अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-3
उच्च स्तरीय स्कूल में दाखिले का प्रयास करते एक पिता जिसका दावा है “मैंने तो अपनी बेटी की मातृभाषा ही ‘इंग्लिश’ बना दी है।” शोधकर्ता से उसका संपर्क एक ‘हाई-फाई’ अर्थात् उच्च स्तरीय कहलाने वाले स्कूल के स्वागत कक्ष में हुआ। पिता अपनी पुत्री के दाखिले के सिलसिले में वहाँ आया हुआ था। पिता विपिनचन्द्र की समस्या यह थी कि उसकी पत्नी का ‘ट्रान्सफर’ हरियाणा के हाँसी स्थित सरकारी स्कूल से फरीदाबाद में हो गया था। सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली माँ और वकील पिता की इच्छा थी कि वे अपनी बेटी का दाखिला फरीदाबाद के किसी ‘हाई-फाई’ स्कूल में करवाएँ। अभी उनकी पुत्री सुगन्धा हाँसी के ‘हाई-फाई’ अर्थात् उच्च दर्जे के प्राईवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती है। हाँसी का वह स्कूल भी इसी स्कूल की ही फ्रेंचाइजी ब्रांच है। पर शहर बदलने के साथ उच्च वर्ग की परिभाषा में भी परिवर्तन आ जाता है। तो उसके मापदंडों में भी परिवर्तन आ जाता है। विश्वविद्यालय तक पढ़ा और आर्थिक रूप से संपन्न यह दंपति, हाँसी के हिसाब से तो उच्च एलिट वर्ग में आता है। पर फरीदाबाद और दिल्ली शहर में हाई-फाई वर्ग में शामिल होने के लिए आर्थिक रूप से संपन्न होने के साथ हाई-फाई वर्ग की भाषा बोल पाने की शर्त भी थी। पर अनुसूचित जाति एवं कस्बाई परिवेश से सम्बन्धित इस दम्पति की अपनी विश्वविद्यालय तक की औपचारिक शिक्षा क्षेत्रीय (हिन्दी) माध्यम से ही हुई थी। पर आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ, अब उनकी भी तीव्र इच्छा थी कि वे भी हाई-फाई वर्ग में शामिल हों। अपनी बच्ची के दाखिले के सिलसिले में आए इस पिता से जब उसके अंग्रेजी बोल पाने की क्षमता पर सवाल पूछा गया तो उसका जबाब था, ‘मेरी छोड़िए मेरी बच्ची की अंग्रेजी पर बोलने की पकड़ देखिए। (जो उस वक्त वहाँ उपस्थित नहीं थी)। हमारी ना सही हमारी बच्ची की मातृभाषा तो अंग्रेजी ही है, जी।’ यह अपने आप में अचम्भित कर देने वाला दावा था। एक व्यक्ति जो एक आम हिन्दुस्तानी परिवेश से सम्बन्ध रखता हो। जिसके खुद के माता-पिता देहाती पृष्ठभूमि के हों तथा जिसे खुद अंग्रेजी भाषा बोलने पर धाराप्रवाह पकड़ ना हो। उसकी बेटी की मातृभाषा अंग्रेजी कैसे हो सकती है? यह दावा अपने आप में इतना अनोखा था कि शोधकर्ता ने विपिनचन्द्र की बेटी और उसके परिवार को केस स्टडी के लिए चुन लिया। हालांकि उसका दावा महज अंग्रेजियत के वर्चस्व से प्रभावित व्यक्ति का दावा मात्र साबित हुआ।
वस्तुस्थिति को समझने के लिए क्रमवार दम्पति एवं बच्चे से विस्तृत
बातचीत की गयी।
बच्ची सुगन्धा के पिता विपिनचन्द्र ने बताया कि वे पेशे से वकील हैं
तथा दिल्ली स्थित तीसहजारी कोर्ट में ‘प्रैक्टिस’ करते हैं। उसकी पत्नी सुषमा हरियाणा राज्य के सरकारी विद्यालय में
प्राथमिक स्तर की शिक्षिका हैं। विपिनचन्द्र के पिताजी सन 1974 में उत्तर प्रदेश के खुर्जा जिले से हरियाणा के हाँसी शहर में आकर बस गए
थे। विपिनचन्द्र का जन्म उसी वर्ष खुर्जा जिला में ही हुआ था। पर जन्म के बाद की
सारी परवरिश हाँसी की ही है। घर में विपिनचन्द्र से बड़ी उसकी चार बहनें और चार भाई
हैं। इस प्रकार विपिनचन्द्र का एक भरा-पूरा परिवार है। विपिनचन्द्र की सबसे बड़ी
बहन तथा विपिनचन्द्र की उम्र में लगभग 22 वर्ष का तथा सबसे
बड़े भाई तथा विपिनचन्द्र की उम्र में 20 वर्ष का अंतर है।
बड़े दो भाइयों को औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष कामयाबी नहीं मिली तथा
वे दोनों स्कूल की दहलीज पार करने से पूर्व ही दर्जी का काम करने लगे। बहनों के
सन्दर्भ में विशेष बात यह है कि उनके पिता ने सामाजिक विरोध के बावजूद उन्हें
शिक्षित बनाने का प्रयास किया। विपिनचन्द्र के दोनों बड़े भाई काफी छोटी उम्र से ही
अपने पिता के आर्थिक कामों में हाथ बँटाने लग गए थे। फलस्वरूप विपिनचन्द्र तथा
उनके दो बड़े भाइयों के वक्त में उनके घर की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार आया।
परिवार छोटे तीनों भाईयों की औपचारिक शिक्षा का खर्च उठाने की स्थिति में आ गया।
कुछ आरक्षण तथा कुछ पारिवारिक प्रयास की वजह से विपिनचन्द्र से क्रम में बड़े भाई
ने एमबीबीएस में दाखिला लेने में सफलता हासिल की। इस प्रकार, क्रम में सबसे बड़े दो भाई जहाँ दर्जी का काम करते हैं वहीं छोटे तीनों भाई
औपचारिक शिक्षा हासिल कर क्रमशः एमबीबीएस डॉक्टर (एस.एम.ओ.), दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर और वकील हैं। तीनों को सुशिक्षित बनाने में
उसके दोनों बड़े भाइयों तथा बड़े जीजाजी (बहन के पति) का विशेष हाथ है। विपिनचन्द्र
के जीजाजी खुद पेशे से वकील हैं। विपिनचन्द्र के सन्दर्भ में विशेष बात यह भी रही
कि उसकी बड़ी बहन भाइयों के बच्चे तथा वह साथ-साथ पढ़े हैं। विपिनचन्द्र की माँ जीवन
भर वही बोली बोलती रही थी जो वह खुर्जा से आते वक्त लेकर आई थी। विपिनचन्द्र की दोनों बड़ी भाभियों का
सम्बन्ध भी उत्तर प्रदेश से होने की वजह से उनकी बोल-चाल में उत्तर प्रदेश की
क्षेत्रीय बोलियों का ही पुट है। समय के साथ उन्होंने हरियाणा की क्षेत्रीय बोली
को भी अपना लिया है। पर अंग्रेजी को छोड़ो, शुद्ध परिष्कृत
मानक हिंदी से भी इनका दूर-दूर का सरोकार नहीं है।
विपिनचन्द्र की अपनी शिक्षा मानक भाषा हिंदी में ही हुई है। उसके
अपने परिवेश की बोल-चाल में क्षेत्रीय बोली हरियाणवी तथा खुर्जा की बोली का ही
बोल-बाला रहा है। अपनी स्कूली शिक्षा हाँसी से सम्पन्न कर के उच्च शिक्षा प्राप्त
करने हेतु एम् डी विश्वविद्यालय रोहतक पहुँचा। यहीं से उसने अपने जीजाजी के
मार्गदर्शन में एलएलबी में दाखिला भी लिया। एलएलबी के दौरान भी उसकी शिक्षा का
माध्यम हिंदी ही रहा है। इंग्लिश का पर्चा तो उसके लिए स्कूल के दिनों से ही
चुनौतीपूर्ण रहा है। पर हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों की अच्छी खासी संख्या होने
के बावजूद भी विश्वविद्यालय की कक्षाओं में अंग्रेजी का ही बोल-बाला रहा है। जिन
पुस्तकों का सन्दर्भ विश्वविद्यालय में दिया जाता था, वे अधिकतर अंग्रेजी में ही होती थीं। विपिनचन्द्र की उन पुस्तकों को पढ़ने
में कभी रुचि नहीं रही। वह तो किसी तरह से हिंदी में छपी गाइडों के सहारे ही कक्षा
को ‘पास’ करने का जुगाड़ कर लेता था। इस
प्रकार खीच-तान कर उसकी एलएलबी किसी तरह पूरी हो गई। पर अंग्रेजी का दंश उसी को
नहीं उसके साथ पढ़ने वाले सभी देहाती और कस्बाई छात्रों को भी झेलना पड़ा था।
स्वयं विपिनचन्द्र के शब्दों में, ‘हमारी गिनती कक्षा के
विलनों में ही होती थी। प्रोफेसर की नज़र में हम सिर्फ़ कक्षा को डिस्टर्ब करने के
लिए ही आते थे। पर हम करें क्या, उनके एक शब्द भी तो हमारे
पल्ले नहीं पड़ते थे। उनके हीरो तो इंग्लिश मीडियम से पढ़ कर आए विद्यार्थी ही
होते थे। वे ही कक्षा में इंग्लिश में चट-पट बोल पाते थे। वे हमसे योग्य नहीं थे,
पर फिर भी योग्य थे।’ इस प्रकार एलएलबी तो
किसी तरह हो गयी। पर असल समस्या विपिनचन्द्र को प्रैक्टिस के दौरान आई। इंग्लिश पर
पकड़ ना होने की वजह से वह कभी सुप्रीमकोर्ट तो दूर हाईकोर्ट में भी अपने केस की
पैरवी नहीं कर पाया। उसे सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में केस ले जाने के लिए उन
वकीलों का सहयोग लेना पड़ता था जिनका अंग्रेजी भाषा अच्छा नियंत्रण होता था। सिर्फ़
अंग्रेजी पर बेहतर पकड़ की वजह से ये वकील समान्य वकीलों से कई गुना अधिक फीस
चार्ज करते थे। उसने बताया, ‘एलएलबी के दौरान मेरे साथ पढ़ने
वाले जो इंग्लिश मीडियम के लल्लू-पंजू (अति सधारण) छात्र भी थे। वे धड़ल्ले से
सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं और हम लोअर कोर्ट के लोअर
कोर्ट में अटके हुए हैं। बडी शर्म-सी महसूस होती है जब हमें सुप्रीमकोर्ट और
हाईकोर्ट के मैटर के लिए इनसे अनुरोध करना पड़्ता है। जबकि एलएलबी के दौरान ये लोग
समझने से जयादा रटने पर ही जोर देते थे।’ आगे विपिनचन्द्र ने
बताया कि जजों की नियुक्ति के लिए ली जाने वाली परीक्षाएँ भी मूलतः अंग्रेजी में
ही होती हैं। बेचारे सधारण पढ़े-लिखे लोगों के लिए तो कोर्ट की भाषा ही समझ के
बाहर होती है। कोई सधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति कोर्ट में प्रयोग की जाने वाली हिंदी
की शब्दावली को देखे तो उसे हिंदी से अंग्रेजी ही आसान लगेगी। दिल्ली में कोर्ट की
सारी कार्यवाही अंग्रेजी में ही होती है। इसीलिए वकीलों की चाँदी भी है।
जैसा कि ऊपर वर्णन किया जा चुका है कि विपिनचन्द्र के क्रम में तीसरे
और चौथे, अर्थात् उससे क्रम में बड़े दो भाई क्रमशः डॉक्टर तथा
पुलिस इंस्पेक्टर हैं। इन दोनों के पारिवारिक अनुभवों ने भी विपिनचन्द्र के नज़रिये
को ढालने में विशेष मदद की। विपिनचन्द्र के अनुसार उसकी सबसे बड़ी दोनों भाभियाँ
निरक्षर ही हैं। विपिनचन्द्र का भाई जो पुलिस इंस्पेक्टर है उसकी पत्नी भी सामान्य
पढ़ी लिखी है। पर जो भाई डॉक्टर है उसकी पत्नी खुद भी डॉक्टर है। विपिनचन्द्र के
अनुसार, ‘मेरी डॉक्टर भाभी के पिता सरकारी महकमे में
इंजिनियर थे। इस प्रकार उसकी पढाई-लिखाई भी शुरू से इंग्लिश मीडियम स्कूल में हुई
है। चूँकि हमारी जाति (अनुसूचित जाति में से एक में) में ज्यादा पढ़े-लिखे लड़के
आसानी से नहीं मिलते हैं अतः यह रिश्ता आसानी से हो गया। पर डॉक्टर भाभी शादी के
बाद थोड़े समय ही घर में रही। वे जल्द ही गाज़ियाबाद शिफ्ट हो गए। यहीं पर उन्होंने
एक कॉलोनी में मकान भी खरीद लिया। उनके बच्चों की शिक्षा भी उसी कॉलोनी में स्थित
दिल्ली पब्लिक स्कूल जैसे हाई-फाई स्कूल में हो रही है। उनके बच्चे धड़ाधड़
अंग्रेजी बोलते हैं।’ वहीं
जब पुलिस वाले भाई के बारे में पूछा गया तो उसने बताया, ‘ ठीक है सरकारी महकमे में है, ऊपर और नीचे की मिला कर
अच्छी आमदनी भी हो जाती है। दिल्ली में सीमापुरी में अपना मकान है। उसके बच्चे भी
प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। पर जो स्टैंडर्ड डॉक्टर भाई के बच्चों का है,
वो इंस्पेक्टर भाई के बच्चों में नहीं है। सब इलाके, माहौल और स्कूल का फर्क है।’ इसके अतिरिक्त
विपिनचन्द्र को लगता है कि इसके पीछे का एक महत्वपूर्ण कारण उनकी भाभियों का अपना
बैकग्राउंड भी है। ‘चूँकि डॉक्टर भाभी का बैकग्राउंड हाई-फाई
इंग्लिश मीडियम का रहा है। इसलिए वह अपने बच्चों को भी उसी के अनुरूप परवरिश कर
रही है।’ अतः विपिनचन्द्र ने अपने अनुभवों से यह सीख लिया है
कि जिस इलाके में व्यक्ति रहता है। उसका सम्पूर्ण परिवेश, स्कूल
का स्तर ये सभी बच्चों की भाषा सीखने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। अतः बच्चे
शुरू से जिस माहौल में रहेंगे, वे माहौल को ही धीरे-धीरे
अपना लेते हैं। ‘हाई-फाई’ स्कूलों में ‘हाई-फाई’ इलाकों के बच्चे ही कामयाब हो पाते हैं और
फिर वे ही हाई-फाई सोसाइटी में एडजस्ट हो पाते हैं।
अब सवाल पैदा होता है कि इन सब बातों का विपिनचन्द्र की बच्ची की
मातृभाषा अंग्रेजी होने से क्या सम्बन्ध हो सकता है। इस बात को समझने के लिए पुनः
विपिनचन्द्र और उसकी पत्नी के सम्बन्धों में झाँकना पड़ेगा। विपिनचन्द्र की पत्नी
सुषमा ने भी हरियाणा के छोटे-से शहर से हिंदी माध्यम से एम.ए., बी.एड. तक की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है। शादी के उपरांत वह भी दिल्ली
आ गई। विपिनचन्द्र का प्रयास था कि उसके अनिश्चित आय में पत्नी थोडा-ही सही पर कुछ
स्थाई योगदान दे। अतः सुषमा ने दिल्ली के बहुत-से निजी स्कूलों में नौकरी का
प्रयास किया पर छोटे शहर से सम्बन्ध रखने तथा अंग्रेजी भाषा पर पकड़ ना होने की वजह
से उसे कहीं पर भी नौकरी न मिली। उसने दिल्ली के सरकारी स्कूलों में टीजीटी पद के
लिए आवेदन किया पर उसे वहाँ भी तुरंत सफलता हासिल नहीं हो सकी। उसको लगता है कि
टीजीटी परीक्षा में इंग्लिश वाला भाग उसकी पकड से बाहर था। इस बीच उनकी बेटी
सुगन्धा ने जन्म लिया। पत्नी सुषमा बीएड के आगे भी पढना चाहती थी। पर विपिनचन्द्र
ने उसे वह पढाई करने हेतु प्रेरित किया जिससे परिवार की आय सुरक्षित हो सके। वह या
तो अंग्रेजी भाषा को सीख कर हो सकती है या कोई ऐसा कोर्स करके जिससे आसानी-से छोटे
स्तर की भी कोई नौकरी हसिल हो सके। प्राथमिक शिक्षकों की बढती मांग को देखते हुए
जेबीटी का कोर्स उन्हें सबसे सुरक्षित नज़र आया। एम.ए, बी.एड.
कर चुकी सुषमा ने दिल्ली के साथ लगे हरियाणा के गुडगाँव के डाइट कॉलेज में जेबीटी
कोर्स करने हेतु दाखिला लिया। उस वक्त उसकी बेटी 15 महीने की
हो चुकी थी। समस्या अब बेटी को किसी सुरक्षित हाथों में छोड़ने की थी। दो उपाय थे-
पहला, घर से किसी को बुलाया जाए अथवा किसी क्रेच में छोड़ा
जाये। विपिनचन्द्र के अनुसार सुषमा के दाखिले को लेकर परिवार में मतभेद था अतः घर
से शुरू में कोई आने को तैयार नहीं हुआ। अतः उसने उसे क्रेच में दाखिल करवाया।
पत्नी सुषमा सुबह कॉलेज जाने से पूर्व उसे क्रेच में छोड़ कर जाती और देर शाम को
उसे वहाँ से लेकर आती। विपिनचन्द्र के शब्दों में, ‘पूर्वी
पटेल नगर दिल्ली स्थित यह क्रेच अपने इलाके का सबसे हाई-फाई क्रेच था। वहाँ
हाई-फाई घरों से ही बच्चे आते थे। वहाँ की मैडम भी इंग्लिश बोलना जानती थी। जो
मैडम उसे चलाती थी वह भी हाई-फाई परिवार से थी तथा इंगलिश बोलती थी।’ उसने आगे बताया, ‘इस प्रकार लगभग डेढ़ वर्ष तक मेरी
बच्ची उस क्रेच में ही पली। फीस तो उसकी ज्यादा थी पर जब वह घर आकर इंग्लिश का
प्रयोग करती तो मुझे और सुषमा को अच्छा लगता था। हमें लगता कि हमारा पैसा खर्च
करना सार्थक हो गया है।’ विपिनचन्द्र ने आगे कहा, ‘बच्चों को शुरू से जिस
वातावरण में रखो, उसकी भाषा को वह अपना लेता है। बीच में,
कुछ समय वह हमारे हाँसी के घर तथा अपने ननिहाल में भी गयी और उसने
अपनी नानी और ताई दोनों को अंग्रेजी सीखा दी।’ सुषमा का
जेबीटी का कोर्स जब ख़तम हुआ तब हमारी बेटी की उम्र तीन-सवा तीन साल की हो गई थी।
विपिनचन्द्र के अनुसार अब वह नर्सरी स्कूल में डालने की उम्र में आ गयी थी। अतः
उन्होंने उस क्रेच से ही संबधित प्राइवेट स्कूल में उसे दाखिल करवा दिया।
विपिनचन्द्र ने आगे बताया कि जब उनकी बेटी
साढ़े चार – पाँच साल की थी तभी उसकी पत्नी का ‘सिलेक्शन’ जेबीटी के आधार पर हाँसी स्थित हरियाणा के
सरकारी स्कूल में हो गया। चूकि माँ की
पोस्टिग के साथ बेटी का भी हाँसी जाना निश्चित था। अतः उसने अपनी बेटी के भविष्य
को सुनिश्चित करने हेतु हिसार और हाँसी शहर के बीच स्थित देश के प्रतिष्ठित
स्कूलों में गीने जाने वाले दिल्ली पब्लिक स्कूल की फ्रेंचाइजी शाखा में करवाया।
विपिनचन्द्र के अनुसार, ‘यह स्कूल फुल्ली इंग्लिश मीडियम
स्कूल है। स्कूल के चपरासी, जमादार, मेड,
ड्राइवर और स्कूल बनाने में पैसा लगाने वाले मैनेजर के अलावा कोई
देहाती भाषा तो छोडो हिन्दी का भी प्रयोग नहीं कर सकता है। सभी टीचर और स्टूडेंट
के लिए अंग्रेजी का प्रयोग अनिवार्य है।’ जब इस बारे में
विपिनचन्द्र की पत्नी सुषमा से शोधकर्ता ने पूछा कि आप खुद तो सरकारी स्कूल में
पढ़ाती हैं तथा अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम प्राइवेट स्कूल में भेजती हैं। क्या
आप मानती है कि सरकारी स्कूल की शिक्षा बेहतर नहीं है। इस पर सुषमा जी ने जबाब
देते हुए कहा , ‘बात यह नहीं कि सरकारी स्कूल में पढाई नहीं
होती। बच्चे की शिक्षा में सिर्फ़ शिक्षक ही नहीं उसका वातावरण भी शामिल होता है।
सरकारी स्कूलों में जिस तरह के बच्चे आते हैं उनका बैकग्राउंड देहाती होता है,
उनके बोलचाल की भाषा भी देहाती ही होती है। आपको क्या लगता है,
ऐसे परिवेश में बच्चा क्या सीखेगा? ऐसी बात
नहीं कि इन बच्चों में सीखने की क्षमता ही नहीं होती, पर
इंग्लिश न आने की वजह से इनकी सारी की सारी योग्यता धरी की धरी रह जाती है। हम भी
तो इंग्लिश न आने की वजह से ही इस स्कूल में हैं। शायद फ़्लूएंट इंग्लिश आती तो
शायद हम इससे कहीं अच्छी जगह होते। अब क्या आप चाहेंगे कि इंग्लिश न आने की वजह से
जो दिक्कत हमने फेस की, वे हमारे बच्चे भी फेस करें?’
जब जिज्ञासावस शोधकर्ता ने पूछा, “क्या आप
अपने बच्चे का स्कूल से मिलने वाला होमवर्क खुद करवाती हैं?” जबाब मिला, “नहीं, स्कूल से
आने के बाद खा-पीकर थोड़े देर आराम करती हैं। फिर शाम चार बजे करीब इसकी मैडम (घर
पर पढ़ाने वाली होम ट्यूटर, अर्थात् शिक्षिका) आ जाती है। वही
इसका सारा होमवर्क वही करवाती है... और इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्से भी।” शोधकर्ता ने आगे पूछा – “घर परिवार और दूसरे लोगों
के साथ गुजारने के लिए कितना वक्त मिल पाता है?” जबाब था –
“बस छुट्टी का दिन, उस दिन भी कई बार इधर-उधर
चले जाते हैं। लम्बी छुट्टियाँ पड़ती हैं तो हम विपिनचन्द्र के पास दिल्ली आ जाते
हैं।“ शोधकर्ता –
“आपके घर में तो आपको छोड़ कर बाकी सभी देहाती बोली (पश्चिमी उत्तर
प्रदेश तथा हरियाणा की बोली) बोलते हैं। क्या यह बच्ची अपने ताया-ताई की बोली समझ
पाती है?” सुगंधा की माँ का जबाब था – “नहीं! पूछती है कि ताया-ताई कैसे बोलते हैं? समझ तो
जाती है पर देहाती बोलियों को तो बोलना बिलकुल भी पसंद नहीं करती। स्कूल में
सिखाते हैं ये बैड लैंग्वेज है। अपने पापा को भी कहती है – “पापा
स्पीक इन इंग्लिश” बच्ची की वजह से हम भी अंग्रेजी बोलना सीख
रहे हैं। ‘स्पून’ तो अब इसकी ताई भी
बोल लेती है।”
यहाँ यह स्पष्ट होता है कि बच्ची खुर्जा से ढ़ोकर लायी अपनी दादी की
विरासत को छोड़ चुकी है.... और वक्त के साथ जिस हरियाणवी परम्परा के साथ
विपिनचन्द्र के परिवार ने रोटी और बेटी का सम्बन्ध जोड़ा, उसे भी नकार कर आगे बढ़ चुकी है पर पिता विपिनचन्द्र को फक्र है कि उसकी
बेटी धाराप्रवाह इंग्लिश बोलती है। विपिनचन्द्र के अनुसार, “मेरी
बेटी अपनी कक्षा की टॉपर है तथा उसे क्लास में सबसे बेहतर अंग्रेजी बोलने के लिए
बैज भी मिला है। सभी टीचर उसकी तारीफ करते हैं।” दूसरी तरफ़
बच्ची की स्थिति यह है कि वह स्कूल से मिले होम वर्क को करवाने के लिए ट्यूटर पर
निर्भर है। जब शोधकर्ता ने बच्ची से बातचीत की तो पाया कि बच्ची अंग्रेजी की गिनती
आदि तो बोल पाती है पर हिंदी के साधारण अंकों व शब्दों का अर्थ नहीं बता पाती।
अब मेरे मन में पुनः जिज्ञासा पैदा हुई कि फरीदाबाद में तो बहुत से
प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यम स्कूल हैं। ये सज्जन अपने बच्चे को उसी प्रतिष्ठित
स्कूल में दाखिला क्यों दिलवाना चाहते हैं? शोधकर्ता ने जब ये
सवाल विपिनचन्द्र से पूछा तो उनका जबाब था, “मेरे डॉक्टर भाई
के बच्चे भी इसी स्कूल की दूसरी शाखा में पढ़ते हैं। इसलिए मैं भी चाहता हूँ कि
अपनी बच्ची का दाखिला उसी स्कूल की दूसरी शाखा में करवाऊँ।”
आर्थिक वृद्धि की दौड़ में तुलना उसके साथ होती है जो आर्थिक रूप से
कामयाब हुआ है। वह बेवकूफ और मूर्ख साबित हुआ है जो उस दौड में पीछे छूट गया।
विपिनचन्द्र के बच्चे अपने ताया-ताई के साथ रह कर भी उनके साथ नहीं हैं।
विपिनचन्द्र का डॉक्टर भाई जो परिवार के साथ नगण्य सम्पर्क रखता है वो विपिनचन्द्र
के लिए आदर्श है.... और हाँ, सिर्फ़ स्कूल ही नहीं ‘लोकेलिटी’ भी उसी हिसाब से चुनी जाती है। जब
विपिनचन्द्र से पूछा गया कि उसने फरीदाबाद की पोर्स ग्रीनपीस कॉलोनी को ही क्यों
चुना। जबाब था, “यहाँ की लोकेलिटी अच्छे परिवारों की है।
यहाँ पढ़े-लिखे सम्भ्रांत लोग ही रहते हैं। दूसरे दर्जे की कॉलोनी में देहाती बोलने
वाले लोग ही रहते हैं। फिर जैसे वातावरण में रहो, उसी की
बोली-भाषा बच्चा सीख जाता है। अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम के अनुरूप बेहतर
वातावरण उपलब्ध कराने के लिए ही मैंने इस लोकेलिटी को चुना है।”
विपिनचन्द्र को अपने अनुभवों से जो बात स्पष्ट हुई और उसके मूल्यों
का आधार बनी, वे कुछ इस प्रकार से हैं :-
• क्षेत्रीय
बोलियों के सहारे आप घर-परिवार आस-पड़ोस और छोटे स्तर के व्यवसायों में तो काम चला
सकते हो। जैसे उसके पिता तथा बड़े दोनों भाइयों का चलता रहा है। पर समाज में उच्च
स्तर के माने जाने वाले व्यवसायों में कामयाबी हेतु अंग्रेजी अनिवार्य है।
• विपिनचन्द्र
के अपने अनुभव से यह धारणा पुख्ता हो चुकी है कि कामयाबी की मंजिल अंग्रेजी की सड़क
पर चल कर ही हासिल हो सकती है।
• उसका
विश्वास है कि यदि उसकी बेटी अंग्रेजी माध्यम में नहीं पढ़ी, हाई-फाई
सोसाइटी वाली अंग्रेजी नहीं सीख पाती है तो वह कामयाब नहीं हो पाएगी।
• मूल्य ये
बने कि बेटी की शिक्षा पर खर्च करना है और उसके लिए कमाना भी है। बेशक गलत रास्ते
का ही प्रयोग करना पड़े। उच्च वर्ग की सोसाइटी में रहना है तो उसकी संस्कृति को भी
अपनाना पड़ेगा। उच्च वर्ग की संस्कृति के अनुरूप ढालने के लिए उसके इंग्लिश मीडियम
वाले कल्चर को भी अपनाना जरूरी है।
• इस क्रम
में, यदि उसके माता-पिता के बराबर के भाई-भाभी पीछे छूट जाते
हैं और उसका आदर्श डॉक्टर भाई और भाभी हैं जो इंग्लिश मीडियम कल्चर को अपनाकर आगे
बढ़े हैं।
• औपचारिक
शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक कामयाबी है। इसके लिए मौलिक समझ की कुरबानी
और संस्कृति का त्याग सब मंजूर है।
• इंग्लिश
शोषण, भ्रष्टाचार और गैर-बराबरी को बनाए रखने का आधार
है।
नोट : - साक्षात्कारदाता की
मांग पर नाम परिवर्तित किया गया है।
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