खतरा है इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था
शिक्षा के समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के आधार पर इंग्लिश के वर्चस्व वाली शिक्षा व्यवस्था की विवेचना
औपचारिक शिक्षा को लेकर समाज के अंदर अनेक प्रकार के मिथ प्रचलित हैं।
पहला तो यही है कि यह समाजिक कल्याण के
लिए है तथा आदर्श समाज की स्थापना के लिए है। दूसरा, यह समाज में क्राँतिकारी परिवर्तन को लाने का साधन है। पर हकीकत इससे कहीं परे है। थोड़ी गहराई पर
विवेचना करने पर हम पाते हैं कि यह राज्य नियंत्रित औपचारिक शिक्षा व्यवस्था
राजव्यवस्था और पूँजीव्यवस्था के एजेंट से ज्यादा कुछ नहीं है। औपचारिक शिक्षा
व्यवस्था, राजव्यवस्था और पूँजीव्यवस्था की उपव्यवस्था के
रूप में इन दोनों पर वर्चस्व प्राप्त वर्ग की ही इच्छा पूर्ति का ही साधन मात्र है।
यह उपव्यवस्था राज्यव्यवस्था और पूँजीव्यवस्था पर वर्चस्व प्राप्त वर्ग के मूल्यों
को ही समाज में आरोपित करने का काम करती है। औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की इस भूमिका
की समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों पर विवेचना का प्रतिपादन दुर्खाईम, टालकोट और बोर्जियो जैसे समाजशास्त्रियों ने भी किया है। इस पाठ में हम
उन्हीं के प्रतिपादित सिद्धान्तों को आधार बनाकर औपचारिक शिक्षा व्यवस्था
की विवेचना करेगे।
1.
2.
औपचारिक
शिक्षा की तमाम संस्थाएँ जैसे प्लेस्कूल, नर्सरी, प्राथमिक,
माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्कूल, पोलीटेकनिक-कॉलेज-विश्वविद्यालय,
आईआईटी-आईआईएम, युपीएससी-कैट-मैट जैसी परीक्षाओं को आयोजित करने वाली ऐजेंसियाँ,
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेण्टर,
इसके अतिरिक्त कंप्यूटर कोर्स एवं इंग्लिश स्पीकिंग सिखाने वाली संस्थाएँ (शायद अब
भी कुछ नाम छूट गए होंगे), पर ये सभी ऐजेंसिया सामाजीकरण की द्वितीयक एजेंसी के
रूप में सिर्फ़ और सिर्फ़ वर्चस्व प्राप्त वर्ग के मूल्य-मान्यताओं एवं कौशलों की
धारणाओं को ही न केवल युवा वर्ग में, अपितु शेष समाज में समाहित करने का कार्य करती है।
3.
औपचारिक
शिक्षण संस्थाएँ साँस्कृतिक मूल्यों के लिए युवा लोगों के समाजीकरण के द्वारा
व्यवस्था को और अधिक समर्थन एवं मजबूत बनाने में मदद करती हैं। यह समाज के शीर्ष
वर्ग की ज़रूरत के अनुरूप शेष समाज की सोच में निरंतर परिवर्तन करने का प्रयास
करता रहता है। और यह प्रयास कार्य कुछ हद तक ही घोषित तरीके से चलता है, परन्तु
शेष व्यवहारों और परिणामों के उदाहरणों के माध्यम से अघोषित रूप में शेष जन में
स्थापित किया जाता है। अघोषित तरीके से पड़ने वाली छाप का ज्यादा गहरा साँस्कृतिक
असर होता है। इसमें से कुछ ही स्पष्ट हो पाता है और लोगों को भी समझ में आता है।
पर क्रियाएँ इतनी स्वाभाविक हो जाती है कि अधिकतर साँस्कृतिकरण के टूल जन-सामान्य
के समझ से बाहर की ही बाता हो जाती है। औपचारिक शिक्षा के माध्यम से खुले रूप में
बच्चों और युवाओं का साँस्कृतिकरण करने की प्रक्रिया छुपे रूप में समस्त समाज का साँस्कृतिकरण
करती है। नीचे की आबादी बेशक अपने आप को उन स्थापित साँस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप
अपने आप को परिवर्तित न कर पाए, पर उसके वर्चस्व को स्वीकार कर
लेती है।
4.
ऊपर से
देखने में लगता है कि औपचारिक शिक्षा संपूर्ण
व्यवस्था श्रेष्ठता, योग्यता, क्षमता को निखारने का काम कर
रही है। कहने को श्रेष्ठता, योग्यता और क्षमता के आधार पर
समाज के सभी लोगों को आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध कराती है। पर इस श्रेष्ठता, योग्यता व क्षमता की परिभाषा को
तय करने का काम दृश्य एवं अदृश्य रूप में समाज
का शीर्ष वर्ग ही तय कर रहा होता है। इस प्रकार वह ही तय करता है कि समाज के किस
काम के लिए किस प्रकार की योग्यता की ज़रूरत है। समाज में वर्चस्व-प्राप्त कामों
के लिए अंग्रेजी अनिवार्य करके उन कामों को पूर्णतः अंग्रेजीभाषी लोगों के लिए
आरक्षित कर दिया जाता है। कहने को भारत में सरकार, संविधान के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, आर्थिक एवं समाजिक
रूप से पिछडे वर्गों के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं एवं नौकरियों में आरक्षण की
व्यवस्था है। पर ज्ञान, योग्यता, कौशल, क्षमता को तय करने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है
कि यह समाज के शीर्ष ऐलिट वर्ग के ही अनुरूप रहता है। आदिवासियों का ज्ञान कभी
स्थापित ज्ञान की बराबरी नहीं कर पाता। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विद्यार्थियों/अभ्यर्थियों
को शीर्ष द्वारा स्थापित ज्ञान को अपनाना ही पड़ता है। इसी प्रकार, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछडे वर्गों की भाषा औपचारिक व्यवस्था का भाग
नहीं होती। आरक्षण की व्यवस्था इसलिए है कि इस वर्ग के भी लोग ऐलिट वर्ग में
समाहित हों। जाति आधारित इस व्यवस्था में भी उन्हीं लोगों के पास अवसर अधिक होते
हैं, जो तय मापदंडों के करीब होते हैं। अनिल मीणा (अजजा/ST)
और विजय (अजा/SC) जैसे विद्यार्थी तो आरक्षण जैसी व्यवस्था के बावजूद अपवाद स्वरूप
ही इन शीर्ष केन्द्रों तक पहुँच पाते हैं और फिर बहुत जल्दी धकिया दिए जाते हैं।
अतः इंग्लिश मीडियम की अनिवार्यता एक ऐसा माहौल पैदा करती है कि इन आरक्षित वर्गों
के भी ऊपर के पायदानों के कुछ हद तक अंग्रेजी जानने वाले लोग ही लोग उच्च शिक्षा
के श्रेष्ठ संस्थानों तक पहुँच पाते हैं और फिर सत्ता के उसी रंग में रंग जाते हैं।
5.
औपचारिक
शिक्षा की भूमिका लोगों को वर्गीकृत करने की है तथा औपचारिक शिक्षा अहर्ता एवं
परीक्षाओं के माध्यम से समाज की स्थापित व्यवस्था के अनुरूप लोगों का विभाजन करने
का कार्य करती है। व्यवस्था किस प्रकार के साँस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करना
चाहती है, यह काफी हद तक औपचारिक व्यवस्था की मूल्यांकन पद्धति
तय करती है। पाठ्यक्रम देख कर तय किया जा सकता है कि व्यवस्था का फोकस क्या है?
शिक्षण की प्रविधि तय करती है कि विषय से विद्यार्थी को व्यवस्था किस रूप में
जोड़ना चाहती है। व्यवस्था क्या चाहती है? सतही जानकार या विवेचनशील। ये वार्षिक की जगह सेमिस्टर सिस्टम के पीछे की
राजनीति क्या है? औपचारिक शिक्षा पर किस वर्ग का साँस्कृतिक वर्चस्व बना रहे, यह भाषाई माध्यम तय करता है।
6.
मानव पूँजी शिक्षा और स्तरीकरण
कौशल, योग्यता और कार्य सम्बन्धी ज्ञान को मानव पूँजी की अवधारणा के
रूप में समेट सकते हैं। मानव पूँजी से तात्पर्य समाज के उत्पादक कार्यों के अनुरूप
लोगों में ज्ञान, कौशल एवं तकनीकी समझ विकसित करना। चूँकि अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग तरह के कौशल की
आवश्यकता होती है। अतः औपचारिक शिक्षा की विभिन्न संस्थाएँ व्यवस्था के द्वारा तय
मापदंडों के अनुरूप अलग-अलग प्रकार की मानवीय पूँजी तैयार करने का कार्य करती हैं।
जैसे- आईआईटी इंजिनियर तैयार करने का काम करती है तो आईटीआई तकनिशियन। इसी प्रकार, अन्य संस्थाएँ भी मजदूर-चपरासी से लेकर जज, डॉक्टर जैसी मानवपूँजी तैयार
करने का काम करती है। औपचारिक शिक्षा की वास्तविक भूमिका वर्चस्व प्राप्त वर्ग की
संस्कृति के अनुरूप संस्कृतिकरण की ही है। मानवीय पूँजी के निर्माण की प्रक्रिया
में वर्चस्व प्राप्त वर्ग के मूल्य को शेष समाज के मूल्यों में समाहित किया जाता
है। आईटीआई का प्रशिक्षण क्षेत्रीय माध्यमों में संभव है। पर क्या आईआईटी की
इंजिनयरिंग की शिक्षा, आईआईएम की मैनेजमेंट की शिक्षा, तमाम मेडिकल कॉलेजों की
शिक्षा, वर्चस्व प्राप्त विश्वविद्यालयों की शिक्षा भी क्या क्षेत्रीय भाषा
माध्यमों में होती है? किसी भी प्रकार की मानवपूँजी की
वर्चस्व प्राप्त वर्ग की साँस्कृतिक पूँजी से ओहदेवार तुलनात्मक दूरी जितनी कम
होगी, उतना ही उस मानव पूँजी के निर्माण पर वर्चस्व
प्राप्त वर्ग की संस्कृति का प्रभाव अधिक दिखेगा।
औपचारिक शिक्षा की सर्वोच्च संस्थाएँ ‘साँस्कृतिक पुनरुत्पादन’ के माध्यम
से साँस्कृतिक पूँजी को और अधिक पुख्ता करती जाती है। ‘साँस्कृतिक पुनरुत्पादन’
से तात्पर्य, समाज के वर्चस्वशाली वर्ग की संस्कृति को पैदा
करना और उसके साँस्कृतिक वर्चस्व को कायम रखना है। साँस्कृतिक पूँजी, एक
जैसा सोच-विचार रखने वाले लोगों का एक छोटा-सा समूह तैयार करती है। यह छोटा-सा
समूह ही समाज की सामाजिक पूँजी है। इस प्रकार यह सामाजिक पूँजी एक प्रकार के समूह-संबंधों पर आधारित है। इसके ही हाथ में
समाज की अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था का नियंत्रण होता है। यह समूह ही
अर्थव्यवस्था की शर्तों को भी तय कर रहा होता है।
एक तरह का वैचारिक स्तर रखने वाले वर्ग का एक समूह बन जाता है। वर्चस्ववादी
वर्ग ही तय करता है कि समाज के अलग-अलग स्तर की मानव पूँजी के लिए किस प्रकार ‘साँस्कृतिक-गमन’
की आवश्यकता है। ‘साँस्कृतिक-गमन’ के लक्ष्य के अनुरूप ही मानवीय पूँजी के ज्ञान,
कौशल, क्षमता
की परिभाषाएँ गढ़ी जाती हैं। समाज में अलग-अलग वैचारिक स्तर के अलग-अलग
समूह होते हैं। जिनका पद-क्रम साँस्कृतिक पूँजी के केंद्र से दूरी के आधार पर तय
किया जाता है। इस साँस्कृतिक पूँजी के संरक्षण का लक्ष्य आर्थिक पूँजी को वर्चस्व
प्राप्त वर्ग तक समेटे रखना है।
ऊपर के विश्लेषण को समझने के लिए मार्क्सवादी चिंतक ग्रामिस के ‘साँस्कृतिक आधिपत्य’ के सिद्धांत के दृष्टिकोण से भी
देखना होगा। ये साँस्कृतिक आधिपत्य समाज के साँस्कृतिक रूप से वर्चस्ववादी वर्ग का
पैदा किया हुआ है। निस्संदेह ऐसी व्यवस्था में वे लोग ही सफल हो पाएँगे, जो व्यवस्था के हिसाब से साँस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ होंगे। साँस्कृतिक
रूप से हीन माना जाने वाला वर्ग न केवल तय मापदंडों के आधार पर असफल होकर निचले
पायेदानों पर अटकेगा, अपितु वर्चस्वशाली वर्ग के साँस्कृतिक
मूल्यों की श्रेष्ठता को भी अपनाता जाएगा।
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