अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-6
समूह में विचार-विमर्श की परम्परा प्राचीन काल से बनी हुई है। समूह के बीच विचार-विमर्श के माध्यम से समूह के लोगों की किसी भी घटना विशेष को लेकर बनी संकल्पना, अवधारणा, विचार का पता लगाया जा सकता है। साथ ही साथ लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले कारकों के बारे में समुदाय में प्रचलित मत, विश्वास, तर्क-वितर्क का भी ज्ञान हासिल कर लिया जाता है। विचार विमर्श में भाग लेने वाले लोग अपने तर्क और विचारों को प्रकट करने हेतु स्वतन्त्र होते हैं। पर लोग तर्क को अपने वर्गीय हितों के अनुरूप गढ़ते हैं। बौद्धिक स्तर को नियंत्रण करने वाले वातावरणीय कारकों के आधार पर ही विचार प्रकट होते हैं।
समूह वार्ता के दौरान शोधकर्ता की भूमिका उन्हें विचार-विमर्श हेतु
एक भय-मुक्त वातावरण प्रदान करने वाले संचालक की रही है। संचालक की व्यक्तिगत
भूमिका फुटबाल मैच के रैफरी के समान ही रहती है। जो खिलाड़ियों को फुटबाल उपलब्ध
कराता है, खिलाड़ियों के साथ मैदान में भी होता है, खेल के मैदान में खिलाड़ियों के साथ भाग भी रहा होता है। पर इन सब के
बावजूद भी वह खेल का हिस्सा नहीं होता। उसकी भूमिका फुटबाल को मैदान के दायरे में
रखने और मैच को खेल के नियमों के अनुरूप चलाते रहने भर की होती है। इस क्रम में
शोधकर्ता ने दो समूह-केन्द्रित विचार-विमर्श कार्यक्रम आयोजित किये।
पहला – इस समूह के विद्यार्थी एक मध्य स्तर के माने जाने
वाले निजी विद्यालय में पढ़ते हैं। ये स्कूल के उद्दंड माने जाने वाले विद्यार्थी
ही हैं। ये वे विद्यार्थी हैं जिनकी क्लास अक्सर कक्षा के बाहर लगती है। अर्थात्
भिन्न-भिन्न कारणों से अक्सर कक्षा से बाहर निकाले जाते हैं।
दूसरा- यह उन विद्याथियों का समूह है जो उच्च स्तर के कहलाने वाले
निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं। ये गंभीर माने जाने वाले विद्यार्थियों का समूह है।
स्कूल की पढाई से संतुष्ट हैं। पर बोर्ड की परीक्षा में अच्छे से अच्छे अंक लाने
की अभिलाषा उन्हें ट्यूशन सेण्टर तक खींच लाती है।
इन दोनों ही समूह वार्ताओं को स्कूल परिसर के बाहर ही संचालित किया
गया है। स्कूल के बहर संचालित करने का उद्देश्य समूह-वार्ता में भाग लेने वाले
विद्यार्थियों को विचार प्रकट करने की अधिक-से-अधिक स्वतंत्रता प्रदान करना है।
जिससे वे ज्यादा-से-ज्यादा मुक्त होकर अपने विचारों को प्रकट कर सकें।
पहला समूह - संक्षिप्त परिचय
जैसा कि पहले बताया जा चुका है यह उन विद्यार्थियों का समूह है जो एक
मध्य स्तर के माने जाने वाले प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। लेकिन उससे भी बड़ी
विशेषता यह है कि इस ग्रुप चर्चा में भाग लेने वाले विद्यार्थी वे हैं जो अमूमन
क्लासों से बाहर निकाल दिए जाते हैं। अतः इस ग्रुप के सदस्यों की विशेषता यह भी है
कि ये स्कूल के बिगडैले विद्यार्थी माने जाते हैं। अपने प्रति स्कूल के
व्यवस्थापकों के नकारात्मक दृष्टिकोण का वर्णन करते हुए एक विद्यार्थी बतलाता है, “एक रोज मुझे बिना किसी गलती के
क्लास से बाहर निकाल रखा था। उसी वक्त प्रिंसिपल सर ‘राउंड’
(दौरे) पर थे और उन्होंने मुझसे मेरी गलती पूछे बिना ही मुझे दो-चार
लगा दिए। उनका कहना था कि क्लास से बाहर है तो गलती की ही होगी।”
इस विचार-विमर्श के द्वारा हम पता लगाने का प्रयास करेंगे कि वे
गलतियाँ किस प्रकार की करते हैं और उनके प्रति शिक्षकों के नकरात्मक नजरिये का
कारण क्या है।
इस ग्रुप वार्ता में पाँच विद्यार्थी शामिल हैं तथा उनको ट्यूशन
पढ़ाने वाले शिक्षक भी शामिल हैं। ट्यूशन पढ़ने वाले शिक्षक उनके स्कूल में एक दूसरी
निजी कंपनी द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सर्विस ‘स्मार्ट
क्लास रूम’ के इंचार्ज हैं। उनके साथ विद्यार्थियों का
भावनात्मक सम्बन्ध इस प्रकार बनता है कि वे क्लास रूम से निकल दिये जाने के बाद इन
विद्यार्थियों का सहारा बनते हैं। बच्चे इनके पास साइंस (विज्ञान)और मैथ (गणित)
पढ़ने के लिए आते हैं। विद्यार्थियों के अनुसार ये अनक्वालिफाइड टीचर स्कूल के
क्वालिफाइड टीचरों से कहीं बेहतर हैं।
ग्रुप चर्चा का सार
शोधकर्ता का पहला प्रश्न यही है कि आपको ट्यूशन की जरुरत ही क्यों
पड़ी। जबाब क्रमशः इस प्रकार से थे -
o (क) “घर में पढ़ते वक्त जो दिक्कत आती है वह स्कूल का टीचर दूर नहीं कर पाता है।
स्कूल के टीचर का ध्येय अपने स्लेबस को समय-से खत्म करना भर होता है।”
o (ख) “स्कूल में ज्यादा बच्चे होने की वजह से शोर भी अधिक होता है। बच्चे पढ़ते
कम बोलते ज्यादा हैं।”
o (ग) “हाँ ! तू तो बड़ा चुप रहता है। अरे समझ में नहीं आएगा तो बोलेगे नहीं !”
o (घ) “एक ऐसी मानसिकता बन गई है कि ट्यूशन में पढ़ेंगे यहाँ तो मस्ती करो।”
o (ड.) “फिर स्कूल में बिलकुल बुक की भाषा का प्रयोग करते हैं’। उदाहरण भी बुक के। बस इंग्लिश में बक दो, हो गयी
टीचिंग।”
o (ख) “हाँ कुछ, जैसे लाइट (प्रकाश), ये
भी कि यदि किसी एसिड को पानी में डालें तो वह रिएक्ट करेगा।”
फिजिक्स, केमिस्ट्री में लिखने के लिए आप किस भाषा का प्रयोग
करते हो? किताब में लिखी भाषा का या अपनी भाषा का।
o (ग) “स्कूल में किताब की रटी-रटाई भाषा का ही प्रयोग होता है। हम नहीं करते
इसलिए जीरो-काटा पाते हैं।”
o (क) “जो समझ में आये वो अपनी भाषा में लिखते हैं। वैसे क्लास में नंबर उनके ही
ज्यादा आते हैं जो किताब से रट कर लिखते हैं। पर हम लोग रटते नहीं तभी टीचरों को
खलते हैं। हमारा लिखा अक्सर काट दिया जाता है।”
o (ड.) “जो हमें समझ में आता है उसी को इंग्लिश में ‘कन्वर्ट’
करके लिखते हैं अर्थात् समझते तो अपनी भाषा में हैं पर लिखते उसे
इंग्लिश में हैं।”
इंग्लिश तो अपनी भाषा है नहीं, पर कभी आपके साथ
ऐसा हुआ कि आपको इंग्लिश लिखने में दिक्कत आयी हो।
o (क) “स्कूलों में अन्य विषयों के मुकाबले इंग्लिश की ज्यादा प्रेक्टिस करवाई
जाती है। इसलिए इंग्लिश में लिखने में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आती है। पर हम
समझते अपनी भाषा में है और लिखते इंग्लिश में हैं।”
o (ग) “हर पीरियड ही इंग्लिश का लगता है। कभी-कभी तो कान में भी दर्द करने लगता
है।”
आपको क्यों लगता है कि हमारे देश में इंग्लिश की विशेष प्रेक्टिस की ज़रूरत
है?
o (क) “हमारा देश एक ‘डेवलपिंग कंट्री’ है और ‘डेवलपिंग कंट्री’ में
विकास के लिए इंग्लिश की ज़रूरत होती है। हमें इंग्लिश आएगी तो एम.एन.सी. हमारे
यहाँ निवेश करेगी। अतः डेवलपिंग कंट्री के डवलपमेंट के लिए इंग्लिश की ज़रूरत है।”
o (ख) “हमारे देश के नेता जब बाहर जाते हैं तो इंग्लिश में बोलते हैं। जो
दुभाषिया होगा वह इंग्लिश से उस देश की भाषा में ट्रांसलेट (अनुवाद) करेगा। उनके
देश के नेता अपनी भाषा में बोलेंगे, फिर दुभाषिए हमारे
नेताओं को इंग्लिश में बताएगा। पर जो विदेशी आते हैं उनका दुभाषिया उन्हें उनकी
भाषा में ही बताएगा।” (गैर-अंग्रेजी भाषी देशों के बारे में
टिप्पणी करते हुए कहा)
o (ग) “हमारे देश में एक इस
प्रकार का एनवायरमेंट बना दिया है कि इंग्लिश ही सब कुछ है। अतः सबका ध्यान सिर्फ़
इंग्लिश की तरफ़ है। वरना बच्चा हिंदी मीडियम में भी पढ़ सकता है।”
o (क) “मैं इससे पूर्व हिंदी मीडियम में पढ़ता था। वहाँ इससे अच्छा समझ में आता
था। पर ऐसा माहौल बना दिया गया है कि
इंग्लिश मीडियम ही सब कुछ है।”
o (ग) “हिंदी मीडियम में
ऐसे-ऐसे बच्चे हैं जो नवीं क्लास में दसवीं का मैथ ‘सोल्व’
कर देंगे। अर्थात् अधिक योग्य हैं। पर आजकल सब सीबीएसई (इंग्लिश
मीडियम) की तरफ़ भाग रहे हैं।”
o (क) “सीबीएसई हर साल स्लेबस कम करती जा रही है। सेमेस्टर सिस्टम ने पढाई को और
सिमित कर दिया है। हमें अब सिर्फ़ इतना पढ़ना होता है जितना एक सेमेस्टर में आता
है।”
o ट्यूशन
शिक्षक - “बच्चों की मानसिकता हो गई है कि पास होने लायक
पढ़ो। पढ़ो, क्लास पार
करो और भूल जाओ।”
मीडियम के फर्क की वजह से समझ में किसी तरह का फर्क उत्पन्न होता भी
है अथवा नहीं? अपनी मातृभाषा में ही पढने का चलन होता तो क्या आपकी
समझ ज्यादा बनती या कम बनती? आपकी समझ पर मातृभाषा का क्या
प्रभाव पड़ता?
o “मातृभाषा
में ज्यादा अच्छी बनती है“ (सभी बच्चे एक साथ )
शोधकर्ता - “क्यों?”
o (ग) “अपनी मातृभाषा में किसी
भी बात को आसानी से ‘पिक-अप’ कर लेते
हैं। हम उसे आसानी से रिलेट कर पाते हैं। भाषा के फर्क की वजह से कई बार हम सही
अर्थ तक नहीं पहुँच पाते। एक ही शब्द को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह से प्रयोग
किया जाता है। एक ही शब्द को इंग्लिश में कुछ और हिंदी में कुछ और प्रकार से
प्रयोग करते हैं, इसलिए भ्रम बना रहता है।”
o (ख) “इंग्लिश में स्पष्ट नहीं होता पर
अपनी भाषा में उसकी एक इमेज बन जाती है।”
शोधकर्ता - “इंग्लिश में होने की वजह से क्या ऐसा भी होता है कि
आप अपने घर परिवार, आस-पडोस वालों से उसी की भाषा में बातचीत
नहीं कर पाते हो।”
o (क) “हाँ ! हम किताब में लिखी किसी-भी बात पर अपने माता-पिता से, या किसी दूसरे से चर्चा नहीं कर पाते हैं। क्या चर्चा करें, किसी को हमारी किताब की भाषा ही समझ नहीं आएगी।”
शोधकर्ता - क्या इंग्लिश में नि:संकोच बिना याद किये बोल पाते हो?
o (ख) “नहीं ! इंग्लिश में बोलने पर डर-सा लगता है, हम
बोलते वक्त सोचते हैं कि कहीं गलत ना बोल जाएँ।”
शोधकर्ता - भाषाओं को छोड़ें तो स्कूल में देहाती बोलियों को लेकर
क्या नजरिया है?
(एक ने स्पष्टीकरण मागते हुए कहा, वो जिसमें हम आपस में बातचीत करते हैं। शोधकर्ता ने सहमति जताई)
o “गँवार
टाइप का।” (सब एक साथ ) आगे एक ने कहा, “लफंगे” (एक ने कहा)
o “हमें
गँवार और लफंगे कहा जायेगा, हमें गलत निगाह से देखा जाएगा।”
शोधकर्ता - “पर क्यों?”
o (क) “क्योकि वे कुछ ज्यादा ही पढ़-लिख गए।” कुछ गुस्से में
जबाब दिया।
o (ख) “इंग्लिश मीडियम स्कूल
हैं इसलिए।”
शोधकर्ता - “क्या आपको लगता है - जो प्यार, जो
जज़्बात, जो मोहब्बत इन गँवारू कहलाने वाली भाषाओं में बन
सकती है क्या दूसरी भाषाओं में भी बन सकती है? जब आपके ऊपर
कोई दबाव नहीं होता तो आप कौन सी भाषा का प्रयोग करते हो?
o (क) “हम अपने आली में बोलते हैं। मतलब देहाती बोलियों में ही बातचीत करते हैं।”
o (ख) “जितनी आसानी से हमें
हमारी बोलियों में समझ आता है, उतनी आसानी से इंग्लिश और
यहाँ तक स्कूल वाली हिंदी में भी समझ नहीं आता।”
o (ग) “समझ में तो इसी भाषा में
आता है। बेशक पढ़ें किसी में भी। हम हर बात को अपनी भाषा में ही समझते हैं। इंग्लिश
में तो ट्रांसलेट कर के ही लिखते हैं।”
o (घ) “हम जब मुक्त होकर बैठते
हैं तो अपनी भाषा का ही प्रयोग करेंगे।”
शोधकर्ता - क्या स्कूलों में देहाती भाषा की लोक-कथाओं को पढ़ने-पढ़ाने
के दौरान प्रयोग किया जाता है?
o (घ) “नहीं।”
o (क) “औरों का तो पता नहीं, हमारी हिंदी वाली शिक्षिका
कभी-कभी हिंदी कविता-कहानियाँ सुनाती हैं।”
शोधकर्ता - “और साइंस के टीचर...”
o (ख) “साइंस के टीचर से कह
दिया तो वो तो क्लास से ही बाहर निकाल देंगे।”
o (क) “वो तो आते ही इंग्लिश में डिक्टेशन देना शरू कर देते हैं।”
o (क) “स्कूल के अन्दर का एक सिद्धांत है ‘रटो, याद करो, पास हो जाओ और नेक्स्ट क्लास में’
o (क) “कोई भी शिक्षक हमें प्रयोग के लिए प्रेरित नहीं करता, जिससे एक व्यावहारिक समझ बने। घर में करेंगे तो घर वाले कहेंगे - बेटा पढ़
ले, फालतू काम ना कर।”
शोधकर्ता - “जब यही बात है तो आपने सीबीएसई से संबद्ध इंग्लिश
मीडियम स्कूल ही क्यों चुना?”
o (क) “लोगों की ऐसी धारणा है कि सीबीएसई (इंग्लिश मीडियम) स्कूल बेहतर है। यदि
हम किसी को बताते हैं कि हम हरियाणा बोर्ड या हिंदी मीडियम से पढ़ते हैं तो वे हमें
सम्मान नहीं देंगे।”
o (ग) “लोग सीबीएसई की पढ़ाई को
ज्यादा वैल्यू देते हैं।”
शोधकर्ता - स्कूल में होने
वाले भाषण आदि किस भाषा में होते हैं?
“हिंदी इंग्लिश में होते हैं। पर देहाती भाषाओं का कोई
स्थान नहीं होता।”
शोधकर्ता - आप उसे किस
प्रकार तैयार करते हो?
o (क) ”इंग्लिश के लिए तो इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। इन्टरनेट से उतारते हैं,
रटते हैं और सुना देते हैं।”
o (ख) “हिंदी में हमें रटने की
आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि इंटरनेट से लिया भी होता है तो अपने शब्दों में बता देते
हैं।”
शोधकर्ता - स्कूल की
असेम्बली या वार्षिकोत्सव में किस प्रकार की गतिविधियों पर जोर होता है?
o (क) “असेम्बली में इंग्लिश प्ले करवाया जाता है। चाहे किसी को समझ आये या ना आए,
पर प्ले होगा इंग्लिश में। सिर्फ़ ये दिखाने के लिए कि स्कूल
इंग्लिश मीडियम है। प्ले का सम्बन्ध समझ से नहीं, इंग्लिश
मीडियम से है।”
o (ग) “प्रिंसिपल मैडम कहती है
- हिंदी की मात्रा कम रखना।”
o (ख) “देहाती बोलियों का
प्रयोग वर्जित है।”
o (ग) “नाटक में गँवार टाइप का
आदमी दिखाने के लिए देहाती बोली का प्रयोग होता है। यदि हिंदी नाटक हुआ तो।”
दूसरा, उन बच्चों का समूह है जो उच्च स्तर के कहलाने वाले निजी विद्यालयों में
पढ़ते हैं।
यह समूह वार्ता फरीदाबाद के उच्च स्तर के कहलाने वाले पब्लिक स्कूल
के विद्यार्थियों के साथ की गई। यहाँ लडकियों का एक ग्रुप है। यह 12 वीं-बोर्ड कक्षा की छात्राएँ हैं तथा पढ़ाई के सम्बन्ध में गम्भीर मानी
जाती हैं। समूह वार्ता का स्थान स्कूल के
बाहर चलने वाला एक कोचिंग सेण्टर है। कोचिंग सेण्टर पर जो शिक्षक पढ़ाते हैं वे
क्वालिफाइड हैं तथा एक मध्य स्तर के निजी स्कूल में पढ़ाते हैं। उनकी खुद की शिक्षा
क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से ही हुई है। इस ग्रुप के विद्यार्थी जिन स्कूलों से
सम्बन्ध रखते हैं, उन स्कूलों के प्रबंधकों का दावा है कि
उनके स्कूलों में शिक्षा का माध्यम पूर्णतया अंग्रेजी है तथा कक्षा में पूर्णतया
अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होता है। इन स्कूलों के प्रचार्य ने यह बात जोर देकर
साक्षात्कार के दौरान कही। इस स्तर के स्कूल के दो प्रिंसिपलों के साक्षात्कार अलग
खण्ड में हैं। इन स्कूलों ने कक्षा एवं स्कूल के अन्दर अवलोकन की इज्जाजत नहीं दी।
इस स्तर के कुछ स्कूल के प्राचार्यों ने साक्षात्कार देने से भी मना कर दिया।
शोधकर्ता ने यह समूह वार्ता निम्नलिखित उद्देश्यों से आयोजित की
-
• उन
कारणों को समझना जिनकी वजह से बच्चे ट्यूशन सेण्टर की तरफ़ रुख करते हैं,
• इनके
स्कूलों के अन्दर के वातावरण के बारे में जानना,
• स्कूल
में पढ़ाई-लिखाई, सीखने-सिखाने को लेकर जो समझ है, उसे जानना।
• स्कूल
तथा ट्यूशन के बाद बचे समय में बच्चों के परिवेश के बारे में समझना।
विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाएँ -
(क) “इंग्लिश मीडियम स्कूल हैं,
पर हमें हिंदी (इनका हिंदी से तात्पर्य हिंगलिश से है) में ही पढाया
जाता है। इंग्लिश टीचर को छोड़ कर।”
(ख) “हमें परीक्षा में इंग्लिश में लिखने में कोई दिक्कत नहीं आती। क्योंकि हम
शुरू से ही इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहे हैं। यदि शुरू से ना पढ़ रहे होते तो
जरूर दिक्कत आती।”
(ग) “दसवीं कक्षा तक इंग्लिश पर विशेष जोर होता है पर 11वीं
12वीं में यह प्रेशर ख़तम हो जाता है। टीचर और स्टूडेंट अपनी
सुविधा के अनुसार बोलते हैं।”
(घ) “कॉन्वेंट स्कूल में भाषा को लेकर सख्त नियम है। वहाँ हम किसी-भी क्लास में
हिंदी नहीं बोल सकते, हर क्लास में इंग्लिश अनिवार्य है।”
शोधकर्ता - “कब आप बेहतर समझें जाओगे। समाज की प्रतिष्ठा का भाषा से कोई सम्बन्ध है।
आपको कब ज्यादा अवसर मिलेंगे।”
(ख) “अवसर तो तब ही ज्यादा मिलेंगे जब इंग्लिश में बोलेंगे।”
(क) “यदि बाकि सब विषयों में कितना भी बेहतर कर लूँ पर यदि इंग्लिश में बेहतर
नहीं कर सकी तो मेरी जिंदगी ख़राब है।”
(घ) “किसी भी मल्टीनैशनल कंपनी में जाना है तो इंग्लिश जरुरी है।”
(ड.) “इंटरव्यू के दौरान
पर्सनालिटी का मूल्यांकन इंग्लिश के आधार पर ही होता है। स्कूल में बताया जाता है
कि यदि इंग्लिश अच्छी है तो ही आप ग्रो कर सकते हो।”
शोधकर्ता - अच्छा जॉब, इंटरव्यू के अलावा
भी कहीं और इंग्लिश सहायता करती है?
(क) “हाँ! कॉलेज इंटरव्यू में इंग्लिश हेल्प करती है। एडमिशन के बाद भी टीचर को
इम्प्रेस करने में इंग्लिश हेल्प करती है। टीचर भी चाहते हैं कि इंग्लिश बोलने
वाले बच्चे ही कॉलेज में आएँ क्योंकि यदि बाहर जाते हैं और जब जॉब इंटरव्यू को फेस
करते हैं तो उनके साथ कॉलेज का नाम भी जुडा होता है। स्टूडेंट यदि इंटरव्यू में
चुना जाता है तो इससे कॉलेज का रेप्युटेशन भी बढ़ता है।”
(घ) “मैं सहमत नहीं हूँ / आई डोंट एग्री.” उन
विद्यार्थीयों में से घ ने अपने से पहले वाले वक्ता का विरोध करते हुए कहा “इंटरव्यू में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन-सी लैंग्वेज का
प्रयोग करते हो। आप जिस भी लैंग्वेज का प्रयोग करो पर बेहतर तरीके से करो।”
(ड.) “यदि आपका इंग्लिश में
कमांड नहीं है तो उसमें क्यों बोलना? आप जिस भी भाषा में
बोलो, पर वो ही बोलो, जिसमें आप सुविधा
अनुभव करते हो। हिंदी में यदि सुविधा अनुभव करते हो तो हिंदी का ही प्रयोग करो।
इंग्लिश में बोलते वक्त यदि दिक्कत अनुभव होती है तो इंग्लिश के स्थान पर हिंदी का
प्रयोग करो।”
क ने विरोध करते हुए कहा, “परीक्षा में तो
इंग्लिश में ही लिखना पड़ता है।”
जिसका जबाब ड. ने दिया, “परीक्षा और
इंटरव्यू दो अलग-अलग बातें हैं, एग्जाम में सोचने का वक्त है
पर इंटरव्यू में नहीं। हम एग्जाम में सोच कर लिख सकते हैं। पर इंटरव्यू में तो
तुरंत जबाब देना होता है। इसलिए इंटरव्यू में हमारी लैंग्वेज ही बेहतर है।”
इंटरव्यू में इंग्लिश का प्रयोग हो या बोलचाल की भाषा का, इस विषय को लेकर ग्रुप में गहरा मतभेद है। एक ग्रुप मानता है कि इंटरव्यू
में इंग्लिश सहायक है। उसके अनुसार इंटरव्यू इंग्लिश में ही होना चाहिए। दूसरा
मानता है इंटरव्यू की भाषा वह होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थियों को सुविधा हो।
(क) “कॉलेज में दाखिले में अब
मार्क्स के अलावा इंटरव्यू की भी भूमिका है।” अ छात्र ने जोड़ा और “और वो
इंटरव्यू इंग्लिश में होता है।”
(ख) “सरकारी स्कूल के विद्यार्थी वहाँ सहज अनुभव नहीं करते।”
(घ) “सरकारी स्कूल के बच्चे मैनर के मामले में काफी पिछड़े होते हैं। उनकी भाषा
भी प्रॉपर नहीं होती। हिंदी में भी कई बार काफी रूड़ चले जाते हैं। (अर्थात् देहाती
बोलियों का प्रयोग करते हैं)
(क) “क्रिश्चियन स्कूलों का
अनुशासन सख्त है। वहाँ ड्रेस आदि के साथ भाषा को भी सख्ती से लागू किया जाता है।
यदि कोई बच्चा हिंदी बोलता है तो उसे फाइन भरना पड़ता है।”
(ग) “भारत की इंग्लिश यूएसए तथा यूके से भिन्न है और यदि हम पहली बार किसी
विदेशी से मिलते हैं तो दिक्कत होगी ही।”
शोधकर्ता - “देहाती बोलियों में
साइंस पढना सम्भव है या नहीं है।”
“नहीं है।” सभी एक साथ।
(ग) “हिंदी की मुख्य समस्या वैज्ञानिक शब्दावलियों को लेकर आती है। काफी टफ
होती है”
(ख) “मुझे तो अभी-से डर लग रहा है। कॉलेज में एक सब्जेक्ट हिंदी भी पढना पड़ेगा।”
उच्च मध्यम वर्गीय विद्यार्थियों का मानना है कि देहाती भाषा में
पढाई नहीं हो सकती।
शोधकर्ता - “स्कूल, आने जाने तथा ट्यूशन में
कितना समय खर्च होता है”
(क) “हमारा स्कूल 6 घंटे + 2 घंटे की बस यात्रा + 3 घंटे का ट्यूशन आना जाना।”
शोधकर्ता - “ इंग्लिश कहाँ-कहाँ जरुरी है।”
क ने कहा, “मेरी एलएलबी करने वाली बहन ने बताया हाईकोर्ट तथा
सुप्रीमकोर्ट में बहुत हाई स्तर की इंग्लिश चाहिए होती है।”
(ग) “हमें बचपन से सिखाया जाता है कि इंग्लिश में बोलो, इसलिए
हमारी यह धारणा है। वरना कोई भाषा बेकार नहीं”
निम्न मध्यम वर्गीय इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले
विद्यार्थियों के प्रथम समूह के अनुसार-
·
मातापिता सामाजिक प्रतिष्ठ को बनाए रखने के लिए अपने बच्चों को निजी
इंग्लिस मिडीयम’ स्कूलों में दाखिला करवाते है ।
·
पढ़ने के लिए क्षेत्रिए बोली के स्कूल भी बुरे नहीं है। उलटे उन स्कूलों
में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का ज्ञान ज्यादा व्यवहारिक एवं विस्तरित होता है। पर
फिर भी सीबीएसई के इंग्लिश मीडियम स्कूल के विद्यार्थियों के अंक ही ज्यादा आते
है।
·
हम जब दोस्तों में बैठते है तो आपस में अपनी क्षेत्रिए बोलियों में
ही बातचीत करते है और पढ़ाए गये विषययों पर भी उन्हीं बोलियों में ही विचार विमर्श
करते है है। पर यदि इन बोली भाषा का
प्रयोग यदि स्कूल में कर दिया तो तुरंत ‘गवार’ का ठप्पा लग जाएगा ।
·
संस्कृतिक प्रोगामें में स्कूल के प्रचार्य “इंग्लिश की मात्रा ” ज्यादा रखने के लिए करती है।
किसी को समझ आए या न कार्यक्रम होगा सिर्फ अंग्रेजी में।
·
स्कूल परिसर में सांस्कृतिक बोलिय़ों अर्थात जन भाषाओं के प्रयोग पर
पूर्ण प्रतिबंध है ।
उच्च मध्यम वर्गीय इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के दूसरे समूह
के अनुसार-
·
इग्लिश जिसकी अच्छी होगी वह ही समाज में ‘डोमिनेंट’ (वर्चस्व) हासिल कर पाएगा।
·
छोटी कक्षओं में अंग्रेजी पर ज्यादा जोर होता है। बडी कक्षाओं में
शिक्षक पढ़ाने के लिए ‘मिक्स-लैंग्वेज’ अर्थात उच्च मध्यम वर्ग द्वारा बोले जाने
वाली हिंग्लिश का ही प्रयोग करते है।
·
समझ के लिए न सही, पर ‘इंटरव्यू’ (साक्षत्कार) आदि के लिए इंग्लिश जरूरी है।
·
शुरू से इंग्लिश में पढ़ रहे है फिर भी इंग्लिश से डर लगता है। कॉलेज
में जाकर एक पेपर हिन्दी का भी पढ़ना पडेगा इस बात से भी डर लगता है।
·
सरकारी स्कूल के बच्चे हिन्दी में भी काफी रूड हो जाते है।
Comments