अंग्रेजी माध्यम के कारण शिक्षा के प्रति बदलता दृष्टिकोण
विचारणीय मुद्दा –
सामाजिक
साँस्कृतिक परिवेश से बाहर की भाषा (अंग्रेजी) को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाया
जाने से विद्यार्थियों, उनके माता-पिता एवं जन-सामान्य का शिक्षा के प्रति कैसा दृष्टिकोण गढ़ता है?
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अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा व्यवस्था में
अंग्रेजी का वर्चस्व विद्यार्थियों एवं उनके माता-पिता का शिक्षा के प्रति कुंठित
दृष्टिकोण गढ़ने का कार्य करता है और साथ ही परिवेश की साँकृतिक विरासत में
अविश्वास पैदा कर अंग्रेजियत की संस्कृति के वर्चस्व को बढ़ावा देता है। औपचारिक
और अनौपचारिक वातावरण में जो शैक्षिक सामंजस्य स्थापित होना चाहिए, उसकी
सम्भावनाओं को ही पूर्णतः खतम कर देता है। अनौपचारिक शिक्षा अर्थात् परिवेश से
हासिल होने वाले व्याहारिक ज्ञान को शामिल किए बिना स्कूल कॉलेज की औपचारिक शिक्षा
‘बिना नींव की इमारत’ के समान ही
होती है। जो तूफ़ान छोड़िए, हलकी-सी आँधी तक का सामना भी नहीं कर सकती। ‘आधारहीन ज्ञान’ की यह इमारत व्यावहारिक जीवन के
हलके झटके को भी बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। जीवन की वास्तविकताओं का सामना होते ही
औपचारिक शिक्षा का डिग्रीधारी ज्ञान भरभरा कर गिर जाएगा। यह बात आगे के विश्लेषण
से स्पष्ट होगी।
विज्ञान वास्तविक घटनाओं के तर्कपूर्ण
विवेचन पर बल देता है। अनुसंधान के दौरान पाया गया कि अंग्रेजी माध्यम स्कूली
संस्कृति में विद्यार्थी विज्ञान जैसे विषय भी बिना किसी तर्कपूर्ण विवेचन के रटता
जाता है। 1960 के दशक में आयी कोठारी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य
वैज्ञानिक समाज का निर्माण करना है। अनुसंधान के दौरान पाया गया कि
विद्यार्थी विज्ञान जैसे विषय को भी बिना व्यावहारिक अर्थ समझे ही रटते जाते हैं।
अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान भी धार्मिक विश्वासों के सामान आँख
बन्द कर मान लिया जाता है। विज्ञान को अफ़ीम से भी अधिक नशीला
पदार्थ बना दिया गया है। एक ऐसा विषय जो पढ़ कर भी नहीं पढ़ा गया,
एक ऐसा विषय जो ‘बाय-पास’ हो कर पढ़ा जा रहा है। इसी का परिणाम है कि एक एम.एस.सी. पास व्यक्ति भी
बिल्ली के रास्ता काटते ही रूक जाता है। ऐसा कैसे हो रहा है, यह आगे स्पष्ट करेंगे।
अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में माता-पिता
की भूमिका ऐसे ‘मूक दर्शक’ की होती है जो स्कूल से मिलने वाले अंकों के आधार पर ही
अपने बच्चों के कृत्य का मूल्यांकन करते हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूल की शिक्षा
उसके समझ के बाहर ही होती है। बच्चों की नोटबुक में लाल निशान देख अनुमान लगा लिया
जाता है कि उसका बच्चा कुछ गलती कर रहा है। कई बार तो बस उस लाल निशान को देख कर
ही, बिना गलती का पता लगाए ही, बच्चों को पीटना तक शुरू कर दिया जाता है। ऐसा लेखक ने
अपने शिक्षण अनुभव के दौरान भी पाया है।
प्रोमेश आचार्य ने अपनी पुस्तक
‘देशज शिक्षा : औपनिवेशिक विरासत और जातीय विकल्प’ में ‘पाक
ब्रिटिश काल की देशज शिक्षा’ लेख में
पूर्व ब्रिटिश कालीन शिक्षा व्यवस्था का जो वर्णन किया था, उस शिक्षा व्यवस्था में
मूल्यांकन प्रक्रिया में अभिभावक भी शामिल था। अभिभावक ही अंतिम मूल्यांकन-कर्ता
होता था। बेशक उस व्यवस्था में लाख खामियाँ रही हो, पर अनुसंधानकर्ता उसकी दो विशेषताओं को
यहाँ उजागर करना चाहेगा। पहली, उस समय के अभिभावक को ज्ञात था कि उसके बच्चे को उसका
शिक्षक क्या पढ़ा रहा है। दूसरा, शिक्षण प्रक्रिया में अभिभावक तथा शिक्षक दोनों का
तालमेल बना रहता था।
परंतु साँस्कृतिक परिवेश से बाहर की भाषा
(अंग्रेजी) में शिक्षण व अधिगम का परिणाम यह हुआ है कि माता-पिता ही नहीं, आस-पड़ोस
के जानकार लोगों तथा समझदार माने जाने वाले रिश्तेदारों तक की समझ से बाहर होता है
कि बच्चा आखिर स्कूल में पढ़ क्या रहा है? कौन-सी शिक्षा ग्रहण कर रहा है?
शिक्षण के लिए गैर-परिवेशगत भाषा का प्रयोग
शिक्षा को लेकर भ्रम पैदा करने का काम करता है। यह भ्रम उसे शिक्षा के वास्तविक
लक्ष्यों से परे ले जाता है।
इस बात कि पुष्टि हम निम्नलिखित साक्ष्यों
के आधार पर कर सकते हैं -
जब
अनुसंधानकर्ता ने गाँव भिडूकी में एक निकट के कसबे होडल में स्थित अंग्रेजी माध्यम
स्कूल में जाने वाले बच्चे से यह जानना चाहा कि उसे अंग्रेजी माध्यम में पढने का
क्या फ़ायदा नज़र आता है तो उसका सीधा और सपाट जबाब था - “अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने से इंग्लिश बोलना आ जाता है।” अनुसंधानकर्ता ने जब आगे जानना चाहा कि इंग्लिश
बोलने से क्या फायदा होता है तो उसका तपाक-से जबाब था, “आगे जॉब मिलने में आसानी होती है। इंग्लिश
बोलने वाले ही अच्छी जॉब ले पाएँगे और आगे डी.यू. के कॉलेज में पढ़ पाएँगे।”
इसका तात्पर्य
है बच्चे ‘वर्तमान
में ज्ञान-प्राप्ति’ के लिए नहीं, अपितु ‘भविष्य में नौकरी की चिंता के बोझ’ के चलते
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की ओर जा रहे हैं! घर-गाँव की वर्तमान वास्तविकताओं से दूर
स्थापित अंग्रेजी माध्यम स्कूल में! पर जब जानना चाहा कि वे विभिन्न विषयों को कितना समझ पाते हैं तो उनके
जबाब नदारद थे।
गाँव भिडूकी के एक ग्रामीण ने अपने गाँव के एक बच्चे
से जानना चाहा कि पक्षी कैसे उड़ते हैं, खेत में चना गेहूँ से पहले बोना चाहिए या बाद में, आदि आदि। वह बच्चा उस
ग्रामीण व्यक्ति के मित्र का था तथा वह गाँव से 20 किमी दूर पलवल शहर के किसी
प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ने जाता था। ग्रामीण ने बताया उसका तपाक
से जबाब आया, “ ताऊ! मैं अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढूँ हूँ। मेरे ती जो बुझणा
है अंग्रेजी में बुझ। मेरी किताब से बुझ। यो फालतू की बातें हमें ना पढ़ावी जावें।
हम तो जो किताब में लिखा है बस वही याद करे हैं।” उस ग्रामीण ने हँसते-हँसते
बताया। आगे वह जोड़ते हुए बोला, “भाई! यो है! अंग्रेजी मीडियम की पढ़ाई। ” अतः स्पष्ट होता है अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था में बच्चे
व्यावहारिक ज्ञान को ‘बाई-पास’ करके / एक तरफ़ छोड़ कर, मात्र किताबी ज्ञान ही हासिल कर रहे हैं।
आरूणी को
अंग्रेजी माध्यम शिक्षण समझ में नहीं आता, वह और उसके साथी सिर्फ़ रट कर ही काम चलाते
हैं। उसे लगता है कि यदि उसे उसकी भाषा - हिंदी में विज्ञान आदि विषय पढ़ाए जाते
तो पढ़ना कुछ आसान होता और आनंन्दायक भी। ऐसी अवस्था में उसे गाईडों से रटने की
नौबत ना आती। पर खुद से जब-जब हिन्दी माध्यम की पुस्तकों को पढ़ने का प्रयास करती
है, उसे हिन्दी के टर्म ही समझ नहीं आते हैं। आरूणी का कहना है कि उसे कक्षा टेस्ट
में जो दस में से दस अंक मिले हैं, वे ‘रट्टे’ के ही हैं, वे अंक ‘समझ’ के नहीं हैं। उसने बिना समझे बस रट कर लिख दिया। बोर्ड में जब यही प्रश्न
घुमा के पूछ लिया जाएगा तो वह खुद से नहीं लिख पाएगी। तब उसे अपनी विज्ञान की
अध्यापिका से उस प्रश्न का तात्पर्य पूछना पड़ेगा। पर वह उसके बावजूद भी उसी
अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ना चाहती है क्योकि अंग्रेजी माध्यम स्कूल सामाजिक
प्रतिष्ठता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। उसके अनुसार, “चाहे आगे अच्छी यूनिवर्सिटी
में पढ़ना हो या जॉब करनी हो, हर जगह इंग्लिश ही चाहिए।” अपने भैया के कहने पर वह इंग्लिश ‘मूवी’ भी देखती है क्योकि इससे भी
‘लेंग्वेज इम्प्रूव’ होती है। पर जब अपने पंजाबी दोस्तों के यहाँ जाती है तो वह
वहाँ उनके दादा-दादी को पंजाबी भाषा में बोलते सुन कर भी अनसुना कर देती है। जहाँ
उसकी ललक परिवेश के बाहर की बोली को अपनाने की है, वहीं परिवेश में आयी एक नयी
भाषा को वह नज़र-अंदाज़ कर देती है। वह पंजाबी भाषा को समझने की चेष्टा तक नहीं
करती क्योकि पंजाबी ना तो यूनिवर्सिटी और ना ही जॉब में सहायक है।
अब
अनुसंधानकर्ता आपसे पूछना चाहेगा कि यहाँ शिक्षा को लेकर किस प्रकार के मूल्य पैदा
हो रहे हैं? समझ में नहीं आ रहा है तो बस रटते जाओ। पर भविष्य सुनिश्चित करना है
तो डटो अंग्रेजियत के अखाड़े में। अपने आस-पड़ोस में देशी भाषाएँ बोलते लोगों की
बातें मत सुनो, पर ‘लेंग्वेज इम्प्रूव’ करने के लिए देखो ‘विदेशी इंग्लिश मूवी’। अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा व्यवस्था बिना ‘समझ’ के ज्ञान को हासिल करने की कैसी
व्यवस्था पैदा कर रही है? क्या इसे हम ‘वैज्ञानिक चिंतन’ पैदा करने वाली शिक्षा कह सकते हैं?
इसी प्रकार
अन्य मामलों में भी देखिए -
साँस्कृतिक
कार्यक्रम के लिए प्राचार्य कहती हैं, “हिंदी की मात्रा थोड़ी कम रखना।”
विद्यार्थियों
ने स्कूल का शिक्षण सिद्धांत बताया, “रट कर याद करो, परीक्षा में लिखो, अगली
क्लास में पहुँचो। ”
ऊपर जो घटनाक्रम दर्शाए गए हैं वे शिक्षा
संबंधी निम्नलिखित दृष्टिकोण पैदा करते हैं -
उतना ही
पढो जितना परीक्षा में पूछा जाये।
समाज में
प्रचलित भ्रम के अनुसार ‘अहर्ता’ ही शिक्षा है और ‘अंक’ योग्यता का
पैमाना।
इसलिए रटो, याद करके
परीक्षा में लिखो, अंक लो,
अगली क्लास में पहुँचो और पिछला भूल जाओ!
स्कूली
पढाई अभिव्यक्त नहीं की जा सकती क्योंकि स्कूल में वो भाषा (अंग्रेजी) होती है जो
स्कूल के बाहर सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश में होती ही नहीं।
अंकों की
दौड़ में गहन,
विचारशील, सृजनशील, खोजी प्रवृति वाले विद्यार्थी, ‘स्मार्ट’ और
तथाकथित ऊपर वर्णित लक्ष्य केन्द्रित विद्यार्थियों से काफी पीछे छूट जाते
हैं।
यह भ्रम विद्यार्थी ही नहीं, माता-पिता
की सोच का दायरा भी सीमित करता है। विद्यार्थी प्राकृतिक, साँस्कृतिक, सामाजिक सन्दर्भों को देखे बिना, सिर्फ़ उतना ही अध्ययन करता है, जितना ‘अहर्ता’ हासिल करने के लिए आवश्यक होता
है। यह सोच,
रटने की प्रकृति को ही बल देती है। शिक्षा को पाठ्यक्रम की सीमा में ही बाँध कर
छोड़ देती है।
इस मुद्दे का निष्कर्ष एक अध्यापक द्वारा
व्यक्त किए गए अनुभव के साथ निकाला जा सकता है। अध्यापक के शब्दों में -
“इंग्लिश ढंग से नहीं आती इसलिए विद्यार्थी
बाकी के सब्जेक्ट जैसे साइंस, सोशल साइंस यहा तक की मैथ भी रटते हैं। इन विषयों में
इंग्लिश का इस्तेमाल बिना सर पाँव के करते हैं। ना इन विषयों को समझ पाते है ना
इंग्लिश को। इन विषयों को पढ़ने के दौरान जो इंग्लिश के प्रति समझ बनती है, वो आगे
जाकर उनकी इंग्लिश को भी प्रभावित करती है। इसलिए इंग्लिश भी बिना सर पाँव के
लिखता और बोलता है। ग्रामर के नियम का तो इतनी बुरी तरह प्रयोग करते हैं कि बस
पूछो मत! अंग्रेजी माध्यम एजुकेशन कल्चर, बाकी सभी विषयों की समझ के लिए ही नहीं, स्वयं
इंग्लिश के लिए भी घातक है।”
अनुसंधानकर्ता
ने अपने एकल अध्ययनों के दौरान पाया कि विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम कि वजह से ही
रचनात्मक रूप से सीख नहीं पा रहे हैं तथा सिर्फ़ रटते हुए एक कक्षा से दूसरी कक्षा
की तरफ़ गमन कर रहे हैं। यह बात विद्यार्थी, माता-पिता, शिक्षक तथा प्राचार्य से मिले साक्ष्यों के
आधार पर की जा रही है कि विद्यार्थियों की शिक्षा, महज़ किताबी है और अंग्रेजी में लिखी
पुस्तकों के गूढ़ रहस्य को समझने के चक्कर में वह सामाजिक जीवन से भी कटता जा रहा
है। स्वतंत्र रूप से पढ़ने की रूचि तो समाप्त ही समझो। वह अपनी उर्जा तथा जीवन अवधि
का एक मूल्यवान समय सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा को सीखने में गँवा देते हैं और उसके बाद
भी वे पढ़ाए जाने वाले विषयों को समझ ही नहीं पाते।
जैस कि अनुसंधानकर्ता ने दूसरे साँस्कृतिक परिवेश में जाकर भाषा सीखने
वालों पर भी प्रयोग किया और पाया कि दूसरे साँस्कृतिक परिवेश में जा कर भाषा सीखना
उतना कष्टकर नहीं है। दूसरे साँस्कृतिक परिवेश में भाषा सीखने में उतना ही वक्त
लगता है, जितना कोई बच्चा एक-दो शब्द बोलने से पूरे-पूरे वाक्य बोलना प्रारम्भ करने
में लेता है। ये इसलिए आसान होता है क्योंकि आप साँस्कृतिक सन्दर्भों के साथ उसे
लेते हैं और जैसे-जैसे आप नई संस्कृति में रमते जाते हैं, वैसे-वैसे
भाषा आपके अन्दर बसती जाती है।
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