अंग्रेजी माध्यम और बच्चों का सांस्कृतिक, सामाजिक परिवेश

 विचारणीय मुद्दा –

सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश से बाहर की भाषा- अंग्रेजी को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने वाले स्कूल, क्या स्कूली बच्चों के दैनिक जीवन की गतिविधियों, स्कूल से बाहर के साँस्कृतिक अनुभवों को स्कूली शिक्षा में स्थान दे पाते हैं? तथा क्‍या वे काम और शिक्षा में सम्बन्ध जोड़ पाते हैं?

जैसा कि इससे पूर्व के अध्‍याय में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं‍ कि बच्चे के साँस्कृतिक परिवेश से इतर की भाषा (अंग्रेजी) में चलने वाली औपचारिक शिक्षा व्यवस्था बच्चे के जीवन पर पूरी तरह से हावी है। यह बच्चों को इस कृत्रिम परिवेश से बाहर  निकलने का मौका ही नहीं देती। बच्चों से अब उम्‍मीद की जाती है कि सुबह उठते ही स्कूल के लिए तैयार हो, बस स्टॉप पर पहुँच कर बस का इंतज़ार करो, फिर बस में भेड़-बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर स्कूल पहुँचो, स्कूल में छह घण्टे तक स्कूली पाठ्यचर्चाओं को झेलो, यदि आप उच्च कक्षाओं में हो तो, या आपके ऊपर कमजोर होने का लेबल लगा हुआ है, या आपके शिक्षक का कोर्स माध्यम की वजह से निर्धारित गति से पूरा नहीं हो रहा है, या आपके स्कूल के प्रबंधक को लगता है कि अतिरिक्त कक्षा भी लगायी जानी चाहिए, चाहे ज़रूरत हो अथवा नहीं, तो आप अतिरिक्त कक्षा को भी झेलने के लिए तैयार ही रहें। 

उसके बाद, वापस बस की उबाऊ यात्रा के बाद घर पहुँचो। घर पहुँच कर थोड़ा तरो-ताज़ा हुए नहीं कि पुनः किताबें उठाकर ट्यूशन के लिए भागो। इस मशीनी दिनचर्या के बाद भी यदि ‘स्कूल से बाहर के साँस्कृतिक वातावरण के लिए बच्‍चों का समय बच पाता हो, तो यह किसी अजूबे से कम नहीं होगा। साथ ही, उनकी दैनिक स्‍कूली गतिविधियों में स्कूल से बाहर की क्रियाएँ शामिल होती होंगी, यह सोचना तो पूर्णतः फिजूल की ही बात होगी। पर इस अनुसंधान का यह उद्देश्य भी है इसलिए आइए थोड़ा-सा विचार इस बारे में कर ही लेते हैं।  स्कूल से बाहर  के साँस्कृतिक वातावरण के सन्दर्भ में राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005 में कहा गया है कि,

“स्थानीय परिवेश केवल भौतिक-प्राकृतिक नहीं होता, बल्कि सामाजिक- साँस्कृतिक भी होता है। हर बच्चे के घर में उसकी अपनी आवाज होती है। स्कूल के लिए आवश्यक है कि कक्षा में भी वो आवाज सुनी जाए। समुदायों का साँस्कृतिक स्रोत भी प्रचुर होता है। लोककथाएँ, लोकगीत, चुटकले, कलाएँ आदि के माध्यम से स्कूल की भाषा और ज्ञान को हम समृद्ध बना सकते हैं। ”

इस मुद्दे पर बात करने के लिए जैसे ही अनुसंधानकर्ता ने अनुसंधान के दौरान अपनी बात रखी, तो दो टूक से जबाब आए। प्राचार्य सी/C जो स्वीकार करती है कि उनके पास आने वाले बच्चे या तो ग्रामीण हैं या शहरी निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं, अर्थात् ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनमें अब भी रूड़ मानी जाने वाली जन-बोलियों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् ऐसे परिवार जिनके परिवेश में जन-बोलियों को बोलने का चलन है। जब अनुसंधानकर्ता ने स्कूली परिसर में जन-बोलियों के प्रयोग की बात उठाई, तो उन्होंने वैसा-ही दो टूक जबाब दिया - “मैं अपने स्कूल में देहाती बोलियों में बोलने की बिलकुल भी इजाज़त नहीं देती हूँ।” 

एक अभिभावक (अजित) ने भी इसकी पुष्टी करते हुए बताया,  “वे (स्कूल) हमारी भाषाओं को बैड लैंग्वेज कहते हैं। यदि स्कूल में बच्चा इसका प्रयोग करे तो हमें अभिभावक-शिक्षक-बैठक (पीटीएम/PTM) में बुला कर फटकारा जाता है और कहा जाता है कि वह ‘रूड भाषाओं’ से स्कूल परिसर को गन्दा करता है। उसे सभ्य भाषा सीखाएँ।” 

प्राचार्य एफ़/F, जिनका स्कूल ग्रामीण क्षेत्र में है, उनका कहना है -“स्कूल में हम ग्रामीण क्षेत्र से क्वालीफाईड  लोगों को भी टीचिंग स्टाफ़ के लिए नहीं लेते हैं, ना ही स्कूली प्रक्रिया के बीच में (पाँचवी, छठी कक्षा में) किसी बच्चे का दाखिला ही लेते हैं। क्योकि दोनों ही अवस्थाओं में स्कूली परिसर की भाषा प्रभावित होती है।” 

क्या इसके बाद भी जन-संस्कृतियों के स्कूली परिसर में प्रवेश की गुंजाइश शेष बचती है? जो स्कूली परिसर में लोक-कथाओं, लोकगीतों, चुटकुलों आदि को स्कूली परिनेश में जगह दिला सके। वैसे प्राचार्य सी/C का स्पष्ट मानना है, “आदिवासियों में तो दिमाग ही नहीं होता।” प्रसिद्ध वकील और कम्युनिस्ट विचारधारा की सोशलिस्ट वर्कर पार्टी के नेता राजेश त्यागी जी का तो स्पष्ट मानना है कि आदिवासियों एवं देहातियों की बोली में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को पढ़ाया ही नहीं जा सकता है। यदि अब भी कोई सम्भावना साँस्कृतिक ज्ञान की स्कूली परिसर में प्रवेश करने की शेष बचती है तो वह महज गणतन्त्र दिवस,  स्वतंत्रता दिवस, हिंदी दिवस आदि अवसरों पर होने वाले नुमाइशी साँस्कृतिक कार्यक्रम भर ही हैं। जैसा कि अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल की एक प्राचार्या ने कहा भी,  इंडिपेंडेंस डे, रिपब्लिक डे  और हिन्दी दिवस को हम शुद्ध हिन्दी में बोलने की छूट देते हैं

जैसा कि अपनी पुत्री की मातृभाषा अंग्रेजी बताने वाले अभिभावक के बताया, “हमारी बच्ची जब ताया-ताई को देहाती बोलियों में बात करते हुए सुनती है, तो उनको बैड़ लेंग्वेज के प्रयोग को खतम करने की नसीहतें भी देती है।” एक अन्य अभिभावक अजित ने बताया कि उनके परिवार में तय हुआ है कि अब वे घर में अपनी भाषा, अर्थात् बैड लेंग्वेज का प्रयोग नहीं करेंगे।”

राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005  के अंतर्गत उत्पादक कार्यों को स्कूली व्यवस्था का भाग बनाने की विशेष रूप से वकालत की गई है। इसमें कहा गया है -

“उत्पादक कार्य, प्रभावी शिक्षण का माध्यम बन सकते हैं -  (क) कक्षा के ज्ञान को बच्चों के जीवन अनुभव से जोड़ा जाये; (ख) हाशिये के समाजों के बच्चों को, जिन्हें काम से जुड़े कौशल का ज्ञान होता है, अपने संपन्न साथियों का मान-सम्मान पाने का अवसर मिल सकेगा और (ग) संचित मानवीय अनुभव, ज्ञान और सिद्धांतों को इस प्रकार संदर्भित किया जा सकेगा।”

अनुसंधानकर्ता को वर्तमान औपचारिक शिक्षा की उबाऊ व्यवस्था में, कहीं-भी उत्‍पादक कार्यों के लिए कोई स्थान नज़र नहीं आ रहा है, न ही किसी प्रकार का सम्मान ही। सर्वप्रथम, रमेश की माँ ने अनुसंधानकर्ता को बताया, “कोई भी बालक भैंस के कामों में रुचि नहीं लेता, हर कोई इन कामों को एक-दूसरे पर टालने का प्रयास करता है।”

पीटीएम अर्थात् अभिभावक शिक्षक बैठक के दौरान एक शिक्षक ने ग्रामीण अभिभावक से व्यंगात्मक लहज़े में कहा, आप लोग अपने बच्चों से खेत में ही काम करवाओगे। न्यार (चारा) ही कटवाओगे। अरे! इस तरह-से अंग्रेजी-माध्‍यम  की पढ़ाई नहीं होती। आपके बच्चे इंग्लिश में कमजोर हैं, इस कारण दूसरे विषय भी नहीं पढ़ पा रहे हैं। खेत और न्यार (चारे) का काम छुड़वा कर ट्यूशन की व्यवस्था करो। इस तरह अंग्रेजी माध्‍यम नहीं चलता है।”

ऊपर के दोनों वक्तव्यों से क्या आशय निकाला जाएगा? क्या हम कह सकते हैं कि स्कूल ने उत्पादक कार्यों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है? क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि दस से बारह घण्टे की उबाऊ स्कूली व्यवस्था के बाद बच्चे उत्पादक कार्यों में रूचि लेंगे? क्या चाय बेचने वाले का बच्चा, अपने पिता के चाय बेचने के काम में सहयोग दे पाता होगा? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था 85% के सीमांत वर्ग को अपने अंदर समाहित कर पाती है? क्या उत्पादक कार्य करने वाले परिवारों और उन परिवारों के बच्चों को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सम्मान मिल पाया है और क्‍या मिल पाएगा?

जैसा कि भिडूकी गाँव के ग्रामीणों ने बताया, “प्राइवेट सीबीएसई स्कूल जाने वाले बच्‍चे परिवार के किसी-भी काम में सहयोग नहीं कर पाते। ना तो खेती-किसानी में, ना पशुओं की देखभाल में।”

क्या इसके बाद भी हम कह सकते हैं कि औपचारिक शिक्षा में उत्पादक कार्यों का कहीं-भी कोई स्थान शेष है? क्या इसके बाद भी अंग्रेजी माध्यम स्कूली संस्कृति में कहीं कोई स्थान सामुदायिक संस्कृति के लिए बच पाता है? शायद अभी इसकी उम्मीद करना, अति आशावादिता  ही होगी।

 

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