अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-5

 रविन्द्र मूलतः फरीदाबाद शहर के अज्रोंदा गाँव  के रहने वाले हैं। शहर... क्योंकि यह गाँव अब शहर का ही भाग बन गया है तथा हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) द्वारा बसायी गयी शहर की पोरस कॉलोनी यानी सेक्टर से लगा हुआ है तथा अब उसी का भाग है। रविंद्र फरीदाबाद स्थित सैसन कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। अजित उनके साथी हैं तथा उन्हीं के साथ प्रैक्टिस करते हैं। अजित फरीदाबाद की निम्न-मध्यम वर्गीय कॉलोनी डबुआ के निवासी हैं। वे मूलतः पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश से सम्बन्धित हैं। आस-पास के सेक्टरों में बसा नव-धनाड्य  वर्ग मुख्यतः मानक हिन्दी के अपभ्रंश हिंग्‍लिश में ही बोलचाल करता है। यदा-कदा इनमें से कुछ इंग्लिश भी बोल लेते हैं। रविंद्र और अजित, दोनों के घरों में देहाती कहलाने वाली बोलियों के ही बोलने का प्रचलन है। पर पिछले कुछ सालों में कुछ ऐसा घटा कि इन लोगों के  घर में “बैड लैंग्वेज” अर्थात् देहाती बोलियों के बोलने पर रोक लग गयी है। यदि बोलते भी हैं तो बच्चों की अनुपस्थिति में और वह भी यदाकदा ही।

आइए,  जानने के लिए पढ़ें इन दोनों के साथ हुई  विस्तृत बातचीत के मुख्य अंश-

पहले रविन्द्र-


रविन्द्र, “मेरे दो बच्चे हैं, दोनों बच्चे उच्च कहलाने वाले निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बेटी क्रिश्चन स्कूल में पढ़ती है। जबकि बेटे को फरीदाबाद के बेस्ट माने जाने वाले स्कूल में दाखिला दिलवा रखा है।

बेटे के स्कूल का सिस्टम काफी हाई-फाई है और अब लगता है कि मेरी पहुँच के बाहर है।कैसे? पूछने पर उन्होंने निम्न बिंदु गिनाए।

•      उनके शब्‍दों  में, “कल्चरल प्रोग्राम हो रहा हो तो उस दौरान सभी पढ़ाई-लिखाई का काम पीछे छूट जाता है। वैसे पढ़ाई-लिखाई के लिए उस स्कूल के विद्यार्थियों के माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए घर पर ही ट्यूशन की व्यवस्था कर रखी है।”

•      “महँगे-महँगे टूर लेकर जाते हैं। जैसे गोवा का टूर (2000 किमी दूर), नासा (यूएसए) का टूर”

•      “बच्चों को भड़का दिया कि नासा का टूर लेकर जाएँगे। बच्चे घर आकर 2 लाख रुपए की मांग करने लगे। हमने तो बच्चे को नहीं भेजा। पर बच्चे जिद्द तो करते ही हैं। कुछ माँ-बाप ने भेजा होगा। हमारी तो आर्थिक क्षमता इतनी नहीं है कि यूएसए घूमने के लिए भेजें।”

•      “बच्चे अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं पर उन्‍हें घर के संस्कारों के लिए बोलना पड़ता है। वे उससे विमुख हो रहे हैं।”

•      “बच्चे स्कूल में घर की भाषा का प्रयोग करें तो उन्हें सजा मिलती है।”

•      “हिन्दी में बोलने पर फाइन लगा देते हैं। हमारी देहाती भाषाओं की तो आप बात ही ना करो। हमारे बच्चे भी मानने लगे हैं कि हमारी भाषाएँ गँवारू ही हैं।”

पर जब शोधकर्ता ने जानना चाहा कि इसके बावजूद भी आप अंग्रेजी माध्यम स्कूल में क्यों डालते हो तो जबाब था -

•      “हिंदी मीडियम या क्षेत्रीय भाषा मीडियम में डालने से बच्चा आगे आने वाले दौर में प्रतियोगिता / कम्पटीशन्स में टिक नहीं पाएगा।”

•      “जॉब में जाना है तो इंग्लिश जरुरी है।”

•      “उच्च शिक्षा के लिए भी इंग्लिश जरूरी है। इंजिनियरिंग मेडिकल के फील्ड में इंग्लिश जरूरी है।”

•      “हम लोग इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं इसके पीछे कारण यही है कि बच्चे कम्पटीशन (प्रतियोगिता) में बने रहें। हम लोग इतनी अच्छी इंग्लिश नहीं बोल पाते हैं और इंग्लिश ना बोल पाने का मलाल तो रहता ही है। हम नहीं चाहते कि इंग्लिश ना बोल पाने की वजह से जो दिक्कत हमें आती है, वह हमारे बच्चों को भी आए।”

उदाहरण देते हुए, “जैसे कि हम वकील हैं और वकील के लिए जो योग्यता है उसको पूरा भी करते हैं। पर यदि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के केस लेकर वहाँ  बहस करना चाहें, तो वहाँ अच्छी इंग्लिश की ज़रूरत होती है। सेशन कोर्ट में तो काम इंग्लिश हिंदी मिक्स करके चल जाता है। पर सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में नहीं चल सकता है। हम वहाँ कामयाब नहीं हैं। कानून के चाहे कितने भी बड़े जानकार हों। पर इंग्लिश नहीं आती तो निरे मूर्ख हैं।”

•      “कोर्ट में तो इंग्लिश भाषा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो ही दहाड़ेगा।” 

•      “स्कूल की भूमिका बच्चों को महज किताबी कीड़ा बनाने की है। बच्चा किताबों से बाहर निकल कर सोच ही नहीं पाता है।”

•      “स्कूल में बच्चों का क्रेज समझने पर नहीं, महज़ रट कर प्रोड्यूस  करने भर का है।”

•      “हमारी जो देहाती भाषा है उसमें हम आज के दिन घर पर भी बातचीत नहीं करते हैं।

अजित से जब शोधकर्ता ने बात करना चाहा तो पहले तो उन्होंने इस विषय पर बात करने से ही इनकार कर दिया। उलटे शोधकर्ता को सलाह दी कि वह सर्वे रिपोर्ट आदि देखे। पर जब बोलना शुरू किया तो अपनी पीड़ा रोक भी नहीं पाए।

अजित से हुई  बातचीत  के अंश -

जो हमारी मदरटंग है यदि उसमें बच्चा बात करता है तो हमें पीटीए (PTA) में बुला कर वॉर्निंग दी जाती है।”

•      स्कूल के अनुसार हमारी भाषा ‘बैड लैंग्वेज’ है। वे इसे गँवारू भाषा कहते हैं। स्कूल वालों के अनुसार यदि हमारा बच्चा इसमें बोलता है तो इससे दूसरे बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है। कहते हैं, “आपके बच्चों की भाषा को सुन कर कहीं वे भी ‘वाइल्ड एनिमल’ हो जाए।” वो इसे गाली-गलौच की भाषा करार देते हैं।” 

•      “तय ये हुआ है कि अब घर पर कोई भी अपनी मदरटंग नहीं बोलेगा।”

•      “अब हम घरों में मैक्सिमम इंग्लिश का इस्तेमाल ही कर रहे हैं। हम सभ्य कहलाने वाली भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।”

•      “का कर रहे हो। कहाँ जात हो, स्कूल की नज़र में ये सब बैड लैंग्वेज है।”

•      “आप इंग्लिश बोलोगे तो सभ्य हैं, इसके अलावा कोई भी इंडियन भाषा बोलोगे तो असभ्य कहलाते हैं।”

•      “हर परिवार चाहता है कि उसे नम्बर वन बनाना है। इसके लिए इंग्लिश अख़बार पढ़ने का दिखावा करते हैं।”

•      “कोर्ट में सीनियर लॉयर और लॉ ऑफिसर पूर्णतया इंग्लिश का प्रयोग ही करते हैं। अन्दर से वो भी हमारी तरह देशी ही हैं। पर उन्होंने अपने आप को सिस्टम के अनुरूप बना लिया है। तब ही वे वहाँ है।”

•      “कोर्ट में भी जज यदि किसी बिंदु पर ध्यानाकर्षण करना चाहता है तो वह इंग्लिश में बोलेगा। जैसे यदि वह सुनो-सुनो-सुनो कहता है तो कोई गौर नहीं करेगा। पर यदि वह लिसेन-लिसेन-लिसेन करता है तो दोनों पक्षों के वकीलों का ध्यान सीधे आकर्षित होगा और अलर्ट हो जाएँगे।”

•      “सभी इम्पोर्टेण्‍ट चीजें तो इंग्लिश में ही हैं।”

•      आप आज यदि थाने में चले जाइय,  यदि आप हिंदी अथवा देहाती में बोलते हो तो आपको कोई रिगार्ड नहीं देगा परन्तु यदि इंग्लिश में बोलते हो तो आपकी बात ध्यान से सुनेंगे।”

•      “थानों में रिपोर्ट लिखने वालों को सख्त हिदायत है कि यदि कोई एप्लीकेशन हिंदी में आती है तो आप उसे खुद डील करें पर यदि एप्लीकेशन इंग्लिश में आती है तो उसको डील करने से पूर्व आप अपने सीनियर अफसर या पब्लिक प्रोसिक्यूटर से जरूर सलाह लें। हिंदी में है तो हवलदार भी अपने स्तर पर कार्यवाही कर सकता है। पर यदि इंग्लिश में है तो बड़े अफसर तक बात जाएगी।

रविन्द्र तथा अजित से की गई बातचीत से व्यवहार को प्रभावित करने वाले  मूल्य , धारणाएँ  और विश्‍वास  सम्बन्धी जो मुख्य बातें /  बिंदु निकल कर आए, वे इस प्रकार से हैं-

•      लोग अपने बच्चो को आज के समय की प्रतियोगिता में बनाये रखने के लिए इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भेज रहे हैं। इस प्रकार अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेजना उनकी विवशता है।

•      अंग्रेजी के बिना न तो बेहतर उच्च शिक्षा ही संभव है, ना किसी सरकारी या प्राइवेट नौकरी में सेलेक्ट हो सकते हो। ना ही हाई कोर्ट, सुप्रीमकोर्ट में ही प्रैक्टिस कर सकते हो।

•      वे बच्चों के स्कूल की संस्कृति से संतुष्ट नहीं हैं, पर दोनों ही स्कूलों में सिखाए जा रहे मूल्यों के आगे विवश हैं।

•      स्कूल से सिर्फ़ बच्चे ही नहीं, पूरा परिवार प्रभावित होता है। पारिवारिक मूल्यों में परिवर्तन आता है। अर्थात् स्कूल की वज़ह से माता-पिता, अडोस-पड़ोस सबका समाजीकरण हो रहा है।

•      काफ़ी गहरे में ये बात स्थापित कर दी गई है कि अंग्रेजी ही रौब की भाषा है, शासन की भाषा है। जो अंग्रेजी जानता है वही कद्र पा सकता है। सो इस ताकत की भाषा का ज्ञान हासिल करने हेतु अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के समक्ष अपने पारिवारिक मूल्यों और परम्‍पराओं की कुर्बानी देनी होगी।

चीन, जपान, स्वीडन, जर्मनी, बैल्जियम में अपने देश की भाषाओं में संभव है तो भारत की दिक्कत क्या है??

 

परिवेश से काट कर एक कृत्रिम मानव बनाने की प्रक्रिया को दर्शाता साभार प्राप्त यह चित्र ।

 

 

 

 

 

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