अंग्रेजी माध्यम विद्यालय के शिक्षकों के आगे कुआँ पीछे खाई

शिक्षकों के साक्षात्कार के मुख्य बिंदु -

विद्यार्थियों से शिक्षण अधिगम के दौरान यदि किसी का सीधा सरोकार होता है, तो वह है शिक्षक। शिक्षक ही वह शख्स है जो पाठ्यक्रम और विद्यार्थियों के बीच कड़ी स्थापित करता है। शिक्षकों को नियंत्रण करने वाली एक डोर यदि स्कूल प्रबंधक है तो दूसरी डोर माता-पिता की महत्वाकांक्षा, तीसरी डोर खुद विद्यार्थी होते हैं जो अपने जो परिवार से मिली कुछ ख़ास तरह की आकांक्षा पाले स्कूल परिसर में आते हैं और शिक्षक इन सभी डोरों से बंधा पपेट यानी कठपुतली होता है। उसे इन विषम स्थितियों का सामना करते हुए कक्षा कक्ष में घुसना होता है और कक्ष में सामना करना पड़ता है। इससे विद्यार्थियों को, जिनका परिवेश तो उन्हें सांस्कृतिक भाषा में ही समझने की इजाजत देता है, पर उनकी प्राथमिक तथा द्वितीयक समाजीकरण द्वारा स्थापित मूल्य, अंग्रेजी में ही पढ़ें  इस बात पर बल देते हैं। इन के बीच खड़ा शिक्षक इन सब में तालमेल स्थापित करने का प्रयास करता रहता है। शिक्षकों का साक्षात्कार इन्हीं बातों को स्पष्ट करेगा।


शिक्षक 1 – श्री महावीर

श्री महावीर गणित विषय के अहर्तायुक्त शिक्षक हैं। वे पिछले 08 वर्षों से यह विषय निजी स्कूलों तथा कोचिंग संस्थाओं में पढ़ा रहे हैं। उन्होंने इस दौरान तीन संस्थाओं को अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। चार वर्ष तक फरीदाबाद के फ्रिंज इलाके में पढ़ाने के बाद अप्रैल 2012 से फरीदाबाद के पास स्थित एक छोटे शहर के इंटरनैशनल कहलाने वाले निजी विद्यालय में पढ़ा रहे हैं। इस इंटरनैशनल कहलाने वाले स्कूल में भी ग्रामीण तथा शहरी इलाकों के फ़ीस अदा करने की क्षमता रखने वाले परिवारों के विद्यार्थी आते हैं।

महावीर के अनुसार, “हालाँकि उनका व्यक्तिगत पढ़ने वाला विषय ऐसा है जिसमें भाषा-विशेष मायने नहीं रखती। क्योंकि गणित विषय में लिखने के लिए संकेतों की अपनी ही लिपि है। फिर भी देखने में आया है कि बच्चे कई बार सवाल इसलिए गलत करते हैं  क्योकि वे दी हुई स्टेटमेंटका अर्थ ही नहीं समझ पाते। इसके पीछे कारण उनकी अंग्रेजी भाषा पर कमजोर पकड़ ही है। इस प्रकार अंग्रेजी भाषा पर कमजोर पकड़ उनकी गणित सीखने की क्षमता को भी प्रभावित करती है।

अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले विद्यार्थियों को शहरी क्षेत्र के विद्यार्थियों से कहीं ज्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ता है।

अंग्रेजी की  वज़ह से ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी शहरी क्षेत्र के मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों से पिछड़ रहे हैं तथा कही़ं-ना-कहीं भाषा को लेकर उनके मन में हीनभावना उत्‍पन्न हो रही है।

शहरी मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले दस में से चार या पाँच विद्यार्थी ही अंग्रेजी माध्यम के बैरियर (अवरोध) को पार कर पाते हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों के दस में से एक।

जो इस भाषा को माध्यम के रूप में प्रयोग कर लेते हैं, वे अपने आप को दूसरों से श्रेष्‍ठतर/सुपीरियर समझने लगते हैं।

क्लास में देहाती बोली बोलने की बिलकुल भी इजाज़त नहीं होती, ना ही शिक्षकों को ना विद्यार्थियों को। इस कारण कई बार विद्यार्थी खुल कर अपनी समस्या बता भी नहीं पाते। हमें निर्देश होता है कि बच्चो को टूटी-फूटी ही सही पर अंग्रेजी में बोलने के लिए प्रेरित करो।

प्रबंधकों की सोच है कि क्लास में यदि हम विद्यार्थियों की भाषा बोलने पर अंकुश लगा दें तो वे अंग्रेजी बोलना सीख जाएँगे। पर क्लास से निकलते ही वे अपनी बोली बोलना शरू कर देते हैं। आप कहाँ-कहाँ  अंकुश लगाओगे?”

मैं अपने घर पर निजी कोचिंग भी चलाता हूँ। पर जिन बच्चों को स्कूल में पढ़ाता हूँ, उन्हें कोचिंग-सेंटर पर नहीं पढ़ाता। अपने निजी कोचिंग पर हमें ज्यादा स्वतंत्रता होती है क्योकि यहाँ के नियम हम खुद तय करते हैं और कोचिंग के लिए आने वाले अधिकतर विद्यार्थियों की समस्या ही मीडियम की है। पर वे इसे स्वीकारते नहीं हैं। शायद अंग्रेजी माध्‍यम में पढने का उनका ईगो सामने आता है। शायद सामाजिक प्रतिष्ठा का तिलिस्म। इसलिए थोडा इंग्लिश, ज्यादा हिंदी, कभी-कभी कठिन बातों को रिलेट करने के लिए देशी भाषा।


 

शिक्षक - 2 - श्री मनवीर

श्री मनवीर ने लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली से अपनी शिक्षा ग्रहण की है तथा पिछले तीन सालों से शिक्षण कर रहे हैं। एक साल नवोदय विद्यालय विद्यालय में पढाया। दूसरे साल एक प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था द्वारा संचालित एक निजी आवासीय विद्यालय में पढ़ाया, वर्तमान में वे एक निजी मध्य स्तर के स्कूल में पढ़ा रहे हैं।

यदि मैं अपने विषय के बारे में बताऊँ तो यही कहूँगा कि इस विषय का  कोई भी कोचिंग नहीं लेता। क्योंकि यह विषय अंक प्राप्त करने में जितना सहायक है उतना ही आर्थिक रूप से अनुपयोगी है।

सिर्फ़ अपने-आप को उच्च स्तर के घोषित करने वाले स्कूल ही नहीं अब तो केंद्रीय विद्यालय भी संस्कृत शिक्षकों के स्थान पर विदेशी भाषाओं, जैसे- फ्रेंच, जर्मन आदि पढ़ाने पर बल दे रहे हैं। जो त्रिभाषा फ़ॉर्मुले का सीधा-सीधा उल्लंघन है।

हमारे विषय को स्कूल में इतना स्थान नहीं दिया जाता। स्कूल में प्राचार्य हमें संस्कृत भी अंग्रेजी माध्‍यम से पढ़ाने पर बल देते हैं।

हमारी प्राचार्य तथा मैनेजमेंट हमें (सभी शिक्षकों को) इंग्लिश मीडियम कल्चर विकसित करने पर बल देते हैं।

आर्थिक रूप से अनुपयोगी होने की वज़ह से विद्यार्थियों का लक्ष्‍य भी नंबर प्राप्त करना होता है, ना की समझ बढ़ाना। कुछ तो इस विषय को लेते ही सिर्फ़ नम्बरों के लिए हैं।


शिक्षक - 3 – श्री शास्त्री

श्री शास्त्री के अनुसार, “वे पिछले आठ सालों से फ्रिंज इलाके के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं।

उन्होंने अपनी सबसे बड़ी समस्या को उजागर करते हुए कहा, “हमारी तनख्वाह अंग्रेजी की शिक्षिका से आधी से भी कम होती है। इन्क्रीमेंट भी नहीं मिलता। उच्च स्तर के स्कूलों में तो संस्कृत अध्यापकों की तो पोस्ट भी नहीं निकल रही है।

हमारे पास आठवीं कक्षा तक ही संस्कृत पढाई जाती है। नवीं कक्षा में आते ही बच्चे दूसरे विषयों की तरफ़ भागते हैं।

स्कूल के वातावरण के बारे में  बताते हुए उन्होंने कहा, “अब तो नहीं हमारे स्कूल के पिछले डायरेक्टर के समय में स्कूल में इंग्लिश बोलने पर विशेष जोर होता था। वे ख़ुद बेशक इंग्लिश में चार ही लाइनें बोलें, पर शिक्षकों तथा बच्चों पर पूरा दबाव होता था कि वे इंग्लिश में ही बोलें। वे क्लास में जाकर विशेषतः इसी बात को देखते थे। बच्चों को समझ में आया कि नहीं आया, यह सब उनके लिए गौण है।

उन्होंने अपने समय में एक ऐसे व्यक्ति को स्कूल कॉर्डिनेटर बना रखा था। जो शिक्षक बनाने की भी योग्यता नहीं रखता था। उसकी अहर्ता भी बी.ए. थी तथा वह यहाँ से 60 किमी दूर पश्चिम दिल्ली से आता था। उसकी भूमिका ही स्कूल में इंग्लिश का वातावरण बनाने की थी। बिना योग्यता के उसे सामाजिक विज्ञान और यहाँ तक कि ग्यारवीं कक्षा को इकोनॉमिक्स तथा बिज़नेस स्टडीज़  तक पढ़ने के लिए दिता गया परन्तु मुझे नहीं लगता उसे अंग्रेजी बोलने के अलावा भी कुछ आता होगा।

उनके (डायरेक्टर के) जाने के बाद हमारे स्कूल में नई प्रिसिपल आईं, वे शिक्षा की अच्छी जानकार हैं। वे शिक्षकों को कक्षा में दोनों भाषाएँ इस्‍तेमाल करने की छूट देती हैं। बच्चे भी क्लास में दोनों भाषा का प्रयोग कर सकते हैं। पर इसका नतीजा यह निकला कि यह अफ़वाह फैल गई कि इस स्कूल में तो अब हिंदी मीडियम में पढ़ाई होती है। फलस्वरूप इस साल ग्रामीण इलाकों से भी नए एडमिशन कम आये। शहरी इलाकों के माँ-बाप ने तो अपने बच्चों को स्कूल से भी निकालना शरू कर दिया है।

शिक्षक - 4 – श्री अजय

श्री अजय, एम.ए. (अर्थशास्‍त्र), एम.कॉम, बी.एड. की अहर्तायुक्त ट्रेंड शिक्षक हैं तथा उन्हें पढ़ाने का 12 वर्ष का अनुभव है। निम्न तथा मध्य स्तर के स्कूलों में पढ़ने के बाद अप्रैल 2010 से एक प्रतिष्ठित स्कूल की फ्रेंचाइज़ी शाखा में पढ़ा रहे हैं। उनके अनुसार -

आज बड़े कहलाने वाले पब्लिक स्कूलों में एक शिक्षक के इंग्लिश में बोलने की क्षमता को ही पढ़ाने की क्षमता कहा जाता है। मैं एक प्रतिष्ठित स्कूल में इंटरव्यू देने गया। मैं जब क्लास में डेमो’(नमूना क्लास) दे रहा था तो देखा कि बच्चे क्लास में पेपर पर कुछ निशान लगा रहे हैं। जब उस पेपर  को देखा तो पता चला बच्चे मेरा मूल्यांकन कर रहे हैं। उस मूल्यांकन में एक बिंदु प्रोफिसेन्सी इन इंग्लिश लैंग्वेजभी था। अजीब लगने वाली बात यह थी कि उस स्कूल में यह बात बच्चे चैक कर रहे थे।

हमारे स्कूल में भी इस बात पर विशेष जोर रहता है कि हम इंग्लिश  में ही पढाएँ। जबकि हमारे पास सिर्फ़ शहर के ही नहीं आस-पास के गाँवों के बच्चे भी आते हैं। पर हमारे सामने प्रमुख समस्या ऐसे गाँवों के बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाने की होती है। जिनके घर तो दूर अडोस-पड़ोस में भी कोई अंग्रेजी नहीं बोलता।

तो क्या आप जब कक्षा में हिंदी-इंग्लिश मिक्स करके पढ़ाते हैं तो विद्यार्थियों को बेहतर समझ आता है, “नहीं! यदि कोई शिक्षक पढ़ाते वक्त हिंदी या देहाती बोलियों का प्रयोग करे तो प्रबंधक से पहले विद्यार्थी ही उसके खिलाफ खड़े हो जाएँगे। आज का छात्र एक शिक्षक की पढ़ाने की योग्यता का आकलन ही उसके अंग्रेजी बोलने की क्षमता के आधार पर करता है। उसे इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि उसे समझ में आ रहा है या नहीं। उसे तो बस इंग्लिश में बोलता हुआ पपेट चाहिए। मैं आपको अपने स्कूल के एक फंक्शन की घटना बताना चाहूँगा। एक लड़का सभी टीचर की इंग्लिश बोलने के तरीके की मिमिक्री कर रहा था। विषय था- कौन शिक्षक कैसे इंग्लिश बोलते हैं। एक दक्षिण भारतीय शिक्षक की मिमिक्री करते हुए उसने कहा कि ये तो इस प्रकार बोलते हैं जैसे दो-चार पैग लगा कर (शराब पी कर) आए हों, फिर एक्टिंग करते हैं। फिजिक्स के एक बहुत ही योग्य शिक्षक हैं, बच्चों को उनके परिवेश के उदाहरण लेकर समझाते हैं, उनके लिए कहता है कि ये तो आते ही गाँव में पहुँच जाते हैं। आप इससे क्या अंदाजा लगाएँगे।

जब इस विषय पर प्रबंधकों की प्रतिक्रिया जाननी चाही, “प्रिंसिपल और प्रबंधक पीछे बैठ कर ताली पीट रहे थे। प्रिंसिपल ने अपने भाषण में उस लड़के की विशेष तारीफ़ की और कहा कि टीचर इससे सीख लेंगे और अपनी इंग्लिश सुधारेंगे। प्रबंधक ने उसे विशेष उपहार दिया।

शोधकर्ता- इस पर शिक्षकों की क्या प्रतिक्रिया है?”

शिक्षक -  (कुछ रुक कर) हाँ जी की नौकरी, ना जी का घर। आज के समय में हर शिक्षक दो गाली खाने के बाद भी कहता है यु आर राईट सर एक शिक्षक थे क्रान्तिकारी, शिक्षाशास्त्र के बखान करने वाले। क्या हुआ? बीच सेशन में निकाल दिया और ऐसे शिक्षक को नियुक्त कर दिया जो एक लाइन बोलने से पहले किताब में देखता था। ये लोग पहले दो तीन साल तो किसी को पक्का करते नहीं हैं, जब ये आश्‍वस्‍त जाते हैं कि ये टीचर हमारा पक्का गुलाम है, तब जाकर रेगुलर अपॉइंटमेंट देते हैं।

अंग्रेजी माध्यम के इस निजी स्‍कूल में स्थाई हो चुके इस शिक्षक ने कुछ रुक कर कहा, टीचर की नहीं, अंग्रेजी बोलने वाले गुलामों की जरुरत है।

शिक्षक - 5 – सुश्री मीनाक्षी

सुश्री मीनाक्षी की शैक्षिक योग्यता बी.कॉम, एन.टी.टी. है। इस प्रकार वह नर्सरी तक के बच्चों को ही पढ़ाने के योग्य है। पर उसे प्राइमरी क्लास भी पढ़ने के लिए दी जाती है। जिस स्कूल में वह पढ़ाती है वह स्कूल आठवीं तक का है तथा यह एक निम्न मध्यम वर्गीय इलाके में स्थित है। यह इलाका ग्रामीण इलाके भी निकट है। अतः इस इलाके में ग्रामीण तथा शहरी निम्न मध्यम वर्गीय इलाके के बच्चे आते हैं। सुश्री मीनाक्षी ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही वह यह है- 


हमें क्लास में पढ़ाते समय विशेष हिदायत होती है कि हम बच्चों को कुछ इस प्रकार के अंग्रेजी के शब्द सिखाएँ जिसे बच्चे घर जाकर प्रयोग कर सकें, जैसे- स्पून’, इसी प्रकार और भी कई अंग्रेजी शब्द सिखाए जाते हैं, जो दिन प्रतिदिन इस्तेमाल होते हैं।

शोधकर्ता ने कहा, “यह तो एक अच्छा चलन कहा जा सकता है।इस पर सुश्री मीनाक्षी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा,  यह सब कुछ बच्चे को सिखाने के लिए नहीं होता। इसके पीछे का मकसद माँबाप को यह विश्वास दिलाना होता है कि आपका बच्चा इंग्लिश बोलना सीख रहा है। जब बच्चा चम्मचको स्पूनकहता है तो देहाती और निम्न मध्यम वर्गीय इलाकों के माँ-बाप को विश्‍वास हो जाता है कि उनका बच्चा इंग्लिश बोलना सीख गया।

सुश्री मीनाक्षी ने आगे बताया, “चम्मच को स्पून सिखाने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। यदि बच्चा चम्मच को चम्मच बोलता है तो उसे अपमानित किया जाता है, यह साबित किया जाता है कि तुम एक अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे हो। इस प्रकार बच्चा घर जाकर चम्मच को सिर्फ़ स्पून ही नहीं कहता, वह माँ-बाप को भी कहता है कि वे चम्मच को स्पून कहें।

सुश्री मीनाक्षी ने दाखिले के लिए चलने वाले अभियानों की जानकारी देते हुए कहा, “हमें दाखिले अभियानों के दौरान हिदायत होती है कि हम बच्चों के माँ-बाप को विश्वास दिलाएँ कि हमारे यहाँ अंग्रेजी में ही शिक्षा होती है। इसके लिए हमें माँ बाप के आगे इंग्लिश बोलने की एक्टिंग करनी होती है। यह एक नाटक के सामान होता है। हम पहले स्कूल में इंग्लिश में बात करने का अभ्‍यास करते हैं। इस अभ्‍यास के लिए डायलॉग पहले से तय होते हैं। (हँसते हुए) हम भी उसे रटते हैं और फिर पेरेंट के सामने आपस में बाते करते हैं ताकि पेरेंट इम्प्रेस हो जाएँ।

बस, इसके बाद शोधकर्ता सुश्री मीनाक्षी से आगे कुछ भी पूछने की स्थिति में नहीं था।


शिक्षक - 6सुश्री कुमुद

सुश्री कुमुद अंग्रेजी विषय की एक अहर्तायुक्त शिक्षिका हैं। उनकी अहर्ता एम.ए. बी. एड. है। विवाह से पूर्व वो दिल्ली में अपने माता-पिता के साथ रहती थीं तथा एक प्रतिष्ठित एम.एन.सी. में कार्यरत थी। विवाह उपरांत वे फरीदाबाद आईं और परिवार के साथ तालमेल के साथ काम करने की इच्छा ने उन्हें बी.एड. करने हेतु प्रेरित किया और उन्होंने फरीदाबाद के स्थानीय कॉलेज से बी.एड. कर फरीदाबाद के स्कूलों में पढ़ाना शरू किया। वे पिछले छह-सात वर्ष से फरीदाबाद में पढ़ा रही हैं। वे स्कूल में पढ़ाने के बाद घर संभालती हैं, प्राइवेट ट्यूशन नहीं लेतीं।

सुश्री कुमुद की शिकायत थी कि, मैं जिस हिसाब से मेहनत करती हूँ, उस हिसाब से मुझे रिज़ल्ट नहीं मिलता।शोधकर्ता को लगा शायद वो तनख्वाह को लेकर असंतुष्ट होगी। पर आगे सुश्री कुमुद ने स्पष्ट करते हुए कहा, “मैं यहाँ अपनी सेलरी के बारे में बात नहीं कर रही हूँ। भगवान का दिया हमारे घर में सब कुछ है। मैं यहाँ अपने बच्चों (विद्यार्थियों) के साथ जो मेहनत करती हूँ, उसकी बात कर रही हूँ। कितना भी करा लो, इन बच्चों के दिमाग में कुछ जाता ही नहीं है। आखिर कक्षा में टीचर कितना सिखा सकता है? स्कूल से बाहर निकलते ही वापस उसी माहौल में ढल जाते हैं।

  “वैसे इन बच्चों का भी अपना कसूर नहीं, भाषा सीखने के लिए वातावरण भी तो चाहिए।

क्लास में हम बच्चों को इंग्लिश में बोलने हेतु प्रेरित करते हैं। बुलवाते भी  हैं, पर मैं 35-40 मिनट के पीरियड में कितना करवा सकती हूँ? समस्या और भी विकराल हो जाती है, जब कोई हिंदी माध्यम का बच्चा कक्षा में आ जाता है। चूँकि एडमिशन का फैसला हमारे हाथ में नहीं है। पर हमें उन बच्चों को भी इन्टरटेंट तो करना ही पड़ता है। नैतिक रूप से हम उसे छोड़ भी नहीं सकते। पर समस्या यह होती है कि हमारे स्कूल की इंग्लिश की पुस्तकों का स्तर और हिंदी मीडियम वाली इंग्लिश की पुस्तकों में काफी फ़र्क होता है।

बच्चा सिर्फ़ इंग्लिश सीखता, तो अलग बात होती। वह बाकी विषयों को भी इंग्लिश में ही पढता है। अब क्योंकि उसकी इंग्लिश अच्छी नहीं है इसलिए बाकी सभी विषयों में  हेम्पेर (बाधा) उत्पन्न होती है। बाकी विषयों  में वह इंग्लिश का इस्तेमाल किसी-भी तरह कर सकता है इसलिए उसकी इंग्लिश में हेम्पर (बाधा) उत्पन्न होती है।(नोट- सबसे महत्वपूर्ण बात कही गई।)

शोधकर्ता- इसे आप एक बार फिर से स्पष्ट करें।

सुश्री कुमुद-इंग्लिश ढंग से नहीं आती इसलिए बच्‍चे बाकी के विषय साइंस, सोशल साइंस यहाँ तक कि मैथ भी रटते हैं। इन विषयों में इंग्लिश का इस्तेमाल बच्‍चा बिना सर-पाँव के करता है। ना इन विषयों को समझ पाते हैं, ना इंग्लिश को। इन विषयों को पढ़ने के दौरान, जो इंग्लिश के प्रति समझ बनती है, वो आगे उनकी इंग्लिश को प्रभावित करती है। इसलिए इंग्लिश भी बिना सर-पाँव के लिखता और बोलता है। ग्रामर के नियम का तो इस बुरी तरह प्रयोग करते हैं कि बस मत पूछो ! इंग्लिश मीडियम एजुकेशन कल्चर बाकी सभी विषयों की समझ के लिए ही नहीं, स्वयं इंग्लिश के लिए भी घातक है। उन्होंने हँसते हुए अपनी बात सरल शब्दों में समझाई।

आगे उन्होंने कहा, “आप  पहले के हिंदी मीडियम के पढ़े लोगों की इंग्लिश देखें, उनकी भाषा शुद्ध होती है। पर आज अच्छे-से-अच्छे पब्लिक स्कूल में पढ़े हुए बच्चों को ले लो, उनकी इंग्लिश बेतुकी होती है।


शिक्षक - 7 – श्री पवन   

श्री पवन, एक प्रतिष्ठित स्कूल की फ्रेंचाइज ब्रांच में भौतिक विज्ञान के शिक्षक हैं। उनकी अहर्ता एम.एससी. (भौतिक विज्ञान) तथा बी.एड. है। पिछले दस वर्षों के शिक्षण के दौरान उन्होंने तीनों प्रकार के बोर्ड के स्कूलों में पढाया है। वर्तमान में स्कूल के अतिरिक्त, उनके निजी कोचिंग सेण्टर पर भी तीनों ही बोर्ड के विद्यार्थी पढ़ते हैं। हफ्ते में तीन दिन वे पलवल, हरियाणा में पढ़ाते हैं, तो तीन दिन कोशी (उत्तर प्रदेश) में भी पढ़ाते हैं।

उन्होंने मिलते ही शोधकर्ता को स्पष्ट किया कि, स्कूल के बारे में जो भी जानना चाहें, खुल कर पूछें। मैं अब स्कूल की बैसाखियों से मुक्त हूँ।

शोधकर्ता ने अपने विषय को स्पष्ट करते हुए बताया, मैं सिर्फ़ शिक्षा के माध्यम के फलस्वरूप शिक्षण अधिगम पर पड़े प्रभाव तथा  विद्यार्थियो के मूल्यों में आये परिवर्तन मात्र को जानना चाहता हूँ।

उन्होंने कहा, “हिंदी और अंग्रेजी माध्यम, दोनों की ही समस्याएँ है।

सबसे पहले मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि स्कूल का माध्यम या पढ़ाई का माध्यम कुछ भी हो, समझ का माध्यम तो अपनी भाषा ही है। आप दूसरी भाषा में रट सकते हैं, समझते सिर्फ़ अपनी ही भाषा में ही हैं। घर पर मेरे कोचिंग सेण्टर पर तो हर तरह के स्कूलों के बच्चे आते हैं। सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए मैं फीस में भी विशेष छूट देता हूँ। मैंने अपने अनुभव में पाया कि सरकारी स्कूल के या हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चे फिजिक्स की किसी भी प्रोब्लम को लेकर लम्बे समय तक जूझते हैं। जबकि अंग्रेजी माध्यम वाले जल्द ही हौंसला खो बैठते हैं। ये बात अलग है कि अंग्रेजी माध्यम वाले बच्‍चे अच्छे खाते-पीते परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। उनका परिवार उनकी कोचिंग पर विशेष पैसा खर्च कर सकता है। दिल्ली और कोटा में खुले  कोचिंग सेण्टर  उन्हें ड्रिल करके आई.आई.टी. तक पहुँचा सकते हैं। पर जूझने की जो क्षमता हिंदी माध्यम वाले स्कूल के विद्यार्थी में है, वो अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी में नहीं है।

शोधकर्ता ने जूझने का अर्थ स्पष्ट करने को  कहा तो श्री पवन ने बताया, जूझने का अर्थ है कि कोई छात्र फिजिक्स की किसी प्रॉब्लम पर कितना दिमाग लगाता है। मान लो एक आंकिक सवाल (न्‍यूमेरिकल) थोडा कठिन है, तो अंग्रेजी माध्‍यम वाला छात्र दो-से-तीन बार में प्रयास करना छोड़ देता है, वहीं हिंदी माध्‍यम का देहाती माने जाने वाला छात्र 10 से 15 बार तक प्रयास करता है। समझ की बात करें तो यह मायने नहीं रखता कि किसने ठीक किया, मायने यह रखता है कि किसने कितना प्रयास किया।रुक कर, “समझ प्रयास पर निर्भर करती है।जूझने की संस्कृति ही समझ की संस्कृति को पैदा करती है।”  “पर बड़े कहलाने वाले प्राइवेट अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों में होता क्या है, हम वहाँ बच्चे को जूझने के लिए नहीं परीक्षा के लिए तैयार करते हैं। वहाँ लक्ष्य समझ नहीं नंबर (परीक्षा के अंक) होता है। हम उन्हें नम्बरों के लिए तैयार करते हैं। हम इतने सालों से पढ़ा रहे हैं, हमें भी मालूम है कि परीक्षा में किस-किस तरह के प्रश्न पूछे जाने हैं और हम उन्हीं की प्रैक्टिस करवा देते हैं और इस तरह बच्चों के सीबीएसई में अंक आते हैं। पर क्या समझ भी आती है? मुझे तो लगता नहीं ...

शोधकर्ता - “परंतु इसका मीडियम के साथ क्या सम्बन्ध है

शिक्षक - हाँ है। शुरू से अंग्रेजी मीडियम में पढ़ा छात्र सीमित मात्रा में (लिमिटेड) पढ़ने का आदि हो चुका होता है। जूझने की क्षमता उसकी ख़तम हो चुकी होती है। इसलिए अंग्रेजी माध्‍यम वाला बच्चा सिर्फ़ नम्बरों को केंद्र में रख कर, केवल उतना ही पढ़ता है, जिससे नंबर आ जाएँ... किसी अच्छी जगह एडमिशन हो जाये... बस...

शोधकर्ता -  आपने कहा... समस्या दोनों माध्‍यमों के विद्यार्थियों के साथ आती है।

श्री पवन- “जहाँ अंग्रेजी माध्‍यम में समस्या भाषा को लेकर आती है, वहीं हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की समस्या टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली) को लेकर आती है। हिंदी में कई बार ऐसे-ऐसे शब्‍दों/टर्म का प्रयोग किया जाता है, जिसको हम भी ध्यान नहीं रख पाते हैं। दूसरा, हिंदी में आगे अभ्‍यास/प्रैक्टिस  के लिए किताबें कम हैं। यदि कोई आई.आई.टी. आदि के स्तर के सवाल करना चाहे तो हिंदी में एक तो किताबें उपलब्ध नहीं हैं, दूसरा यदि बच्चे इंग्लिश की किताबों से अभ्‍यास/प्रैक्टिस करना भी चाहें, तो उसकी समस्या शब्‍दों/टर्म की आती है और इसी प्रकार कोई अंग्रेजी माध्‍यम का छात्र खुद से पढ़ कर समझना चाहे तो उसकी भी समस्या भाषा की नहीं, शब्‍दों/टर्म की आती है।

यदि शब्‍दावली/टर्म एक कर दें तो हिंदी और इंग्लिश, दोनों की समस्या ही ख़त्‍म हो जायेगी।

शिक्षकों से लिए गए असंरचित साक्षात्कारों के दौरान उनके व्यवहार को निर्धारित करने वाले मूल्यों, विश्वासों, धारणाओं तथा मानदंडों सम्बन्धी निम्नलिखित बातें निकल कर सामने आईं -


निजी क्षेत्र के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों का एक समान विश्वास है कि यदि निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में कार्य करना है तो अपने अल्प-शिक्षित प्रबंधकों के शिक्षाशास्त्र के मूल्यों को अपनाना होगा। यदि शिक्षण अधिगम क्रिया में उन्होंने अपनी मर्जी से गाँधीजी और गुरुदेव टैगोर का शिक्षा शास्त्र प्रयोग किया, तो उन्हें घर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। जैसा कि एक शिक्षक ने कहा भी, हाँ जी की नौकरी, ना जी का घर। निजी अंग्रेजी माध्यम शिक्षण में प्रबंधकों के मूल्यों को लागू करने का यह अलिखित-मानदंड पहले से तय ही है। प्रबंधकों का मानदंड उनके पास दाखिला करने वाले माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं से निर्धारित होता है। प्रबंधक, शिक्षकों को उन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति होती हुई दिखाई दे, ऐसा भ्रामक शिक्षाशास्त्र अपनाने पर बल देते हैं।

वहीं शिक्षकों का भी विश्वास है कि बच्चे की अपनी समझ उनकी परिवेश की बोली/भाषा में होती है और विद्यार्थी भी तब ही आनन्द लेता है जब उसे रचनात्मक तौर पर उसकी बोली में ही पढाया जाए। पर घर में जो महत्वकांक्षा का ठीकरा बच्चों के सिर फोड़ा जाता है तथा स्कूल में स्पीक इन इंग्लिश की जो घुट्टी पिलाई जाती है, उसका नतीजा यह होता है कि बच्चे भी अंग्रेजी की कुंठा लेकर घर आते हैं और अंग्रेजी के लेक्चर को ही शिक्षण मानते हैं। इसलिए उन्हें रचनात्मक शिक्षण के शिक्षाशास्त्र को दरकिनार कर लेक्चर विधि को ही अपनाना पड़ता है। शिक्षकों की ऐसी धारणा है। ट्यूशन में यह धारणा कुछ कमजोर पड़ती है, पर टूटती नहीं है इसलिए शिक्षक कुछ हद तक परिवेश की भाषा का प्रयोग कर लेता है। इस प्रकार हर शिक्षक अपने अनुभवों से जनता है कि विद्याथी की समझ तो उसकी अपनी बोली-भाषा में ही होती है। शिक्षकों के अनुसार अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल में बच्चों को डालने का मुख्य मकसद ही यह होता है कि वह अंग्रेजी बोल-चाल की संस्कृतिको अपनाए। अंग्रेजी बोल-चाल की संस्कृतिको ही अपनाना निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की शिक्षा का मकसद है। प्राचार्य एवं शिक्षक इन मानदंडों से बँधा हुआ सेवक-मात्र  है। कुछ हद तक, शिक्षक का अपना खुद का समाजीकरण भी आड़े आता है। पर उसने अपने अनुभव से जान लिया (अर्थात् विश्वास हासिल कर लिया) है कि जूझने तथा समझने की जो ताकत अपने परिवेश की भाषा के माध्‍यम से पढने वाले विद्यार्थियों  में होती है, वह ताकत अंग्रेजी माध्‍यम में पढने वाले विद्याथियों में नहीं होती। अंग्रेजी माध्यम मे पढ़ने वाले विद्यार्थी अपने माता-पिता के धन के बल पर ही कामयाब होते हैं। ऐसा भी शिक्षको का मानना है।

प्रबंधकों के प्रशंसा-पात्र बनाने की अभिलाषा, उन्हें प्रबंधकों के मानदंडों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। प्रशंसा-पात्र बने रहने का अर्थ है - नौकरी तथा पदोन्नति की सुरक्षा।  

शिक्षकों के व्यक्तिगत अनुभव

शिक्षकों ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों में पाया कि स्कूल प्रबंधन का एकमात्र दबाव भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा के प्रयोग करने का रहता है, ताकि उनके स्कूल की प्रतिष्ठा बढ़े। प्रबंधको का विशेष आदेश रहता है कि कक्षा में अंग्रेजी का ही प्रयोग करें। चाहे वह विद्यार्थियों को समझ आए अथवा न आए। शिक्षकों के चयन के दौरान शिक्षकों का ज्ञान तथा शिक्षाशास्‍त्रीय समझ को, वे द्वितीयक प्राथमिकता में रखते हैं। प्रथम तो उनकी अंग्रेजी बोलने की क्षमता ही रहती है। शिक्षकों की तनख्‍वाह और स्थायित्‍व, उनकी अंग्रेजी बोलने की क्षमता पर ही नहीं, अपितु इसको कितना आगे बढ़ा सकते हैं, इस बात पर भी निर्भर करता है। स्कूलों में कुछ अध्‍यापकों को तो सिर्फ़ इसलिए नियुक्त किया जाता है क्योंकि वे अंग्रेजी बोलने में महारथ रखते हैं। इन अध्यापकों की जिम्मेदारी अंग्रेजी में बात ना करने वाले शिक्षकों पर नैतिक दबाव बनाने की रहती है। ये शिक्षक ही स्कूल की असेम्‍बली, पी.टी.एम., साँस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र में होते हैं। इसके अतिरिक्त, इन शिक्षकों का विशेष दायित्व विद्यार्थियों को अंग्रेजी में वार्तालाप करने हेतु प्रेरित करने का होता है। ऐसे में, शिक्षक चाहे तो भी, विद्यार्थियों के सामाजिक परिवेश को कक्षाओं में नहीं ला पाता। यदि कोई अध्यापक शिक्षण के दौरान क्षेत्रीय भाषा-बोलियों को शामिल भी करना चाहे, तो वह उसे शामिल नहीं कर सकता।

अंग्रेजी माध्‍यम के इन निजी स्कूलों में विद्यार्थियों से यह तो उम्मीद की जाती है कि वे अपने प्राचार्य, शिक्षक एवम् आपसी बातचीत आदि में सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी का प्रयोग करे। यहाँ  तक कि स्कूल पुस्तकालय में अख़बार/न्यूज़-पेपर, मैगज़ीन तक इंग्लिश की पढ़े। यदि वे इन मानदंडों का उलंघन करते हैं तो सज़ा के पात्र बनते हैं।  परन्तु चपरासी, गेट-कीपर, के साथ  बातचीत करने हेतु वे मानक भाषा (हिन्दी) का प्रयोग कर सकते हैं। यही उम्मीद विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक अपने विद्यार्थियों से करते हैं कि वे कक्षा-शिक्षण के दौरान अंग्रेजी का प्रयोग करें। पूरा-पूरा लेक्चर इंग्लिश में देने के बाद पीरियड खत्‍म  होने के वक्त कहते हैं कि जिसको समझ में नहीं आया हो, वह हिन्दी में पूछ ले।

बहाना कुछ भी हो, अंग्रेजी रोजगार की गारंटी देती है या इंग्लिश हाई स्टेटस सोसाइटी में बने रहने के लिए जरूरी है। अतः अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों में छोटे दर्जे के कर्मचारियों से बातचीत करने के लिए तो आप हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग कर सकते  हैं, पर उच्च दर्जे के लोगों से सम्पर्क करने के लिए आपको टूटी-फूटी ही सही, अंग्रेजी में ही बातचीत करनी होगी। ये सारी घटनाएँ अंग्रेजी को श्रेष्ठ और उच्च दर्जे़ की भाषा के रूप में स्थापित करती हैं।

ये सभी बहाने अंग्रेजी माध्‍यम के साँस्कृतिक वर्चस्व को पैदा करते हैं। अंग्रेजी माध्‍यम कल्चर वास्तव में साँस्कृतिक वर्चस्व है, जो स्कूलों के माध्यम से समाज के मानस पर आरोपित किया जाता है। स्कूल के अध्यापक का वास्तविक काम विद्यार्थियों के ज्ञान-निर्माण में सहायता करने का नहीं, अपितु इसी साँस्कृतिेक वर्चस्व को बनाए रखने का का हो गया है।

(नोट सभी नाम काल्पनिक है)

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