अंग्रेजी माध्यम और विद्यार्थियों की दिनचर्या
विचारणीय मुद्दा –
सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश से बाहर की भाषा, अर्थात्
अंग्रेजी को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने से क्या विद्यार्थियों की दिनचर्या भी
प्रभावित होती है?
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राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा-2005 (National
Curriculam Framework/NCF-2005) के अंतर्गत औपचारिक शिक्षा में स्कूल के
बाहर के साँस्कृतिक वातावरण से सृजित होने
वाली अनौपचारिक शिक्षा के योगदान की चर्चा
करते हुए कहा गया है कि “समाज में मिलने वाली अनौपचारिक शिक्षा, विद्यार्थियों
में अपना ज्ञान स्वयं सृजित करने की स्वाभाविक क्षमता को विकसित करती है। जिससे
विद्यार्थियों में अपने आसपास के सामाजिक एवं भौतिक वातावरण से और विभिन्न कार्यों
से जुड़ने की क्षमता बढ़ती है। इसके लिए ऐसे मौकों का मिलना बहुत जरूरी है, जिससे
विद्यार्थी नयी चीजों को आज़माएँ, जोड़-तोड़ करें, गलतियाँ करें और अपनी गलतियों को
खुद सुधारें। यह बात भाषा सीखने के लिए भी उतनी ही सच है, जितनी
किसी हस्तकौशल या विषय को सीखने के लिए।”
राष्ट्रीय पाठ्यर्चा
रूपरेखा-2005 शिक्षा व्यवस्था
के अंतर्गत,
संचित मानवीय अनुभवों,
ज्ञान और सिद्धांतों को संदर्भित करने हेतु
उत्पादन कार्य को प्रभावी शिक्षण का माध्यम बनाये जाने पर बल देता है। काम से जुड़े
कौशलों को भी औपचारिक शिक्षा का भाग बनाने पर बल देता है। इसलिए कक्षा के ज्ञान को
जीवन अनुभव से जोड़ने की बात उठती है। जब हमें राष्ट्रीय पाठ्यर्चा
रूपरेखा-2005 के इन सुझावों पर अमल
करने की बात आती है तो पहला प्रश्न यही उठता है कि बच्चों का अपने सामजिक,
साँस्कृतिक परिवेश के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध है तथा वे स्कूली शिक्षण के बाद
कितना समय अपने परिवेश के अनौपचारिक-भौगौलिक-समाजिक-साँस्कृतिक वातावरण के लिए दे
पाते हैं?
इस प्रश्न के उत्तर की
खोज के लिए शोधकर्ता लेखक ने पहले तो यही पता करने का प्रयास किया कि बच्चे स्कूल
के छह घंटों के बाद का समय किस प्रकार बीतता है।
हिसाब-किताब - दिन में होते हैं – 24 घण्टे, उसमे से स्कूल
कार्यदिवसों में सैद्धान्तिक और क़ानूनी तौर पर स्कूल में बीते 6 घण्टे, इस
प्रकार शेष बच गए 18 घण्टे। एक स्वस्थ्य
बच्चे को 7-8 घण्टे की नींद लेनी चाहिए, परंतु वास्तविकता तो यह है कि अंग्रेजी माध्यम स्कूली व्यवस्था में आज बहुत-से बच्चों को
इतना-भी समय नहीं मिल पाता है कि वे अपनी नींद भी पूरी कर सकें, तथापि, मानने में
क्या जाता है, चलो मान लो कि सभी बच्चे 8 घण्टे की स्वस्थ नींद लेते हैं। इस
प्रकार शेष बच जाते हैं 10 घण्टे। अब शोधकर्ता इस बचे हुए 10 घण्टों का विश्लेष्ण
करेगा कि विद्यार्थी ये 10 घण्टे कैसे बिताते हैं।
इस सम्बन्ध में, अलग-अलग
स्कूलों के बच्चों की अलग-अलग कहानी है। जहाँ विशिष्ट माने जाने वाले मेट्रोपोलिटन
सिटी के स्कूल हफ्ते में 5 दिन ही लगते हैं, इस कारण इन स्कूलों के बच्चों के लिए ‘वीक-एंड ’ एक सुखदाई शब्द भी है। जब उन्हें स्कूल के बाहर के
परिवेश में अपने माता-पिता के साथ ‘एडवेंचर’ करने का मौका मिलता
है। यहाँ ‘एडवेंचर’ का अर्थ ‘साहसिक कार्य’ कदापि नहीं है। ‘एडवेंचर’ का यहाँ अर्थ है- वह मस्तीभरा
क्षण, जो
वे अपने माता-पिता के साथ मॉल में, वाटर-पार्क में बिताते हैं। उनके अपने शब्दों
में ‘वीक-एंड’ का अर्थ है कि वह समय, जो वे अपने माता-पिता के साथ ‘एन्जॉय’ (आनंद) में बिताते हैं। अतः इस ‘एडवेंचर’ और ‘एन्जॉय’ के दौरान उनका परिवेश किस प्रकार का होता है, यह जानने
के लिए तो हमें मॉल, वाटर-पार्क, फाइव स्टार होटल और यदि छुट्टी लम्बी हो तो
सिंगापुर आदि भी जाना पड़ेगा। पर उच्च-मध्यम वर्गीय विद्यार्थियों की तुलना, यदि हम
गाँवों एवं कस्बाई इलाकों के निजी स्कूलों के विद्यार्थियों से करें, तो यह
स्थिति बिलकुल ही भिन्न है, क्योंकि इन इलाकों के स्कूल हफ्ते में सातों दिन लगते
हैं। अर्थात् गाँव के विद्यार्थियों को रविवार को भी ‘एक्स्ट्रा क्लास’ (अतिरिक्त
कक्षा) झेलनी पड़ती है और बाकी दिनों में भी अमूमन दो घण्टे की ‘एक्स्ट्रा क्लास’ (अतिरिक्त
कक्षा) लगना आम बात है। इस प्रकार से, स्कूल हो गया 6+2= 8 घण्टे का और
रविवार व अन्य छु्ट्टियों के दिन 4 घण्टे का।
ये ‘एक्स्ट्रा क्लास’ बच्चों को सिखाने का कम और माँ-बाप को प्रभावित करने का
काम अधिक करती है। पास के कस्बों में जाने वाले बच्चे प्रतिदिन दो से चार घण्टे बसों से आने-जाने में ही बिता
देते हैं। कस्बाई इलाके, जैसे- पलवल में भी प्रतिष्ठित ब्रांड के स्कूलों में भी
‘एक्स्ट्रा क्लास’ का चलन है।
इस प्रकार छह घण्टों का स्कूल, आठ से दस घण्टे का हो जाना आम बात है।
अभी तक हम स्कूल की बात कर रहे थे। अब
आती है स्कूल के बाहर चलने वाली ट्यूशन
कक्षाओं की बात, जो
स्कूल के अंग्रेजी माध्यम पाठ्यक्रम का ही प्रतिफल है। यूनेस्को द्वारा प्रकाशित मार्क
ब्रे की पुस्तक ‘प्रतिछाया शिक्षा - शिक्षा प्रणाली को एक एक चुनौती’ में ट्यूशन की समस्या को गंभीरता से उठाया गया है। इस
अनुसंधान आधारित पुस्तक के माध्यम से मार्क ब्रे जिस समस्या को संबोधित
करते हैं, वह ट्यूशन का बोझ ही है। लेखक के अनुसार पूर्वी एशिया के देशों में तेजी
से ट्यूशन का जाल फैल रहा है। उनके अनुसार यह तेजी से विकसित होता हुई बाज़ार
आधारित शिक्षा व्यवस्था है। जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। ट्यूशन की
व्यवस्था वास्तव में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की खामियों का ही प्रतिफल है। पर
इसका कारण क्या है? क्या सिर्फ़ पठ्यक्रम का बोझ ही इसका कारण
है? जैसा कि समूह-वार्ता में भी विद्यार्थियों
ने स्वीकार किया और कहा कि सीबीएसई बोर्ड लगातार पाठ्यक्रम कम करता जा रहा है।
विद्यार्थियों ने उदाहरण भी दिया और बताया कि ‘कलर ब्लाइंडनेस’ की संकल्पना पिछले वर्ष पाठ्यक्रम में थी, पर इस वर्ष
हटा दी गई है। यदि वास्तव में पाठ्यक्रम का बड़ा होना ही कारण है तो नर्सरी कक्षा
के बच्चों की ट्यूशन क्यों लगयी जाती है। केस स्टडी 3 की छात्रा की माँ खुद सरकारी
प्राथमिक स्कूल की शिक्षिका है परन्तु उसकी खुद की शिक्षा हिंदी माध्यम में होने
की वजह से वह अपनी बच्ची का होम वर्क खुद नहीं करा सकती। यह विचारणीय बिंदु है कि
जब एक एम.ए. बी.एड. शिक्षिका प्रतिष्ठित अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ने वाली
बच्ची का होम वर्क नहीं करा सकती, तो ऐसी स्थिति में उन बच्चों की स्थिति क्या होगी, जिनके
माता-पिता अल्प-शिक्षित हैं अथवा पढ़े-लिखे नहीं हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूल में
पढने वाला विद्यार्थी नर्सरी का हो या बारहवीं का, हर बच्चा कहीं-ना-कहीं ट्यूशन पर आश्रित तो
जरूर है। इस प्रकार प्रतिदिन तीन से चार घण्टे का समय ट्यूशन पर ही बीत जाता है।
अनुसंधान के दौरान सिर्फ़ प्रतिष्ठित कहलाने
वाले स्कूलों के विद्यार्थियों को छोड़ दें, तो शेष सभी ने स्वीकार किया कि स्कूली
शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने की वजह से स्कूल में विषय को समझने में दिक्कत आती
है और इसी वजह से वे ट्यूशन की तरफ़ भागते हैं। चाय बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने
वाले सज्जन ने बताया, “स्कूल की दो बजे छुटी के पश्चात् तीन बजे वे अपने बच्चों को
ट्यूशन के लिए छोड़ कर आते हैं। पहले इंग्लिश वाले शिक्षक के पास जाते हैं, फिर मैथ
वाले शिक्षक के पास। इंग्लिश वाले शिक्षक उनके बच्चों को इंग्लिश के अतिरिक्त सोशल
साइंस (सामाजिक विज्ञान) जैसे विषय भी पढ़ाते हैं। मैथ (गणित) वाले शिक्षक मैथ के
अतिरिक्त साइंस (विज्ञान) भी देखते हैं।” इस तरह 3 बजे के गए बच्चे साढ़े छह–सात
बजे तक घर आते हैं। जब बच्चों के खेल-कूद के सन्दर्भ में जानकारी हासिल करनी चाही
तो उसने जबाब दिया, “मेरे बच्चे कहीं-भी इधर-उधर नहीं जाते। स्कूल से घर और घर आकर
सीधे ट्यूशन ही जाते हैं। वापस घर आकर ट्यूशन और स्कूल दोनों का काम करते हैं।” जब
शोधकर्ता लेखक ने जानना चाहा कि इतना ट्यूशन लगाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। तो
उनका कहना था,
“हम तो पढ़े-लिखे हैं नहीं, हमें तो उनकी पढ़ाई समझ में नहीं आती। तो क्या करें, अब स्कूल
वाले कहते हैं मेहनत कराओ, तो ट्यूशन ही
भेजेगें ” आगे उसने बताया, “मेरे बच्चे अच्छे-खासे हरियाणा बोर्ड (हिंदी माध्यम
स्कूल) में पढ़ते थे। पाँचवी तक कभी ट्यूशन नहीं लगवाया। जब बच्चों को सीबीएसई
(अंग्रेजी माध्यम) स्कूल में डालने की बात आई, तो यहाँ डालने से एक साल पहले ही इंग्लिश
मजबूत करने के लिए इंग्लिश की ट्यूशन लगवाई। तब से अब तक ट्यूशन के सहारे ही चल
रहे हैं।” “बच्चे कहते हैं स्कूल में अंग्रेजी में सारी पढाई होती है पर आज के दिन
में अंग्रेजी है क्या चीज, जो दो क्लास पढ़ जाए वो अंग्रेजी बोलना सीख जाता है।”
केस स्टडी-1 का रमेश तथा केस स्टडी-2 की आरूणी भी मानती है कि माध्यम की वजह से ही
वे सभी ट्यूशन की तरफ़ भागते हैं। रमेश का कहना है, “टीचर आते हैं, अंग्रेजी में क्या कुछ बोल कर चले जाते हैं
कुछ पता ही नहीं चलता है। कुछ पूछो तो जवाब मिला है- ‘स्पीक इन इंग्लिश’..... पूछो भी और
सबके सामने मज़ाक भी बनो”... ट्यूशन में यह समस्या नहीं होती। हम खुल कर पूछ सकते
हैं। समूह वार्ता-1 के विद्यार्थियों से जब अनुसंधानकर्ता ने “ट्यूशन क्यों
पढ़ते हो?” का सवाल किया, तो
उन्होंने कारण गिनवाने शरू किये – (1) सर्कल (घेरा ) छोटा होता है, (2) क्लास में बहुत बच्चे होते हैं, सब बोलते
हैं तो शोर होता है, आदि आदि... पर जो अंतिम बात कही, वह अधिक महत्वपूर्ण थी, वह यह कि
“क्लास में टीचर इंग्लिश में ही परिभाषा
को लिखवाता है, जैसे- ‘Reflection
is defined as Bouncing back of light from a reflective surface.’
हम यदि उन्हें इसे बताने और समझाने को कहें तो इसी बात को दो-तीन अलग-अलग तरीके से
बता देंगे। पर कोई देशी-सा उदाहरण नहीं दे सकता। इस प्रकार हम क्लास में कही बात
को रिलेट नहीं कर पाते हैं। पर जब ट्यूशन पर वही बात हमारी देशी भाषा-बोली में
आस-पास के उदाहरण लेकर बताई जाती है, तो समझना आसन हो जाता है। ट्यूशन पर हम खुल
कर ‘डिसकस’ कर सकते हैं। क्लास में नहीं।” कारण स्पष्ट है, स्कूल में भाषा की जो
बंदिश होती है, वह ट्यूशन में नहीं
होती।
लेखा / अकाउंट विषय के शिक्षक संजीव, जो स्कूल
में पढ़ाने के बाद होम ट्यूशन तथा ग्रुप ट्यूशन भी लेते हैं, उनका कहना है, “प्रतिष्ठित माने जाने वाले स्कूलों में बच्चे पढने कम, मस्ती करने ज्यादा जाते हैं। आजकल हिसाब कुछ इस प्रकार का बन गया है कि
बच्चे ट्यूशन में ही गंभीर/सिंसियर होकर पढ़ते हैं।”
जबकि भौतिक विज्ञान / फिजिक्स विषय के शिक्षक
पवन के अनुसार, “हिंदी माध्यम से अंग्रेजी माध्यम में आने वाले
विद्यार्थियों को मुख्य समस्या शब्दावली / टर्मिनॉलॉजी की आती है। इसी प्रकार
इंग्लिश मीडियम वाले विद्यार्थी भी हिन्दी के टर्म नहीं जानते, परंतु समझते सब हिन्दी में ही हैं। समझाने के लिए इंग्लिश की शब्दावली/टर्मिनालॉजी
का ही प्रयोग होता है। ये शब्द/टर्म ही हिन्दी अंग्रेजी का गैप बनाए ऱखती है।
मेरे पास जो हिंदी माध्यम के बच्चे भी ग्रुप ट्यूशन पढ़ने के लिए आते हैं, उनके साथ समस्या यह होती है कि वे इंग्लिश के शब्द/टर्म ही नहीं समझ
पाते। वैसे हिन्दी वालों की समझ, इंग्लिश वालों से ज़्यादा
होती है।”
आगे, उन्होंने हिंदी तथा
अंग्रेजी माध्यम दोनों ही की समस्या का समाधान बताते हुए कहा, “हिंदी माध्यम के
बच्चों को अंग्रेजी के शब्द/टर्म भी याद करवाता हूँ, फिर उन्हें सिखाते वक्त उन शब्दों/टर्म का स्थानीय/देशी
(देहाती बोली) में जो अर्थ है, वह भी बताता हूँ।
राष्ट्रीय
पाठ्यर्चा रूपरेखा-2005 (National Curriculam Framework/NCF-2005) में पृष्ठ संख्या 97, 101, 109, 139 पर
ट्यूशन की समस्या को उठाया गया है। इसमें माना गया है कि ट्यूशन के बोझ का कारण पाठ्यक्रम
एवं गृहकार्य है। इस पूरे घटनाक्रम को देखने और विश्लेषणात्मक विवेचन करने के
बाद हम इस निष्कर्ष पर ही पहुँचते हैं कि वास्तविक बोझ पाठ्यक्रम का नहीं है। वास्तविक बोझ तो माध्यम और अंग्रेजी माध्यम
स्कूलों की संस्कृति का है। राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005
को लिखने वाले शिक्षाविद्
ट्यूशन को लेकर इतने अधिक संवेदनशील हैं कि ट्यूशन पर भेजने वाले माँ-बाप के
खिलाफ़ सख्त कार्यवाही करने की भी हिदायत देते हैं। शोधकर्ता लेखक जानना चाहता है
कि राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005 के शिक्षाविद् उस
पिता को क्या सजा देंगे, जो जान ही नहीं पा रहा कि उसका बच्चा कक्षा में विषय
क्यों नहीं समझ पा रहा। चाय बेचने वाले भैया कहते हैं, “मैं सीबीएसई की पढ़ाई समझ
नहीं पा रहा हूँ। स्कूल से बच्चों की शिकायत आती है। हम क्या कर सकते हैं। ट्यूशन
ही तो लगा सकते हैं? स्कूल वाला कहता है कि ट्यूशन वाला नहीं
पढ़ाता और ट्यूशन वाला कहता है कि स्कूल वाला नहीं पढ़ाता। हम किसकी बात सही मानें?” राष्ट्रीय पाठ्यर्चा रूपरेखा (NCF)-2005 के शिक्षाविद् उस पिता को क्या
सजा देना चाहेंगे, जिसने उच्च समाज के बराबर लाने की अभिलाषा
में अपनी आय का आधा हिस्सा ही बच्चों की पढ़ाई पर लगा दिया। उस माँ को क्या सजा
मिलनी चाहिए, जिसने खुद शिक्षिका होकर भी, अपनी बच्ची को उच्च समाज के मूल्यों के अनुरूप अंग्रेजी बोल-चाल सिखाने
के लिए अलग-से एक शिक्षिका लगावा रखी है। अरे! उन बच्चों को
भी तो कोई सजा होनी चाहिए, जो भौतिकशास्त्र की सरल संकल्पना
को अपनी बोली भाषा में समझने हेतु ट्यूशन पर जाते हैं। राष्ट्रीय पाठ्यर्चा
रूपरेखा (NCF)-2005 के शिक्षाविदों का यह कहना कि बच्चे ट्यूशन पर
ना जाकर स्वतन्त्र होकर किताबें पढ़ें, ठीक उसी प्रकार की
नसीहत है, जो कभी फ़्रांस की रानी ने फ्रांस की जनता को दी थी और कहा था - “रोटी
नहीं खा सकते तो क्या हुआ केक खाओ”।
अतः शोधकर्ता लेखक राष्ट्रीय पाठ्यर्चा
रूपरेखा (NCF)-2005 में
वर्णित ट्यूशन के कारण को नकारता है और इस बात को स्थापित करता है कि ट्यूशन का
मूल कारण स्कूलों में परिवेश के साँस्कृतिक भाषा का प्रयोग ना करना ही है। स्कूल
में प्रयोग की जाने वाली मानक भाषा चाहे वो हिंदी हो या अंग्रेजी, समझ में बाधा उत्पन करती है। विद्यार्थी, स्कूल में
होने वाली शिक्षण अधिगम क्रिया को अपने साँस्कृतिक संदर्भो के साथ समायोजित नहीं
कर पाता और इस अवस्था में उसे ऐसे सहारे की ज़रूरत पड़ती है,
जो इस ‘गैप को फिल’ कर सके अर्थात् इस
अंतर को भर सके। इस अंतर को भरने के लिए ‘ट्यूशन’ रूपी संस्था का
उदय हुआ है। अतः स्कूल की भाषा तथा साँस्कृतिक परिवेश की
भाषा-बोली के बीच का अंतर/गैप, जितना अधिक
होगा, उतना ही
ट्यूशन के प्रति रुझान अधिक होगा।
चूँकि ट्यूशन केन्द्रों
की भूमिका भी उन्हीं मूल्यों और मान्यताओं के अनुरूप अपने ग्राहक, अर्थात्
विद्यार्थी को सेवा प्रदान करने की होती है, जिन मूल्य के अनुरूप उन्हें स्कूल में
पढाया जाता है। बस, उनका काम उस को थोड़ा और अधिक ग्राह्य अर्थात् आसान बनाना भर होता है।
जैसा केस स्टडी-3 की विद्यार्थी की ट्यूशन शिक्षिका का काम, उसके
इंग्लिश में मिले होम वर्क को पूरा करना है। साथ ही साथ, इंग्लिश में वार्तालाप सिखाना भी है। काम
अभी-भी पूरा नहीं हुआ है, ट्यूशन शिक्षिका का एक काम स्कूल के अंग्रेजी माध्यम
वातावरण एवं एलीट वर्ग के अनुरूप आचरण सिखाना भी है।
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