अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक वातावरण
अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक वातावरण
क्या अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में बाल केन्द्रित रचनात्मक
एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र के अनुरूप शिक्षा के लिए उपयुक्त वातावरण का
निर्माण संभव भी है?
‘बाल-केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक
पद्धति’ ‘औपनिवेशिक नागरिक’ तैयार करने वाली ‘शिक्षक-केन्द्रित एवं पुस्तक-केन्द्रित शिक्षा पद्धति’ से सर्वथा भिन्न है।
शिक्षक-केन्द्रित
पद्धति में शिक्षक ही ज्ञान का केन्द्र होता है। विद्यार्थी का काम शिक्षक द्वारा
उढ़ेले गये ज्ञान को बिना तर्क के आत्मसात करना भर होता है। वहीं पुस्तक-केन्द्रित
पद्धति में पुस्तक में लिखी बात ही अंतिम सत्य होती है। पुस्तक-केन्द्रित पद्धति
को पुस्तक-केन्द्रित न कह कर यदि सहायक-पुस्तक-केन्द्रित पद्धति कहा जाए तो ज्यादा
बेहतर होगा। सहायक-पुस्तक अर्थात् गाईड, कुंजी, गुटका। इस पद्धति में जो गाईड में
लिखा है, वही अंतिम ज्ञान है। अब चाहे वह कितना भी आधा-अधूरा हो। बेशक वह तर्कहीन, आधारहीन
हो,
तथ्य भी गलत हो। ‘रट लो और फरीक्षा में
उतार दो’! बस, इतना भर विद्यार्थी का काम है। शिक्षक-केन्द्रित एवं पुस्तक-केन्द्रित पद्धति के मूल में केवल रटना ही है।
बाल-केन्द्रित पद्धति, दोनों
पद्धतियों से सर्वथा भिन्न है। बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक पद्धति में
शिक्षक विद्यार्थियों पर ज्ञान को थोपता नहीं है। अपितु वह विद्यार्थी के भौगोलिक, सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश के अनुरूप ऐसा वातावरण तैयार करता है कि
विद्यार्थी औपचारिक एवं अनौपचारिक वातावरण में स्वतः ही तालमेल कर संवाद स्थापित
कर सके। फलस्वरूप विद्यार्थी ज्ञान के सृजनकर्ता बन जाते हैं। इस प्रकार के शिक्षण
का शिक्षाशास्त्रीय उद्देश्य विद्यार्थी में प्रश्न करने एवं विचार करने की
क्षमता पैदा करना है, न कि रटे रटाए जबाव देने के लिए तैयार करना है।
राष्ट्रीय
पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005 में निर्धारित किए गए प्रमुख सिद्धांत इस
प्रकार से हैं -
Ø “बड़े होते हुए बच्चे, अपने परिवेश से काफी कुछ सहजता से सीख लेते
हैं। वे अपने आस-पास के जीवन तथा दुनिया पर भी नज़र रखते हैं। जब उनके अनुभवों को
कक्षा में लाया जाता है, तब उनके प्रश्नों तथा जिज्ञासाओं से पाठ्यचर्चा अधिक
समृद्ध और रचनात्मक बनती है ।”
Ø “उत्पादक
कार्यों को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए। उत्पादक
कार्य,
स्कूली शिक्षा का भाग बन सके, इसके लिए ‘कक्षा के ज्ञान’ को ‘बच्चों के जीवन अनुभवों’ के साथ जोड़ा जाए, ‘काम से जुड़े कौशलों’ को
‘स्कूली शिक्षा’ में पर्याप्त स्थान दिया जाए एवं ‘संचित मानवीय अनुभव तथा
ज्ञान’ को भी ‘संदर्भित’ किया जाए।
बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं, जब उन्हें लगे कि उन्हें महत्वपूर्ण माना जा
रहा है।”
Ø “बाल-केन्द्रित
रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र का अर्थ है, बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को
प्राथमिकता देना।”
Ø “समाज
की हर पीढ़ी को विरासत में सांस्कृति एवं ज्ञान का एक भंडार मिलता है। जिसे वह अपनी
गतिविधियों तथा समझ से समाहित करते हुए ऩए ज्ञान रचने की सार्थकता महसूस करता है।”
Ø “समाज
में मिलाने वाली अनौपचारिक शिक्षा, विद्यार्थी में अपना ज्ञान स्वयं सृजित करने की
स्वभाविक क्षमता विकसित करती है। जिससे विद्यार्थी को अपने आस पास के सामाजिक एवं
भौतिक वातावरण से जुड़ने की क्षमता विकसित होती है ।”
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ‘बाल
केन्द्रित शिक्षण व्यवस्था ’ एक प्रकार से ‘संस्कृति-केन्द्रित-शिक्षण व्यवस्था ’ ही है। इस प्रकार के शिक्षण में शिक्षक एक सहायक की
भाँति विद्यार्थियों को अपने साँस्कृतिक सन्दर्भों के साथ ज्ञान की पुनरसंरचना
करने का अवसर प्रदान करता है।
अंग्रेजी माध्यम
स्कूलों का शैक्षिक वातावरण-
उक्त सिद्धांतों के
संदर्भ में,
अनुसंधान के दौरान अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में कुछ और ही परिवेश देखने को मिला।
अनुसन्धान के दौरान पाया कि विद्यार्थियों के साँस्कृतिक ज्ञान को अंग्रेजी माध्यम
की स्कूली व्यवस्था में कहीं कोई-भी स्थान प्राप्त नहीं है। साँस्कृतिक बोलियाँ जो
संचित ज्ञान का प्रतिबिम्ब होती हैं। उन बोलियों को तो अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के
स्कूली परिसर में विद्यार्थी एवं अध्यापकों के द्वारा प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध
होता है। एक तरफ़ विशिष्ट माने जाने वाले स्कूल तो पूर्णतः अंग्रेजी को ही अपने
परिसर की भाषा मानते हैं। वहाँ का तो पूरा ‘क्राउड’ ही उच्च और उच्च-मध्यमवर्गीय होता है। (‘क्राउड’ के लिए
कुछ लोग ‘स्टफ’ शब्द का भी प्रयोग करते हैं। ‘क्राउड’ या ‘स्टफ’ अर्थात् स्कूल के संदर्भ
में स्कूल परिसर में आने वाले लोग। पता नहीं, इसमें ‘चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी/क्लास फोर स्टाफ’ शामिल हैं अथवा नहीं)
परंतु दूसरी ओर, मध्य स्तर के इन स्कूलों के प्राचार्यों ने
माना कि उनके यहाँ आने वाले बच्चे ग्रामीण एवं निम्न मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के
होने की वजह से अंग्रेजी भाषा का किसी भी प्रकार का परिवेशजन्य ज्ञान नहीं रखते।
मजबूरन उन्हें अंग्रेजी के साथ-साथ थोड़ी हिंदी के प्रयोग की भी इजाज़त देनी ही
पड़ती है। पर वे भी परिवेश की साँस्कृतिक बोलियों को अपने परिसर में घुसने नहीं
देते। अंग्रेजी के ज़्यादा से ज़्यादा प्रयोग हेतु नये-नये हथकंड़े अपनाते रहते
हैं। जैसे- असैम्बली में मंच पर उन्हीं विद्यार्थियों को बुलाना, जो
अपेक्षाकृत बेहतर अंग्रेजी जानते हों; स्कूलों मे अक्सर अंग्रेजी के प्रयोग की हिदायत वाले नोटिस निकालते रहना; शिक्षकों पर अंकुश लगाकर रखना; स्कूल से शिक्षकों को निकालने के वक्त उनकी अंग्रेजी न
बोल पाने की अयोग्यता को आधार बनाना; विषय का ज्ञान न होने पर भी कुछ ऐसे शिक्षकों को नियुक्त
करना, जो
अंग्रेजी भाषा का प्रभाव रखते हों; ऐसे शिक्षकों को कुछ जिम्मेदार पदों पर आसीन करना; आदि आदि.. इसी प्रकार विद्यार्थ़ियों में भी
उनको अधिक तवज्जो देना, जो अंग्रेजी बोल पाते हों; अंग्रेजी न बोल सकने वालों को प्रताड़ित करते रहना; देहाती बोलियों का प्रयोग करते हैं। निस्संदेह उन स्कूलों में भी वातावरण
अपेक्षाकृत शहरी मध्यम वर्ग के ही अधिक अनुकूल होता है।
ग्रामीण इलाकों तथा
कस्बाई क्षेत्रों में खुले स्कूल अंग्रेजी माध्यम के अनुरूप वातावरण तैयार करने
के लिए शहरी क्षेत्र से शिक्षकों को बुलाने का विशेष प्रबंध भी करते हैं। जैसे ‘कैब’ (लाने-ले जाने वाली विशेष गाड़ी) की व्यवस्था करना, शहरी
क्षेत्र से आने वाले शिक्षकों के रहने के लिए कस्बाई इलाकों में होस्टल आदि की
व्यव्स्था करना, आदि। ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र के स्कूल-प्रबंधकों को शिक्षकों
की नियुक्ति करते वक्त भी डर लगा रहता है कि कहीं ग्रामीण बोली बोलने वाले लोग
स्कूल में नियुक्त ना हो जाएँ। अतः नियुक्ति के समय ही भाषा के प्रति दृष्टिकोण का
पता लगा लिया जाता है। विशिष्ट वर्ग के लोगों के लिए खुले ‘हाई-फाई’ स्कूल, जैसे-
डीपीएस आदि हों या मध्यम वर्ग एवं जनसामान्य
के लिए खुले निम्न दर्जे के स्कूल, अंग्रेजी भाषा के अनुकूल वातावरण तैयार
करना सबकी पहली प्राथमिकता रहती है। मज़बूरी में बेशक क्षेत्रीय भाषाएँ आ भी जाएँ, पर नीतिगत
तौर पर वे कतई स्वीकार नहीं हैं। देहाती एवं कस्बाई स्कूल तो अपने स्कूल का प्रचार
ही इस आधार पर करते हैं कि उनके यहाँ का 100% वातावरण अंग्रेजी
का ही है। वे प्रमुखता से इस बात को
उठाते हैं कि उनके स्कूल में केवल अंग्रेजी का ही प्रयोग होता है। स्कूल चाहे
विशिष्ट दर्जे का हाई-फाई हो या मध्यम स्तर का, सभी के प्रबंधकों को हमेशा यह डर
लगा रहता है कि कहीं क्षेत्रीय बोलियों से स्कूल परिसर का माहौल ही गंदा ना हो
जाए। आखिर अभिभावक फ़ीस भी तो अंग्रेजी माध्यम के नाम की ही दे रहे हैं।
विशिष्ट समझे जाने वाले स्कूलों का दावा
है कि उनके शिक्षक तथा विद्यार्थी, ऐसे परिवारों से आते हैं, जहाँ अंग्रेजी भाषा को
बोल-चाल के लिए प्रयोग किया जाता है। वे यह भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है
कि आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ई.डब्ल्यू.एस.) की पृष्ठभूमि वाले बच्चे उनके स्कूल में
आते भी हैं। न ही वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि देहाती बोली बोलने वाले बच्चे
एवं अभिभावक उनके स्कूलों में आते हैं। उनका मानना है कि आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ई.डब्ल्यू.एस.) का विद्यार्थी उनके यहाँ टिक भी नहीं पाएगा। हालाँकि माता-पिता
से बातचीत करने पर ऐसा नहीं पाया गया। माता-पिता आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग के हों
या कमजोर वर्ग के, दोनों के घर-परिवार में
क्षेत्रीय व देहाती भाषा-बोलियों का प्रयोग होता ही है। हाँ! स्कूलों के दबाव में बच्चों के सामने क्षेत्रीय व देहाती भाषा-बोलियों को बोलने पर कुछ अंकुश जरूर
लग गया है। वहीं
मध्यम स्तर के स्कूल इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके स्कूल में आने
वाले बच्चों के परिवेश में अंग्रेजी के शब्दों का थोड़ा-बहुत प्रयोग होता भी हो, पर शायद
ही पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा बोली जाती हो।
एक प्राचार्य के शब्दों में “ न तो
शिक्षक, न ही विद्यार्थी ही ऐसे परिवेश से आते हैं, जहाँ अंग्रेजी बोली जाती हो। उनके स्कूल मे आने वाले बच्चों के घरों मे तो
अंग्रेजी भाषा का प्रयोग शायद ही कभी होता हो।” स्कूल के
प्राचार्य के अनुसार, “ स्कूल परिसर में कुछ हद तक अंग्रेजी के साथ हिन्दी के
प्रयोग की भी इजाज़त दे दी जाती है।”
परंतु स्कूल के शिक्षकों की इस बात पर
विपरीत प्रतिक्रिया है - “आपको प्रिंसिपल ने ऐसा कहा होगा, पर हकीकत में हम पर
तो अंग्रेजी भाषा के प्रयोग का दबाव बना रहता है। प्रत्येक स्टाफ-मीटिंग में ‘इंग्लिश कल्चर - इंग्लिश कल्चर’ ही सुनाई देता
है। छात्र हो या शिक्षक, सबको हमेशा ‘स्पीक इन इंग्लिश - स्पीक इन इंग्लिश’ बोलते रहते हैं।” इस बात की पुष्टि बच्चों ने भी की
और आगे जोड़ते हुए कहा, “साँस्कृतिक कार्यक्रमों / कल्चरल प्रोग्राम में भी
इंग्लिश का ही बोलबाला होता है। देखने वाले अंग्रेजी नहीं जानते पर फिर भी
‘इंग्लिश प्ले’ (नाटक) ही होगा।”
इंग्लिश स्पीकिंग कल्चर बनाने के लिए स्कूल प्रबंधक साम, दाम, दंड, भेद
अर्थात् हर प्रकार की नीति का प्रयोग करते हैं। स्कूल के प्रचार / पब्लिसिटी का आधार भी स्कूल का अंग्रेजी वातावरण ही है।
अंग्रेजी वातावरण की एक वजह अभिभावकों की अंग्रेजी की मांग भी है। अभिभावक बेशक
अंग्रेजी भाषा का बेसिक भी न जानता हो पर उसकी इच्छा रहती है कि शिक्षक सिर्फ़ और
सिर्फ़ अंग्रेजी का ही प्रयोग करे। बच्चे को समझ में आ रहा है या नहीं, इससे भी
बड़ा प्रश्न यह बन जाता है कि बच्चा अंग्रेजी सुन/समझ रहा है कि नहीं। अतः अपने ग्राहकों, अर्थात् अभिभावकों की संतुष्टि के लिए
प्रबंधकों एवं प्रिंसिपल की तरफ़ से शिक्षकों और बच्चों पर हमेशा दबाव रहता है कि
वे स्कूल परिसर में अंग्रेजी का वातावरण तैयार करें। अतः अंग्रेजी वातावरण के दबाव
की दूसरी सबसे बड़ी वजह माता-पिता तथा विद्यार्थियों की शिक्षण को लेकर बनी गलत
अवधारणा भी है। एक शिक्षक के शब्दों में, “वे अंग्रेजी बोलने को ही शिक्षण समझते
हैं। बेशक उन्हें अंग्रेजी में कही बात समझ आए या ना आए। उन्हें तो बस गाईड में
निशान लगा कर दे दो। रट लेंगे बस! बस दो-चार
लाईन अंग्रेजी में बोल दो, तो समझने लगे कि पढ़ाई हो गई।” जबकि विद्यार्थियों से
हुई समूह-वार्ता में विद्यार्थियों ने बताया कि उन्हें विज्ञान में पारिभाषाएँ
लिखवा दी जाती हैं। उनकी भूमिका उसे याद करके लिखने की होती है। किसी भी प्रकार की
दैनिक गतिविधियों को स्कूली-चर्चा में शामिल नहीं किया जाता क्योकि जैसे ही दैनिक
गतिविधियों को शामिल करने की बात आती है, कृत्रिम रूप से बनाए गए अंग्रेजी वातावरण में हिंदी व
क्षेत्रीय भाषाएँ/बोलियाँ घुसपैठ करने लगती हैं। अंग्रेजी में रटी-रटाई बातें तो
उगली जा सकती हैं पर मौलिक चिंतन के लिए परिवेश की बोली ही अनुकूल होती है। परन्तु
परिवेश की भाषा/बोलियों पर अंकुश लगाने से कक्षा में स्वतंत्र रूप से प्रश्न
पूछने, विचार-विमर्श करने की प्रक्रिया बाधित रहती है।
“जैसे ही
कक्षा की परिचर्चा में दैनिक गतिविधियों को शामिल करने की बात उठती है
तिलिस्मी-भाषा का आवरण उड़न-छू हो जाता है और स्कूल परिसर के अंग्रेजीमय वातावरण
गन्दा करने वाली साँस्कृतिक बोलियाँ भूतों की तरह स्कूली परिसर में घुस आती हैं।”
इस संबंध में, दसवीं कक्षा
की छात्रा आरूणी का वक्तव्य गौर करने लायक है। आरुणी के अनुसार, “ स्कूल में किताब पढ़ा देते हैं। गाइड में से
प्रश्न-उत्तर लिखवा देते हैं। यदि दूसरी गाइड में कुछ और प्रश्न मिल जाएँ तो उसे
भी लिखवा देते हैं। हम उसे रट लेते हैं। आठवीं तक तो काम चल जाता था क्योंकि
प्रश्नपत्र स्कूल का ही होता था। परंतु नवीं कक्षा में दिक्कत आ रही है क्योंकि
प्रश्नपत्र सीबीएसई से छप कर आता है।”
आगे छात्रा ने खुद इस समस्या को बताया
“यदि हमने समझा होता तो खुद अपने मन से भी लिख देते पर हमने तो रटा है। सीबीएसई से
आया प्रश्न थोड़ा-भी घुमा कर आ गया तो उसे नहीं कर पाएँगे।”
इसी प्रकार की प्रतिक्रिया रमेश ने दी, उसके
अनुसार, “विज्ञान जैसे विषय को भी नोटबुक में लिखवा भर देते हैं। प्रयोगशाला में
भी ले जाकर कुछ-कुछ करा देते हैं। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमने स्कूल के बाहर की
किसी वस्तु अथवा घर में प्रयोग किये जाने वाले सामान को स्कूल में प्रयोग के
दौरान प्रयोग किया हो या पढ़ाने के दौरान
उदाहरण भी दिया हो।”
ऐसा इसलिए, क्योकि स्कूल के बाहर के प्रयोगों तथा घर
में रसोई के सामान के साथ किये प्रयोगों के साथ घर एवं परिवेश की बोली-भाषा भी स्कूल
परिसर में प्रवेश करती है। परिचर्चा में शामिल विद्यार्थियों के अनुसार स्कूल में
उन्हीं बच्चों को अधिक अंक मिलते हैं जो याद कर लिखते हैं। अतः स्कूली शिक्षण का
मुख्य केंद्र याद करना ही है। रमेश को विज्ञान की अपेक्षा सामाजिक विज्ञान इसलिए
अच्छा लगता है क्योंकि उसकी शिक्षिका उसे इस विषय में याद करने को नहीं बोलती। वह
मन से क्लास में सुना सकता है। पर यहाँ भी परीक्षा के लिए याद करने की ज़रूरत तो
पड़ती ही है। स्वयं उस स्कूल की प्राचार्य स्वीकार करती हैं और कहती हैं - “हम
बच्चों को कहते हैं कि लिखते वक्त वे थोड़ा याद करके लिखें क्योकि इंग्लिश में
सीधे लिखने पर गलती होने की आशंका बनी रहती है।”
सतत और व्यापक मूल्यांकन पद्धति
(सीसीई/CCE) लागू होने के बाद विद्यार्थियों की 9वीं तथा 10वीं परीक्षा
सेमेस्टर के अनुसार स्कूल में ही होती है। स्कूल के एक चपरासी ने सीबीएसई के
प्रश्नपत्र तथा स्कूल में अध्यापकों के बनाए प्रश्न पत्र में अंतर करते हुए बताया,
“ स्कूल के टेस्ट में तो ये बच्चे बिना गरदन हिलाए ही कर लेते हैं। पर सीबीएसई से
जब पेपर आता है तो ‘सब्जेक्ट टीचर’ को बुलाते-बुलाते मैं थक जाता हूँ।”
अर्थात् विद्यार्थियों की शंकाओं को दूर करने के लिए विषय-अध्यापक को बार-बार
बुलाना पड़ता ही है। रटे-रटाए प्रश्नों को छोड़ दें तो अग्रेजी में छपे प्रश्नों
को खुद समझ पाने में बच्चे असमर्थ रहते हैं।
बेशक सिद्धान्तः सतत और व्यापक
मूल्यांकन पद्धति (सीसीई) की मूल्यांकन
प्रविधि लागू है और बोर्ड का दावा है कि पाठ्यचर्चा अब बाल-केन्द्रित, रचनात्मक
एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र पर आघारित है। परन्तु फिर भी,
विद्यार्थी यदि विषयों को समझने के स्थान पर महज़ रटने पर जोर देते हों तो आप इसे
बाल-केन्द्रित,
रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र कैसे कह सकते हैं? वर्ष के अंत में ली
जाने वाली परीक्षा की भूमिका कम हुई है पर कक्षा में चलने वाली निरंतर
मूल्यांकन-प्रक्रिया में विद्यार्थी के साँस्कृतिक वातावरण के अनुभवों को किस
मात्रा में शामिल किया जाता है? या उसमें भी साल के अंत में ली जाने वाली परीक्षा
के अनुरूप साल भर के टेस्ट में तब्दील दिया जाता है? अभिव्यक्ति परीक्षण /
एक्सप्रेशन टेस्ट के नाम पर अंग्रेजी में रटी-रटायी बातें उगलना क्या स्वतंत्र
अभिव्यक्ति को दर्शाता है? “रटो, याद करो, लिख दो या सुना दो और फिर भूल जाओ” यह किस प्रकार
की मानसिकता को दर्शाता है? इसी प्रकार का एक टेस्ट आरूणी ने दिखाया। जिसमें वही
प्रश्न टेस्ट में दिये थे जो पुस्तक में छपे थे। प्रोजेक्ट की भूमिका बच्चों को
पास कराने के ‘यंत्र’ के रूप में है। बच्चे की किताबों में जो
छपा होता है,
उसे ही सुसज्जित पुस्तिका / डेकोरेटेड़ नोटबुक में लिख भर दिया जाता है।
उक्त विश्लेषण के आधार पर
अनुसंधानकर्ता शिक्षण-अधिगम के इस वातावरण को बाल-केन्द्रित, रचनात्मक
एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र के अनुरूप तो दूर, शिक्षक-केन्द्रित भी नहीं कहेगा। इस अवलोकन के आधार
पर इसे शुद्ध रूप से पुस्तक-केन्द्रित,
वह भी सहायक-पुस्तक-केन्द्रित वातावरण ही कहा जाएगा, जिसमें पकी-पकाई जानकारियों को रटना भर ही
ज्ञान कहा जाता है। इसमें, ज्ञान वही है जो सहायक पुस्तको में लिखा है। जैसा कि
विद्यार्थियों ने बताया, “ शिक्षक लिखवा भर देते है और हम लिख लेते है। फिर याद कर
लेते हैं, यानी रट लेते हैं। यदि किसी ने थोड़ा-सा घुमा
कर पूछ लिया तो हमारे होश उड़ जाते हैं।”
शिक्षकों ने इसी बात पर अपनी परेशानी
व्यक्त करते हुए कहा, “वे क्या करें, बच्चों का भाषा का स्तर ऐसा नहीं होता कि वे इंग्लिश
में समझ सकें और हम पर प्रबंधकों का इतना दबाव होता है कि हम चाह कर भी उनकी भाषा
में समझा नहीं सकते। जो किताब में छपा है, उसी को थोड़ा डायल्यूट
(सरल) भर कर देते हैं और फिर कह देते हैं कि जो किताब में छपा है, उसे थोड़ा याद कर लो। ”
अतः इस प्रकार बाल-केन्द्रित, रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र
अर्थात् राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005 के
आधार पर पाठ्यचर्चा लागू होने
के बाद भी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का शैक्षिक वातावरण, शिक्षण, अधिगम
शिक्षक-केन्द्रित या विषय-केन्द्रित भी नहीं रहा, अपितु
पूर्णतः सहायक-पुस्तक(गाइड)-केन्द्रित ही हो गया है। जिसके अनुसार पकी-पकाई
जानकारियों को रटना ही ज्ञान-प्राप्ति
कहा जाता है।
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