रच अर्थात् एक ऐसा पालनाघर (क्रच), जिसकी संचालिका बच्चों के साथ वार्तालाप हेतु अंग्रेजी
भाषा के साथ-साथ अंग्रेजियत के तौर-तरीकों का प्रयोग करती है। इस बात को विस्तार
से ‘तथाकथित भाषा-शुद्धिकरण’ के बिंदु के साथ विचार करेंगे। यहाँ तो हम उन
पहलुओं पर विचार करेंगे, जो माता-पिता को इस दिशा में कदम बढ़ाने को मजबूर करते
हैं।
सर्वप्रथम, हम रमेश के पिता अशोक कुमार के व्यक्तिगत
अनुभवों पर विचार करते हैं। अशोक कुमार ने अपनी कमजोर अंग्रेजी को देखते हुए ही
उच्च शिक्षा में जाने के स्थान पर आई.टी.आई. कोर्स करने का निर्णय किया। उनके अपने
शब्दों में, “हम (वह और उसके गाँव के
साथी) जब पहली दफ़े कॉलेज गए तो क्लास में लेक्चरर आकर अंग्रेजी में क्या बोल गया, हमें कुछ
समझ में ही नहीं आया। मैंने निर्णय किया कि मैं कॉलेज ना जाकर आई.टी.आई. जाऊँगा।
मेरे साथ कुछ और साथी भी आ गए। मेरे जो साथी कॉलेज में टिके रहे, उनमें से
शायद ही कोई कामयाब हुआ हो। कोई फस्ट इयर में फेल होकर बाहर आया तो कोई सेकंड इयर
में।”
अजय कुमार के ये अनुभव दिल्ली विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर राम जी दुबे के व्यक्तिगत अनुभव से मिलते-जुलते हैं। इसका वर्णन
उन्होंने अपनी आत्म-कथा ‘अध्यापक का सफरनामा’ में किया है। “मैंने अंग्रेजी की बाधा को पार किया” नामक अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार
कक्षा में बैठने के बाद 40 मिनट काटने ही भारी पड़ते थे। सिर्फ़ पार्लियामेंट,
प्रेसिडेंट, सोवेरेनिटी, जैसे शब्दों को सुन कर सिर्फ़ अंदाजा भर लगा पाते थे
कि यह राजनीति विज्ञान की कक्षा है। इसी प्रकार जब कानों में अकबर-बाबर सुनाई पड़ता था तो पता लगता था कि यह इतिहास
है। वे बताते हैं कि कक्षा में दूसरे विद्यार्थी से विषय के बार में पूछ रहे थे, तभी
शिक्षक ने उन्हें खड़ा कर दिया, तो वे सकपका गए और बोले “आई नहीं हई” अंग्रेजी भौजपुरी
का मिला जुला शब्द। उन्होंने आगे बताया कि किस प्रकार वे और उनके साथी भाषा की वजह
से कॉलेज में मजाक के पात्र बनते थे। एक रोज उन्होंने कॉलेज छोड़ने का निर्णय
किया। वे कॉलेज से तंग आकर अपने बड़े भाई साहब के पास गए और रोते हुए किसी हिन्दी
माध्यम के कॉलेज में दाखिला दिलाने का आग्रह किया। बदले में भाई साहब ने मुँह से
कम और लात-घूँसों से ज्यादा बातचीत की। जो हाथ में आया उसी से पिटाई की और आदेश
जारी किया कि खबरदार जो अंग्रेजी से डर कर भागे। बड़े भाई साहब ने कहा, “बेशक फेल हो जाओ, पर डटे रहो अंग्रेजी के मैदान में।” अंग्रेजी
पढ़ना मजबूरी हो गयी। यदि उस दिन प्रो. रामजी दुबे अंग्रेजी से डर कर कॉलेज छोड़
देते तो क्या आज दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हो सकते थे? यदि योगेश के पिता अंग्रेजी
की बाधा पार कर लेते तो क्या वे मामूली टेकनिशियन ही रहते? एक अंग्रेजी प्रोफेसर को टेकनिशियन और टेकनिशियन को
प्रोफ़ेसर बना सकती है। इतना ताकतवर बना दिया है हमारे समाज ने इस विदेशी भाषा को!
रमेश के पिता ने आगे बताया, “मेरे अनुभव
की इमारत तब मज़बूत हुई, जब मेरा बड़ा लड़का बी-फार्मा का कोर्स बीच में छोड़
कर आ गया। मैंने अपने बच्चों से यह बात कह दी है कि यदि आगे पढ़ना है तो इंग्लिश
पर ध्यान देना ही पड़ेगा। यह बात लड़की के समझ में तो आ गई, पर लड़कों
के गले ना उतरी। हम (माता-पिता) तो पैसे ही खर्च कर सकते हैं।”
रमेश की माता ने अपने अनुभवों को बताया, “अंग्रेजी
कठिन है तो हिन्दी कौन-सी आसान है। हिन्दी में भी तो कठिन कठिन शब्द होते
हैं।” रमेश की माता का यह कथन शिक्षाविद्
श्री कृष्णकुमार की पुस्तक ‘विद्यालय
की हिन्दी’ में उठाई गई
समस्या की पुष्टि करता है। न केवल अंग्रेजी, अपितु अतिसंस्कृतनिष्ठ हिन्दी भी आम
लोगों की समझ के बाहर है। रमेश के माता-पिता के अनुभव से स्पष्ट होता है कि यदि
उच्च-शिक्षा की तरफ़ कदम बढ़ाना है तो “भाषा, वो भी इंग्लिश को तो मजबूत करना ही पड़ेगा
नहीं तो छोटे-मोटे कोर्स करके ही रह जाओगे।” अभिभावक मनोज जो हिन्दी
के पत्रकार हैं तथा इतिहास विषय के अच्छे जानकार है। जामिया विश्वविद्यालय से
एम.ए. (इतिहास) में स्वर्ण पदक हासिल करने वाले मनोज का कहना है, “आज इंग्लिश में
गिटपिट करना फैशन हो गया है, इंग्लिश नहीं तो हिंग्लिश बोलिए। हाय-बाय कीजिये, तभी आप
आधुनिक कहलाओगे। पर क्या करें यही वक्त की ज़रूरत बन गयी है। यदि आप इसके अनुरूप
नहीं हैं तो बैकवर्ड कहलाएँगे। हम तो किसी तरह झेल रहे हैं पर क्या हम अपने बच्चों
को बैकवर्ड कहलाने के लिए छोड़ दें?” विपिनचंद्र, जो कॉलेज और विश्वविद्यालय में किसी तरह खींच-तान कर इंग्लिश में पास हो
गया। पर जैसे ही जॉब मार्केट में आया उसको अंग्रेजी विषय की अहमियत का ज्ञान हुआ।
उसने बताया, “अनुसूचित जाति आरक्षण का फायदा होने के बावजूद, कभी-भी
ज्यूडिसरी की परीक्षा पास नहीं कर सका, क्योंकि हरियाणा में ज्यूडिसरी की परीक्षा होती ही
इंग्लिश में है। यदि दूसरे राज्यों में कहीं हिन्दी में परीक्षा होती भी है, तो पूछे
गए प्रश्नों के हिन्दी अनुवाद तथा हिन्दी शब्दावली को लेकर इतनी समस्याएँ होती
है।” वक्त के साथ विपिनचंद्र ने यह भी सीख लिया कि किस प्रकार इंग्लिश उसके लिए
फायदेमंद है। कोर्ट में आने वाले मामलों में लोग वकीलों के चक्कर में इसलिए पड़ते
हैं क्योंकि उन्हें अनजान भाषा में चलने वाली प्रक्रिया समझ में ही नहीं आती।
इसलिए विपिनचंद्र अंग्रेजी की व्यवस्था से उत्पीडि़त होने के बावजूद अंग्रेजी का
हिमायती है।
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