क्या अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में मिल पाता है, सीखने का एक-समान अवसर ?


विचारणीय मुद्दा –

क्या सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश के बाहर की भाषा (अंग्रेजी) का स्कूली शिक्षा में माध्‍यम के रूप में प्रयोग, सभी विद्यार्थियों को सीखने का एक-समान अवसर प्रदान करती है?

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अवसर की समानता परिस्थितियों की समानता पर निर्भर करती है। परंतु विविध संस्कृति वाले समाज में यदि हम एक ही मानकीकृत भाषा (चाहे वह अंग्रेजी हो या कोई अन्य) को सम्पूर्ण समाज पर थोप दें, तो यह कुछ लोगों की तुलनात्मक स्थिति तो बेहतर करेगी, पर बहुसंख्यकों की तुलनात्मक स्थिति तो हीनतर ही होगी। अवसर का पलड़ा हमेशा समाज के उस वर्ग के पक्ष में झुका रहेगा, जिसकी भाषा को शेष समाज पर थोपा गया है। शेष समाज हाशिए पर खिसकता जाएगा और धीरे-धीरे साँस्कृतिक-हीनता का शिकार भी बनता जायेगा। यही हुआ अंग्रेजी, तथाकथित शुद्ध कहलाने वाली संस्कृतनिष्ठ हिंदी और शहरी हिंदी के वर्चस्व के फलस्वरूप। यह स्थिति, जहाँ समाज के छोटे-से वर्ग को साँस्कृतिक वर्चस्व प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर,  समाज की साँस्कृतिक पूँजी को चंद लोगों के अधिकार में रखती है। इस प्रकार साँस्कृतिक पूँजी पैदा कर आर्थिक पूँजी के संरक्षण काम करती है। 

          जैसा कि ‘समझ का माध्यम’  नामक पुस्तक में भी कहा है, “हमारी शिक्षा पद्धति, कुछ लोगों की भाषा को स्वीकार करती है और कुछ लोगों की भाषा को नकारती है।”  यह नकार शिक्षा पाने के उपकरण या ज्ञान प्राप्त करने के उपकरण भर का नकार नहीं है। अपितु यह तो ज्ञान का ही नकार है। आगे सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश की भाषा-बोली के महत्त्व को रेखांकित करते हुए ‘समझ का माध्यम’  कहता है “नयी मशीन बनाना, नए शोध करना, अपने और समाज के बारे में नए ढंग से सोचना, तब ही सम्भव होगा, जब हम अपनी भाषाओं में सोच पाएँगे।”

          अनुसंधान के दौरान जो साक्ष्य मिले, वे सभी स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजी माध्यम स्कूली व्यवस्था, जहाँ शहरी क्षेत्र के उच्च-मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों की तुलनात्मक स्थिति को बेहतर बनाती है, वहीं निम्न-मध्यम वर्गीय समाज से आने वाले तथा ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की तुलनात्मक स्थिति को बद से बदतर बनाती है। 

आजकल फ्रिंज इलाकों में तेजी से इंटरनेशनल कहलाने वाले स्कूल खुल रहे हैं। इन स्कूलों में ग्रामीण तथा शहरी, दोनों क्षेत्रों से विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते हैं। पर क्या ये स्कूल सबको सीखने का समान अवसर प्रदान करते हैं। आइए, इस पर एक शिक्षक की प्रतिक्रिया जानते हैं। 

          हरियाणा राज्य के पलवल शहर में स्थित एक इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक महावीर के अनुसार, “ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले विद्यार्थियों में 10 में से एक-दो विद्यार्थी ही  भाषा की बाधा को पार कर पाते हैं। वहीं शहरी निम्न एवं सामान्य मध्यम वर्गीय इलाकों से आने विद्यार्थियों में यह अनुपात 10 में से 4-5 तक का होता है। पर शहरी इलाकों के उच्च-मध्यम वर्गीय पढ़े-लिखे परिवारों से आने वाले अधिकतर विद्यार्थी भाषा की बाधा को तो कम से कम पार कर ही जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की समस्या सिर्फ़ अंग्रेजी की ही नहीं होती, अपितु शहरी हिंदी भी उनकें लिए समस्या होती है। वे हिंदी अंग्रेजी को मिला कर बोले जाने वाली हिंग्‍ल‍िश को भी नहीं समझ पाते। हमारी समस्या यह होती है कि हम पर प्रबंधकों का पूरा दबाव होता है कि हम सिर्फ़ अंग्रेजी का ही प्रयोग करें। यदि फिर भी हिंदी बोलने की ज़रूरत पड़ती भी है तो सिर्फ़ मानक शहरी हिंदी (हिंगलिश) का ही इस्तेमाल करें। मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का शहरी व्यक्ति हूँ तथा ग्रामीण बोली को अच्छी तरह जनता भी हूँ। पर क्या करूँ, मजबूर हूँ, बच्चों को कहना ही पड़ता है, ‘रूड़ बोली-भाषाओं-बैड़ बोली-भाषाओं’ का इस्तेमाल मत करो।”

          अनुसंधानकर्ता ने ग्रामीण इलाके के एक अंग्रेजी माध्यम निजी स्कूल के बच्चे के अवलोकन के दौरान पाया कि बच्चे ‘गुड मॉर्निंग’ के अलावा एक शब्द भी आगे बोल नहीं बोल पाए क्‍योंकि उन्हें आदेश दिया गया था कि बाहर से आये आगन्तुक के समक्ष अंग्रेजी में ही बोलें। बच्चे अंग्रेजी में विचार न गढ़ पाने के कारण चुप ही रहते हैं।

          ‘बच्चे की भाषा और अध्यापक’  नामक पुस्तक में कृष्ण कुमार लिखते हैं, “बच्चे की भाषा का सम्बन्ध उन अनुभवों से है, जिन्हें वे अपने हाथों और शरीर से स्वयं करते हैं और उन वस्तुओं से भी, जिनके संपर्क में वे आते हैं। बचपन में शब्द और क्रिया-कलाप साथ-साथ चलते हैं। क्रियाकलाप और अनुभवों को आत्मसात करने और व्यक्त करने के लिए शब्दों की ज़रूरत होती है। कोई अनुभव जब पूरा हो जाता है, तब वह शब्द के रूप में उपलब्ध होता है।”

          ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे के अनुभव उसके ग्रामीण परिवेश से सम्‍बन्धित होते हैं और वह उसे अपनी ग्रामीण बोली में बड़ी-ही सहजता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। स्कूल के बाहर वही बच्चा प्रश्नों की झड़ी लगा देता है, परंतु स्कूल में चुप्पी छाई रहती है। अध्यापक के ना रहने पर शोर और अध्यापक के आते ही ख़ामोशी ! क्या आप मान सकते हैं कि इस वातावरण में हर वर्ग और हर क्षेत्र के विद्यार्थी के लिए सीखने के एक-समान अवसर उपलब्ध हैं? एक विद्यार्थी, जो हफ्ते में सिर्फ़ पाँच दिन ही स्कूल जाता है और दूसरा जो रविवार की छुट्टी वाले दिन भी ‘एक्स्ट्रा-क्लास’ लेता है। क्या दोनों के अवसर एक-समान हैं? एक, जिसके माता-पिता उसे पाँच सितारा होटलों में लेकर जाते हैं और वह वहाँ अपने माता-पिता और उनके मित्रों से ही नहीं, अपितु इस पाँच सितारा होटल के बैरे तक से अंग्रेजी में बात करता है। इसके विपरीत, दूसरा बच्‍चा, जिसके माता-पिता तो दूर, आस-पड़ोस का कोई व्यक्ति भी अंग्रेजी का ज्ञान नहीं रखता। इस बात की पुष्टी प्राचार्य सी/C से मिली जानकारी के आधार पर भी की जा सकती है। एक बच्चा, जिसके स्कूल में शिक्षक के ऊपर पूरा दबाव होता है कि वह अंग्रेजी में ही बोले और इस वजह से वह किताबों में लिखी जानकरी भर बात पाता है और विद्यार्थी भी उसी किताबी भाषा को ही रटते हैं।

          शिक्षक को जिस दिन बाहर का रास्ता दिखाना होता है। उस दिन उसके द्वारा स्कूल परिसर में प्रयोग की गई जन-सामान्य-हिंदी एक महत्वपूर्ण आधार बनती है। अतः शिक्षक वर्ग चाह कर भी क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग नहीं करता है। बस घिसीपिटी अंग्रेजी का प्रयोग करता है। इस बात की आरूणी, रमेश और  रमेश की बहन से मिली जानकारी के आधार पर तथा समूह वार्ता-1 के विद्यार्थियों के वक्तव्यों के आधार पर पुष्टि की जा सकती है। वहीं एक दूसरा अति-विशिष्ट माना जाने वाला स्कूल, जो यह दिखावा करता है कि उसके परिसर में सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा ही प्रयोग की जाती है, वहाँ पर भी 11वीं 12वीं की बोर्ड की कक्षाओं में शहरी हिंदी अथवा हिंग्लिश के प्रयोग की छूट होती है। इस बात की पुष्टि का आधार प्राचार्य ए/A का वक्तव्य तथा समूह वार्ता-2 के विद्यार्थी हैं। समूह वार्ता-2 के विद्यार्थियों में ए/A स्कूल के विद्यार्थी भी शामिल हैं, जो अपने ही स्कूल के प्राचार्य की बातों को नकार रहे हैं। क्या हम कह सकते हैं कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाली, अंग्रेजी माध्‍यम शिक्षा व्यवस्था सभी वर्गों को सामान अवसर प्रदान करती है? या इस व्यवस्था में सिर्फ़ तथाकथित पढ़े-लिखे, उच्च माध्यम वर्ग परिवारों से आने वाले विद्यार्थी ही सफल हो रहे हैं। शेष चाय बेचने वाले सज्जन के समान संतोष करके रह जाते हैं। उनके खुद के शब्दों में, “माँ-बाप पैसे ही तो खर्च कर सकते हैं। यदि बच्चे अंग्रेजी में ना चल पाएँ तो माँ-बाप कुछ नहीं कर सकते।”

          अंग्रेजी भाषा जितनी फरीदाबाद जैसे शहर में हिंदी बोलने वालों के साथ विभेद पैदा करती है। तथाकथित हिंदी, अर्थात् शहरी हिंदी, ग्रामीण इलाकों के लोगों के बीच विभेद का आधार है। गाँव भिडूकी  में खुले सीबीएसई स्कूल का सारा स्टाफ़ फरीदाबाद-दिल्ली जैसे मेट्रोपोलिटन शहर से आता है। प्राचार्य के अनुसार कारण यह नहीं है कि गाँव में लोग क्वालिफाइड नहीं हैं, पर वे जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं वह भाषा, पब्लिक (प्राइवेट) स्कूल के मानदंडो के ही खिलाफ है।” अतः गाँव भिडूकी को भाषा की दोहरी मार झेलनी पड़ती है। 

अनुसंधानकर्ता ने पुस्तक मेले के दौरान छत्‍तीसगढ़ राज्य के पाठ्य पुस्‍तक निगम के स्टॉल पर जो देखा वह कुछ इस प्रकार था। “ मैंने वहाँ रखी पुस्तकों को उलटा-पलटा और पाया कि हिंदी की पुस्तक की भाषा कुछ भिन्न है। जब मैंने वहाँ बैठे अधिकारी से पूछा कि क्या ये छतीसगढ़ राज्य की बोली में लिखी गय़ी है। तो उनका जबाब था नहीं इसमें 25% ही छतीसगढ़ की बोली समाहित है। शेष तो मानक हिंदी ही है।” उसके बाद अनुसंधानकर्ता ने विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान की पुस्तकें उठाई। देख कर दंग रह गया कि ये पुस्तकें शुद्ध संस्कृतनिष्ठ मानक हिंदी में लिखी गय़ी हैं। जब 25% स्‍थानीय बोली समाहित करने वाली पुस्तक की भाषा इतनी भिन्न है तो शतप्रतिशत संस्‍कृतनिष्‍ठ मानक हिंदी में लिखी पुस्तकें वहाँ की स्‍थानीय बोली से कितनी भिन्न होगी। ऐसी हिंदी वाली पुस्तक जब छत्‍तीसगढ़ जैसे राज्य के आदिवासियों को पढ़ने को दी जाएगी तो क्या वह मौलिक चिंतन को प्रस्‍फुटित कर पाएगी? जब मानक हिंदी वाली भाषा में आदिवासियों को पढ़ाया जाएगा तो वे अपनी समझ को अपने परिवेश की वास्तविकता से कितना जोड़ पाएँगे। 

किसी भी समाज की स्कूली व्यवस्था उसकी सामाजिक व्यवस्था का ही प्रतिबिम्ब होती है। राज्य व्यवस्था के केंद्र में अंग्रेजी होने तथा भाषा के आधार पर विभेदीकरण किये जाने से अग्रेजी माध्यम स्कूलों को बल मिला है। इस विभेदीकरण के पहले पायदान पर यदि अंग्रेजी तो दूसरे पर मानक संस्कृतनिष्ठ हिंदी है और ये दोनों ही जमीनी बोलियों से पूर्ण भिन्न हैं। 

संविधान की उद्घोषिका सबको समान अवसर की वकालत करती है। पर क्या आपको लगता है कि अंग्रेजी माध्‍यम के वर्चस्व वाली शिक्षा व्यवस्था सबको एक-समान अवसर उपलब्ध करा पा रही है? इस विषय पर इस देश का सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट मौन है।

कितने सार्थक है गरीब बच्चे अर्थात 'भारत' के वे बच्चे जिनके परिवेश में अंग्रेजी नहीं है के लिए अमीर बच्चे अर्थात 'इंडिया' के ऐसे बच्चे जिनके परिवेश में अंग्रेजी है वाले इंग्लिश मीडियम स्कूल............????

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