अंग्रेजी माध्यम का एक विद्यार्थी की समझने की क्षमता पर पड़े प्रभाव का एकल अध्ययन संख्या-2

 आरुणी ने दो वर्ष पूर्व कुछ ऐसा कदम उठाया था कि यदि सही समय पर उसे डॉक्टरी सहायता न प्रदान की जाती तो वह आज अखबारों में छपी खबर भर बनकर रह जाती।  एक ऐसा विषय, जिसके घट जाने के बाद ही कुछ संवेदनशील समझे जाने वाले लोग अखबार और पत्रिकाओं में कुछ गम्भीर लेख लिखते हैं, समाजिक रूप से सक्रिय लोग कुछ दिन मोमबत्तियाँ जला कर इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर बैठते हैं.... और फिर जैसा चलन है, समय के साथ इस घटना को भी भुला दिया जाता और फिर मीडिया नयी घटना के साथ नए ख़बर का इंतजार करती। यह घटना है सुसाईड अर्थात् आत्महत्या का प्रयास। किशोर अवस्था में जब उसकी उम्र के बच्चे सुनहरे भविष्य के सपने गढ़ते हैं, उस अवस्था में परिवारिक उलझनों के बीच इस चौदह वर्ष की बच्ची को अपना भविष्य इतना अनिश्चित नज़र आया कि उस अवस्था में उसने जीवन से हार मान कर आत्महत्या का रस्ता चुना। हाँ! एक रोज उसने नींद की गोलियों का एक पत्ता एक साथ हलक से उतार लिया। यथोचित् कदम उठा लेने से उसका यह प्रयास सफल नहीं हो सका और इस प्रकार यह घटना सुर्ख़ियों में आते आते रह गयी। ओह! पता नहीं कितनी कैंडल जंतर-मंतर पर जलने से रह गयी। आह! मज़हब, जाति और क्षेत्र के नाम पर दूकान लगाने वालों की बिक्री होते-होते रह गयी। पर आरुणी ने ही नहीं उसके उम्र के अनेकों बच्चों ने मान लिया है कि अंग्रेजी नहीं आती तो उनका कोई भविष्य शेष नहीं बचता है। पर उसका यह कदम मुझ शोधकर्ता को उसकी केस स्टडी के रूप में चुनने के लिये विवश करता है। 

आरुणी की समस्या को समझने के लिये शोधकर्ता ने बच्चे के परिवेश का अवलोकन किया, उस घटना को न कुरेदते हुए उसके घर के लोगों से विस्तृत बातचीत के माध्यम से उसके सम्पूर्ण समाजिक साँस्कृतिक एवं परिवारिक परिवेश से पैदा होने वाले दबाव को पता लगाने का प्रयास किया। 

अनुसंधानकर्ता आरुणी के एकल अध्ययन हेतु निम्न सोपानों का प्रयोग करेगा -

आरुणी के सम्पूर्ण समाजिक साँस्कृतिक परिवेश में जानकारी,

आरुणी के माता-पिता से उनके परिवार की सामाजिक, आर्थिक स्थिति की जानकारी,

आरुणी की पढाई सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन तथा शिक्षा के माध्यम को लेकर बने दृष्टिकोण पर साक्षात्कार,

आरुणी के पिता का अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल के चयन पर साक्षात्कार।

आरुणी के सम्पूर्ण सामाजिक-सांस्कृति-परिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन -

आरुणी के पिता बिहार राज्य के डेहरी-ओन-सोन कसबे के निवासी हैं। आरुणी के दादाजी उसी शहर में स्थित बिहार सरकार के एक महकमे में प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत अधिकारी थे। कस्बे भर में उनका सम्मान था। आरुणी के परिवार की गिनती उस के प्रतिष्ठित परिवारों में होती थी। घर में कभी किसी वस्तु की कमी नहीं रही। आरुणी के नाना भी अपने इलाके के एक प्रतिष्ठित संस्कृत अध्यापक थे, पर पिछले कुछ सालों में कुछ ऐसा घटा कि यह परिवार अब फरिदाबाद में बेगानों की भान्ति बसर कर रहा है। खुद आरुणी की माँ के अनुसार, “हमारा सबसे बड़ा दुख यह है कि यहाँ हमारे बच्चों के कोई दोस्त ही नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि परिवार परिवर्तित परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने में कहीं-न-कहीं असफल रहा है।

घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है कि पिता नीरज कुमार की स्कूली शिक्षा बिहार में ही हई थी। पिता स्थानांतरणीय सेवा में होने की वजह से प्राथमिक शिक्षा का स्थान परिवर्तित होता रहा पर उसके बाद की शिक्षा स्थाई तौर पर डेहरी शहर में ही हुई। घर में शुरू से पठनपाठन  का माहौल था। परन्तु अंग्रेजी के प्रति अंध-अनुराग नहीं था। आरुणी के पिता की खुद की प्रारंभिक शिक्षा क्षेत्रीय भाषा माध्यम से ही हुई। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढने के बावज़ूद भी उनकी मुख्य रुचि हिन्दी साहित्य के प्रति ही रही। इतिहास के विद्यार्थी होने के बावज़ूद हिन्दी साहित्य का शायद ही कोई दिग्गज साहित्यकार हो जिसकी रचनाओं से वे परिचित ना रहे हों। कॉलेज के दिनों में ही वे साहित्य, दर्शन, इतिहास आदि पर छपी मूल पुस्तकों को पढ़ चुके थे। उनके पढ़ने की लगनशीलता को देख दिल्ली स्थित जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में दाखिले का साक्षात्कार लेने वाले प्रोफेसर भी काफी प्रभावित हुए। वे जब एम‌.ए. में दाखिला लेने के लिए आए उम्मीदवारों से उम्मीद कर रहे थे कि वे इतिहास विषय पर छपी कुछ मूल पुस्तकों के नाम भर बता दें। नीरज कुमार आलोचनात्मक विवेचन करने की स्थिति में थे। पठन-पाठन का यह क्रम एम.ए. के दौरान भी जारी रहा। फलस्वरूप उन्होंने गोल्ड मैडल के साथ एम.ए. इतिहास की परीक्षा उत्तीर्ण की। कुछ समय इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च में रिसर्च फ़ैलोशिप  करने के बाद वापस अपने गृह नगर चले गये। वहीं से उन्होंने पत्रिका भी निकाली, साथ ही, एक छोटे स्तर का स्कूल भी चलाया। उनकी प्राथमिकता यह भी थी कि अपने गृह क्षेत्र में रह कर कार्य करें। पर यह सब कुछ लम्बे अन्तराल तक नहीं चल सका। पिता की बीमारी ने उन्हें इस कदर उलझाया कि वे पिता की मृत्यु के समय सब जमा पूँजी गवाँ चुके थे। इस उलझन में धीरे-धीरे स्कूल भी बन्द हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी। अनिश्चितता के माहौल में पत्नी का दबदबा भी बढ़ता जा रहा था। चूँकि पत्नी की बहन के बच्चे पटना के प्रतिष्ठित क्रिश्चियन स्कूल में पढते थे अतः आरुणी की माँ की भी यह जिद थी कि आरुणी और उसकी बड़ी बहन को भी डेहरी के प्रतिष्ठित क्रिश्चन स्कूल में ही दाखिला करवाया जाए। व्यक्तिगत रूप से मातृभाषा को शिक्षा का बेहतर माध्यम मानने वाले नीरज कुमार, जो शुरू से अंग्रेजी माध्‍यमस्कूल में दाखिले का विरोध कर रहे थे, अंततः उन्होंने पत्नी को अपनी मौन सहमति अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल के लिए प्रदान कर दी। इस मौन सहमति के पीछे उनके दूसरे दिल्ली प्रवास के अनुभव थे। उन अनुभवों का वर्णन हम आगे पढ़ेंगे।

पिता की मृत्यु के पश्चात् घर में आजीविका के स्रोत के रूप में पिता की पैंशन के नाम पर उनकी माँ को प्राप्त होने वाली आय ही शेष बच गई थी। परिणामस्वरूप आजीविका का संकट पैदा हो गया था। चूँकि डेहरी-ओन-सोन जैसी छोटी सी जगह पर आजीविका के अधिक स्रोत उपलब्ध नहीं थे। इसलिये अब नीरज कुमार को दूसरी बार महानगर की तरफ़ पलायन करना पड़ा। उनके शब्दों में एक बार मुझे फिर से अंग्रेजी नहीं, अंग्रेज़ियत से रूबरु होना पड़ा। हाँ, जामिया के दिनों में इस अंग्रेज़ियत के भूतों से सामना हुआ था, पर उस वक्त हमारे विषय की पकड़ के सामने कोई टिक नहीं पाता था। सभी अंग्रेजी वाले हमारे सामने पानी भरते थे। अंग्रेजी में सीमित मात्रा में पढ़ने वाले ये लोग हमारे आगे क्या टिकेंगे? पर अब तो हर जगह वही थे। असल समस्या अंग्रेजी की नहीं, अंग्रेज़ियत की थी। जो क्षेत्रीयता के साथ मिल कर और भी घृणित हो गई थी। हमने जामिया के दौरान भी अंग्रेजी भाषा में काफ़ी साहित्य पढ़ा था। पर यहाँ समस्या भाषा की पकड़ की नहीं, अंग्रेज़ियत के विशेष लहजे की थी। गलत बोलो पर उस लहजे में बोलो। तब ही आप स्वीकारे जाने योग्य हो।आजीविका की तलाश के दौरान कई बार उन्हें शर्मसार होना पड़ा। स्कूल में गए तो जबाब मिला आपकी विषय पर पकड़ तो अच्छी है पर आप जिस लहजे में बोलते हैं उस लहजे में बोल कर हमारे बच्चों (विद्यार्थियों ) के सामने टिक नहीं पाओगे। यही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी हुआ। नीरज के अनुसार, “दिक्कत की एक वज़ह मान्य डिग्री का अभाव भी हो सकती है। पर असल तो घाघ की तरह बैठे अंग्रेजियत की मानसिकता वाले लोग ही थे।

आजीविका की तलाश तथा रुझान के अनुरूप कार्य करने की इच्छा उन्हें अंततः फरीदाबाद ले आई और उनकी आजीविका की खोज दिल्ली के पास स्थित फरीदाबाद में पूरी हुई। उन्होंने यहाँ एक छोटे स्तर के दैनिक अखबार के सह-सम्पादक के रूप में काम करना शुरू किया। बीच में एक वर्ष के लिये राजस्थान से निकलने वाले राष्ट्रीय स्तर के दैनिक अखबार में भी कार्य किया। पर स्वास्थ्य की समस्या की वजह से वे वहाँ लम्बे अन्तराल तक टिक नहीं पाए और उन्हें वापस फरीदाबाद के छोटे अखबार से जुड़ना पड़ा। पर इस बीच जो सबसे बडा परिवर्तन हुआ, वह यह कि फरीदाबाद का दैनिक अखबार दैनिक से पाक्षिक हो गया। अखबार की अपनी आय प्रभावित हुई तो उसके कर्मचारी के रूप में नीरज कुमार की आय भी प्रभावित हुई। दूसरी बार जुड़ते वक्त 2004 में जो तनख्वाह (8000 हजार रु.) तय हुई, 2012 तक वही बनी रही। कभी अपनी पॉकेटमनी से मनचाही पुस्तक खरीदने वाले नीरज को एक-एक रुपये के लिये मोहताज़ होना पड़ा। आर्थिक अभाव कई तरह की नई समस्याओं को जन्म देता है। और यही उनके साथ भी हुआ। वे पाइल्स एवं अनिद्रा रोग के शिकार हो गये। इस बीच उनका परिवार भी बिहार के डेहरी ओन सोन से फरीदाबाद आ गया। आर्थिक रूप से सम्पन परिवार को एक-एक पाई के लिये मोहताज होना पड़ा। आरुणी की माँ जो खुद संस्‍कृत से बी.ए. पास थी, को भी दो-ढाई हजार में एक निजी क्लिनिक में अटेन्डेण्‍ट के रूप में काम करना पड़ा। बड़ी बहन ने भी परिस्थितियों के अनुरूप बी.सी.ए. करने के साथ पहले गैर-मान्यता प्राप्त निजी विद्यालय में पढ़ाया तथा बाद में प्राईवेट फैक्टरी में भी कुछ दिन काम किया। पिता को अख़बार के दफ्तर का काम सम्पादन तक ही सीमित नहीं था अपितु इसके अतिरिक्त भी बहुत-से काम ऐसे करने पड़ते थे, जो अमुमन दूसरे दफ्तरों में छोटे दर्जे के कर्मचारी ही करते हैं। पिता को अखबार का बंडल सिर पर लाते देख कर आरुणी को काफ़ी तकलीफ़ होती। स्कूल में भी एक रोज अध्यापिका कह रही थी हिन्दी वालों का कोई भविष्य नहीं है।उस वक्त उसे भी लगता यदि उसके पापा भी अंग्रेजी माध्यम के पढ़े होते तो उन लोगों को तंगहाली में जीना न पड़ता।

एक ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति में जहाँ बच्चों को डेहरी के प्रतिष्ठित क्रिश्चन स्‍कूल में पढ़ते थे। वहीं अब उन्हें सरकारी विद्यालय में दाखिला कराने के बारे में सोचा जाने लगा। पर बच्चों ने तथा उनकी माँ ने इसे प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ मुद्दा बना दिया। तब पिता नीरज ने अपने अखब़ार के प्रकाशक (मालिक) के सहयोग से मध्य स्तर के एक स्‍कूल में दाखिला करवा दिया। वहाँ की फ़ीस का कुछ अंश भी अखबार के मालिक के प्रभाव से कम हो गया। पर स्‍कूल में होने वाले बाकी के फिजूलखर्च का तो कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता और उन फ़िज़ूलखर्चों को पूरा न करने की स्थिति में होने वाला बच्चे का अपमान। वह अपमान कैसे होगा, कैसा होगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।स्कूल में आये दिन के फ़िज़ूलखर्च और खर्च न कर पाने की स्थिति में होने वाले अपमान से आरुणी हीन-भावना का शिकार हो गयी। घर से उसको अपने दूसरे दोस्तों की तरह खर्च करने के लिए पॉकेट मनी भी नहीं मिलती थी।

धीरे-धीरे आरुणी के दिमाग में यह धारणा बैठ गई कि उसके पिता अपनी आय से उसे नहीं पढ़ा सकते। झूठ पर आधारित प्रतिष्ठा और वह प्रतिष्ठा भी जब खोती हुई नज़र आयी तो उसे अपना जीवन ही निरर्थक नज़र आया। माता-पिता में घर परिवार की स्थिति को लेकर खींचतान आम बात हो गयी थी। इस रोज-रोज की खींचतान का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों पर ही पड़ रहा था। इस दिन प्रतिदिन की खींचतान से तंग आकर, एक रोज आरुणी ने आवेग में आकर पिता की नींद की गोलियों का पत्ता एक साथ गटकने का कदम उठाया, अर्थात् आत्महत्या का प्रयास किया।

प्रस्तुत है आरुणी के साक्षात्कार के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु-

आरुणी से उसके घर पर ही बातचीत की गई। यह बातचीत निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित थी -

स्कूल में चलने वाली पठनपाठन क्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त करना।

स्कूल की गतिविधियों और घर की गतिविधियों में तालमेल।

उन कारकों का पता लगाना जो उसे अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों में पढने हेतु प्रेरित करते हैं।

उसके दोस्तों, भाई-बहनों के बारे में जो उसके अनुभव हैं।

 

नोट आरुणी द्वारा किए गए आत्महत्या के प्रयास के लगभग 2 वर्ष बाद यह साक्षात्‍कार लिया गया है। इस बीच सबसे बड़ी तब्दील तो उसके परिवार में  यह आई है कि उसके पिता को एक प्रतिष्ठित अखबार में रोजगार मिल गया  है। माँ ने भी कम आय वाली कंपाउंडर की नौकरी छोड़ कर थोड़ी बेहतर नौकरी कर ली है। आरुणी का दाखिला भी पहले से बेहतर स्तर के अंग्रेजी माध्‍यम स्कूल में हो गया है। अब अपने दोस्तों की तरह वह भी पॉकेट मनी प्राप्त प्राप्त करती है। इस दौरान घर की आय में भी कई गुणा बढ़ोतरी हुई है।

प्रस्तुत है आरुणी के साक्षात्कार के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु-

शिक्षण अधिगम क्रिया को लेकर पूछे गये प्रश्नों के जबाब के मुख्य बिन्दु :-

हमारे स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने हेतु माध्यम अंग्रेजी ही है। पर टीचर हमें पढ़ाते वक्त हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग करता है। टीचर पहले अंग्रेजी में बता देते  हैं उसी को यदि कोई बच्चा कहता है तो उसे हिंदी में भी बता देते हैं।

टैक्स्ट बुक (पाठ्य पुस्तक) का प्रयोग कम ही करते हैं, सिर्फ़ पढ़ने के लिए, अर्थात्  बुक रीडिंग। लिखवाया मुख्यतः गाइड से ही जाता है। गाइड में जो  लिखा होता वही उतरवा दिया जाता है।

घरेलू  गतिविधियों को शामिल करना तो दूर वे सिर्फ़ वही उदाहरण लेते हैं जो किताब में लिखे होते हैं। कभी-कभी यदि किसी और गाइड में कोई नया प्रश्न अलग-सा दिख जाता है तो उसे भी लिखवा देते हैं।

आठवीं तक तो काम चल जाता था। चाहे हमारा डेहरी वाला स्कूल हो या फरीदाबाद वाला, दोनों जगह जो शिक्षक क्लास में प्रश्न उत्तर लिखवाते थे, उन्हीं में से प्रश्न पूछ लेते थे। इसलिए हमें किसी प्रकार की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता था। पर अब नवीं क्लास में क्या करें? पेपर तो सीबीएसई से आता है। अब सीबीएसई  में जो प्रश्न पूछे जाएँगे वो जरुरी नहीं कि वे वही हो जो हमें क्लास में लिखवाये गए थे। चूँकि हमने भी प्रश्न को रटा ही होता है अतः यदि  थोडा भी घुमा फिरा के प्रश्न पूछ लें तो समस्या आन पड़ती है।

समझा होता तो कैसे भी लिख देते पर चूँकि रटा होता है इसलिए यदि थोड़ा घुमा के पूछ लें तो हम लिख नहीं पाते।

यदि हिंदी में, मतलब हमारी भाषा में होता तो हम अपने मन से भी लिख लेते पर चूँकि अंग्रेजी में है अतः किताब से पढ़ कर ही लिख पाते हैं। अंग्रेजी में रटना  ही पड़ता है अतः हम अपने मन से बना के नहीं लिख सकते।

हिंदी में तो आ रहा होता है पर उसकी अंग्रेजी ना आने की वजह से कई बार लिख नहीं पाते।”

समझ में अंग्रेजी बाधा बन के आ रही है। टोटली अंग्रेजी हमें पूरी तरह समझ नहीं आता और उसमें हिंदी में भी दिक्कत आती है। मिक्स करके पढ़ाने में ज्यादा समझ में आता है।


अंग्रेजी माध्‍यम स्कूलों में पढ़ने हेतु प्रेरित करने वाले कारकों के जबाब :-

अच्छे से पर्सनालिटी इम्प्रूव होना, लोगों से बात करना, सीबीएसई वालो को आसानी से जॉब मिल जाती है।

अंग्रेजी जानने वालों को आसानी से जॉब मिलती है।

सुनने में आता है कि अच्छी यूनिवर्सिटी में सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पढाई होती है।

अच्छी यूनिवर्सिटी जैसे- आई.आई.टी., बी.आई.टी., मानव रचना यूनिवर्सिटी, दिल्ली विश्‍वविद्यालय। इन सब में अंग्रेजी में पढाई होती है। आते-जाते ऐसा सुनने में आ जाता है।

आई.आई.टी., बी.आई.टी. के बारे में हमारे अम्बुज भैया ने बताया। मानव रचना यूनिवर्सिटी में निशु दीदी की दोस्‍त पढ़ती है। हमारे स्कूल के दोस्तों के भाई बहन भी इस स्कूल में पढ़ते हैं। नीचे वाली दीदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम.एस.सी. किया है। वो भी बताती हैं कि सभी अच्छी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी माध्यम से पढाई होती है।

अच्छी यूनिवर्सिटी में टीचर सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पढाते हैं। यूनिवर्सिटी में सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पढ़ाना पड़ता है।

नेहरू कॉलेज (कमतर माना जाने वाला फरीदाबाद, हरियाणा का कॉलेज) में पढाई हिंदी माध्यम से होती है। पर वहाँ ज्यादातर बच्चे गाँव के होते हैं। पर वहाँ का पढ़ाई का स्तर ज्यादा अच्छा नहीं है।

अंग्रेजी में पढ़ने पर ज्यादा इम्पॉर्टेंस मिलती है।

अंग्रेजी स्कूल में सीखी, घर परिवार तथा आस-पड़ोस के लोगों से हिंदी-भोजपुरी में ही बात होती है।

यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अंग्रेजी में पढ़ाते हैं तथा वहाँ पढ़ने वाले बच्चे अंग्रेजी में बातचीत करते हैं।

यूनिवर्सिटी में पढने वाले बच्चे अच्छे घरों से ही आते हैं। गाँव में पढ़ने वाले बच्चे यूनिवर्सिटी में नहीं आते।

सरकारी स्कूल के बच्चे हिंदी में बात करते हैं। गाँव वाले भी गाँव की हिंदी में बोलते हैं पर यूनिवर्सिटी में सभी अंग्रेजी में ही बोलते हैं। यदि यूनिवर्सिटी में छोटी फॅमिली के बच्चे जाते भी हैं तो उन्हें अंग्रेजी के साथ मैनेज करना पड़ता है।

स्कूल में प्रार्थना में बारी-बारी से हिंदी और अंग्रेजी का प्रयोग होता है। पर हम ग्रामीण हरियाणवी बोली में प्रार्थना नहीं  कर पाते।

पापा कहते हैं कि अंग्रेजी का प्रयोग करो।

अम्बुज भैया! कहते हैं अंग्रेजी मूवी देखो, अंग्रेजी मूवी देखोगे तो फायदा होगा। हिंदी मूवी देखने का कोई फायदा नहीं होगा।

स्कूल की गतिविधियों में हिंदी का प्रयोग कम होता है। हिंदी को हिंदी दिवस वाले दिन महत्व दिया गया था। उस दिन हिंदी टीचर को भी महत्व दिया गया था।

पर क्विज़ आदि सब अंग्रेजी में ही होता है। स्पीच आदि बच्चे इन्टरनेट से डाउनलोड कर बस में याद करते हैं और सुना देते हैं।”

स्कूल में यदि कोई बच्चा फीस नहीं देता तो उसे स्कूल में आने नहीं दिया जाता।”

पर जो फीस नहीं देता तो उसके लिए सरकारी स्कूल ही एकमात्र चारा है।

अंग्रेजी माध्‍यम की अच्छी शिक्षा के लिए पैसा होना जरुरी है।

हमारे स्कूल की एक लड़की है जो कम आय वाले परिवार से है। वह गैट-टुगैदर के लिए पैसा खर्च नहीं कर पाती। इसलिए कोई उसे महत्व नहीं देता।

गाँव से आने वाले बच्चे हरियाणवीगुजरी बोली बोलते हैं। स्कूल में जैसा मन में आता है वे वैसा बोलते हैं। टीचर हरियाणवीगुजरी बोलने पर डाटते हैं। लेकिन फिर थोड़ी देर में वैसे ही बोलना प्रारम्भ कर देते हैं।

पिता नीरज कुमार से इस बारे में चर्चा किये जाने पर उनके जबाब इस प्रकार से थे:-

शोधकर्ता - आपने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नहीं डाला? आर्थिक स्थिति खराब होने पर भी निम्न दर्जे का प्राइवेट स्कूल ही क्यों चुना?”

नीरज कुमार-  “इसलिए क्योंकि सरकारी स्कूलों की दुर्दशा से मैं भली-भाँति वाकिफ हूँ। सरकारी स्कूलों से तो वह घटिया निजी स्कूल भी बढिया ही है।

शोधकर्ता -उतने ही खर्च पर हिंदी मीडियम में कहीं अधिक बेहतर प्राइवेट ट्रस्ट के स्कूल भी तो है। आप उसमें डाल सकते थे। निम्न दर्जे के प्राइवेट स्कूल में तो शिक्षक भी क्वालिफाइड नहीं होते।

नीरज कुमार-हां, मूल कारण यही है। सरकारी स्कूलों का माहौल बहुत-ही खराब है। वहाँ अपनी बच्चियों को भेजने से उनके व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ सकता था। वैसे, निजी स्कूलों के माहौल को भी मैं बढ़िया नहीं मानता, पर सरकारी स्कूलों से वह बेहतर तो है ही। आपके दूसरे सवाल पर कहना यह है कि नजदीक होने के कारण मैंने वहाँ एडमिशन कराया। जहाँ तक उतनी ही फीस में अच्छे स्कूलों की बात है, मुझे इसमें संदेह है। यह बच्चे पर निर्भर करता है कि वह पढ़ाई के प्रति कितना जागरूक है। स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा पर मेरा भरोसा नहीं।

शोधकर्ता -निजी हिंदी मीडियम के स्कूल भी उतने ही पास में हैं, यह आप अच्छी तरह से जानते हैं।

नीरज कुमार -अरे, हिदी-अंग्रेजी मीडियम ढकोसला है। हर जगह पढ़ाई हिंदी में ही होती है।

शोधकर्ता - पर फिर अपने बच्चों पर किताबों का बोझ क्यों डाला जाए? बच्चे अंग्रेजी में ही क्यों रटें? पढाई हिंदी में होती है तो परीक्षा भी हिंदी में क्यों नहीं?”

नीरज कुमार-  “नहीं, यह सिस्टम है। एक आदमी चाह कर भी इस सिस्टम के खिलाफ कैसे जाए। और क्या हिंदी के माध्यम से उच्च शिक्षा पाना संभव है। हिन्दीं में तो किताबें ही नहीं हैं। हिंदी साहित्य और भाषा का उच्च अध्ययन करने के लिए भी अंग्रेजी की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। हम अपनी भाषा को विकसित नहीं कर पाए। यह सिस्टम का दोष है। चीन और जापान में वहाँ की भाषा में ही पढ़ाई होती है और तकनीक एवं सभी क्षेत्रों में उनका कोई मुकाबला नहीं। पर भारत में हम मानसिक गुलामी की अवस्था से गुजरते रहे हैं।

हाँ, ये सही बात है। हिंदी में इतना काम नहीं हुआ कि इसके सहारे किसी भी विषय में उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त की जा सके। यह एक पिछड़ी हुई भाषा है। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। हम इन पर विस्तार से बाद में चर्चा करेंगे। मैं आपसे बाद में बात करूँगा। अभी जरा निकल रहा हूँ।

शोधकर्ता को जो जबाब चाहिए था वह मिल चुका था।

(नोट- नाम परिवर्तित है।)

निष्कर्ष-

·   आरुणी बोलचाल की भाषा में ही समझ पाती है। अंग्रेजी में तो वह रट ही सकती है।

·   स्कूल में गाइड से लिखवा दिया  जाता है और सभी बच्चे उसे उतार कर याद करते हैं।

·   पर फिर भी शिक्षा के लिए उसे अंग्रेजी माध्यम ही सही लगता है।

·   क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा और उच्च शिक्षा का रास्ता  अंग्रेजी के दरवाजे से ही गुजरता है।

·   आरुणी की माता जी के अनुसार इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिले के बाद आर्थिक दबाव बढ़ गया है। स्कूल की फीस के अतिरिक्त ट्यूशन का बोझ। भी बढ़ गया है।

·   पिता का भी मानना है कि हिन्दी या किसी भारतीय भाषा के सहारे आगे बढ़ा जा सके।

·   आरुणी को अपने पडोस में बोले जाने वाली पंजाबी बोली फिजूल लगती है। वही अंग्रेजी सीखने के लिए इंग्लिश मूवी भी देखती है।

·   विश्वविद्यालय स्तर पर सिर्फ़ अंग्रेजी में ही पढ़ाई होती है इसकी जानकारी उसे अपने एवं दोस्तों  के बड़े भाई-बहनों  से प्राप्त होती  है।

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