हिन्‍दी बनाम हिन्दुस्तानी – औरंगाबाद शहर की मिली-जुली हिन्दुस्तानी संस्कृति की जानने का प्रयास (मराठी + हिन्‍दी-उर्दू (हिन्दवी) = जन-हिन्दुस्तानी)

 महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में शेष भारत से प्रवास कर बसे परिवारों तथा उनके अड़ोस-पड़ोस के मराठी परिवारों से संपर्क के फलस्वरूप पैदा हुई मिलीजुली संस्कृति और भाषा को खोजने का प्रयास।

 (शहर में घूमने-फिरने के दौरान जो जानकारी मिली इसके अतिरिक्त मध्यमवर्गीय कॉलोनियों के मूल मराठी एवं प्रवासी निवासियों, स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और उनके माता-पिता, भाई-बहन, जन-सामान्य के साथ हुई बातचीत के माध्यम से जो कथानक व जानकारियाँ हासिल हुईं। आगे शोधकर्ता उसके कुछ मुख्य बिन्दुओं को विश्लेषणातमक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।)

 


औरंगाबाद में मूलतः रहने वाले लोग आपस में बात करते वक्त अक्‍सर गर्दन हिलाते हैं, लड़ाई के लिए दोनों हाथों की अँगुलियों को विशेष प्रकार से मिला कर संकेत-भाषा का भी प्रयोग करते हैं। इस तरह की संकेत-भाषा उत्तर भारत के लोग इस्तमाल नहीं करते।  यह बात बिहार-उत्‍तर प्रदेश से प्रव्रजन कर बसे लोगों की पहली पीढ़ी के बच्चों तथा बाल-अवस्था में ही प्रव्रजन कर बसे बच्चों के व्यवहार में भी देखने को मिलती है।  बड़ी उम्र में प्रव्रजन करने वाले लोगों पर इस प्रकार की संकेत-भाषा के प्रयोग का प्रभाव भी कुछ हद तक देखने को मिला।  वे सभी इस संकेत भाषा को अच्छी तरह समझते थे।

उत्तर भारत से आ कर बसे पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के बोलचाल में मराठी का प्रभाव अधिक दिखा। हिन्दी भाषी क्षेत्र कहलाने वाले महिलाओं में भी विश्वविद्यालय तक तथाकथित हिन्दी की शिक्षा ग्रहण करने वाली महिलाओं की अपेक्षा अल्पशिक्षित या अशिक्षित कहलाने वाली महिलाओं ने मराठी लोगों की भाषाई  संस्कृति को अच्छे से आत्मसात किया है।

एक महिला के अनुसार, मराठी और बिहारी लोगों के बीच प्रेम-भाव के साथ रोटीका संबंध कायम है। कहीं-कहीं बेटीका संबंध भी देखने को मिलता है। पर वह ज्यादातर लड़के-लड़की की अपनी आपसी पहल से शुरू होता है।इस प्रकार के संबंध नयी संस्कृति के सृजन के वाहक रहे हैं। “हम एक-दूसरे के रीतिरिवाजों में शामिल भी होते हैं और अपनाते भी जाते हैं।”

एक मराठी महिला जो मूलतः भुसावल (महाराष्ट्र) की ही रहने वाली है, उन्होंने बताया कि विवाह-पूर्व वे भुसावल जिले के गाँव में रहती थी। शादी के बाद शहर में आई। वह कभी स्कूल नहीं गई। उसने लोगों से बात करते-करते मराठी लहजे की हिन्‍दी/हिन्दुस्तानी अर्थात् आम बोलचाल की हिन्दी बोलना सीखा लिया। आज वह उत्तर और पूर्व भारत के लोगों से इसी हिन्दी में बातचीत करती है। वे भी उसकी हिन्दी (मराठी लहजे की) को समझते हैं तथा वह भी उनकी हिन्दी (उत्तर भारत एवं भोजपुरी लहजे की) को समझती है। “हम इसिच में बातचीत करते हैं, यदि कभी लड़ाई हो गयी तो बराबर ऐसेइच  गाली-गलौच भी कर लेते हैं। अपन को न तो प्रेम-भाव से बातचीत करने में कोई दिक्कत आता एच, न अपन को लड़ने में ही। बरोबर” पाठक समझ ले कि बॉलीवुड की फिल्मों में जिस भाषा को मुम्बई के भाई लोगों की भाषा के रूप में दिखाया जाता है, वह ही मराठीभाषी क्षेत्र की समान्य बोलचाल की भाषा है।  

महाराष्ट्र के बी.टेक. तक पढ़ चुके युवा ने बताया कि पूरे महाराष्ट्र की मराठी एक सामान नहीं है। महाराष्ट्र के बाहर के लोगों को लगता है कि पूरे महाराष्ट्र में एक समान मराठी बोली जाती है। पर हकीकत इससे परे है। महाराष्ट्र के चार खंड हैं और चारों खंडों में बोले जाने वाली मराठी अलग-अलग है। पर स्कूलों में पढाई जाने वाली मराठी और मराठी भाषा मे छपी शेष विषयों की पुस्तकों पर पुणे की शहरी मराठी का प्रभाव अधिक दिखता है। उन युवकों के अनुसार शायद इस का कारण यह रहा हो कि राज्य का टैक्स्ट बुक निगम पुणे में स्थित है।

महाराष्ट्र में सात वर्ष की उम्र में बिहार से आ कर बसी प्रियंका के अनुसार, “मैंने 12वीं तक की शिक्षा महाराष्ट्र हिंदी भवन से की, जहाँ शिक्षा का माध्यम हिंदी था।”  “स्कूल में मराठी तीसरी भाषा के रूप में पढ़ी परन्तु स्कूल के बाहर यह हमारी महाराष्ट्र में बसने के एक साल  के भीतर ही प्रथम भाषा हो गई थी। आगे कॉलेज में बी.ए. तथा एम.ए. की पढ़ाई मराठी माध्यम से ही की।” “आज हम (वह और उसके भाई बहन) मराठी भाषा को उसके संकेतों का प्रयोग करते हुए, उसी धाराप्रवाह के साथ बोल सकते हैं जिसमें एक आम मराठी आदमी बात करता है। जब तक हम खुद ना बताएँ, कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता कि हम महाराष्ट्र के बाहर के हैं।” “मराठी भाषा सीखने में लोगों का संपर्क अधिक कारगर रहा, बजाय स्कूल में पढ़ाई गई मराठी के। स्कूल में हम बेशक हिंदी की पुस्तकों से पढ़ते थे, पर स्कूल के बाहर या कक्षा के बाद और यहाँ तक कि कक्षा में भी मराठी में ही विचार-विमर्श करते थे।इस साक्षात्कार के इस संक्षिप्त वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि शिक्षा का माध्यम परिवेश उपलब्ध करता है, ना कि केवल स्कूल।

लेखक ने औरंगाबाद स्थित एक निजी अंग्रेजी माध्यम क्रिश्चन स्कूल का भी अवलोकन किया। इस स्कूल की स्थिति फरीदाबाद, पलवल, होडल के स्कूलों से इस प्रकार भिन्न है कि इसके पास एक ही स्कूल बस है जबकि फरीदाबाद के इलाकों के लगभग हर स्कूल के पास बसों का एक अच्छा खासा काफिला होता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि औरंगाबाद शहर के इस स्कूल में आस-पास के विद्यार्थी ही आते हैं, दूर-दराज़ के गाँवों से बसों में भर कर बच्चे लाने का चलन कम-से-कम इस स्कूल में नहीं दिखता है।

इंग्लिश माध्यम स्कूल में पढ़ने वाले प्रवासी एवं मूल मराठी  विद्यार्थियों के अनुसार, “स्कूल में  पढ़ाई इंग्लिश में होती है, टीचर थोड़ा-बहुत हिंदी का प्रयोग कर सकता है, पर मराठी पर प्रतिबंध है। प्रिंसिपल कहते हैं कि महाराष्ट्र के अन्दर ही मराठी का प्रयोग कर सकते हो, महाराष्ट्र के बाहर इस भाषा में काम नहीं चलेगा।” “स्कूल की असेम्बली में भी इंग्लिश और कभी-कभी हिंदी का प्रयोग होता है। मराठी का प्रयोग सिर्फ़ मराठी भाषा की कक्षा में ही कर सकते हैं।” “मिस (शिक्षिका) से बात करने के लिए इंग्लिश ही बोलते हैं।“स्कूल से घर आने के एक घंटे बाद हम लोग ट्यूशन जाते हैं। वहाँ के शिक्षक मराठी हिन्दी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं का प्रयोग करते हैं।” “इंग्लिश के टर्म’ (शब्दावली) और मराठी भाषा में उदाहरण, कहानी आदि।हमें इस तरत से अधिक समझ आता है। स्कूल में छह तथा ट्यूशन में तीन घंटे खर्च होते हैं। परीक्षा के दिनों में वहीं (ट्यूशन में) रात के 9 बजे तक अध्ययन करते हैं।” “खेलने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।  अवकाश के दिन ही खेलने को मिलता है।उनके माता-पिता  भी समझते हैं कि शिक्षा एक बौद्धिक काम है, इसका सम्बन्ध पुस्तकों से, प्रयोगशाला से है ना की घर की रसोई और खेल के मैदान से।

जब मराठी भाषा की अंग्रेजी भाषा के साथ अंतःक्रिया हुई तो उसने उस संस्कृति के अनुरूप उसका अपभ्रंश तैयार किया और मराठी में ग्राह्य शब्दों को पैदा किया, जैसे ‘झेरोक्स’ ‘इंगरेजी’ ‘फ्लावर’ आदि। भारत में शायद मराठी लोग ही फूलगोभी की सब्जी को ‘फ्लावर’ कहते हैं।

अंत में मैं, लेखक और शोधकर्ता अपना बहुत ही व्यक्तिगत अनुभव आपके साथ साझा करना चाहूँगा। मैं चाहता था कि मेरी पुत्री अपने दिन का कुछ समय मराठी भाषी बच्चों के साथ बिताए। ताकि उसके बोलचाल पर उन बच्चों के सम्पर्क के फल स्वरूप मराठी भाषा के प्रभाव को आसानी से देखा जा सके। उसके ननिहाल के आस-पास प्ले स्कूल तलाशने का प्रयास किया गया। परन्तु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैनें देखा कि आस-पास का एक भी प्ले स्कूल मराठी भाषी नहीं था। छोटे से बड़े स्तर पर खुले सभी प्ले स्कूलों में इंग्लिश का बोलबाला था। मतलब साफ है कि प्ले स्कूल तक इंग्लिश मीडियम में। मैं यह देख कर दंग रह गया कि इन स्कूलों में भी बच्चों को मराठी छोड़ कर अंग्रेजी भाषा को अपनाने का दबाव बनाया जाता है।  फलस्वरूप, बच्चों के चेहरों पर खामोशी छा जाती है। उन प्ले स्कूलों में जितने समय बच्चे रहते हैं, उतने समय वे खामोश ही रहते हैं। कारण साफ है। अंग्रेजी में आप बोल नहीं सकते और  मराठी बोलने की इजाज्त नहीं। वहीं अंग्रेजी की कुछ प्रचलित कविताओं का रट्टा लगवाया जाता है। बच्चे डरे और सहमे-सहमे-से रहते हैं। बच्चे यदि डरते-सहमते कुछ शब्द अंग्रेजी के बोल देते हैं तो इसे प्ले स्कूल के शिक्षक विजय श्री के रूप में देखते हैं.. और बड़े गर्व से बताते हैं कि हम बच्चे को आने वाले भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि यह वही महाराष्ट्र है जहाँ पर कुछ समय पूर्व मराठी-मानुष के नाम पर किसी छुट-भईया नेता ने दंगे करवाये थे। मुम्बई समेत महाराष्ट्र के तमाम शहरों से गैर-मराठी भाषी लोगों को निकालने का प्रयास किया था। उसने आरोप लगाया कि गैर-मराठी लोग महाराष्ट्र में आकर मराठी लोगों के रोजगार के अवसरों को खा रहे हैं। पर आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजी, जिसने स्थाई तौर पर मराठी भाषी लोगों की सीमा तय कर दी है उसके खिलाफ़ किसी नेता का आक्रोश फट कर बाहर नज़र नहीं आता है। मराठी और गैर-मराठी के बीच दंगे करा कर वोट बैक की राजनीति की जा सकती है। पर आम जनता को सत्ता के गलियारे से बाहर करने के लिए अंग्रेजी का वर्चस्व जरूरी है। इसलिए सत्ताधारी वर्ग इंग्लिश मीडियम सिस्टम को लेकर खामोश़ है। 

इस अध्ययन के निष्कर्ष के रूप में भी निम्न बातें विशेष रूप से निकल कर आई :-

जितना स्वभाविक रूप से किसी संस्कृति के संपर्क में आएँगे, उतना ही उसकी भाषा-बोली को अपनाना आसान होगा। पुरुषों के कार्यस्थल का औपचारिक वातावरण कहीं-न-कहीं साँस्कृतिक सम्पर्क में बाधा उत्पन्न करता है। वहीं तथाकथित शिक्षित कहलाने वाली महिलाओं का श्रेष्ठता भाव भी साँस्कृतिक सम्पर्क में बाधा उत्पन्न करता है। वहीं अशिक्षित अथवा अल्प-शिक्षित महिलाएँ एवं बच्चे, इन सब बंधनों से मुक्त होते हैं। अतः अधिक स्वाभाविक रूप से संस्कृति को ग्रहण करते हैं।

यह बात लेखक ने दिल्ली स्थित क्रिश्चन माइनॉरिटी स्कूल में भी देखी कि जहाँ दक्षिण से प्रव्रजित होकर आये स्टाफ़ में नॉन-टीचिंग स्टाफ़ के कर्मचारियों ने दिल्ली की प्रादेशिक भाषा को अपना लिया है तथा तमिल-मलयालम भाषा के लहजे के साथ हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। वहीं विश्वविद्यालय तक की शिक्षा ग्रहण करके आई हुई सम-उच्च मध्यमवर्गीय परिवेश की महिला शिक्षिकाओं का प्रयास रहता है कि वे यही दिखाएँ कि उन्हें हिन्दी नहीं आती। उन शिक्षिकाओं में एक शिक्षिका तो ऐसी भी है, जो न तो शिक्षकों और न ही बच्चों से हिन्दी में बात करती है।  जबकि उनको इस स्कूल में ही पढ़ाते हुए ही 7-8 वर्ष हो चुके हैं। पर वे दक्षिण के नॉन-टीचिंग स्टाफ़ से तमिल में ही बात करती है। जहाँ स्टाफ़ रूम में साथी शिक्षकों और विद्यार्थियों से बातचीत करने के लिए अंग्रेजी को वे ऊँची आवाज में उच्चारित करती हैं, वहीं दूसरी ओर,  नॉन-टीचिंग स्टाफ़ से बातचीत करते वक्त अवाज को नीची रखती हैं। महिला शिक्षकों में अधिकतर शिक्षकों की कोशिश रहती है कि वे ऐसा दिखाएँ कि वे हिन्दी नहीं जानतीं। पश्चिम बंगाल से प्रव्रजित होकर आई एक महिला शिक्षिका ने हिन्दी में छपी बुकलैट लेने से मना कर दिया और कहा कि उसे हिन्दी नहीं आती। जबकि स्टाफ़ रूम में वह दूसरे सहकर्मियों के साथ हिन्दी में बातचीत ही करती है। वहीं पुरुष शिक्षक जो मुख्यतः सम-मध्यमवर्गीय परिवेश से निकल कर आए हैं, वे परिवेश की बोली को सहजता से अपनाते हैं। पर दिखावा करने के लिए हिन्दी से परहेज करने की प्रवृत्ति उनमें भी दिखाई देती है। 

बच्चों को सीखने में वह भाषा ही अधिक सहायक है जो वे अपने परिवेश से ग्रहण करते हैं। प्रव्रजित वर्ग के बच्चे, ना तो माता-पिता की मातृभाषा में सहज हो पाते हैं और ना ही परिवेश से बाहर की भाषा में। अब वह चाहे हिन्दी हो या अंग्रेजी। वे तो उस भाषा में सहज होते हैं जो उनके परिवेश में मूलतः बोली जाती है। बच्चों की मातृभाषा वास्तव में उनके परिवेश की बोली ही होती है।

•      भाषाएँ जब एक-दूसरे से स्वतंत्र संपर्क में आती हैं, तो वे एक-दूसरे से मिलकर ठीक उसी तरह एक हो जाती हैं, जैसे नदी की दो धाराएँ। मैं इस बात को स्पष्ट करने के लिए महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के साइनबोर्ड का उदाहरण दूँगा। मराठी भाषा का अंग्रेजी भाषा के साथ जो परस्पर-क्रिया हुई, उसने मराठी संस्कृति के अनुरूप उसका मिला-जुला रूप तैयार किया। परिणामत: अंग्रेजी मराठी में ग्राह्य हुई और उसका (अंग्रेजी का) मराठीकरण हुआ। जैसे इंग्लिश के लिए इंग्रेजी, ज़ेरोक्स के लिए झेरोक्स आदि। इंग्लिश शब्द फ्लॉवर का अर्थ फूल होता है, पर मराठी बोलने वाले औरंगाबाद शहर के लोगों के लिए फ्लॉवर का अर्थ फूलगोभी है। सडकों पर लगे साइन-बोर्ड चूँकि आम लोगों की समझ को प्रतिबिंबित करते हैं। अतः साईन बोर्ड में प्रयुक्त इंग्लिश शब्‍दों के अपभ्रंश/परिवर्तित रूप मराठी में रच-पच चुके मराठी शब्‍द ही हैं।

इस पूरे पर्यवेक्षण से स्पष्ट  होता है कि लोगों की भाषा का निर्धारण इस बात से होता है कि वे किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आते हैं। अतः किसी व्यक्ति की भाषा, उसके सम्पर्क से निर्धारित होती है। कोई व्यक्ति जिस-जिस प्रकार के लोगों के संपर्क में आता है, उस प्रकार की भाषा को अपनाता जाता है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उच्च मध्यमवर्गीय बच्चे का सम्पर्क चूँकि समाज के उस तबके से पड़ता है जो अंग्रेजी-भाषी भी होता है। अतः उसके लिए अंग्रेजी भाषा को सीख पाना अपेक्षाकृत आसान होता है, जबकि निम्न-मध्यम वर्ग, ग्रामीण पृष्‍ठभूमि के बच्चों का अंग्रेजी का भाषायी सम्पर्क शिक्षक और पुस्तकों के अतिरिक्त किसी और से नहीं होता। इस वजह से वे इस भाषा को सीखने में असमर्थ हो जाते हैं। वे अंग्रेजी में पढ़ाए जाने वाले पाठों को समझ नहीं पाते। पर चूँकि उनका सारा पाठ्यक्रम ही अंग्रेजी में ही होता है अतः वे बाकी विषयों के नाम पर भी सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी को ही रटते रहते हैं। इस प्रक्रिया में वे कुछ हद तक अंग्रेजी भाषा पर अपने परिवेश के अन्य विद्यार्थियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में आ जाते हैं। और इस प्रकार इंग्लिश उनके लिए प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ मुद्दा बन जाती है। वे महज अग्रेजी में रटते हैं पर वे समझते हैं कि वे अंग्रेजी में सीख पा रहे हैं। वे इस मिथ का शिकार होते हैं कि इंग्लिश मीडियम में सीखा जा सकता है। यही कारण है कि अधिकतर ग्रामीण एवं निम्न-मध्यमवर्गीय पृष्‍ठभूमि के बच्चे, न केवल अंग्रेजी माध्यम स्कूली व्यवस्था में पिछड़ते हैं अपितु सबसे ज्यादा अंग्रेजी भाषा में ही असफल भी होते हैं, और इस सब का सीधा फायदा उच्च एवं उच्च-मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों को ही होता है।

इंटरनेट से प्राप्त यह चित्र दर्शाता है कि किस प्रकार कोई भी भाषा अपने परिवेश के साँस्कृतिक वातावरण से संबंधित होती है। भाषा का जो स्वरूप सतह पर दिखता है, वह कहीं गहराई में सामाजिक मूल्यों में जुड़ा हुआ होता है। बिना उस साँस्कृतिक परिवेश को समझे भाषा को समझना सतही कवायद होती है और उस भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग करना या तो मूर्खता ही होगी, या फिर भावी पीढ़ी को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम बनाने की राजनीति ही होगी।

अतः निष्कर्ष,  इसीप्रकार तमाम भारतीय जनबोली-जनभाषाओं का मिश्रण   =  क्षेत्रिय लहजों के साथ हिन्दुस्तानी का सृजन करता है ।

 

 

 

 

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