अंग्रेजी माध्यम विद्यालय के संरक्षक
क्या अंग्रेजी माध्यम स्कूल, अपने विद्यार्थियों के सामुदायिक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को अपने स्कूली परिसर में स्थान दे रहे हैं? इस बात का पता लगाने हेतु प्रबंधकों/प्राचार्यों से बातचीत की गयी एवं अवलोकन करके स्कूल परिसर के अन्दर और उसके बाहर के वातावरण का पता लगाया गया।
स्कूल प्राचार्यों/प्रबंधकों को इस अध्ययन में समाहित करने की
आवश्यकता इसलिए भी पड़ी क्योंकि यह वर्ग ही स्कूली परिसर के मानदंड तय करता है। वे
ना केवल उन मानदंडों के अनुरूप शिक्षकों एवं विद्यार्थियों (कानूनी दबाव के बावजूद
भी) का चयन करते हैं अपितु स्कूली परिसर में उन नियमों और मानदंडों के अनुरूप चलने
की पूरी व्यवस्था भी करते हैं। प्राचार्य और प्रबंधक ही विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक के बीच के लिंक को स्थापित करता है।
इस उद्देश्य की पुष्टि के दौरान शोधकर्ता यह पता लगाना चाहता है कि स्कूल परिसर का
वातावरण विद्यार्थी के परिवेश-विशेष की संस्कृति को कितना समाहित कर पाया।
इसका पता लगाने हेतु शोधकर्ता
द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए गए-
प्राचार्यों का असंरचित साक्षात्कार,
स्कूल एवं स्कूल के आसपास के वातावरण का अवलोकन (नोट- बहुत से
स्कूलों में इसकी इजाजत नहीं मिली),
स्कूल-अध्यापकों का साक्षात्कार,
उन लोगों से बातचीत की, जो अमूमन स्कूली
वातावरण का निकट से अवलोकन करते हैं, जैसे- चपरासी, गेटकीपर, कैंटीन-वाले, स्कूल
के बाहर खड़े रिक्शा वाले।
प्राचार्यों का असंरचित साक्षात्कार एवं स्कूलों के अवलोकन से जो
मुख्य बिंदु निकल कर आए, वे इस प्रकार हैं।
शोध एवं लेखन का उद्देश्य किसी व्यक्ति एवं संस्था विशेष पर
व्यक्तिगत हमला करना नहीं है। इसलिए व्यक्ति एवं संस्थाओं के वास्तविक नाम को
उजागर करने के स्थान पर A, B, C, D जैसे काल्पनिक नाम दिए
हैं। सुविधा के लिए जो स्कूल का नाम है, उसी नाम से प्राचार्य एवं प्रबंधकों को
संबोधित किया गया है।
अतिविशिष्ट माने जाने वाले इस प्रतिष्ठित स्कूल को हम A नाम देते हैं और उसके प्राचार्य के संबोधन के लिए भी A नाम का प्रयोग करेंगे।
A स्कूल के मुआयना करने दौरान निम्नलिखित मुख्य
बिन्दु उजागर हुए :-
स्कूल A के अवलोकन में पाया कि यह स्कूल ग्रामीण एवं शहरी
क्षेत्र के बीच स्थित है।
बस ड्राइवरों से बात करने पर ज्ञात
हुआ कि शहर और गाँव की सरहद पर स्थित इस स्कूल में शहर के पॉश इलाकों से
विद्यार्थी आते हैं। ग्रामीण क्षेत्र से विद्यार्थी न के बराबर हैं।
न केवल स्कूल के आधे ग्राउंड को इन
बसों ने घेर रखा है अपितु स्कूल के बाहर भी बड़ा क्षेत्र इन्हीं बसों के कब्जे़ में
है।
स्कूल ऑफिस के बाहर एक सुन्दर ‘लॉन’ है, जो बाहर से आने वाले
आगंतुकों को आकर्षित करता है। पर यहाँ एक भी बच्चा उछल-कूद करता नहीं दिखा। ना ही
स्कूल के ग्राउंड में कोई बच्चा खेलता दिखा।
आम तौर पर स्कूलों में जो शोरगुल
सुनाई पड़ता है, वह इस स्कूल में नहीं है। स्कूल परिसर में शांति है।
स्कूल में कक्षाओं के निरिक्षण की
इजाजत शोधकर्ता को नहीं मिली।
स्कूल परिसर में जगह-जगह कैमरे लगे
हैं।
प्राचार्य-कक्ष में प्रवेश करने पर पाया कि प्राचार्य एक पिता को
स्कूल में प्रवेश हेतु लिये जाने वाले टेस्ट की जानकारी दे रहे हैं। टेस्ट ‘इंग्लिश’, ‘मैथ्स’, ‘साइंस’
का होगा, जिसमें इंग्लिश का स्तर उच्च रहेगा।
यह भी प्राचार्य साथ-साथ स्पष्ट कर रहे हैं। प्राचार्य का संक्षिप्त परिचय यह है
कि वे एक वे फरीदाबाद में देश के प्रतिष्ठित स्कूल ब्रांड के संस्थापक प्राचार्य
(फाउंडर प्रिंसिपल) रह चुके हैं। उन्होंने तीस साल तक उस स्कूल में प्राचार्य के
रूप में काम किया है। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने ये स्कूल किसी बिज़नस फ़र्म के
साथ मिल कर खोला है।
प्राचार्य ने साक्षात्कार के दौरान बताया कि -
“जिस परिवेश के बच्चे
की आप बात कर रहे हैं, वह हमारे यहाँ नहीं पढता। स्कूल में
आने वाले सभी छात्र उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों के हैं,
जिनके माता-पिता भी ‘क्वालिफाइड’ हैं। माता-पिता के ‘क्वालिफाइड’
होने से तात्पर्य है वे माता-पिता जिन्होंने विश्वविद्यालयी शिक्षा
प्राप्त कर रखी हो तथा जो अंग्रेजी बोलना जानते हों।” इस
प्रकार जब प्राचार्य ने विद्यार्थी के
परिवेश में उसके माता-पिता को ही समाहित किया, तो माता-पिता
के अलावा, परिवार के अन्य सदस्यों, जैसे-
ताया-ताई, दादा-दादी, तमाम नातेदारी, आस-पड़ोस, रिक्शेवाले,
ठेलीवाले आदि की भूमिका को नकार दिया। बार-बार उकेरने पर भी यही कहा कि शहरी
नव-मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चे का अधिकतर संपर्क अपने माता-पिता से ही होता है, उनके दोस्त भी उसी स्तर के होते हैं। इस स्कूल में आने वाले सभी
विद्यार्थी अच्छे इलाकों के होते हैं.... और उनके अनुसार वहाँ भी बोलचाल के लिए
इंग्लिश और हिंग्लिश का प्रयोग होता है।
जब प्राचार्य ने इस बात से इंकार कर
दिया कि उनके इलाको में आने वाले छात्रों में ग्रामीण एवं निम्न मध्यमवर्गीय
पृष्ठभूमि के लोग नहीं हैं, तो शोधकर्ता ने अंतिम हथियार के तौर पर आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस / EWS) की बात की। इस पर कुछ इस प्रकार-से
जबाब प्राप्त हुए-
“कानून बनाने से क्या
होता है। आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS)
का कोई भी विद्यार्थी इस स्कूल में नहीं है और ना ही कभी पढ़ सकता
है।”
“गलती से कभी आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस/EWS) का
कोई विद्यार्थी आ भी गया तो यहाँ टिक नहीं
पायेगा। सरकार के नियम के अनुरूप सिर्फ़ ‘फीस’ ही तो माफ की जा सकती है। स्कूल
में चलने वाली अन्य गतिविधियों का तो मूल्य देना पड़ेगा,
जैसे- बस ‘यूज़’ करेगा तो बस का चार्ज
देगा। रेडीमेड ड्रेस और छपे-छपाए नोट्स के पैसे अलग से देने होंगे। यह बिल्डिंग और उसकी साफ-सफाई सरकारी वाली तो है
नहीं। तो क्या उसका चार्ज अलग-से नहीं होना चाहिए। फिर स्कूल में समय-समय पर चलने
वाली अन्य गतिविधियों का खर्च भी तो होता है, जैसे- टूर, पिकनिक आदि क्योकि हमारे बच्चे ऐसी-वैसी जगह तो जाते नहीं हैं।
आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS) के विद्यार्थी के माता-पिता
हमारे स्कूल के अन्य खर्च वहन नहीं कर सकते।” शोधकर्ता प्राचार्य की व्यक्तिगत
ईमानदारी एवं स्पष्टता की कद्र करता है। जिस ईमानदारी और स्पष्टता से उन्होंने ये
बात क़बूल की है कि एलीट वर्ग के लिए खुले उच्च दर्जे के निजी अंग्रेजी माध्यमस्कूलों
का वातावरण, निम्न दर्जे के स्कूलों के अनुरूप नहीं है। यह
बात शायद आर्थिक-अशक्त्-वर्ग (ईडब्यूएस /EWS) को 25% सीट उपलब्ध कराने की वकालत करने वाले तथाकथित
शिक्षाविद् ने भी नहीं की हो। वे इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था को ‘इन्क्लुसन’
(समावेशन) की संज्ञा देते हैं।
शोधकर्ता ने इसी प्रकार के इन्क्लुसन (समावेशन) का एक
नज़ारा जसोला विहार स्थित गुड स्मार्टन स्कूल में अपने शिक्षण अनुभव के दौरान
देखा। यह एक अंग्रेजी माध्यमका स्कूल है, पर यहाँ आने वाले
विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या दिल्ली के स्लम इलाकों की है। माता-पिता में
इंग्लिश के प्रति जो क्रेज़ है। उसकी वजह से वे अपने बच्चों का दाखिला चैरिटी के
नाम पर खुले इस स्कूल में करवा रहे हैं। इस स्कूल में आने वाला पैसा भी अमेरिका और
ब्रिटेन स्थित विदेशी संस्थाओं का है। चूँकि यह स्कूल गरीब बच्चों को शिक्षित
कराने का काम करता है अतः दिल्ली सरकार ने इस स्कूल को मुफ्त के बराबर मूल्य पर
ज़मीन भी दी है। पर होता क्या है कि मध्यमवर्गीय एवं स्लम इलाकों अर्थात् दोनों
क्षेत्रों से आने वाले बच्चों में स्लम इलाकों के बच्चे पिछड़ते जाते हैं। दो
सेक्शन में बँटे दो वर्गों के बच्चों में स्लम इलाकों के बच्चे अधिक उद्दंड घोषित
कर दिए जाते हैं। ‘फ़्लूएंट इंग्लिश’ में पढ़ाने वाले इन शिक्षकों के अनुसार ये
बच्चे कक्षा में पढ़ने मे रूचि ही नहीं लेते। जबकि हकीकत यह है कि जो
विद्यार्थियों को पढाया जाता है, वह उनके पल्ले ही नहीं पड़ता है और नतीजा यह
निकलता है कि आठवीं- नवीं कक्षा तक दो सेक्शनों में बटे दो वर्गों के ये बच्चे जब
नवीं कक्षा से फेल होना प्रारंभ होते हैं तो बारहवीं कक्षा तक सिर्फ़ मध्यम वर्ग
के ही बच्चे शेष रह जाते हैं। यदि इस
अनुभव को प्राचार्य A के वक्तव्य के साथ जोड़ कर देखें तो A प्राचार्य का वक्तव्य
अधिक ईमानदार एवं स्पष्ट है।
प्राचार्य ने आगे कारण स्पष्ट करते
हुए बताया, “आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS) का विद्यार्थी हमारी अंग्रेजी की
परीक्षा कभी पास ही नहीं कर सकता। हमारे यहाँ तो नर्सरी से ही सभी विषय अंग्रेजी
में ही पढाये जाते हैं। जबकि शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस / EWS) के
लिए की गयी आरक्षण की व्यवस्था पहली कक्षा से प्रारंभ होती है। इस प्रकार पहली
कक्षा से जिस बच्चे का दाखिला होगा वह उन बच्चों के सामने कैसे टिक पायेगा, जो नर्सरी कक्षा से ही अंग्रेजी में पढ़ रहा है।” अतः स्पष्ट होता है कि
पहली कक्षा से ही, दोनों वर्गों से आने वाले विद्यार्थियों
में अंग्रेजी भाषा एक भेद बना कर रखती है।
प्राचार्य के अनुसार “अंग्रेजी माध्यममें पढने के लिए शुरू से इंग्लिश होना जरूरी है, आप सोचो कोई बच्चा आठवीं कक्षा में आकर यदि अंग्रेजी में पढ़े तो नहीं पढ़
पायेगा। और बड़ी कक्षा में तो और अधिक दिक्कत होगी।”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि आप
अंग्रेजी के अनुरूप शिक्षण के लिए माहौल कैसे तैयार करते हैं? तो इस संबंध में प्राचार्य का स्पष्ट जबाब था, “शिक्षकों
को नियुक्त कर के” “कैसे? “हम उनको ही शिक्षक नियुक्त करते हैं जो शुरू
से अंग्रेजी माध्यमसे अच्छे पब्लिक
(प्राइवेट) स्कूल में पढ़े हों, अच्छी ‘यूनिवर्सिटी’
के ‘ग्रेजुएट’ और ‘पोस्ट-ग्रेजुएट’ हों। कुल मिलाकर उसकी ‘स्पोकन इंग्लिश’ अच्छी होनी चाहिए और दूसरा हम
एडमिशन भी उन्हीं ‘बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) के बच्चों को देते
हैं, जिनके माता-पिता का बैकग्राउंड अच्छा हो।” अर्थात् स्कूल के शिक्षक एवं माता-पिता दोनों का बैकग्राउंड अंग्रेजी
माध्यमकल्चर का होने पर ही उन्हें स्कूल परिसर में प्रवेश मिलता है।
“स्कूल में बातचीत सिर्फ़
इंग्लिश में ही होती है। कोई शिक्षक बच्चों से हिंदी में बात नहीं कर सकता। ”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि
ऐसी आवश्यकता क्यों पड़ी, इस बात पर प्राचार्य का स्पष्ट मानना है कि इंग्लिश के बिना वह कहीं टिक
नहीं सकता है। ना ‘हायर एजुकेशन’ में,
न एम.एन.सी. में, ना वर्ल्ड के किसी कोने में, उसे दूर छोड़ो आपके साउथ (भारत देश के साउथ) में भी बिना इंग्लिश के नहीं
पहुँचा जा सकता।
जब प्राचार्य से यह पूछा गया
कि जापान, जर्मनी, रूस, चीन आदि देश कैसे टिके? “आपके पास अपने वेद नहीं हैं, जर्मनी में उसका जर्मन
अनुवाद है, आज अमेरिकन संस्कृत सीख रहे हैं।”
कुछ विशेष बातें जो प्राचार्य से संबंधित हैं वो ये कि ये देश के
सबसे प्रतिष्ठित निजी स्कूल ग्रुप की फरीदाबाद इकाई के ‘फाउंडर प्रिंसिपल’ रह चुके हैं और वर्तमान में
नव-स्थापित प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यमस्कूल के ‘प्रिंसिपल
डायरेक्टर’ हैं। मात्र हिंदी बोलने पर शिक्षकों को घर का
रास्ता दिखाने और देहाती बोलने पर बच्चों को टी.सी. थमाने वाले प्राचार्य A
के टेबल पर हिंदी का अखबार नवभारत टाइम्स
रखा था, जो आजकल हिंगलिश में छपता है।
जब स्कूल के बाहर खड़े स्कूल के वॉचमैन से बात करनी चाही तो उसने जबाब
देने से मना कर दिया। पर साथ खड़े ड्राइवर ने बताया, “बच्चे
इतने अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं पर कई बार बस में ऐसी-ऐसी हरकतें करते हैं कि हमें
शर्म आ जाती है। अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं।”
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि स्कूल A के आस-पास
के ग्रामीण सामुदाय की संस्कृति का स्कूल परिसर में कोई स्थान नहीं है। नव-धनाड्य
उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे ही यहाँ टिक सकते हैं। शहरों में भी
माता-पिता के आगे किसी और को बच्चे के परिवेश में शामिल नहीं करते हैं। आस-पड़ोस तो
दूर, नाते-रिश्तेदार भी परिवेश में नहीं आते हैं। पिकनिक और
टूर के लिए जो जगह चुनी जाती है, वह प्राकृतिक परिवेश ना
होकर अम्यूज़मेंट पार्क तथा यू.एस.ए. स्थित नासा है।
B स्कूल एवं B प्राचार्य (काल्पनिक नाम)
स्कूल B भी फरीदाबाद का एक अंग्रेजी माध्यम का एक नव स्थापित
प्रतिष्ठित विद्यालय है। शोधकर्ता को स्कूल परिसर में विस्तारित अवलोकन की इजाज़त
तो नहीं मिली परन्तु जहाँ तक वह देख पाया, स्कूल के
क्लास-रूम आधुनिक सुविधाओं से सम्पन हैं। स्कूल में ‘प्राइमरी विंग’ की कक्षाओं में स्मार्ट-बोर्ड लगे
हुए हैं। शोधकर्ता अवलोकन हेतु जिस वक्त वहाँ पहुँचा, उस वक्त वहाँ कुछ माता-पिता
बच्चों के प्रोफाइल-बुक के लिए फ़ोटो खिंचवाने आए हुए थे। माता-पिता से बातचीत
करने पर पता चला कि स्कूल में प्राथमिक कक्षाओं में कम बच्चे रखे जाते हैं ताकि हर
बच्चे पर अधिक ध्यान दिया जा सके और एक बात जो और उन्होंने बतायी वह यह थी कि
स्कूल में ‘अंग्रेजी माध्यमके अनुरूप इंग्लिश स्पीकिंग
कल्चर’ है। (नोट- लेखक ने ‘अंग्रेजी
माध्यमकल्चर’ और ‘इंग्लिश
स्पोकन कल्चर’ इन सज्जन से ही उधार लिया।) पर इस इंग्लिश
स्पीकिंग कल्चर वाले स्कूल में काफी मिन्नत-मश़क्कत के पश्चात् ही प्राचार्य के
साक्षात्कार का मौका मिला।
प्राचार्य B के अनुसार -
“इंग्लिश स्पीकिंग
कल्चर से तात्पर्य उस कल्चर से है जहाँ बच्चे हर समय इंग्लिश ही बोलते हों।”
“स्कूल में बोलचाल
पूर्णतः अंग्रेजी में होती है। यदि विद्यार्थी को शिक्षक से कुछ भी पूछना है तो
उसे अंग्रेजी में ही पूछना होगा। यदि कोई छात्र क्षेत्रीय भाषा या हिंदी में बोलता
भी है तो शिक्षक जबाब नहीं देता।”
प्राचार्य ने अपना ही उदाहरण देते
हुए कहा, “यदि मेरे पास कोई बच्चा आकर क्षेत्रिय भाषा या
हिंदी में बोलता है तो मैं कोई जबाब नहीं देती।” प्राचार्य
के अनुसार वे कह देती है, “माय इअर कान्ट हियर व्हाट यू
हैव स्पोकन / My ear can’t hear what you have spoken.”
(आपने जो कुछ भी बोला उसे मेरे कान नहीं सुन पाए)
“हमारे यहाँ क्लास
रूम में पूर्णतः अंग्रेजी का प्रयोग होता है। शिक्षक अपना ‘लेक्चर’
अंग्रेजी में ही देता है। यदि किसी बच्चे को कुछ पूछना भी होता है
तो वह सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पूछता है।”
“स्कूल में होने वाली
तमाम गतिविधियाँ, सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी में ही होती हैं, जैसे- डिबेट, असेम्बली आदि”
“समय-समय पर बाहर से
अतिथि (गेस्ट) बुलाये जाते हैं वो भी सिर्फ़ अंग्रेजी में ही बोलते हैं और बच्चों
को भी इंग्लिश स्पीकिंग के लिए मोटिवेट करते हैं।”
“इस प्रकार स्कूल में
इंग्लिश के शिक्षण हेतु वातावरण बनाने के लिए हिंदी,
क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों पर पूर्ण रोक लगा दी जाती है।”
आगे, जब शोधकर्ता
ने जानना चाहा कि क्या आपके स्कूल में क्षेत्रीय भाषा, हिंदी
एवं क्षेत्रीय बोलियों जैसे हरियाणवी, गुर्जरी आदि का
बिलकुल-भी प्रयोग नहीं होता? इस प्रश्न के जबाब में आगे
प्राचार्य ने बताया, “ऐसा भी नहीं है कि हम हिंदी का प्रयोग
ही नहीं करते ‘पेट्रियोटिक डेज़’ पर
हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है। उन दिनों में हम प्यूर (शुद्ध) हिंदी (Pure
Hindi) का प्रयोग करते हैं।”
अर्थात् स्पष्ट है कि क्षेत्रीय बोलियों के लिए कोई स्थान नहीं है।
“पर आज समस्या यह आन
खड़ी है कि बच्चे ना तो अच्छी हिंदी जानते है ना ही इंग्लिश”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि किस प्रकार बाहरी वातावरण को
स्कूली परिवेश में समाहित करते हैं। इस पर प्राचार्य ने जो जबाब दिया वह सवाल को ‘बाई-पास’ करने वाला था। “हम
माता-पिता से कहते हैं कि आप इंग्लिश नहीं बोल पाते,
कोई बात नहीं, आप
अपने बच्चों को प्रोत्साहित करो कि वे घर में भी अंग्रेजी ही बोलें।”
जब शोधकर्ता ने और अधिक स्पष्टीकरण चाहा कि आप बहरी वातावरण
को किस प्रकार स्कूली वातावरण में समाहित करते हैं। प्राचार्य का जबाब था, “हम विद्यार्थी को न्यूज़पेपर पढने हेतु प्रेरित करते हैं।”
अब शोधकर्ता ने अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट किया और
उदाहरण देकर पूछा, जैसे- पंचायत के कार्य को लेकर होने वाली बातचीत, दुकानदारों से होने वाली बातचीत, आस-पडोस के लोगों,
रिक्शेवालों-ठेलेवालों से होने वाली बातचीत आदि… आदि...
इस पर प्राचार्य का जबाब था, “वे (विद्यार्थी) सुनते जरुर हैं पर सोचते अंग्रेजी में ही हैं। इंग्लिश
में ट्राँसलेट करने से इंग्लिश नहीं आएगी। अंग्रेजी में सोचना होगा। अतः हम अपने
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अंग्रेजी में ही सोचें।”
स्कूल में अध्यापक और प्राचार्य के अलावा
भी तो अन्य स्टाफ है। “पब्लिक स्कूलों के अन्दर मेड को भी प्रशिक्षण दिया जाता है, वैसे छोटे बच्चों को उनसे बोलना ही क्या होता है- आंटी वाश हैंड / Anti
wash hand… और मेड समझ जाती है। अंग्रेजी माध्यमस्कूलों में मेड को
भी एटिकेट्स सिखाए जाते हैं कि वो भी थोड़ी-बहुत इंग्लिश समझ ही सके।”
बड़े बच्चों के लिए “ऐसा नहीं है कि हम अपने बच्चों को हिंदी बोलने से पूर्णतः रोकते हैं। वे
ड्राइवर, कंडक्टर, चपरासी आदि से हिंदी में बोल सकते हैं। ”
शोधकर्ता - “क्या क्षेत्रीय भाषा-बोली में भी?” नहीं, हमारा कोई भी स्टाफ़ ‘रफ्फ़ भाषाओं’ का प्रयोग नहीं करता। ये पब्लिक स्कूल
के ऐटिकेट्स के खिलाफ है।
शोधकर्ता ने आगे जानना चाहा, “क्या
इतना होने के बावज़ूद भी बच्चे इंग्लिश में समझ बना पाते हैं?”
प्राचार्य ने अपनी विवशता ज़ाहिर की
- “देखिये, बच्चे हमारे पास छः
घंटे ही रहते हैं। शेष समय वे अपने घर पर ही रहते हैं। उनके इंग्लिश में समझने कि
क्षमता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनके घरों में अंग्रेजी का प्रयोग कितना
होता है।”
C स्कूल तथा उस स्कूल
के प्राचार्य C(काल्पनिक नाम)
स्कूल C मध्य स्तर का वह स्कूल है जहाँ की प्राचार्य इस बात
को स्वीकार करती है कि उनके स्कूल में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी का भी प्रयोग
होता है। उनके अनुसार उनके स्कूल में आने वाले अधिकतर विद्यार्थी उन निम्न-मध्यम
वर्गीय परिवारों के हैं, जो ग्रामीण क्षेत्र से परिवर्जित
होकर शहरों में बसे हैं। पर जब उनके स्कूल में ग्रामीण परिवेश के लोगों की ग्रामीण
बोलियों की बात आई तो इस विषय पर उनका कहना है कि वे अपने स्कूल परिसर में
क्षेत्रीय (ग्रामीण) बोलियों के प्रयोग को वर्जित करती हैं।
पाठकों की जानकारी में दो बातें और लाना चाहेंगे। प्रथम केस स्टडी का
छात्र रमेश इसी स्कूल C का विद्यार्थी है। पहले ग्रुप परिचर्चा के छात्र भी
इसी स्कूल से सम्बन्धित हैं। जो बताते हैं, “प्रिंसिपल मैडम हमें साँस्कृतिक
प्रोग्रामों में हिन्दी की मात्रा कम रखने को कहती हैं।” इसका अर्थ है कि
साँस्कृतिक प्रोग्राम में अंग्रेजी का ज़्यादा-से- ज़्यादा प्रयोग किए जाने पर
बल दिया जाता है। सवाल उठता है कि जब माता-पिता एवं बच्चे ग्रामीण पृष्ठभूमि के
हैं तो साँस्कृतिक कार्यक्रमों में अंग्रेजी का
प्रयोग किसके लिए होता है? इसी स्कूल के संस्कृत भाषा
के एक शिक्षक ने बच्चों के संस्कृत में जमा कराए प्रोजेक्ट दिखाते हुए बताया कि, “साइंस, सोशल साइंस को
छोड़िए... मैडम तो संस्कृत भी अंग्रेजी माध्यममें पढ़ाने को कहती हैं। शोधकर्ता ने
चार बार प्राचार्य से मिल कर स्कूल के अन्दर का वातावरण देखना चाहा, पर स्कूल के अन्दर जाने की इजाजत नहीं मिली।
प्राचार्य के साक्षात्कार से निकले कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं -
“आज के समय में इंग्लिश के बिना चलना मुश्किल है।”
“यह लैंग्वेज एक आदमी की पर्सनालिटी को डिफ़ाइन करती
है। स्टेटस, लिविंग स्टैण्डर्ड सभी, इस
भाषा का प्रयोग करने वालों का लिविंग स्टाइल ही डिफरेंट है।”
एक स्कूल की ख्याति को बनाए रखने के लिए जरुरी है कि वह अपने
अंग्रेजी माध्यमका स्तर ऊँचा रखे।
हर स्कूल के लिए अंग्रेजी माध्यम का एक-समान स्तर बनाये रखना संभव
ही नहीं है। स्कूल के अंग्रेजी माध्यम के स्तर को निर्धारित करने वाले कारको में
सबसे महत्वपूर्ण है कि स्कूल का
बैकग्राउंड क्या है, वह किस लोकेलिटी में स्थित है, उसमें आने वाले छात्र किन परिवारों से आते हैं।
घर का परिवेश बच्चे की भाषा को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है।
स्कूल के मीडियम का स्तर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूल
कहाँ पर स्थित है, उसमें किस प्रकार के परिवारों के बच्चे आते हैं।
हम यहाँ बच्चों के साथ छह घंटे बिताते हैं, छह में से तीन घंटे भी उनसे इंग्लिश में बातचीत करें तो भी वे घर जाकर
उसी कल्चर में ढल जाएँगे। इस प्रकार हमारे सारा प्रयास/एफर्ट बेकार जाता है।
यदि डीपीएस के साथ अपने स्कूल को कम्पेयर करें तो सिर्फ़ स्कूल का ही
नहीं, स्कूल में आने वाले बच्चों का भी फर्क होता है।
डीपीएस में आने वाला बच्चा हाई क्लास का है। यदि सर्विस क्लास भी है तो वह
ऐसी-वैसी नहीं, हाई पोस्ट पर काम करने वाले माता-पिता हैं।
डीपीएस में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता भी क्वालीफाईड होते हैं। वे अपने
बच्चों से इंग्लिश में बात करते हैं।
जबकि हमारे स्कूल में आने वाले बच्चों के माँ-बाप छोटा-मोटा काम-धंधा
करते हैं। ये लोग पढ़े-लिखे कम होते हैं, ये बच्चों के साथ
इंग्लिश में बात नहीं कर सकते। हमारे यहाँ आने वाले बच्चे अपने घरों में बिहारी,
मुसलमानी, गुर्जरी आदि भाषाएँ बोलते हैं।
स्कूल से निकलने के बाद वे रिक्शेवाले से, चायवाले से तो इंग्लिश में बात करेगा नहीं।
जब शोधकर्ता ने कहा कि डीपीएस का बच्चा भी तो स्कूल से बाहर निकलता
है, इसका जबाब देते हुए प्रिंसिपल ने कहा, “डीपीएस का बच्चा बाहर निकल कर रोड़-साइड वाले से बात नहीं करता। उसके
पेरेंट उसको लेकर अच्छे-अच्छे मॉल में जाते हैं। डीपीएस का बच्चा फाइव-स्टार होटल
में जाता है, जहाँ का बैरा भी इंग्लिश में बात करता है। जबकि
मेरे स्कूल के पेरेंट उसको लेकर महँगे होटलों में नहीं जा सकता। ये सब बातें भी
बच्चे के इंग्लिश बोलने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।
जिस आदमी के पास पैसा आ गया, वह भी अपने आप को
हाई सोसाइटी वालों के साथ खड़ा करना चाहता है कि चलो, हम तो
नहीं बोल सकते पर हमारे बच्चे तो उस कल्चर को अपनाएँ, इसके
लिए वह अपने बच्चों को महँगे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में डालना शुरू करता है तथा
अपने बच्चों को हाई सोसाइटी में भेजना शुरू करता है।
अतः बच्चों की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ लोगों की आर्थिक एवं सामाजिक
स्थिति का प्रतिफल है।
प्राचार्य के अनुसार बच्चे की भाषा पर स्कूल के शिक्षकों का भी
प्रभाव पड़ता है। हर स्कूल की अपनी पेइंग कैपेसिटी होती है। मेरे स्कूल की पेइंग
कैपेसिटी महँगे स्कूलों से कम है। इसलिए मेरे पास आने वाला शिक्षक भी, वो नहीं जो महंगे स्कूलों का है। मेरे पास आने वाला शिक्षक हरियाणा बोर्ड
हरियाणा की यूनिवर्सिटी का पढ़ा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का पढ़ा होता तो उसकी
इंग्लिश बेहतर होती। मेरे यहाँ के टीचर की इंग्लिश इतनी अच्छी नहीं है। पर ‘सब्जेक्ट कमांड’ उतना ही है अतः मैंने उसका एक प्लस
तथा दूसरा अपना माइनस देख कर उसे रख लिया है।
जैसा कि आपने बताया बच्चों का बैकग्राउंड तो नहीं है। पर पढ़ने वाले
सभी सब्जेक्ट इंग्लिश में हैं तो क्या इससे बच्चों की समझ पर कोई प्रभाव पड़ता है? इसके जबाब में प्राचार्य ने कहा,
“हमारे टीचर मिक्स करके पढ़ाते हैं, इंग्लिश के
साथ थोडा हिंदी में।” पर परीक्षा में तो बच्चों को इंग्लिश
में ही लिखना पढता है। “लिखने में यही दिक्कत आती है। हमने
उन्हें सिखा रखा है कि थोड़ा याद करके लिखें। छोटी क्लास में टीचर उत्तर डिक्टेट
करते हैं। अर्थात् लिखवा देते हैं, बच्चे उसी को लिखते हैं
क्योकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। बड़ी क्लास में भी हम बच्चे को हिंदी इंग्लिश
मिक्स करके समझाते हैं। पर हम बच्चों को कहते हैं थोडा याद भी करे लिखें। क्योंकि
अंतिम लक्ष्य होता है की बच्चे को समझ भी आना चाहिए। अतः लिखते समय थोडा याद भी
किया। क्योकि खुद से लिखेगा तो गलती होने कि आशंका रहती है। हम भी तो अपनी बहुत-सी
बातों को लिखते हैं। लिखने-पढने के लिए इंग्लिश कल्चर को डेवेलप करना इतना आसन
नहीं होता।
आपके यहाँ पालक-शिक्षक-सम्मेलन (पी.टी.एम.) में क्या
माँ-बाप आते हैं?
हाँ! इसे में पिता कम आते हैं पर माताएँ अक्सर आती हैं।
हमारे यहाँ स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग नहीं होने दिया जाता। के कर
रहा है ये सब हमारे यहाँ नहीं चलता। हिंदी और इंग्लिश ये भाषा ही प्रयोग करें।
इंग्लिश के लिए दबाव नहीं बना सकते, बस मॉरली ही मोटिवेट
कर सकते हैं।
मोटिवेट करने का पहला यही तरीका होता है- हम बच्चों को समझाते हैं
कि जब आप यहाँ से बाहर जाओगे तो हमारी सिखाई भाषा ही काम आएगी। चाहे जॉब के लिए
जाओ या यूनिवर्सिटी में पढ़ने हेतु।
मोटिवेट करते समय समझाने के पाँच मुख्य बिंदु इस प्रकार से हैं-
पहला पर्सनालिटी,
आपके पेरेंट ने आपको यहाँ डाला ही इसलिए है ताकि आप वो चीज़ सीख कर
जाएँ जो वे आपमें चाहते हैं। स्कूलिंग क्या होता है- पॉलिशिंग। हमारा मिशन तो तब
ही सार्थक होता है जब बच्चा पॉलिश हो जाय।
आप पॉलिश तक माने जाओगे, जब आपकी लैंग्वेज (इंग्लिश) इम्प्रूव होगी।
यदि इंग्लिश नहीं आती तो ऐसा स्टूडेंट कॉलेज में जाकर काम्प्लेक्स
अनुभव करेगा।
भाषा ना आने की अवस्था में आगे की शिक्षा में थोड़ी बाधा आएगी।
स्कूल के स्तर पर जो बच्चा नहीं सीख पाता है उसे कॉलेज के स्तर पर
सीखना ही पड़ेगा क्योंकि इसके बिना काम नहीं चल पायेगा।
आप असेंबली किस तरह करते हैं?
असेम्बली में गायत्री मन्त्र होता है, हिंदी
इंग्लिश में थॉट बुलवाए जाते हैं, न्यूज़ प्रेजेंटेशन होती
है। इनके लिए मूलतः इंग्लिश का इस्तेमाल होता है।
प्राचार्य D , स्कूल D
स्कूल D के अवलोकन से जो मुख्य बिंदु निकल
कर आये वो कुछ इस प्रकार हैं-
यह स्कूल ग्रामीण और शहरी फ्रिंज इलाके में स्थित है। इस स्कूल में
ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्र के विद्यार्थी भी आते हैं। स्कूल के सामने दुकान
चलाने वाले एक दुकानदार ने बताया कि शुरू में तो सिर्फ़ शहरी बच्चे ही स्कूल में
आते थे पर जैसे-जैसे ग्रामीण क्षेत्र में ज़मीनों के रेट (मूल्य) बढ़ते गए इस स्कूल
में और आस-पास के दूसरे स्कूलों (शहर के बीच स्थित) में भी गाँव की तरफ़ के
विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। साथ खड़े एक दूसरे शख़्स ने इसमें एक तथ्य जोड़ा, “गाँव और शहर के बीच यहाँ एक नहर है। नहर के ऊपर संकरा पुल है। आप सुबह सात
बजे आ जाओ, अक्सर उस पर जाम मिलेगा और यह जाम स्कूल की बसों
की वजह से होगा।”
अतः इस स्कूल को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अपने स्तर को शहरी
क्षेत्र के अन्य स्कूलों के बराबर रखना है। स्कूल के कार्यालय एकाउंटेंट से मिली
जानकारी के अनुसार, “यहाँ बच्चे तो दोनों क्षेत्र के आते हैं। पर शिक्षक
लगभग सभी शहरी ही हैं। स्कूल में बच्चों की इंग्लिश को सुधारने पर विशेष जोर दिया
जाता है। नई प्रिंसिपल थोड़ी लिबरल है, पहले के डायरेक्टर तो
बहुत सख्त थे।”
काफी इंतज़ार एवं तीन चार बार फोन पर संपर्क करने के बाद प्राचार्य
ने मिलने का समय दिया था। प्राचार्य ने अपने साक्षात्कार के दौरान जो साक्ष्य/तथ्य
दिए, वे नीचे प्रस्तुत हैं -
प्राचार्य D ने कहा :-
“हमारे स्कूल में ग्रामीण तथा शहरी दोनों बैकग्राउंड
के बच्चे आते हैं।
शहरी ग्रामीण क्षेत्र से मिडल, लोअर-मिडल क्लास
दोनों के स्टूडेंट आते हैं। दोनों बैकग्राउंड में भाषा का अंतर है।
यदि आप शुरू से (नर्सरी कक्षा से) बच्चे को एडमिशन देते हो तो शहरी
ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों में कोई फर्क नहीं आता है, पर यदि कोई बच्चा हिंदी मीडियम से इंग्लिश में बड़ी उम्र में आता है तो
दिक्कत आती ही है।
बीच में आने वाले विद्यार्थियों की ‘लर्निंग
हेम्पर’ (सीखने में बाधा) होती ही है।
इंग्लिश को लागू करने के पीछे का कारण यह है कि 200 वर्ष का इंग्लिश
राज आज भी हमारे खून में, हमारी सोच में हावी है।
मातृभाषाओं को दोयम दर्जा दे रहे हैं। कम्युनिकेशन के लिए इस देश में
सिर्फ़ इंग्लिश का प्रयोग कर रहे हैं।
नॉन ब्रिटिश कॉलोनी वाले देश अपनी ही भाषा का इस्तेमाल करते हैं। (सही
तथ्य- जो देश कॉलोनी नहीं रहे वे शिक्षा में अपनी ही भाषा का प्रयोग कर रहे
हैं। प्राचार्य के कहने का आशय भी यही है।)
उदाहरण देते हुए, छोटा-सा देश कोरिया, चाइना, फ़्रांस सभी अपनी भाषा में शिक्षा देते हैं।
यदि रूस पढने जाओ तो पहले आपको रूसी सीखनी पड़ती है।
भाषा ही एक कारण नहीं, जो आपको
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देती हो। भाषा की वजह से हम कहीं-न-कहीं आज भी गुलाम
हैं। जबकि हम भारतीय भाषाओं में कही ज्यादा उन्नति कर सकते हैं।
इंग्लिश के लिए साँस्कृतिक वातारण (कल्चरल एनवायरनमेंट) नहीं है और
ना ही हो सकता है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थी के लिए अंग्रेजी विशेष रूप से
बाधा है।
शहर का बच्चा आसानी से अंग्रेजी सीख लेता है जबकि गाँव के बच्चे के
लिए यह ही समस्या है। कारण है वातावरण।
स्कूल में हमारी जिम्मेदारी अंग्रेजी पढ़ाने की नहीं अपितु पाठ्यक्रम
(करिकुलम) की होती है। पर हमारी समस्या यह है कि हमें पाठ्यक्रम (करिकुलम) से हटा
कर सारा ध्यान (फोकस) लैंग्वेज (इंग्लिश) पर डालना होता है।
पाठ्यक्रम (करिकुलम) में हिंदी को छोड़ सब कुछ इंग्लिश में है और
बच्चों के सीखने को ये प्रभावित करेगी।
अंग्रेजी भाषा पर पकड़ ना होने की
वजह से बच्चे की सीखने (लर्निंग) की प्रक्रिया प्रभावित होगी ही, और वह कभी सीख नहीं पायेगा।
अंग्रेजी माध्यम में सामाजिक संपर्क (सोशल कनेक्टिविटी) का तो सवाल
ही पैदा नहीं होता।
40 बच्चों की कक्षा में मुश्किल से 15 बच्चे ही इंग्लिश समझ पाते
होंगे, धाराप्रवाह (फ़्लूएंट) तो इक्का-दुक्का ही होंगे और
वे ही फि़र कक्षा को प्रभावित (डोमिनेट) करते हैं।
इस समस्या से पार पाने के लिए हम दो भाषाओँ (इंग्लिश एवं मानक हिंदी)
को मिक्स करते हैं। बोलियों को शामिल नहीं करते।
बच्चे पर भाषाओं का दबाव रहता है। इस कारण उसके सीखने की की क्षमता
प्रभावित होती है।
जब वही बात अपनी भाषा में करवाई जाती है तो उसे सीखना आसान होता है
और वही जब अंग्रेजी में करवाई जाती है तो सीखना कठिन होता है।
हम भाषा नहीं सिखाते, हम पाठ्यक्रम
करवाते हैं और पाठ्यक्रम इस मान्यता पर बना होता है कि बच्चे को माध्यम-भाषा आती
है।
पब्लिक स्कूलों (प्रतिष्ठित निजी स्कूलों की तरफ़ इशारा कर के) में
जो पेरेंट का इंटरव्यू है वो क्या है? उस प्रक्रिया में
यह ही तो देखा जाता है कि जो बच्चा आ रहा है उसकी पृष्ठभूमि/बैकग्राउंड क्या है।
बच्चा भाषा की वजह से अपने ‘सामाजिक पर्यावरण /
सोशल इन्वार्यामेंट’ से कट (डिटैच) रहा है।
स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति में शैक्षिक योग्यता / क्वालिफिकेशन
के अलावा उसकी इंग्लिश बोलने की क्षमता भी देखी जाती है।
पुराने समय के शिक्षक जो ज्यादा क्वालिफिकेशन नहीं रखते थे पर उन्हें
ज्यादा समझ होती थी, क्योंकि वे अपने पर्यावरण/इन्वार्यामेंट से ज्यादा
जुड़े होते थे।
हम तो अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में रोट लर्निंग करवाते हैं। बच्चे
को कोई भी जीवंत अनुभव (लाइफ एक्सपीरियंस) नहीं होता।
हम सीखने (लर्निंग) की नहीं, नम्बरों की दौड़ में
भाग रहे हैं।
सीखना (लर्निंग) है तो अनुभव (एक्सपीरियंस) काउंट करो ना।
बच्चों को मुक्त करो ताकि वे अपने अनुभवों से सीख सकें। पर
भाषा/लैंग्वेज रूपी बाधा/बैरियर लगते ही बच्चे की गति रुक जाती है। वह अपने सीखने
में अनुभव को शामिल नहीं कर पाता।
इंग्लिश को यदि लैंग्वेज के रूप में सिखाएँ तो बच्चे जल्दी सीखेंगे, पर माध्यम के रूप में थोपने पर वही भाषा बाधा बन जाती है।
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) होता है अधिगम
(लर्निंग) नहीं होता।”
ये सभी बिंदु प्राचार्य के शब्दों में, महत्वपूर्ण
बिंदु रेखांकित किए गए हैं।
प्राचार्य के साक्षात्कार से मूल्यों, विश्वासों,
धारणाओं एवं मानदंडों से सम्बन्धित जो बातें निकल कर आईं, वे इस प्रकार हैं-
हम आज भी 200 वर्ष की गुलामी से पैदा हुई व्यवस्था को ढोने के लिए विवश हैं।
सीखने की क्रिया तो बच्चे की अपनी ही भाषा में हो सकती है। अंग्रेजी
माध्यम स्कूल में तो व्यवस्था की ज़रूरत अनुरूप ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) ही होता है।
जब तक भाषा की
बाधा है तब तक सीखने की क्रिया कभी-भी रचनात्मक नहीं हो सकती।
समय की मांग के आगे हम विवश हैं और अपने यहाँ भी उसी मीडियम में
शिक्षण करवाते हैं।
शिक्षकों की नियुक्ति का मानदंड यह है कि वह इंग्लिश फ़्लूएंट होना
चाहिए।
धारणा यह है कि निजी स्कूल बाज़ार की मांग के अनुरूप नहीं चलेगा तो वह
बाज़ार में नहीं टिक पायेगा।
धारणा यह भी है कि माता-पिता भी अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलते हुए
सुनना चाहते हैं।
इसका परिणाम यह है कि अपना ध्यान पाठ्यचर्चा से हटा कर भाषा शिक्षण
पर लगाना पड़ता है।
भाषा पर कमजोर पकड़ की वजह से निम्न वर्गीय तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि के
बच्चे शिक्षा की इस व्यवस्था में पिछड़ते हैं।
स्कूल E तथा प्राचार्य E
स्कूल E, गाँव तथा तथा शहर को जोड़ने वाली सड़क पर स्थित है। स्कूल
के पास गाड़ियों का अच्छा-खासा काफ़िला है। जो आस-पास के गाँवों से विद्यार्थियों को
स्कूल तक लेकर आता है। स्कूल की बसों का रूट समझते हुए प्राचार्य ने कहा, “प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का एक फायदा यह भी हुआ कि अब गाँवों के
बच्चे भी शहरों के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी पढ़ सकते हैं।” अपने आप को ‘इंटरनेशनल’ घोषित
करने वाले इस स्कूल में पढ़ने आने वाले अधिकतर
विद्यार्थी ग्रामीण परिवेश के है। शिक्षकों का एक वर्ग निकटतम मेट्रोपोलिटन
शहर दिल्ली तथा फरीदाबाद से आता है। जबकि शेष स्थानीय शहर के हैं। पी.टी.आई.
अर्थात् शारीरिक शिक्षा के शिक्षक, जिनका मुख्य काम स्कूल
में अनुशासन बनाना है वो निकट के गाँव के हैं। प्राचार्य कुछ माह पूर्व ही इस
स्कूल में नियुक्त हुए थे और उन्होंने अपनी प्राथमिकता को गिनाते हुए बताया कि वे
इस स्कूल में तेजी से इंग्लिश का वातावरण पैदा करना चाहते हैं।
प्रस्तुत है उनसे हुई बात चीत के मुख्य अंश -
उन्होंने कहा, “मुझसे पहले जो प्राचार्य थे, वे
खुद भी बोल-चाल में इंग्लिश का प्रयोग नहीं करते थे। इस कारण ना तो शिक्षक और ना
विद्यार्थी ही इस दिशा में कदम बढ़ाते थे।” उन्होंने आगे
बताया, “मुझे अपॉइंटमेंट लेटर (नियुक्तिपत्र) देते हुए स्कूल
के प्रबंधकों ने स्पष्ट किया है कि वे इस स्कूल में ‘इंग्लिश
मीडियम कल्चर’ चाहते हैं। अतः मेरी प्रथमिकता इस स्कूल
में अंग्रेजी माध्यम वातावरण पैदा करने की है।”
जब शोधकर्ता ने ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ का अर्थ स्पष्ट
करने को कहा तो उन्होंने बताया, “एक ऐसा वातावरण जहाँ शिक्षक
और विद्यार्थी इंग्लिश भाषा में कम्यूनिकेट (संचार, बातचीत)
कर सकें।”
“तो इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु आप क्या कर रहे
हैं?” शोधकर्ता ने आगे पूछा।
“सबसे पहले तो मेरी कोशिश है कि मैं इस स्कूल के स्टाफ़
को ही बदल दूँ और यह बात मैंने अपने प्रबंधकों को स्पष्ट कर दी है। इस शहर और
आस-पास के गाँवों से आने वाले शिक्षकों का खुद अंग्रेजी भाषा पर नियंत्रण नहीं है।
वे खुद हिंदी, यहाँ तक की ग्रामीण भाषाओं में बोलते पाए जाते
हैं। ऐसे शिक्षक भला बच्चों को क्या अंग्रेजी बोलना सिखाएँगे।” थोड़ा रुक कर, “मैंने अपने प्रबंधकों को स्पष्ट कर
दिया है कि यदि आपको ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ चाहिए तो पहले आप अपने टीचिंग स्टाफ़ को बदलिए। थोड़े महँगे पड़ेंगे, पर आप भी, x,y,z स्कूल (कुछ प्रतिष्ठित माने जाने
वाले स्कूलों का नाम लेते हुए) की तरह अपने स्टाफ़ को दिल्ली अथवा फरीदाबाद से
बुलवाइए। इस शहर और आस-पास के लोगों को खुद अंग्रेजी बोलनी नहीं आती, वो भला आपके बच्चों (विद्यार्थियों) को क्या इंग्लिश बोलना सिखायेगें?”
शोधकर्ता ने इसे और अधिक स्पष्ट करने की चेष्टा से पूछा, “फरिदाबाद तथा दिल्ली का टीचिंग स्टाफ़, यह बात कुछ
स्पष्ट नहीं हुई।”
प्राचार्य, “हमारे शहर में जितने भी बड़े स्कूल हैं, वे अपना स्टाफ़ दिल्ली अथवा परिदाबाद से लाते हैं।” एक
प्रतिष्ठित माने जाने वाले स्कूल का नाम लेकर बताना शुरू किया कि किसका
कितना-कितना स्टाफ़ बाहर से आता है। अपने आँकड़े देने के बाद प्राचार्य कुछ क्षणों
के लिए रुके, फिर मुस्कुराते हुए बोले, “इस शहर के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जहाँ इस शहर के साथ आस-पास के
गाँवों से आते हैं। वहीं स्कूलों की कोशिश
अपने स्टाफ़ को दिल्ली और फरीदाबाद से लाने की है। दिस इज़ ऑल मनी गेम/This
is all money game ये सब कुछ पैसों का खेल है)। देखिये राजधानी के पास होने तथा शहर के विस्तार के साथ इस इलाके के लोगों
की इनकम (आय) तेजी से बढ़ी है। पहले ये होता था कि शहर के खाते-पीते लोग ही अपने
बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल में पढ़ाते थे। गाँव के तथा निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूल
में ही पढ़ते थे। आज जिसके पास पैसा आ गया है वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में
डाल रहा है। गाँव में रहने वाले की भी ख्वाहिश इंग्लिश बोलने की है। बाकी बच्चा
क्या सीखता है नहीं सीखता है। यह बात उसके समझ के बाहर की ही समझो। घर पहुँचने पर
पेरेंट यह नहीं पूछता कि क्या पढ़ाया, क्या नहीं पढ़ाया। वह
यह पूछता है कि किस भाषा में पढाया। बाकी उसकी समझ के बाहर की बात है।”
शोधकर्ता- “इस बात का
फरीदाबाद तथा दिल्ली से शिक्षक बुलाने से क्या सम्बन्ध है। यदि लोकल शिक्षक होगा
तो उसे बच्चों के परिवेश की अच्छी समझ होगी।”
प्राचार्य- “मैं वही तो बताने
की कोशिश कर रहा हूँ। प्राइवेट स्कूलों के तेजी से ग्रोथ की वज़ह से जिस हिसाब से
शिक्षकों की माँग बढ़ी है, उस हिसाब से अंग्रेजी में पढ़ा सकने
वाले शिक्षक इस छोटे से कसबेनुमा शहर में उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए हमें अपने शिक्षक
दिल्ली और फरीदाबाद से लाने पड़ते हैं। बहुत-से स्कूल तो अपने विज्ञापनों में भी इस
बात को बताते हैं कि उनका स्टाफ़ दिल्ली और फरीदाबाद से आता है।”
थोडा रुक कर, प्राचार्य ने आगे कहा, “हमारे
समय में माँ-बाप पूछते थे कि क्या सीखा? आज माँ-बाप पूछते
हैं कि अंग्रेजी बोलना आया कि नहीं। मैं पहले एक स्कूल में पढ़ाता था वहाँ मैं उप
प्राचार्य का भी काम देखता था। क्रिएटिव कामों को करवाने पर बल देने वाले एक टीचर
ने बच्चों को इन्फ्लेशन का कॉन्सेप्ट समझाने हेतु बच्चो को घर में इस्तेमाल होने
वाली 10 वस्तुओं के नाम लिखकर और उनके पाँच साल के अनुमानित मूल्य पता लगाने के
लिए कहा था। जब घर जाकर बच्चों ने पूछा तो कुछ माँ-बाप उस शिक्षक की शिकायत करने आ
गए। कि ये सर पढ़ाते कम और फालतू के काम ज्यादा करवाते हैं। आज पेरेंट इंग्लिश के
पीछे इस कदर पागल हैं कि वे रवीन्द्रनाथ का प्रकृतिवाद, गाँधी
जी का रचनात्मकतावाद आदि सब गौण बातें
हैं। इंग्लिश बोल कर हर कोई हाई सोसाइटी के साथ जुड़ना चाहता है।”
शोधकर्ता- “आप अपने
स्टाफ़ को कैसे मोटिवेट (प्रेरित) करते हैं कि वे इंग्लिश में ही पढाएँ।”
प्राचार्य- “सबसे पहले तो मैंने
सबको वार्निंग दे दी है कि स्कूल परिसर में हर टीचर इंग्लिश ही बोलेगा। इसका नतीजा
यह निकला है कि कम-से-कम स्कूल में शिक्षकों ने देहाती भाषा में बोलना बंद कर दिया
है। दूसरा, मैं जब स्कूल में राउंड पर निकलता हूँ और क्लास में जाता हूँ तो वहाँ
शिक्षक से सिर्फ़ इंग्लिश में बात करता हूँ, ऐसी अवस्था में
या तो टीचर इंग्लिश में बात करे या तौहीन करवाए।” हँसते हुए,
“इनमें-से बहुतों ने इंग्लिश सीखने के लिए रेपिडैक्स तो कम-से-कम
खरीद ही ली होगी। मैं भी क्या करूँ, मेरी भी मज़बूरी है। मैं
इन टीचरों की निगरानी करता हूँ और इस स्कूल का चपरासी जो आठवीं क्लास भी पास नहीं
है वह मेरी निगरानी करता है। वह मनेजमेंट का सबसे ख़ास आदमी है।” शोधकर्ता की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए, “ये बात ना
छाप देना। मैनेजमेंट सोचता है ये बात मुझे मालूम नहीं है।”
शोधकर्ता- “माता-पिता को
आप कैसे विश्वास में लेते हैं कि आगे आने वाले समय में आपके स्कूल में अंग्रेजी
माध्यम के मानदंडों के अनुरूप ही शिक्षण होगा।”
प्राचार्य- “आप हँसोगे, पर मुझे करना पड़ता है। माँ–बाप मुझसे मिलने आते हैं
तो मैं उनसे अंग्रेजी में बात करता हूँ। तब तक अंग्रेजी ही बोलता हूँ जब तक कि वो
ना कह दे कि सर हमें कुछ नहीं समझ आया। जब वो ऐसा कहते हैं तो उसके बाद मैं उनसे
शुद्ध हिंदी (मानक हिंदी) में बात करना शुरू करता हूँ। मुझसे पहले वाले प्रिंसिपल
यही तो गलती करते थे। ग्रामीण माँ-बाप से ग्रामीण भाषा में ही बात करना शुरू कर
देते थे। अरे! उसे ग्रामीण भाषा में ही बोलना सीखना होता तो वे अपने बच्चे को वहीं
गाँव के किसी स्कूल में ना डाल देता। क्या
ज़रूरत है उसे अपने बच्चे को 10-15 किलोमीटर दूर भेजने की।” रुक
कर, “आज हर माँ-बाप अपने बच्चे को इंग्लिश में ही ग्रूम
(विकसित) करना चाहता है। चाहे वो ग्रामीण हो, शहरी हो, झाड़ू लगाने वाला जमादार हो या दिहाड़ी करने वाला मज़दूर। इसलिए हर एक की
हैसियत के अनुरूप अंग्रेजी माध्यम के स्कूल भी हैं।”
शोधकर्ता- “बच्चों को आप
इंग्लिश बोलने के लिए कैसे प्रेरित करते हैं?”
प्राचार्य- “मैं उनको
कहता हूँ टूटी-फूटी बोलो, पर इंग्लिश बोलो। अभी रिसेस
(मध्यांतर) की बात बताता हूँ कि एक बच्चे से दूसरे बच्चे को धक्का लग गया। बच्चे
अपनी शिकायत लेकर आए। मैंने कहा इंग्लिश में बोलो तब ही सुनुँगा। बच्चों ने
एक्सप्लेन किया।”
प्राचार्य ने अब अपना जीवन वृतांत शुरू किया, “मेरी 12 तक की शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई है। मैंने जब बी.एससी. में
दाखिला लिया तो मेरा सामना अंग्रेजी से हुआ। मैंने एम.डी. यूनिवर्सिटी में दाखिला
लिया था। वहाँ की सारी पढाई इंग्लिश में होती थी। मेरे घर में मुझसे बड़े मेरे भाई
थे। वे आर्ट से पढ़ रहे थे। हालाँकि उनके पास एक ही सब्जेक्ट इंग्लिश का था,
बी.ए. पार्ट-I में उनकी कम्पार्टमेंट आ गई।
उन्हें कम्पार्टमेंट तोड़ने के दो अवसर भी मिले, पर दोनों
में सफल नहीं हुए और पार्ट-I के साथ पार्ट-II में भी इंग्लिश में कम्पार्टमेंट आ गई। बस, उसके बाद
तो उनके पास एक ही रास्ता था, फिर से पार्ट-I में दाखिले का और इसी शर्मिन्दगी में उन्होंने पढाई ही छोड़ दी। मुझे उनकी
ये हालत देख कर घबराहट होने लगी। एक बार तो मैंने भी पढ़ने से मना कर दिया।
बी.एससी. में इंग्लिश 50 नंबर की होती है और बी.ए. से आसान भी होती है। फिर
फिजिक्स और केमिस्ट्री का क्या करूँ। तो समझाया ग्रामर की गलती का ख्याल ना करना। एसिड इस
रियेक्टेड / आर रियेक्टेड / वाज़ रियेक्टेड, जो मन में
आए, लिख देना, कैन/कुड कुछ भी।
इसलिए मैं इन बच्चों को भी यही सलाह देता हूँ कि आप ग्रामर की चिंता मत करो, बस बोलो।”
शोधकर्ता- “पर क्या इस
प्रकार आप अंग्रेजी बोलने की क्षमता हासिल कर पाए?”
प्राचार्य- “नहीं इसने
एम.एस.सी. तक साथ दिया। थोड़ी राहत बी.एड. में मिली क्योंकि वहाँ अंग्रेजी नहीं
थी। पर जब अपनी एजुकेशन (शिक्षा ) पूरी करने के बाद जॉब की तलाश में आए, तब इंग्लिश की वैल्यू पता चली।
एक इंटरव्यू का फीड-बैक था, मिस्टर (नाम) आपका सब्जेक्ट
कमांड तो बहुत अच्छा है पर भाषा पर पकड़ ना होने की वजह से हम आपको जॉब में नहीं रख
सकते। और उसके बाद मैंने तय किया कि अपनी अंग्रेजी सुधारूँगा और अंग्रेजी सुधारने
का ही नतीजा है कि आज मैं यहाँ हूँ।”
स्कूल F तथा प्राचार्य F
स्कूल F पर गाँव खेतों के बीचों-बीच भिडूकी गाँव के बाहरी
पूर्वी छोर पर स्थित है। यह स्कूल एक नव स्थापित माध्यमिक स्कूल है। गाँव के लोगों
के बीच यह स्कूल चर्चा का विषय है क्योंकि यह गाँव का पहला सीबीएसई पाठ्यक्रम से औपचारिक शिक्षा
देने वाला स्कूल है। इस स्कूल में भिडूकी गाँव ही नहीं,
अपितु उसके आस-पास के अन्य गाँवों के बच्चे भी आते हैं।
स्कूल के प्राचार्य F से हुई वार्ता का संक्षिप्त विवरण-
“हमारे स्कूल के पास 12वीं तक की मान्यता है पर हमने
तय किया है कि अपने ही विद्यार्थियों को लेकर स्कूल को आगे बढाएँगे। 5वीं क्लास के
बाद नए बच्चे नहीं लेंगे।”
“इसका कारण यह है कि यहाँ के लोगों की लैंग्वेज
प्रॉब्लम बहुत है। 5वीं, 6वीं, 7वीं
क्लास में विद्यार्थियों को लेने से स्कूल के वातावरण पर प्रभाव पड़ सकता है।”
“इन क्लासों में हम जब तक बच्चों का टेस्ट नहीं ले
लेते, तब तक दाखिला नहीं देते।”
“टेस्ट इंग्लिश, हिंदी और मैथ का
लेते हैं।”
“स्कूल में इंग्लिश और शुद्ध हिंदी का प्रयोग करते
हैं। शुद्ध हिंदी मतलब- शहरी हिंदी।”
“स्कूल का सारा स्टाफ़ फरीदाबाद शहर से आता है। सिर्फ़
एक क्लर्क गाँव का रखा है। इधर-उधर के काम
के लिए।”
“ऐसा नहीं कि इस गाँव
में क्वालिफाइड लोग नहीं हैं। पर कितने भी क्वालिफाइड हों भाषा की प्रॉब्लम
तो रहती ही है।”
“बच्चे की वज़ह से माता-पिता की भाषा में भी बदलाव आ रहा है। वे पहले से कम ‘रूड़’ हुए हैं। यहाँ से सीख कर जाने के बाद माता-पिता को भी सिखाता है। वे भी अब इंग्लिश के बहुत-से शब्दों का प्रयोग कर पाते हैं। कम-से-कम मेरे और आप की तरह शुद्ध हिंदी का प्रयोग तो कर ही पाते हैं।”
क्या अंग्रेजी माध्यम स्कूल, अपने विद्यार्थियों
के सामुदायिक सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश को अपने स्कूली परिसर में स्थान दे रहे
हैं? इस बात का पता लगाने हेतु प्रबंधकों/प्रचार्यों से बातचीत की गयी एवं
अवलोकन करके स्कूल परिसर के अन्दर और उसके बाहर के वातावरण का पता लगाया गया।
स्कूल प्रचार्यों/प्रबंधकों को इस अध्ययन में समाहित करने की
आवश्यकता इसलिए भी पड़ी क्योंकि यह वर्ग ही स्कूली परिसर के मानदंड तय करता है। वे
ना केवल उन मानदंडों के अनुरूप शिक्षकों एवं विद्यार्थियों (कानूनी दबाव के बावजूद
भी) का चयन करते हैं अपितु स्कूली परिसर में उन नियमों और मानदंडों के अनुरूप चलने
की पूरी व्यवस्था भी करते हैं। प्राचार्य और प्रबंधक ही विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक के बीच के लिंक को स्थापित करता है।
इस उद्देश्य की पुष्टि के दौरान शोधकर्ता यह पता लगाना चाहता है कि स्कूल परिसर का
वातावरण विद्यार्थी के परिवेश-विशेष की संस्कृति को कितना समाहित कर पाया।
इसका पता लगाने हेतु शोधकर्ता
द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए गए-
प्राचार्यों का असंरचित साक्षात्कार,
स्कूल एवं स्कूल के आसपास के वातावरण का अवलोकन (नोट- बहुत से
स्कूलों में इसकी इजाजत नहीं मिली),
स्कूल-अध्यापकों का साक्षात्कार,
उन लोगों से बातचीत की, जो अमूमन स्कूली
वातावरण का निकट से अवलोकन करते हैं, जैसे- चपरासी, गेटकीपर, कैंटीन-वाले, स्कूल
के बाहर खड़े रिक्शा वाले।
प्राचार्यों का असंरचित साक्षात्कार एवं स्कूलों के अवलोकन से जो
मुख्य बिंदु निकल कर आए, वे इस प्रकार हैं।
शोध एवं लेखन का उद्देश्य किसी व्यक्ति एवं संस्था विशेष पर
व्यक्तिगत हमला करना नहीं है। इसलिए व्यक्ति एवं संस्थाओं के वास्तविक नाम को
उजागर करने के स्थान पर A, B, C, D जैसे काल्पनिक नाम दिए
हैं। सुविधा के लिए जो स्कूल का नाम है, उसी नाम से प्राचार्य एवं प्रबंधकों को
संबोधित किया गया है।
अतिविशिष्ट माने जाने वाले इस प्रतिष्ठित स्कूल को हम A नाम देते हैं और उसके प्राचार्य के संबोधन के लिए भी A नाम का प्रयोग करेंगे।
A स्कूल के मुआयना करने दौरान निम्नलिखित मुख्य
बिन्दु उजागर हुए :-
स्कूल A के अवलोकन में पाया कि यह स्कूल ग्रामीण एवं शहरी
क्षेत्र के बीच स्थित है।
बस ड्राइवरों से बात करने पर ज्ञात
हुआ कि शहर और गाँव की सरहद पर स्थित इस स्कूल में शहर के पॉश इलाकों से
विद्यार्थी आते हैं। ग्रामीण क्षेत्र से विद्यार्थी न के बराबर हैं।
न केवल स्कूल के आधे ग्राउंड को इन
बसों ने घेर रखा है अपितु स्कूल के बाहर भी बड़ा क्षेत्र इन्हीं बसों के कब्जे़ में
है।
स्कूल ऑफिस के बाहर एक सुन्दर ‘लॉन’ है, जो बाहर से आने वाले
आगंतुकों को आकर्षित करता है। पर यहाँ एक भी बच्चा उछल-कूद करता नहीं दिखा। ना ही
स्कूल के ग्राउंड में कोई बच्चा खेलता दिखा।
आम तौर पर स्कूलों में जो शोरगुल
सुनाई पड़ता है, वह इस स्कूल में नहीं है। स्कूल परिसर में शांति है।
स्कूल में कक्षाओं के निरिक्षण की
इजाजत शोधकर्ता को नहीं मिली।
स्कूल परिसर में जगह-जगह कैमरे लगे
हैं।
प्राचार्य-कक्ष में प्रवेश करने पर पाया कि प्राचार्य एक पिता को
स्कूल में प्रवेश हेतु लिये जाने वाले टेस्ट की जानकारी दे रहे हैं। टेस्ट ‘इंग्लिश’, ‘मैथ्स’, ‘साइंस’
का होगा, जिसमें इंग्लिश का स्तर उच्च रहेगा।
यह भी प्राचार्य साथ-साथ स्पष्ट कर रहे हैं। प्राचार्य का संक्षिप्त परिचय यह है
कि वे एक वे फरीदाबाद में देश के प्रतिष्ठित स्कूल ब्रांड के संस्थापक प्राचार्य
(फाउंडर प्रिंसिपल) रह चुके हैं। उन्होंने तीस साल तक उस स्कूल में प्राचार्य के
रूप में काम किया है। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने ये स्कूल किसी बिज़नस फ़र्म के
साथ मिल कर खोला है।
प्राचार्य ने साक्षात्कार के दौरान बताया कि -
“जिस परिवेश के बच्चे
की आप बात कर रहे हैं, वह हमारे यहाँ नहीं पढता। स्कूल में
आने वाले सभी छात्र उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों के हैं,
जिनके माता-पिता भी ‘क्वालिफाइड’ हैं। माता-पिता के ‘क्वालिफाइड’
होने से तात्पर्य है वे माता-पिता जिन्होंने विश्वविद्यालयी शिक्षा
प्राप्त कर रखी हो तथा जो अंग्रेजी बोलना जानते हों।” इस
प्रकार जब प्राचार्य ने विद्यार्थी के
परिवेश में उसके माता-पिता को ही समाहित किया, तो माता-पिता
के अलावा, परिवार के अन्य सदस्यों, जैसे-
ताया-ताई, दादा-दादी, तमाम नातेदारी, आस-पड़ोस, रिक्शेवाले,
ठेलीवाले आदि की भूमिका को नकार दिया। बार-बार उकेरने पर भी यही कहा कि शहरी
नव-मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चे का अधिकतर संपर्क अपने माता-पिता से ही होता है, उनके दोस्त भी उसी स्तर के होते हैं। इस स्कूल में आने वाले सभी
विद्यार्थी अच्छे इलाकों के होते हैं.... और उनके अनुसार वहाँ भी बोलचाल के लिए
इंग्लिश और हिंग्लिश का प्रयोग होता है।
जब प्राचार्य ने इस बात से इंकार कर
दिया कि उनके इलाको में आने वाले छात्रों में ग्रामीण एवं निम्न मध्यमवर्गीय
पृष्ठभूमि के लोग नहीं हैं, तो शोधकर्ता ने अंतिम हथियार के तौर पर आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस / EWS) की बात की। इस पर कुछ इस प्रकार-से
जबाब प्राप्त हुए-
“कानून बनाने से क्या
होता है। आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS)
का कोई भी विद्यार्थी इस स्कूल में नहीं है और ना ही कभी पढ़ सकता
है।”
“गलती से कभी आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस/EWS) का
कोई विद्यार्थी आ भी गया तो यहाँ टिक नहीं
पायेगा। सरकार के नियम के अनुरूप सिर्फ़ ‘फीस’ ही तो माफ की जा सकती है। स्कूल
में चलने वाली अन्य गतिविधियों का तो मूल्य देना पड़ेगा,
जैसे- बस ‘यूज़’ करेगा तो बस का चार्ज
देगा। रेडीमेड ड्रेस और छपे-छपाए नोट्स के पैसे अलग से देने होंगे। यह बिल्डिंग और उसकी साफ-सफाई सरकारी वाली तो है
नहीं। तो क्या उसका चार्ज अलग-से नहीं होना चाहिए। फिर स्कूल में समय-समय पर चलने
वाली अन्य गतिविधियों का खर्च भी तो होता है, जैसे- टूर, पिकनिक आदि क्योकि हमारे बच्चे ऐसी-वैसी जगह तो जाते नहीं हैं।
आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS) के विद्यार्थी के माता-पिता
हमारे स्कूल के अन्य खर्च वहन नहीं कर सकते।” शोधकर्ता प्राचार्य की व्यक्तिगत
ईमानदारी एवं स्पष्टता की कद्र करता है। जिस ईमानदारी और स्पष्टता से उन्होंने ये
बात क़बूल की है कि एलीट वर्ग के लिए खुले उच्च दर्जे के निजी अंग्रेजी माध्यमस्कूलों
का वातावरण, निम्न दर्जे के स्कूलों के अनुरूप नहीं है। यह
बात शायद आर्थिक-अशक्त्-वर्ग (ईडब्यूएस /EWS) को 25% सीट उपलब्ध कराने की वकालत करने वाले तथाकथित
शिक्षाविद् ने भी नहीं की हो। वे इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था को ‘इन्क्लुसन’
(समावेशन) की संज्ञा देते हैं।
शोधकर्ता ने इसी प्रकार के इन्क्लुसन (समावेशन) का एक
नज़ारा जसोला विहार स्थित गुड स्मार्टन स्कूल में अपने शिक्षण अनुभव के दौरान
देखा। यह एक अंग्रेजी माध्यमका स्कूल है, पर यहाँ आने वाले
विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या दिल्ली के स्लम इलाकों की है। माता-पिता में
इंग्लिश के प्रति जो क्रेज़ है। उसकी वजह से वे अपने बच्चों का दाखिला चैरिटी के
नाम पर खुले इस स्कूल में करवा रहे हैं। इस स्कूल में आने वाला पैसा भी अमेरिका और
ब्रिटेन स्थित विदेशी संस्थाओं का है। चूँकि यह स्कूल गरीब बच्चों को शिक्षित
कराने का काम करता है अतः दिल्ली सरकार ने इस स्कूल को मुफ्त के बराबर मूल्य पर
ज़मीन भी दी है। पर होता क्या है कि मध्यमवर्गीय एवं स्लम इलाकों अर्थात् दोनों
क्षेत्रों से आने वाले बच्चों में स्लम इलाकों के बच्चे पिछड़ते जाते हैं। दो
सेक्शन में बँटे दो वर्गों के बच्चों में स्लम इलाकों के बच्चे अधिक उद्दंड घोषित
कर दिए जाते हैं। ‘फ़्लूएंट इंग्लिश’ में पढ़ाने वाले इन शिक्षकों के अनुसार ये
बच्चे कक्षा में पढ़ने मे रूचि ही नहीं लेते। जबकि हकीकत यह है कि जो
विद्यार्थियों को पढाया जाता है, वह उनके पल्ले ही नहीं पड़ता है और नतीजा यह
निकलता है कि आठवीं- नवीं कक्षा तक दो सेक्शनों में बटे दो वर्गों के ये बच्चे जब
नवीं कक्षा से फेल होना प्रारंभ होते हैं तो बारहवीं कक्षा तक सिर्फ़ मध्यम वर्ग
के ही बच्चे शेष रह जाते हैं। यदि इस
अनुभव को प्राचार्य A के वक्तव्य के साथ जोड़ कर देखें तो A प्राचार्य का वक्तव्य
अधिक ईमानदार एवं स्पष्ट है।
प्राचार्य ने आगे कारण स्पष्ट करते
हुए बताया, “आर्थिक-अशक्त-वर्ग (ईडब्यूएस/EWS) का विद्यार्थी हमारी अंग्रेजी की
परीक्षा कभी पास ही नहीं कर सकता। हमारे यहाँ तो नर्सरी से ही सभी विषय अंग्रेजी
में ही पढाये जाते हैं। जबकि शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत आर्थिक-अशक्त-वर्ग
(ईडब्यूएस / EWS) के
लिए की गयी आरक्षण की व्यवस्था पहली कक्षा से प्रारंभ होती है। इस प्रकार पहली
कक्षा से जिस बच्चे का दाखिला होगा वह उन बच्चों के सामने कैसे टिक पायेगा, जो नर्सरी कक्षा से ही अंग्रेजी में पढ़ रहा है।” अतः स्पष्ट होता है कि
पहली कक्षा से ही, दोनों वर्गों से आने वाले विद्यार्थियों
में अंग्रेजी भाषा एक भेद बना कर रखती है।
प्राचार्य के अनुसार “अंग्रेजी माध्यममें पढने के लिए शुरू से इंग्लिश होना जरूरी है, आप सोचो कोई बच्चा आठवीं कक्षा में आकर यदि अंग्रेजी में पढ़े तो नहीं पढ़
पायेगा। और बड़ी कक्षा में तो और अधिक दिक्कत होगी।”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि आप
अंग्रेजी के अनुरूप शिक्षण के लिए माहौल कैसे तैयार करते हैं? तो इस संबंध में प्राचार्य का स्पष्ट जबाब था, “शिक्षकों
को नियुक्त कर के” “कैसे? “हम उनको ही शिक्षक नियुक्त करते हैं जो शुरू
से अंग्रेजी माध्यमसे अच्छे पब्लिक
(प्राइवेट) स्कूल में पढ़े हों, अच्छी ‘यूनिवर्सिटी’
के ‘ग्रेजुएट’ और ‘पोस्ट-ग्रेजुएट’ हों। कुल मिलाकर उसकी ‘स्पोकन इंग्लिश’ अच्छी होनी चाहिए और दूसरा हम
एडमिशन भी उन्हीं ‘बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) के बच्चों को देते
हैं, जिनके माता-पिता का बैकग्राउंड अच्छा हो।” अर्थात् स्कूल के शिक्षक एवं माता-पिता दोनों का बैकग्राउंड अंग्रेजी
माध्यमकल्चर का होने पर ही उन्हें स्कूल परिसर में प्रवेश मिलता है।
“स्कूल में बातचीत सिर्फ़
इंग्लिश में ही होती है। कोई शिक्षक बच्चों से हिंदी में बात नहीं कर सकता। ”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि
ऐसी आवश्यकता क्यों पड़ी, इस बात पर प्राचार्य का स्पष्ट मानना है कि इंग्लिश के बिना वह कहीं टिक
नहीं सकता है। ना ‘हायर एजुकेशन’ में,
न एम.एन.सी. में, ना वर्ल्ड के किसी कोने में, उसे दूर छोड़ो आपके साउथ (भारत देश के साउथ) में भी बिना इंग्लिश के नहीं
पहुँचा जा सकता।
जब प्राचार्य से यह पूछा गया
कि जापान, जर्मनी, रूस, चीन आदि देश कैसे टिके? “आपके पास अपने वेद नहीं हैं, जर्मनी में उसका जर्मन
अनुवाद है, आज अमेरिकन संस्कृत सीख रहे हैं।”
कुछ विशेष बातें जो प्राचार्य से संबंधित हैं वो ये कि ये देश के
सबसे प्रतिष्ठित निजी स्कूल ग्रुप की फरीदाबाद इकाई के ‘फाउंडर प्रिंसिपल’ रह चुके हैं और वर्तमान में
नव-स्थापित प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यमस्कूल के ‘प्रिंसिपल
डायरेक्टर’ हैं। मात्र हिंदी बोलने पर शिक्षकों को घर का
रास्ता दिखाने और देहाती बोलने पर बच्चों को टी.सी. थमाने वाले प्राचार्य A
के टेबल पर हिंदी का अखबार नवभारत टाइम्स
रखा था, जो आजकल हिंगलिश में छपता है।
जब स्कूल के बाहर खड़े स्कूल के वॉचमैन से बात करनी चाही तो उसने जबाब
देने से मना कर दिया। पर साथ खड़े ड्राइवर ने बताया, “बच्चे
इतने अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं पर कई बार बस में ऐसी-ऐसी हरकतें करते हैं कि हमें
शर्म आ जाती है। अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं।”
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि स्कूल A के आस-पास
के ग्रामीण सामुदाय की संस्कृति का स्कूल परिसर में कोई स्थान नहीं है। नव-धनाड्य
उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे ही यहाँ टिक सकते हैं। शहरों में भी
माता-पिता के आगे किसी और को बच्चे के परिवेश में शामिल नहीं करते हैं। आस-पड़ोस तो
दूर, नाते-रिश्तेदार भी परिवेश में नहीं आते हैं। पिकनिक और
टूर के लिए जो जगह चुनी जाती है, वह प्राकृतिक परिवेश ना
होकर अम्यूज़मेंट पार्क तथा यू.एस.ए. स्थित नासा है।
B स्कूल एवं B प्राचार्य (काल्पनिक नाम)
स्कूल B भी फरीदाबाद का एक अंग्रेजी माध्यम का एक नव स्थापित
प्रतिष्ठित विद्यालय है। शोधकर्ता को स्कूल परिसर में विस्तारित अवलोकन की इजाज़त
तो नहीं मिली परन्तु जहाँ तक वह देख पाया, स्कूल के
क्लास-रूम आधुनिक सुविधाओं से सम्पन हैं। स्कूल में ‘प्राइमरी विंग’ की कक्षाओं में स्मार्ट-बोर्ड लगे
हुए हैं। शोधकर्ता अवलोकन हेतु जिस वक्त वहाँ पहुँचा, उस वक्त वहाँ कुछ माता-पिता
बच्चों के प्रोफाइल-बुक के लिए फ़ोटो खिंचवाने आए हुए थे। माता-पिता से बातचीत
करने पर पता चला कि स्कूल में प्राथमिक कक्षाओं में कम बच्चे रखे जाते हैं ताकि हर
बच्चे पर अधिक ध्यान दिया जा सके और एक बात जो और उन्होंने बतायी वह यह थी कि
स्कूल में ‘अंग्रेजी माध्यमके अनुरूप इंग्लिश स्पीकिंग
कल्चर’ है। (नोट- लेखक ने ‘अंग्रेजी
माध्यमकल्चर’ और ‘इंग्लिश
स्पोकन कल्चर’ इन सज्जन से ही उधार लिया।) पर इस इंग्लिश
स्पीकिंग कल्चर वाले स्कूल में काफी मिन्नत-मश़क्कत के पश्चात् ही प्राचार्य के
साक्षात्कार का मौका मिला।
प्राचार्य B के अनुसार -
“इंग्लिश स्पीकिंग
कल्चर से तात्पर्य उस कल्चर से है जहाँ बच्चे हर समय इंग्लिश ही बोलते हों।”
“स्कूल में बोलचाल
पूर्णतः अंग्रेजी में होती है। यदि विद्यार्थी को शिक्षक से कुछ भी पूछना है तो
उसे अंग्रेजी में ही पूछना होगा। यदि कोई छात्र क्षेत्रीय भाषा या हिंदी में बोलता
भी है तो शिक्षक जबाब नहीं देता।”
प्राचार्य ने अपना ही उदाहरण देते
हुए कहा, “यदि मेरे पास कोई बच्चा आकर क्षेत्रिय भाषा या
हिंदी में बोलता है तो मैं कोई जबाब नहीं देती।” प्राचार्य
के अनुसार वे कह देती है, “माय इअर कान्ट हियर व्हाट यू
हैव स्पोकन / My ear can’t hear what you have spoken.”
(आपने जो कुछ भी बोला उसे मेरे कान नहीं सुन पाए)
“हमारे यहाँ क्लास
रूम में पूर्णतः अंग्रेजी का प्रयोग होता है। शिक्षक अपना ‘लेक्चर’
अंग्रेजी में ही देता है। यदि किसी बच्चे को कुछ पूछना भी होता है
तो वह सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पूछता है।”
“स्कूल में होने वाली
तमाम गतिविधियाँ, सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी में ही होती हैं, जैसे- डिबेट, असेम्बली आदि”
“समय-समय पर बाहर से
अतिथि (गेस्ट) बुलाये जाते हैं वो भी सिर्फ़ अंग्रेजी में ही बोलते हैं और बच्चों
को भी इंग्लिश स्पीकिंग के लिए मोटिवेट करते हैं।”
“इस प्रकार स्कूल में
इंग्लिश के शिक्षण हेतु वातावरण बनाने के लिए हिंदी,
क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों पर पूर्ण रोक लगा दी जाती है।”
आगे, जब शोधकर्ता
ने जानना चाहा कि क्या आपके स्कूल में क्षेत्रीय भाषा, हिंदी
एवं क्षेत्रीय बोलियों जैसे हरियाणवी, गुर्जरी आदि का
बिलकुल-भी प्रयोग नहीं होता? इस प्रश्न के जबाब में आगे
प्राचार्य ने बताया, “ऐसा भी नहीं है कि हम हिंदी का प्रयोग
ही नहीं करते ‘पेट्रियोटिक डेज़’ पर
हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है। उन दिनों में हम प्यूर (शुद्ध) हिंदी (Pure
Hindi) का प्रयोग करते हैं।”
अर्थात् स्पष्ट है कि क्षेत्रीय बोलियों के लिए कोई स्थान नहीं है।
“पर आज समस्या यह आन
खड़ी है कि बच्चे ना तो अच्छी हिंदी जानते है ना ही इंग्लिश”
जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि किस प्रकार बाहरी वातावरण को
स्कूली परिवेश में समाहित करते हैं। इस पर प्राचार्य ने जो जबाब दिया वह सवाल को ‘बाई-पास’ करने वाला था। “हम
माता-पिता से कहते हैं कि आप इंग्लिश नहीं बोल पाते,
कोई बात नहीं, आप
अपने बच्चों को प्रोत्साहित करो कि वे घर में भी अंग्रेजी ही बोलें।”
जब शोधकर्ता ने और अधिक स्पष्टीकरण चाहा कि आप बहरी वातावरण
को किस प्रकार स्कूली वातावरण में समाहित करते हैं। प्राचार्य का जबाब था, “हम विद्यार्थी को न्यूज़पेपर पढने हेतु प्रेरित करते हैं।”
अब शोधकर्ता ने अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट किया और
उदाहरण देकर पूछा, जैसे- पंचायत के कार्य को लेकर होने वाली बातचीत, दुकानदारों से होने वाली बातचीत, आस-पडोस के लोगों,
रिक्शेवालों-ठेलेवालों से होने वाली बातचीत आदि… आदि...
इस पर प्राचार्य का जबाब था, “वे (विद्यार्थी) सुनते जरुर हैं पर सोचते अंग्रेजी में ही हैं। इंग्लिश
में ट्राँसलेट करने से इंग्लिश नहीं आएगी। अंग्रेजी में सोचना होगा। अतः हम अपने
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अंग्रेजी में ही सोचें।”
स्कूल में अध्यापक और प्राचार्य के अलावा
भी तो अन्य स्टाफ है। “पब्लिक स्कूलों के अन्दर मेड को भी प्रशिक्षण दिया जाता है, वैसे छोटे बच्चों को उनसे बोलना ही क्या होता है- आंटी वाश हैंड / Anti
wash hand… और मेड समझ जाती है। अंग्रेजी माध्यमस्कूलों में मेड को
भी एटिकेट्स सिखाए जाते हैं कि वो भी थोड़ी-बहुत इंग्लिश समझ ही सके।”
बड़े बच्चों के लिए “ऐसा नहीं है कि हम अपने बच्चों को हिंदी बोलने से पूर्णतः रोकते हैं। वे
ड्राइवर, कंडक्टर, चपरासी आदि से हिंदी में बोल सकते हैं। ”
शोधकर्ता - “क्या क्षेत्रीय भाषा-बोली में भी?” नहीं, हमारा कोई भी स्टाफ़ ‘रफ्फ़ भाषाओं’ का प्रयोग नहीं करता। ये पब्लिक स्कूल
के ऐटिकेट्स के खिलाफ है।
शोधकर्ता ने आगे जानना चाहा, “क्या
इतना होने के बावज़ूद भी बच्चे इंग्लिश में समझ बना पाते हैं?”
प्राचार्य ने अपनी विवशता ज़ाहिर की
- “देखिये, बच्चे हमारे पास छः
घंटे ही रहते हैं। शेष समय वे अपने घर पर ही रहते हैं। उनके इंग्लिश में समझने कि
क्षमता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनके घरों में अंग्रेजी का प्रयोग कितना
होता है।”
C स्कूल तथा उस स्कूल
के प्राचार्य C(काल्पनिक नाम)
स्कूल C मध्य स्तर का वह स्कूल है जहाँ की प्राचार्य इस बात
को स्वीकार करती है कि उनके स्कूल में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी का भी प्रयोग
होता है। उनके अनुसार उनके स्कूल में आने वाले अधिकतर विद्यार्थी उन निम्न-मध्यम
वर्गीय परिवारों के हैं, जो ग्रामीण क्षेत्र से परिवर्जित
होकर शहरों में बसे हैं। पर जब उनके स्कूल में ग्रामीण परिवेश के लोगों की ग्रामीण
बोलियों की बात आई तो इस विषय पर उनका कहना है कि वे अपने स्कूल परिसर में
क्षेत्रीय (ग्रामीण) बोलियों के प्रयोग को वर्जित करती हैं।
पाठकों की जानकारी में दो बातें और लाना चाहेंगे। प्रथम केस स्टडी का
छात्र रमेश इसी स्कूल C का विद्यार्थी है। पहले ग्रुप परिचर्चा के छात्र भी
इसी स्कूल से सम्बन्धित हैं। जो बताते हैं, “प्रिंसिपल मैडम हमें साँस्कृतिक
प्रोग्रामों में हिन्दी की मात्रा कम रखने को कहती हैं।” इसका अर्थ है कि
साँस्कृतिक प्रोग्राम में अंग्रेजी का ज़्यादा-से- ज़्यादा प्रयोग किए जाने पर
बल दिया जाता है। सवाल उठता है कि जब माता-पिता एवं बच्चे ग्रामीण पृष्ठभूमि के
हैं तो साँस्कृतिक कार्यक्रमों में अंग्रेजी का
प्रयोग किसके लिए होता है? इसी स्कूल के संस्कृत भाषा
के एक शिक्षक ने बच्चों के संस्कृत में जमा कराए प्रोजेक्ट दिखाते हुए बताया कि, “साइंस, सोशल साइंस को
छोड़िए... मैडम तो संस्कृत भी अंग्रेजी माध्यममें पढ़ाने को कहती हैं। शोधकर्ता ने
चार बार प्राचार्य से मिल कर स्कूल के अन्दर का वातावरण देखना चाहा, पर स्कूल के अन्दर जाने की इजाजत नहीं मिली।
प्राचार्य के साक्षात्कार से निकले कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं -
“आज के समय में इंग्लिश के बिना चलना मुश्किल है।”
“यह लैंग्वेज एक आदमी की पर्सनालिटी को डिफ़ाइन करती
है। स्टेटस, लिविंग स्टैण्डर्ड सभी, इस
भाषा का प्रयोग करने वालों का लिविंग स्टाइल ही डिफरेंट है।”
एक स्कूल की ख्याति को बनाए रखने के लिए जरुरी है कि वह अपने
अंग्रेजी माध्यमका स्तर ऊँचा रखे।
हर स्कूल के लिए अंग्रेजी माध्यम का एक-समान स्तर बनाये रखना संभव
ही नहीं है। स्कूल के अंग्रेजी माध्यम के स्तर को निर्धारित करने वाले कारको में
सबसे महत्वपूर्ण है कि स्कूल का
बैकग्राउंड क्या है, वह किस लोकेलिटी में स्थित है, उसमें आने वाले छात्र किन परिवारों से आते हैं।
घर का परिवेश बच्चे की भाषा को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है।
स्कूल के मीडियम का स्तर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूल
कहाँ पर स्थित है, उसमें किस प्रकार के परिवारों के बच्चे आते हैं।
हम यहाँ बच्चों के साथ छह घंटे बिताते हैं, छह में से तीन घंटे भी उनसे इंग्लिश में बातचीत करें तो भी वे घर जाकर
उसी कल्चर में ढल जाएँगे। इस प्रकार हमारे सारा प्रयास/एफर्ट बेकार जाता है।
यदि डीपीएस के साथ अपने स्कूल को कम्पेयर करें तो सिर्फ़ स्कूल का ही
नहीं, स्कूल में आने वाले बच्चों का भी फर्क होता है।
डीपीएस में आने वाला बच्चा हाई क्लास का है। यदि सर्विस क्लास भी है तो वह
ऐसी-वैसी नहीं, हाई पोस्ट पर काम करने वाले माता-पिता हैं।
डीपीएस में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता भी क्वालीफाईड होते हैं। वे अपने
बच्चों से इंग्लिश में बात करते हैं।
जबकि हमारे स्कूल में आने वाले बच्चों के माँ-बाप छोटा-मोटा काम-धंधा
करते हैं। ये लोग पढ़े-लिखे कम होते हैं, ये बच्चों के साथ
इंग्लिश में बात नहीं कर सकते। हमारे यहाँ आने वाले बच्चे अपने घरों में बिहारी,
मुसलमानी, गुर्जरी आदि भाषाएँ बोलते हैं।
स्कूल से निकलने के बाद वे रिक्शेवाले से, चायवाले से तो इंग्लिश में बात करेगा नहीं।
जब शोधकर्ता ने कहा कि डीपीएस का बच्चा भी तो स्कूल से बाहर निकलता
है, इसका जबाब देते हुए प्रिंसिपल ने कहा, “डीपीएस का बच्चा बाहर निकल कर रोड़-साइड वाले से बात नहीं करता। उसके
पेरेंट उसको लेकर अच्छे-अच्छे मॉल में जाते हैं। डीपीएस का बच्चा फाइव-स्टार होटल
में जाता है, जहाँ का बैरा भी इंग्लिश में बात करता है। जबकि
मेरे स्कूल के पेरेंट उसको लेकर महँगे होटलों में नहीं जा सकता। ये सब बातें भी
बच्चे के इंग्लिश बोलने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।
जिस आदमी के पास पैसा आ गया, वह भी अपने आप को
हाई सोसाइटी वालों के साथ खड़ा करना चाहता है कि चलो, हम तो
नहीं बोल सकते पर हमारे बच्चे तो उस कल्चर को अपनाएँ, इसके
लिए वह अपने बच्चों को महँगे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में डालना शुरू करता है तथा
अपने बच्चों को हाई सोसाइटी में भेजना शुरू करता है।
अतः बच्चों की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ लोगों की आर्थिक एवं सामाजिक
स्थिति का प्रतिफल है।
प्राचार्य के अनुसार बच्चे की भाषा पर स्कूल के शिक्षकों का भी
प्रभाव पड़ता है। हर स्कूल की अपनी पेइंग कैपेसिटी होती है। मेरे स्कूल की पेइंग
कैपेसिटी महँगे स्कूलों से कम है। इसलिए मेरे पास आने वाला शिक्षक भी, वो नहीं जो महंगे स्कूलों का है। मेरे पास आने वाला शिक्षक हरियाणा बोर्ड
हरियाणा की यूनिवर्सिटी का पढ़ा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का पढ़ा होता तो उसकी
इंग्लिश बेहतर होती। मेरे यहाँ के टीचर की इंग्लिश इतनी अच्छी नहीं है। पर ‘सब्जेक्ट कमांड’ उतना ही है अतः मैंने उसका एक प्लस
तथा दूसरा अपना माइनस देख कर उसे रख लिया है।
जैसा कि आपने बताया बच्चों का बैकग्राउंड तो नहीं है। पर पढ़ने वाले
सभी सब्जेक्ट इंग्लिश में हैं तो क्या इससे बच्चों की समझ पर कोई प्रभाव पड़ता है? इसके जबाब में प्राचार्य ने कहा,
“हमारे टीचर मिक्स करके पढ़ाते हैं, इंग्लिश के
साथ थोडा हिंदी में।” पर परीक्षा में तो बच्चों को इंग्लिश
में ही लिखना पढता है। “लिखने में यही दिक्कत आती है। हमने
उन्हें सिखा रखा है कि थोड़ा याद करके लिखें। छोटी क्लास में टीचर उत्तर डिक्टेट
करते हैं। अर्थात् लिखवा देते हैं, बच्चे उसी को लिखते हैं
क्योकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। बड़ी क्लास में भी हम बच्चे को हिंदी इंग्लिश
मिक्स करके समझाते हैं। पर हम बच्चों को कहते हैं थोडा याद भी करे लिखें। क्योंकि
अंतिम लक्ष्य होता है की बच्चे को समझ भी आना चाहिए। अतः लिखते समय थोडा याद भी
किया। क्योकि खुद से लिखेगा तो गलती होने कि आशंका रहती है। हम भी तो अपनी बहुत-सी
बातों को लिखते हैं। लिखने-पढने के लिए इंग्लिश कल्चर को डेवेलप करना इतना आसन
नहीं होता।
आपके यहाँ पालक-शिक्षक-सम्मेलन (पी.टी.एम.) में क्या
माँ-बाप आते हैं?
हाँ! इसे में पिता कम आते हैं पर माताएँ अक्सर आती हैं।
हमारे यहाँ स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग नहीं होने दिया जाता। के कर
रहा है ये सब हमारे यहाँ नहीं चलता। हिंदी और इंग्लिश ये भाषा ही प्रयोग करें।
इंग्लिश के लिए दबाव नहीं बना सकते, बस मॉरली ही मोटिवेट
कर सकते हैं।
मोटिवेट करने का पहला यही तरीका होता है- हम बच्चों को समझाते हैं
कि जब आप यहाँ से बाहर जाओगे तो हमारी सिखाई भाषा ही काम आएगी। चाहे जॉब के लिए
जाओ या यूनिवर्सिटी में पढ़ने हेतु।
मोटिवेट करते समय समझाने के पाँच मुख्य बिंदु इस प्रकार से हैं-
पहला पर्सनालिटी,
आपके पेरेंट ने आपको यहाँ डाला ही इसलिए है ताकि आप वो चीज़ सीख कर
जाएँ जो वे आपमें चाहते हैं। स्कूलिंग क्या होता है- पॉलिशिंग। हमारा मिशन तो तब
ही सार्थक होता है जब बच्चा पॉलिश हो जाय।
आप पॉलिश तक माने जाओगे, जब आपकी लैंग्वेज (इंग्लिश) इम्प्रूव होगी।
यदि इंग्लिश नहीं आती तो ऐसा स्टूडेंट कॉलेज में जाकर काम्प्लेक्स
अनुभव करेगा।
भाषा ना आने की अवस्था में आगे की शिक्षा में थोड़ी बाधा आएगी।
स्कूल के स्तर पर जो बच्चा नहीं सीख पाता है उसे कॉलेज के स्तर पर
सीखना ही पड़ेगा क्योंकि इसके बिना काम नहीं चल पायेगा।
आप असेंबली किस तरह करते हैं?
असेम्बली में गायत्री मन्त्र होता है, हिंदी
इंग्लिश में थॉट बुलवाए जाते हैं, न्यूज़ प्रेजेंटेशन होती
है। इनके लिए मूलतः इंग्लिश का इस्तेमाल होता है।
प्राचार्य D , स्कूल D
स्कूल D के अवलोकन से जो मुख्य बिंदु निकल
कर आये वो कुछ इस प्रकार हैं-
यह स्कूल ग्रामीण और शहरी फ्रिंज इलाके में स्थित है। इस स्कूल में
ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्र के विद्यार्थी भी आते हैं। स्कूल के सामने दुकान
चलाने वाले एक दुकानदार ने बताया कि शुरू में तो सिर्फ़ शहरी बच्चे ही स्कूल में
आते थे पर जैसे-जैसे ग्रामीण क्षेत्र में ज़मीनों के रेट (मूल्य) बढ़ते गए इस स्कूल
में और आस-पास के दूसरे स्कूलों (शहर के बीच स्थित) में भी गाँव की तरफ़ के
विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। साथ खड़े एक दूसरे शख़्स ने इसमें एक तथ्य जोड़ा, “गाँव और शहर के बीच यहाँ एक नहर है। नहर के ऊपर संकरा पुल है। आप सुबह सात
बजे आ जाओ, अक्सर उस पर जाम मिलेगा और यह जाम स्कूल की बसों
की वजह से होगा।”
अतः इस स्कूल को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अपने स्तर को शहरी
क्षेत्र के अन्य स्कूलों के बराबर रखना है। स्कूल के कार्यालय एकाउंटेंट से मिली
जानकारी के अनुसार, “यहाँ बच्चे तो दोनों क्षेत्र के आते हैं। पर शिक्षक
लगभग सभी शहरी ही हैं। स्कूल में बच्चों की इंग्लिश को सुधारने पर विशेष जोर दिया
जाता है। नई प्रिंसिपल थोड़ी लिबरल है, पहले के डायरेक्टर तो
बहुत सख्त थे।”
काफी इंतज़ार एवं तीन चार बार फोन पर संपर्क करने के बाद प्राचार्य
ने मिलने का समय दिया था। प्राचार्य ने अपने साक्षात्कार के दौरान जो साक्ष्य/तथ्य
दिए, वे नीचे प्रस्तुत हैं -
प्राचार्य D ने कहा :-
“हमारे स्कूल में ग्रामीण तथा शहरी दोनों बैकग्राउंड
के बच्चे आते हैं।
शहरी ग्रामीण क्षेत्र से मिडल, लोअर-मिडल क्लास
दोनों के स्टूडेंट आते हैं। दोनों बैकग्राउंड में भाषा का अंतर है।
यदि आप शुरू से (नर्सरी कक्षा से) बच्चे को एडमिशन देते हो तो शहरी
ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों में कोई फर्क नहीं आता है, पर यदि कोई बच्चा हिंदी मीडियम से इंग्लिश में बड़ी उम्र में आता है तो
दिक्कत आती ही है।
बीच में आने वाले विद्यार्थियों की ‘लर्निंग
हेम्पर’ (सीखने में बाधा) होती ही है।
इंग्लिश को लागू करने के पीछे का कारण यह है कि 200 वर्ष का इंग्लिश
राज आज भी हमारे खून में, हमारी सोच में हावी है।
मातृभाषाओं को दोयम दर्जा दे रहे हैं। कम्युनिकेशन के लिए इस देश में
सिर्फ़ इंग्लिश का प्रयोग कर रहे हैं।
नॉन ब्रिटिश कॉलोनी वाले देश अपनी ही भाषा का इस्तेमाल करते हैं। (सही
तथ्य- जो देश कॉलोनी नहीं रहे वे शिक्षा में अपनी ही भाषा का प्रयोग कर रहे
हैं। प्राचार्य के कहने का आशय भी यही है।)
उदाहरण देते हुए, छोटा-सा देश कोरिया, चाइना, फ़्रांस सभी अपनी भाषा में शिक्षा देते हैं।
यदि रूस पढने जाओ तो पहले आपको रूसी सीखनी पड़ती है।
भाषा ही एक कारण नहीं, जो आपको
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देती हो। भाषा की वजह से हम कहीं-न-कहीं आज भी गुलाम
हैं। जबकि हम भारतीय भाषाओं में कही ज्यादा उन्नति कर सकते हैं।
इंग्लिश के लिए साँस्कृतिक वातारण (कल्चरल एनवायरनमेंट) नहीं है और
ना ही हो सकता है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थी के लिए अंग्रेजी विशेष रूप से
बाधा है।
शहर का बच्चा आसानी से अंग्रेजी सीख लेता है जबकि गाँव के बच्चे के
लिए यह ही समस्या है। कारण है वातावरण।
स्कूल में हमारी जिम्मेदारी अंग्रेजी पढ़ाने की नहीं अपितु पाठ्यक्रम
(करिकुलम) की होती है। पर हमारी समस्या यह है कि हमें पाठ्यक्रम (करिकुलम) से हटा
कर सारा ध्यान (फोकस) लैंग्वेज (इंग्लिश) पर डालना होता है।
पाठ्यक्रम (करिकुलम) में हिंदी को छोड़ सब कुछ इंग्लिश में है और
बच्चों के सीखने को ये प्रभावित करेगी।
अंग्रेजी भाषा पर पकड़ ना होने की
वजह से बच्चे की सीखने (लर्निंग) की प्रक्रिया प्रभावित होगी ही, और वह कभी सीख नहीं पायेगा।
अंग्रेजी माध्यम में सामाजिक संपर्क (सोशल कनेक्टिविटी) का तो सवाल
ही पैदा नहीं होता।
40 बच्चों की कक्षा में मुश्किल से 15 बच्चे ही इंग्लिश समझ पाते
होंगे, धाराप्रवाह (फ़्लूएंट) तो इक्का-दुक्का ही होंगे और
वे ही फि़र कक्षा को प्रभावित (डोमिनेट) करते हैं।
इस समस्या से पार पाने के लिए हम दो भाषाओँ (इंग्लिश एवं मानक हिंदी)
को मिक्स करते हैं। बोलियों को शामिल नहीं करते।
बच्चे पर भाषाओं का दबाव रहता है। इस कारण उसके सीखने की की क्षमता
प्रभावित होती है।
जब वही बात अपनी भाषा में करवाई जाती है तो उसे सीखना आसान होता है
और वही जब अंग्रेजी में करवाई जाती है तो सीखना कठिन होता है।
हम भाषा नहीं सिखाते, हम पाठ्यक्रम
करवाते हैं और पाठ्यक्रम इस मान्यता पर बना होता है कि बच्चे को माध्यम-भाषा आती
है।
पब्लिक स्कूलों (प्रतिष्ठित निजी स्कूलों की तरफ़ इशारा कर के) में
जो पेरेंट का इंटरव्यू है वो क्या है? उस प्रक्रिया में
यह ही तो देखा जाता है कि जो बच्चा आ रहा है उसकी पृष्ठभूमि/बैकग्राउंड क्या है।
बच्चा भाषा की वजह से अपने ‘सामाजिक पर्यावरण /
सोशल इन्वार्यामेंट’ से कट (डिटैच) रहा है।
स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति में शैक्षिक योग्यता / क्वालिफिकेशन
के अलावा उसकी इंग्लिश बोलने की क्षमता भी देखी जाती है।
पुराने समय के शिक्षक जो ज्यादा क्वालिफिकेशन नहीं रखते थे पर उन्हें
ज्यादा समझ होती थी, क्योंकि वे अपने पर्यावरण/इन्वार्यामेंट से ज्यादा
जुड़े होते थे।
हम तो अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में रोट लर्निंग करवाते हैं। बच्चे
को कोई भी जीवंत अनुभव (लाइफ एक्सपीरियंस) नहीं होता।
हम सीखने (लर्निंग) की नहीं, नम्बरों की दौड़ में
भाग रहे हैं।
सीखना (लर्निंग) है तो अनुभव (एक्सपीरियंस) काउंट करो ना।
बच्चों को मुक्त करो ताकि वे अपने अनुभवों से सीख सकें। पर
भाषा/लैंग्वेज रूपी बाधा/बैरियर लगते ही बच्चे की गति रुक जाती है। वह अपने सीखने
में अनुभव को शामिल नहीं कर पाता।
इंग्लिश को यदि लैंग्वेज के रूप में सिखाएँ तो बच्चे जल्दी सीखेंगे, पर माध्यम के रूप में थोपने पर वही भाषा बाधा बन जाती है।
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) होता है अधिगम
(लर्निंग) नहीं होता।”
ये सभी बिंदु प्राचार्य के शब्दों में, महत्वपूर्ण
बिंदु रेखांकित किए गए हैं।
प्राचार्य के साक्षात्कार से मूल्यों, विश्वासों,
धारणाओं एवं मानदंडों से सम्बन्धित जो बातें निकल कर आईं, वे इस प्रकार हैं-
हम आज भी 200 वर्ष की गुलामी से पैदा हुई व्यवस्था को ढोने के लिए विवश हैं।
सीखने की क्रिया तो बच्चे की अपनी ही भाषा में हो सकती है। अंग्रेजी
माध्यम स्कूल में तो व्यवस्था की ज़रूरत अनुरूप ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) ही होता है।
जब तक भाषा की
बाधा है तब तक सीखने की क्रिया कभी-भी रचनात्मक नहीं हो सकती।
समय की मांग के आगे हम विवश हैं और अपने यहाँ भी उसी मीडियम में
शिक्षण करवाते हैं।
शिक्षकों की नियुक्ति का मानदंड यह है कि वह इंग्लिश फ़्लूएंट होना
चाहिए।
धारणा यह है कि निजी स्कूल बाज़ार की मांग के अनुरूप नहीं चलेगा तो वह
बाज़ार में नहीं टिक पायेगा।
धारणा यह भी है कि माता-पिता भी अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलते हुए
सुनना चाहते हैं।
इसका परिणाम यह है कि अपना ध्यान पाठ्यचर्चा से हटा कर भाषा शिक्षण
पर लगाना पड़ता है।
भाषा पर कमजोर पकड़ की वजह से निम्न वर्गीय तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि के
बच्चे शिक्षा की इस व्यवस्था में पिछड़ते हैं।
स्कूल E तथा प्राचार्य E
स्कूल E, गाँव तथा तथा शहर को जोड़ने वाली सड़क पर स्थित है। स्कूल
के पास गाड़ियों का अच्छा-खासा काफ़िला है। जो आस-पास के गाँवों से विद्यार्थियों को
स्कूल तक लेकर आता है। स्कूल की बसों का रूट समझते हुए प्राचार्य ने कहा, “प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का एक फायदा यह भी हुआ कि अब गाँवों के
बच्चे भी शहरों के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी पढ़ सकते हैं।” अपने आप को ‘इंटरनेशनल’ घोषित
करने वाले इस स्कूल में पढ़ने आने वाले अधिकतर
विद्यार्थी ग्रामीण परिवेश के है। शिक्षकों का एक वर्ग निकटतम मेट्रोपोलिटन
शहर दिल्ली तथा फरीदाबाद से आता है। जबकि शेष स्थानीय शहर के हैं। पी.टी.आई.
अर्थात् शारीरिक शिक्षा के शिक्षक, जिनका मुख्य काम स्कूल
में अनुशासन बनाना है वो निकट के गाँव के हैं। प्राचार्य कुछ माह पूर्व ही इस
स्कूल में नियुक्त हुए थे और उन्होंने अपनी प्राथमिकता को गिनाते हुए बताया कि वे
इस स्कूल में तेजी से इंग्लिश का वातावरण पैदा करना चाहते हैं।
प्रस्तुत है उनसे हुई बात चीत के मुख्य अंश -
उन्होंने कहा, “मुझसे पहले जो प्राचार्य थे, वे
खुद भी बोल-चाल में इंग्लिश का प्रयोग नहीं करते थे। इस कारण ना तो शिक्षक और ना
विद्यार्थी ही इस दिशा में कदम बढ़ाते थे।” उन्होंने आगे
बताया, “मुझे अपॉइंटमेंट लेटर (नियुक्तिपत्र) देते हुए स्कूल
के प्रबंधकों ने स्पष्ट किया है कि वे इस स्कूल में ‘इंग्लिश
मीडियम कल्चर’ चाहते हैं। अतः मेरी प्रथमिकता इस स्कूल
में अंग्रेजी माध्यम वातावरण पैदा करने की है।”
जब शोधकर्ता ने ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ का अर्थ स्पष्ट
करने को कहा तो उन्होंने बताया, “एक ऐसा वातावरण जहाँ शिक्षक
और विद्यार्थी इंग्लिश भाषा में कम्यूनिकेट (संचार, बातचीत)
कर सकें।”
“तो इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु आप क्या कर रहे
हैं?” शोधकर्ता ने आगे पूछा।
“सबसे पहले तो मेरी कोशिश है कि मैं इस स्कूल के स्टाफ़
को ही बदल दूँ और यह बात मैंने अपने प्रबंधकों को स्पष्ट कर दी है। इस शहर और
आस-पास के गाँवों से आने वाले शिक्षकों का खुद अंग्रेजी भाषा पर नियंत्रण नहीं है।
वे खुद हिंदी, यहाँ तक की ग्रामीण भाषाओं में बोलते पाए जाते
हैं। ऐसे शिक्षक भला बच्चों को क्या अंग्रेजी बोलना सिखाएँगे।” थोड़ा रुक कर, “मैंने अपने प्रबंधकों को स्पष्ट कर
दिया है कि यदि आपको ‘इंग्लिश मीडियम कल्चर’ चाहिए तो पहले आप अपने टीचिंग स्टाफ़ को बदलिए। थोड़े महँगे पड़ेंगे, पर आप भी, x,y,z स्कूल (कुछ प्रतिष्ठित माने जाने
वाले स्कूलों का नाम लेते हुए) की तरह अपने स्टाफ़ को दिल्ली अथवा फरीदाबाद से
बुलवाइए। इस शहर और आस-पास के लोगों को खुद अंग्रेजी बोलनी नहीं आती, वो भला आपके बच्चों (विद्यार्थियों) को क्या इंग्लिश बोलना सिखायेगें?”
शोधकर्ता ने इसे और अधिक स्पष्ट करने की चेष्टा से पूछा, “फरिदाबाद तथा दिल्ली का टीचिंग स्टाफ़, यह बात कुछ
स्पष्ट नहीं हुई।”
प्राचार्य, “हमारे शहर में जितने भी बड़े स्कूल हैं, वे अपना स्टाफ़ दिल्ली अथवा परिदाबाद से लाते हैं।” एक
प्रतिष्ठित माने जाने वाले स्कूल का नाम लेकर बताना शुरू किया कि किसका
कितना-कितना स्टाफ़ बाहर से आता है। अपने आँकड़े देने के बाद प्राचार्य कुछ क्षणों
के लिए रुके, फिर मुस्कुराते हुए बोले, “इस शहर के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जहाँ इस शहर के साथ आस-पास के
गाँवों से आते हैं। वहीं स्कूलों की कोशिश
अपने स्टाफ़ को दिल्ली और फरीदाबाद से लाने की है। दिस इज़ ऑल मनी गेम/This
is all money game ये सब कुछ पैसों का खेल है)। देखिये राजधानी के पास होने तथा शहर के विस्तार के साथ इस इलाके के लोगों
की इनकम (आय) तेजी से बढ़ी है। पहले ये होता था कि शहर के खाते-पीते लोग ही अपने
बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल में पढ़ाते थे। गाँव के तथा निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूल
में ही पढ़ते थे। आज जिसके पास पैसा आ गया है वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में
डाल रहा है। गाँव में रहने वाले की भी ख्वाहिश इंग्लिश बोलने की है। बाकी बच्चा
क्या सीखता है नहीं सीखता है। यह बात उसके समझ के बाहर की ही समझो। घर पहुँचने पर
पेरेंट यह नहीं पूछता कि क्या पढ़ाया, क्या नहीं पढ़ाया। वह
यह पूछता है कि किस भाषा में पढाया। बाकी उसकी समझ के बाहर की बात है।”
शोधकर्ता- “इस बात का
फरीदाबाद तथा दिल्ली से शिक्षक बुलाने से क्या सम्बन्ध है। यदि लोकल शिक्षक होगा
तो उसे बच्चों के परिवेश की अच्छी समझ होगी।”
प्राचार्य- “मैं वही तो बताने
की कोशिश कर रहा हूँ। प्राइवेट स्कूलों के तेजी से ग्रोथ की वज़ह से जिस हिसाब से
शिक्षकों की माँग बढ़ी है, उस हिसाब से अंग्रेजी में पढ़ा सकने
वाले शिक्षक इस छोटे से कसबेनुमा शहर में उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए हमें अपने शिक्षक
दिल्ली और फरीदाबाद से लाने पड़ते हैं। बहुत-से स्कूल तो अपने विज्ञापनों में भी इस
बात को बताते हैं कि उनका स्टाफ़ दिल्ली और फरीदाबाद से आता है।”
थोडा रुक कर, प्राचार्य ने आगे कहा, “हमारे
समय में माँ-बाप पूछते थे कि क्या सीखा? आज माँ-बाप पूछते
हैं कि अंग्रेजी बोलना आया कि नहीं। मैं पहले एक स्कूल में पढ़ाता था वहाँ मैं उप
प्राचार्य का भी काम देखता था। क्रिएटिव कामों को करवाने पर बल देने वाले एक टीचर
ने बच्चों को इन्फ्लेशन का कॉन्सेप्ट समझाने हेतु बच्चो को घर में इस्तेमाल होने
वाली 10 वस्तुओं के नाम लिखकर और उनके पाँच साल के अनुमानित मूल्य पता लगाने के
लिए कहा था। जब घर जाकर बच्चों ने पूछा तो कुछ माँ-बाप उस शिक्षक की शिकायत करने आ
गए। कि ये सर पढ़ाते कम और फालतू के काम ज्यादा करवाते हैं। आज पेरेंट इंग्लिश के
पीछे इस कदर पागल हैं कि वे रवीन्द्रनाथ का प्रकृतिवाद, गाँधी
जी का रचनात्मकतावाद आदि सब गौण बातें
हैं। इंग्लिश बोल कर हर कोई हाई सोसाइटी के साथ जुड़ना चाहता है।”
शोधकर्ता- “आप अपने
स्टाफ़ को कैसे मोटिवेट (प्रेरित) करते हैं कि वे इंग्लिश में ही पढाएँ।”
प्राचार्य- “सबसे पहले तो मैंने
सबको वार्निंग दे दी है कि स्कूल परिसर में हर टीचर इंग्लिश ही बोलेगा। इसका नतीजा
यह निकला है कि कम-से-कम स्कूल में शिक्षकों ने देहाती भाषा में बोलना बंद कर दिया
है। दूसरा, मैं जब स्कूल में राउंड पर निकलता हूँ और क्लास में जाता हूँ तो वहाँ
शिक्षक से सिर्फ़ इंग्लिश में बात करता हूँ, ऐसी अवस्था में
या तो टीचर इंग्लिश में बात करे या तौहीन करवाए।” हँसते हुए,
“इनमें-से बहुतों ने इंग्लिश सीखने के लिए रेपिडैक्स तो कम-से-कम
खरीद ही ली होगी। मैं भी क्या करूँ, मेरी भी मज़बूरी है। मैं
इन टीचरों की निगरानी करता हूँ और इस स्कूल का चपरासी जो आठवीं क्लास भी पास नहीं
है वह मेरी निगरानी करता है। वह मनेजमेंट का सबसे ख़ास आदमी है।” शोधकर्ता की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए, “ये बात ना
छाप देना। मैनेजमेंट सोचता है ये बात मुझे मालूम नहीं है।”
शोधकर्ता- “माता-पिता को
आप कैसे विश्वास में लेते हैं कि आगे आने वाले समय में आपके स्कूल में अंग्रेजी
माध्यम के मानदंडों के अनुरूप ही शिक्षण होगा।”
प्राचार्य- “आप हँसोगे, पर मुझे करना पड़ता है। माँ–बाप मुझसे मिलने आते हैं
तो मैं उनसे अंग्रेजी में बात करता हूँ। तब तक अंग्रेजी ही बोलता हूँ जब तक कि वो
ना कह दे कि सर हमें कुछ नहीं समझ आया। जब वो ऐसा कहते हैं तो उसके बाद मैं उनसे
शुद्ध हिंदी (मानक हिंदी) में बात करना शुरू करता हूँ। मुझसे पहले वाले प्रिंसिपल
यही तो गलती करते थे। ग्रामीण माँ-बाप से ग्रामीण भाषा में ही बात करना शुरू कर
देते थे। अरे! उसे ग्रामीण भाषा में ही बोलना सीखना होता तो वे अपने बच्चे को वहीं
गाँव के किसी स्कूल में ना डाल देता। क्या
ज़रूरत है उसे अपने बच्चे को 10-15 किलोमीटर दूर भेजने की।” रुक
कर, “आज हर माँ-बाप अपने बच्चे को इंग्लिश में ही ग्रूम
(विकसित) करना चाहता है। चाहे वो ग्रामीण हो, शहरी हो, झाड़ू लगाने वाला जमादार हो या दिहाड़ी करने वाला मज़दूर। इसलिए हर एक की
हैसियत के अनुरूप अंग्रेजी माध्यम के स्कूल भी हैं।”
शोधकर्ता- “बच्चों को आप
इंग्लिश बोलने के लिए कैसे प्रेरित करते हैं?”
प्राचार्य- “मैं उनको
कहता हूँ टूटी-फूटी बोलो, पर इंग्लिश बोलो। अभी रिसेस
(मध्यांतर) की बात बताता हूँ कि एक बच्चे से दूसरे बच्चे को धक्का लग गया। बच्चे
अपनी शिकायत लेकर आए। मैंने कहा इंग्लिश में बोलो तब ही सुनुँगा। बच्चों ने
एक्सप्लेन किया।”
प्राचार्य ने अब अपना जीवन वृतांत शुरू किया, “मेरी 12 तक की शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई है। मैंने जब बी.एससी. में
दाखिला लिया तो मेरा सामना अंग्रेजी से हुआ। मैंने एम.डी. यूनिवर्सिटी में दाखिला
लिया था। वहाँ की सारी पढाई इंग्लिश में होती थी। मेरे घर में मुझसे बड़े मेरे भाई
थे। वे आर्ट से पढ़ रहे थे। हालाँकि उनके पास एक ही सब्जेक्ट इंग्लिश का था,
बी.ए. पार्ट-I में उनकी कम्पार्टमेंट आ गई।
उन्हें कम्पार्टमेंट तोड़ने के दो अवसर भी मिले, पर दोनों
में सफल नहीं हुए और पार्ट-I के साथ पार्ट-II में भी इंग्लिश में कम्पार्टमेंट आ गई। बस, उसके बाद
तो उनके पास एक ही रास्ता था, फिर से पार्ट-I में दाखिले का और इसी शर्मिन्दगी में उन्होंने पढाई ही छोड़ दी। मुझे उनकी
ये हालत देख कर घबराहट होने लगी। एक बार तो मैंने भी पढ़ने से मना कर दिया।
बी.एससी. में इंग्लिश 50 नंबर की होती है और बी.ए. से आसान भी होती है। फिर
फिजिक्स और केमिस्ट्री का क्या करूँ। तो समझाया ग्रामर की गलती का ख्याल ना करना। एसिड इस
रियेक्टेड / आर रियेक्टेड / वाज़ रियेक्टेड, जो मन में
आए, लिख देना, कैन/कुड कुछ भी।
इसलिए मैं इन बच्चों को भी यही सलाह देता हूँ कि आप ग्रामर की चिंता मत करो, बस बोलो।”
शोधकर्ता- “पर क्या इस
प्रकार आप अंग्रेजी बोलने की क्षमता हासिल कर पाए?”
प्राचार्य- “नहीं इसने
एम.एस.सी. तक साथ दिया। थोड़ी राहत बी.एड. में मिली क्योंकि वहाँ अंग्रेजी नहीं
थी। पर जब अपनी एजुकेशन (शिक्षा ) पूरी करने के बाद जॉब की तलाश में आए, तब इंग्लिश की वैल्यू पता चली।
एक इंटरव्यू का फीड-बैक था, मिस्टर (नाम) आपका सब्जेक्ट
कमांड तो बहुत अच्छा है पर भाषा पर पकड़ ना होने की वजह से हम आपको जॉब में नहीं रख
सकते। और उसके बाद मैंने तय किया कि अपनी अंग्रेजी सुधारूँगा और अंग्रेजी सुधारने
का ही नतीजा है कि आज मैं यहाँ हूँ।”
स्कूल F तथा प्राचार्य F
स्कूल F पर गाँव खेतों के बीचों-बीच भिडूकी गाँव के बाहरी
पूर्वी छोर पर स्थित है। यह स्कूल एक नव स्थापित माध्यमिक स्कूल है। गाँव के लोगों
के बीच यह स्कूल चर्चा का विषय है क्योंकि यह गाँव का पहला सीबीएसई पाठ्यक्रम से औपचारिक शिक्षा
देने वाला स्कूल है। इस स्कूल में भिडूकी गाँव ही नहीं,
अपितु उसके आस-पास के अन्य गाँवों के बच्चे भी आते हैं।
स्कूल के प्राचार्य F से हुई वार्ता का संक्षिप्त विवरण-
“हमारे स्कूल के पास 12वीं तक की मान्यता है पर हमने
तय किया है कि अपने ही विद्यार्थियों को लेकर स्कूल को आगे बढाएँगे। 5वीं क्लास के
बाद नए बच्चे नहीं लेंगे।”
“इसका कारण यह है कि यहाँ के लोगों की लैंग्वेज
प्रॉब्लम बहुत है। 5वीं, 6वीं, 7वीं
क्लास में विद्यार्थियों को लेने से स्कूल के वातावरण पर प्रभाव पड़ सकता है।”
“इन क्लासों में हम जब तक बच्चों का टेस्ट नहीं ले
लेते, तब तक दाखिला नहीं देते।”
“टेस्ट इंग्लिश, हिंदी और मैथ का
लेते हैं।”
“स्कूल में इंग्लिश और शुद्ध हिंदी का प्रयोग करते
हैं। शुद्ध हिंदी मतलब- शहरी हिंदी।”
“स्कूल का सारा स्टाफ़ फरीदाबाद शहर से आता है। सिर्फ़
एक क्लर्क गाँव का रखा है। इधर-उधर के काम
के लिए।”
“ऐसा नहीं कि इस गाँव
में क्वालिफाइड लोग नहीं हैं। पर कितने भी क्वालिफाइड हों भाषा की प्रॉब्लम
तो रहती ही है।”
“बच्चे की वज़ह से माता-पिता की भाषा में भी बदलाव आ रहा है। वे पहले से कम ‘रूड़’ हुए हैं। यहाँ से सीख कर जाने के बाद
माता-पिता को भी सिखाता है। वे भी अब इंग्लिश के बहुत-से शब्दों का प्रयोग कर पाते
हैं। कम-से-कम मेरे और आप की तरह शुद्ध हिंदी का प्रयोग तो कर ही पाते हैं।”
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