अंग्रेजी माध्यम के परिणाम स्वरूप पैदा हुई शिक्षण व अधिगम की संकल्पना


विचारणीय मुद्दा –

सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश से बाहर की भाषा (अंग्रेजी) के औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में माध्यम के रूप में वर्चस्व बने रहने से, अर्थात् ‘शिक्षा का अंग्रेजी माध्‍यमीकरणकरने के फलस्वरूप जन-सामान्य के बीच ‘शिक्षा’, ‘शिक्षण’ और ‘अधिगम’ को लेकर किस तरह की धारणाएँ पनपी हैं? क्या वे बाल-केन्द्रित शिक्षा शास्त्र के सिद्धांतों को बल प्रदान करती हैं? क्‍या वे औपनिवेशिक शिक्षाशास्त्र के सिद्धांतों की जड़ता को ही बनाये रखती हैं?

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स्कूल के अन्दर का एक सिद्धांत है- रटो, याद करो, पास हो, अगली कक्षा में जाओ

बच्चों की मानसिकता हो गई है- पास होने लायक पढ़ो, कक्षा पार करो, भूल जाओ

ये बिंदु विद्यार्थियों की मानसिकता को व्यक्त करने के लिए अपने आप में पर्याप्त हैं। 

 

जैसा कि प्राचार्य ई/E ने भी कहा कि 200 वर्षों की गुलामी हमारे खून में इस तरह समाई है कि इसने हमारी शिक्षा  सम्बन्धी संकल्पना को पूरी तरह से कुंद करके रख दिया है। अपने निहित स्वार्थों के चलते स्वतंत्रता के बाद भी व्यवस्था के कर्णधारों ने अंग्रेजों द्वारा स्थापित संकल्पना को ही न केवल पोषित किया, अपितु उसे और अधिक बढ़ाया। उसी का परिणाम है कि आज अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का फलता-फूलता बाज़ार है। अभिभावकों से जो वर्णात्मक जानकारी हासिल हुई उसमें भी इस बात का पुष्टि होती है कि शिक्षा बस कक्षा पास करने की क्रिया भर है। यदि हम देशज शिक्षा व्यवस्था के साथ वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की तुलना करें तो पाते हैं कि अंग्रेजों से पूर्व हमारे देश में शिक्षा कभी भी अहर्ताओं की गुलाम नहीं थी। वह जैसी भी थी व्यक्ति की अंतर्निहित-क्षमताओं को अंकुरित करने हेतु ही थी। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम शिक्षा को अहर्ता से जोड़ा और अहर्ता को रोजगार से। अहर्ताओं को प्राप्त करने के लिए कुछ खास तरह की परीक्षाओं का आयोजन किया और उन परीक्षाओं को पास करने हेतु कुछ खास पाठ्यक्रमों की रचना भी की और इन खास पाठ्यक्रमों  की भाषा अंग्रेजी रखी। हालांकि वुड डिस्पेच के बाद की नीतियों में औपचारिक प्राथमिक शिक्षा, क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध रही, परंतु उच्च शिक्षा की भाषा पूर्णतः अंग्रेजी ही रही। हम प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब के हवाले से कह सकते हैं कि उस समय का पाठ्यक्रम व्यक्ति की सोच को सीमित करने का ही साधन था न कि मानसिक क्राँति लाने का। इस प्रकार शिक्षा द्वारा व्यक्ति के आत्म विकास की अवधारणा काफ़ी पीछे छूट गई, जो बची रह गई वह किताबी पंडित तैयार करने की संकल्‍पना भर थी और यही संकल्पना धीरे-धीरे रच-बस भी गई। इसके साथ ही, काम और शिक्षा का जो सम्‍बन्‍ध था वह भी पूरी तरह-से समाप्त हो गया। व्यक्ति की शिक्षा का पैमाना उसके द्वारा अर्जित अहर्ताएं बन गईं और धीरे-धीरे अहर्ता  ही शिक्षा का पर्याय बन गई। जब साधन साध्य बन जाता है तो स्थिति और भी जटिल हो जाती है। यही हश्र हमारे समाज में शिक्षा का हुआ। अहर्ता  ही शिक्षा है यह इतना जटिल मिथ है कि जिससे पार पाना सम्भव नहीं तो कठिन जरूर है। अंग्रेजी माध्यम शिक्षा व्यवस्था ने इस तथ्य को और भी पुख्ता किया। विद्यार्थियों तथा अभिभावकों से मिली जानकारी के अनुसार क्रिश्चियन स्कूल हिंदी बोलने पर जुर्माना भी लगाते हैं। दूसरे स्कूल जुर्माना ना भी लगाते हों, पर अंग्रेजी बोल पाने की क्षमता रखने वाले विद्यार्थियों को ही इनाम और प्रोत्साहन देते हैं।

अंग्रेजी माध्‍यम शिक्षा व्यवस्था में दी जाने वाली शिक्षा, माता-पिता की समझ से बाहर ही है, जैसा कि चाय बेचने वाले सज्जन ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया- “सीबीएसई की पढ़ाई हमारी समझ के बाहर है।” ऐसा पिता जिसके बच्चे की शिक्षा उसकी समझ से बहर है, वह भला शिक्षा को किसके पैमाने पर आँकेगा? निस्‍संदेह अंकों  एवं अहर्ता के पैमाने पर। परिणामस्वरूप अहर्ता  ही व्यक्ति के ज्ञान, योग्यता एवं क्षमता को आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान करती है और अंक  उसकी गुणवत्‍ता का स्तर आँकने का आधार प्रदान करते हैं।

 

एक शिक्षित व्यक्ति की निशानी ही मान ली गई है, उसकी दो लाइन अंग्रेजी बोलने की क्षमता। परिणाम यह निकला कि शिक्षा’,  यथार्थ रूप में शिक्षा न रहकर अंकों की प्रतियोगिता भर बन गयी है। इस प्रतियोगिता ने लोगों में छिपी सृजनात्मक क्षमता का हृास करके सिर्फ़ व्यवस्था के साँचे में ढ़लने के लिए साक्षर कामगारों की फ़ौज को तैयार किया है।  इस प्रकार शिक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़ रोज़गार प्राप्ति का साधन बन कर रह गयी है।

अंकों की होड़ ने शिक्षा को सामूदायिक-सामूहिक-सहभागी क्रिया के स्थान पर व्यक्तिगत प्रतियोगिता बना कर रख दिया। फलस्वरूप शिक्षा ने मनुष्य में प्रेम एवं समता-भाव पैदा करने के स्थान पर व्यक्तिगत ईर्ष्या-द्वेष पैदा करने के साधन का ही कार्य किया। हम पहले ही विचार कर चुके हैं कि किस प्रकार स्कूल आज लोगों के बीच ईर्ष्या पैदा करने का साधन हो गए हैं। शिक्षित करने की इस चूहा दौड़ पद्धति ने शिक्षित व्यक्ति को स्वार्थी ही बनाने का कार्य किया। इसके फलस्वरूप, जो जितना अधिक शिक्षित, वह सामाजिक रूप से उतना ही अधिक उदासीन। अपवादों को छोड़ दें तो अंकों की प्रतियोगिता के फलस्वरूप जो अति महत्वाकांक्षाओं के बीज मनुष्य में फूटे, उसने ही उस शिक्षित व्यक्ति को भ्रष्ट बनाया। शिक्षा, आत्म-विकास का माध्यम न होकर महज़ धन अर्जन हेतु रोज़गार प्रप्ति का साधन बन कर रह गई। इसका अर्थ यह भी हुआ शिक्षा जीवनपर्यंत चलने वाली प्रक्रिया न हो कर, मात्र धनार्जन का स्रोत, अर्थात् लाभदायक रोज़गार प्राप्ति के साथ ही समाप्त होने वाली प्रक्रिया भर बन कर रह गयी।

शिक्षा के अवमूल्यन में तीसरी सबसे बड़ी भूमिका अंग्रेजियत के वर्चस्व ने निभायी। शिक्षा जब बाजार के साथ जुड़ गई तो बाजार के रंग-ढंग को भी उसने अपने में समाहित कर लिया। अंग्रेजों ने शासन में भागीदार कर सकने वाले अपने सहयोगियों को तलाशने तथा अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान थोपने की जो प्रक्रिया प्रारंभ की, वह तथाकथित स्वतंत्रता के बाद भी कायम रही। मैकाले के मानस-पुत्र कहलाने वाले इस सहयोगी वर्ग ने ही स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी के परचम को लहराने का काम किया। मैकाले का मानस-पुत्र कहलाने वाला यह छोटा-सा सहयोगी वर्ग ही आज राज्य व्यवस्था, कोर्ट तथा विश्वविद्यालयों पर काबिज है। परिणामस्वरूप अंग्रेजियत के वर्चस्व वाली साँस्कृतिक पूँजी का जन्म हुआ। इस साँस्कृतिक पूँजी ने विश्वविद्यालयों तथा सत्ता केन्द्रों को सदैव अपनी गिरफ्त में रखा। यही वर्ग सत्ता, पूँजी, विचारधारा आदि के शीर्ष पर छाया रहा। देश के ज्ञान-केन्द्रों पर इस अंग्रेजी-भाषी लोगों का कब्ज़ा ही अंग्रेजियत के मूल्य का आधार बना। चूँकि ये सभी लोग सबल और सफल थे अतः इनकी भाषा (अर्थात् अंग्रेजी) सफलता के मंत्र के रूप में प्रचारित की गई। इन्‍होंने अपने वर्चस्व को बनाये रखते हुए शासन, प्रशासन, कोर्ट आदि में अपनी मानस भाषा (अंग्रेजी) स्थापित की। यह प्रक्रिया अघोषित तौर पर पर चली। अंग्रेजीदां लोगों के शिक्षा, शासन, प्रशासन, कोर्ट, उद्योग आदि में वर्चस्व ने लोगों के ज़हन में यह बात धीरे-धीरे स्थापित कर दी कि अंग्रेजी ही कामयाबी की भाषा है। यह बात स्थापित हो चुकी है कि बिना अंग्रेजी के उच्च शिक्षा संभव ही नहीं है। ये इतना पुख्ता स्थापित तथ्य है कि परिवेश की भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा की वकालत करने वाले लोग भी उच्च शिक्षा की बात आते ही अंग्रेजी की ही वकालत करने लगते हैं। इस प्रकार ‘अंग्रेजयित’ को अपनाना ही शिक्षा का उद्देश्य है और यह उद्देश्य अघोषित तौर पर शिक्षा के उदेश्य के रूप में इस कदर स्थापित हो चुका है कि आज शिक्षित होने का अर्थ ही बन गया है, अंग्रेजी में बोलने भर की क्षमता। यही अंग्रेजी के वर्चस्व वाली संस्कृति का मूल्य है। धीरे-धीरे यही अवधारणाएँ व्यक्ति के मानस पर इस कदर रच-बस गईं कि अब शिक्षा के वास्तविक उदेश्य कहीं पीछे छूट गए और अंग्रेजियत की मानसिकता को गढ़ना ही शिक्षण प्रक्रिया का एक मात्र मकसद रह गया है। आज निचले स्तर के प्राइवेट स्कूल से लेकर ऊपरी स्तर के प्राइवेट स्कूल को देख लें, सबका लक्ष्य महज़ अंग्रेजियत की संस्कृति का ही प्रसार करना भर है। अंग्रेजियत का वर्चस्व किस कदर आज हमारे समाज पर हावी है इसका वर्णन केस-3 में विशाल की पत्नी के वक्तव्य के माध्यम से कर सकते हैं। जब अनुसंधानकर्ता ने जानना चाहा कि आप अपनी बच्ची को अपने परिवार की मातृभाषा बोलने हेतु क्यों नहीं प्रेरित करते? वे महिला खुद एक शिक्षिका हैं, उसके बाद भी उनका जबाब था कि वह नहीं चाहती कि उसकी बेटी हिन्दी अथवा उसके पति के गाँव की बोली बोले। आज तो एम.एन.सी. का ज़माना है, हिन्दी अथवा देहाती बोलियों को बोलने वालों को एम.एन.सी. में रोज़गार हासिल ही नहीं हो सकता। जब हमने उनसे कहा कि व्यकि की सोचने-समझने की क्षमता तो मातृभाषा में ही विकसित हो सकती है। तब उसने अपनी समझदारी को अधिक तर्क पूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हुए कहा, “हमने अपने बेटी की मातृभाषा ही अंग्रेजी बना दी है। उसे हम अंग्रेजी के शब्द ही सिखाते हैं, जैसे सेब को सेब ना कह कर एप्पल कहते हैं। इसी प्रकार अन्य वस्तुओं को उसके अंग्रेजी नाम से ही पुकारते हैं। हम तो इतना नहीं बोल पाते इसलिए घर पर ही अंग्रेजी ट्यूटर की व्यवस्था की है। वह उनसे अंग्रेजी में ही बातचीत करती है ताकि वह अंग्रजी भाषा ही सीखे। बाहर उसे किसी ऐसे-वैसे के सम्पर्क में आने ही नहीं देते। यहाँ तक कि मैं उसे अपने सुसराल के लोगों के पास भी ज्यादा नहीं छोड़ती, कहीं वह वहाँ जाकर उनकी देहाती गँवारू बोली न सीख जाए।”

आप कह सकते हैं कि यह तो महज नवधनाढ्य मध्यम-वर्गीय महिला के विचार भर हैं। पर इस विचार का फ्युज़न इतनी तेजी-से हो रहा है कि इसने बड़ी तेजी से सम्पूर्ण सामाजिक ताने-बाने को ही छिन्‍न-भिन्न करके रख दिया है। हर एक अपनी भाषा को बहिष्कृत करके अंग्रेजी के नकाब को ओढ़ने में लगा हुआ है। इस क्रम में वह अपने आप को दूसरों से अलग करके खड़ा करता है। जो उसके वाली मानक भाषा नहीं बोलता। देश का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के केन्द्र में बैठे लोगों के लिए सिर्फ़ इसलिए गँवारू और घटिया हो जाता है क्योंकि वह सत्ता के केन्द्र में बैठे लोगों की भाषा नहीं बोलता या नहीं बोल पाता। इस सन्दर्भ में चाय बेचने वाले भाई साहब का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है - अंग्रेजी क्या चीज़ है? जो दो क्लास पढ़ ले वो बोल ले। यह वाक्य यह नहीं दिखा रहा है कि थोड़ा-सा पढ़ कर अंग्रेजी बोल सकते हैं, बल्कि यह वक्तव्य यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति की इस भाषा को सीखने की कितनी प्रबल इच्छा है। क्योंकि बोलने की कला परिवेश से आती है और उसका परिवेश कभी उच्च-वर्गीय नहीं रहा, अतः उसकी भाषा भी कभी उच्च-वर्गीय नहीं हो नहीं हो सकती। यदि भाषा को ज्ञान का पैमाना बनाया जाए तो कभी-भी एक निम्न मध्यम वर्गीय, ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग उस स्तर तक नहीं पहुँच पाएँगे, जिस पर उनसे भी कम योग्यता के उच्च एवं उच्च मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के लोग आसानी से पहुँच जाते हैं। परिणाम स्पष्ट है कि इस व्यव्स्था में निम्न मध्यम-वर्गीय तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थी पिछड़ेंगे ही। जैसा कि फ़्रिंज इलाके के निजी स्कूलों के शिक्षकों तथा प्रचार्यों ने भी माना कि भाषा की वजह से निम्न मध्यम-वर्गीय एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि का विद्यार्थी शहरी पृष्ठभूमि के उच्च मध्यम-वर्गीय विद्यार्थी से पिछड़ ही जाता है। अब चाहे उसकी समझ कितनी ही व्यावहारिक क्यों न हो।

अब हम मनोवैज्ञानिक बंडूरा द्वारा प्रतिपादित सीखने के समाजिक सिद्धांत पर गौर करें तो पाएँगे कि व्यक्ति अपने सामाजिक आदर्शों के अनुरूप आचरण करने का प्रयास करता है। अक्सर व्यक्ति के प्रतिद्वंद्वी भी उसके आदर्श होते हैं क्योंकि व्यक्ति अपने आप को उनके स्तर तक पहुँचाना चाहता है। ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए उन्हें गँवारू कहने वाले उच्च मध्यम-वर्गीय घरों के शहरी बच्चे उसका आदर्श हैं क्योकि वे भी अपनी अपनी अंग्रेजी भाषा को अपने साथियों के समान बनाना चाहते हैं। पर चूँकि उसका सामाजिक वातावरण उनके साथियों से भिन्न है अतः भाषा के उच्चारण के विषय में कभी-भी उनके समान नहीं हो सकते। भाषा का वर्चस्व, सामाजिक वर्चस्व को बनाये रखने का एक बहुत बड़ा हथियार है। यह साँस्कृतिक पूँजी को एक सीमित वर्ग तक समेटे भी रखता है। अंग्रेजी बोलना सीख कर अर्थात् भाषा के ज्ञान द्वारा उस असमानता की खाई को तोड़ सकते हो, यह उससे भी बड़ा भ्रम है। यही भ्रम निम्न वर्ग के लोगों तथा ग्रामीण जनता में तेजी से व्याप्त होता जा रहा है। भाषा एक बिकाऊ माल है और इस माल को बेचने की प्रक्रिया में गली-नुक्कड़ पर खुले कोचिग सेंटर और स्कूल ही नहीं, अपितु विश्वविद्यालय तक शामिल हैं। लोग विटामिन-ई की कमी को दूर करने के लिए इंग्लिश बोलचाल सिखाने वाली कोचिंग की गिरफ्त में फँसते जाते हैं। 

आज आम जन की नज़र में भाषा ही शिक्षा का पर्याय बन गयी है, जो अंग्रेजी या परिष्कृत हिंदी बोलता है वह ही शिक्षित है, देहाती बोलियों को बोलने वाले गँवारू। इस प्रकार शिक्षा के बाकी सभी उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं और मानकीकृत भाषा बोलने की क्षमता को अर्जित करने का काम ही शेष रह जाता है। 

स्कूलों में अंग्रेज़ियत की मानसिकता किस प्रकार थोपी जा रही है, इस बात को स्पष्ट करने हेतु मैं एक और घटना का वर्णन करूँगा। मैं एक निजी स्कूल में प्राचार्य के साक्षात्कार हेतु गया था। चपरासी ने मुझे नया शिक्षक समझ लिया और शिक्षक-कक्ष में बैठा दिया। कुछ देर बाद एक बच्ची वहाँ आई। उसने वहाँ बैठे एक शिक्षक से कुछ पूछा। शिक्षक ने उसे पुनः बोलने के लिए अंग्रेजी में रिपीट करने को कहा। वह लड़की ग्रामीण परिवेश से सम्बन्ध रखती थी। उसने पुनः अपनी बात को उच्च स्वर में ग्रामीण लहजे वाली हिंदी में कहने का प्रयास किया, पर उस शिक्षक ने फिर से रिपीट  कहा और यह सिलसिला चार-पाँच बार तक चला। अंत में उस शिक्षक ने उसे बुरी तरह झिड़कते हुए कहा, “यु आर रीडिंग इन इंग्लिश मीडियम स्कूल एंड स्पीकिंग हिंदी।” मैं  यहाँ इस वाक्य का हिंदी अनुवाद नहीं करूँगा, आप खुद तय करें इंग्लिश की वकालत करने वाले वे महानुभाव खुद इंग्लिश की कितनी समझ रखते थे। मैं यहाँ चर्चा करूँगा तो सिर्फ़ उस फटकार के फलस्वरूप बच्चे पर पड़े मानसिक प्रभाव की। आप कल्पना कर सकते हैं कि इस मामूली-सी घटना ने उस लड़की के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव छोड़ा होगा? समस्या अंग्रेजी में नहीं है, समस्या इस अंग्रेजियत की मानसिकता में है। एक क्षण में उसे उसके अध्यापक ने उसे ना केवल उसकी भाषा-बोली से ही दूर किया, अपितु उसकी संस्कृति, समाज, परिवेश से भी काट दिया और इस क्रम में उसकी बोली, उसकी भाषा, उसकी संस्कृति, उसका परिवार, उसका गाँव सब एक-एक करके टूट कर अलग हो गया। यह सब कुछ पिछड़ेपन की निशानी है, आधुनिकता है तो वह है आदर्श समझें जाने वाली अंग्रेजी में बोलने की क्षमता। मैंने बाद में उस शिक्षक से बात की, मैंने उनसे कहा कि आप यह भी तो कह सकते थे कि आपने हिंदी में अच्छे तरह से अपनी बात कही, अब ज़रा आप मेरे लिए इसे अंग्रेजी में भी बोल दें। इस पर उसका पलट कर जबाब था, यदि मैंने इसे इस प्रकार ना रोका तो वह अपनी देहाती बोली से स्कूल के वातावरण को यूँ ही गन्दा करती रहगी।  मेरा अपने सहकर्मी को दिया गया सुझाव बड़ी तीव्र गति से प्रिंसिपल के कार्यालय तक पंहुँच गया। पाठकगण खुद विचार करें कि मुझे अपने इस सुझाव की क्या कीमत चुकानी पड़ी होगी। उन्होंने अगले दिन ही फरमान जारी कर दिया कि जो भी विद्यार्थी हिंदी अथवा गँवारू बोलियों को बोलेगा, उस पर ‘फाईन’ लगाया जाएगा। शिक्षकों के लिए भी फ़रमान था, ना ही पढाते वक्त, ना ही विद्यार्थियों से बात-चीत करते वक्त हिंदी का प्रयोग करें। देहाती बोलियों के प्रयोग करते पाए जाने पर तो सीधा टर्मिनेशन लैटर दिया जाएगा। चाहे विद्यार्थियों को समझ आए अथवा नहीं फ़रमान जारी हो चुका था कि सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी का ही प्रयोग होगा। ऐसा क्यों? इसका भी जबाब मिला एक रोज। मैं प्रिंसिपल कार्यालय में प्रिंसिपल से विचार-विमर्श करने हेतु बैठा था। तभी एक विद्यार्थी के माता-पिता वहाँ आ गए। प्रिंसिपल ने विद्यार्थी को बुला कर अंग्रेजी में कुछ रटे-रटाए सवाल पूछे। विद्यार्थी ने उसे अंग्रेजी में रटे-रटाए जबाब दे दिए। ग्रामीण परिवेश से सम्बन्ध रखने वाले माता-पिता के लिए यह किसी-भी आश्चर्य से कम नहीं था। इस अंग्रेजी बोलने की क्षमता ने शिक्षा के बाकी सभी उदेश्यों को काफी पीछे छोड़ ‘इंग्लिश कॉम्युनिकेशन’ को ही शिक्षा का उद्देश्य बना दिया। एक देहाती बच्चा भी अंग्रेजी के कुछ वाक्य बोल सकता है। इसका आसानी से अवलोकन किया जा सकता है, पर उसमें शिक्षा के फलस्वरूप सोचने-विचारने, प्रश्न करने, विश्लेषण करने की क्षमता कितनी विकसित हुई यह अवलोकन कर पाना काफी कठिन है। और इस बात की भी क्या गारंटी है कि वह स्कूली शिक्षा से ही हासिल हुई है क्योंकि व्यकि को शिक्षित करने में स्कूली औपचारिक व्यवस्था और स्कूल के बाहर का अनौपचारिक वातावरण, दोनों की सामंजस्यपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण की वज़ह से शिक्षा का पदार्थीकरण हुआ। निजी क्षेत्र के वर्चस्व के फलस्वरूप हुए ‘शिक्षा के पदार्थीकरण’ ने ‘अंग्रेजीकरण’ का रास्ता साफ किया है क्योंकि इस अंग्रेजीकरण की ढाल के सहारे ही अधकचरी शिक्षा रूपी पदार्थ को आसानी से बेचा जा सकता है। अतः अंग्रेजी बोलना ही शिक्षा के रूप में प्रचारित किया जाता है और जिस भाषा के साथ शक्ति/पावर जुड़ी हो, उसे बेचने से फ़ायदेमंद, शायद ही कोई दूसरा कार्य हो। 

हमारे देश का शिक्षा-व्यवस्था का ढाँचा कुछ इस प्रकार का है कि अधिकतर गरीब परिवार के विद्यार्थी स्कूल खत्म करने से पूर्व ही औपचारिक शिक्षा छोड़ देते हैं और इस प्रकार उच्च शिक्षा तक महज़ उच्च वर्ग के विद्यार्थी ही पहुँच पाते हैं। निम्न वर्ग और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों द्वारा औपचारिक शिक्षा छोड़ने की मुख्य वजह अंग्रेजी भी है। जैसा कि रमेश के पिता ने अपने अनुभवों को बताते वक्त कहा। पर यह बात सिर्फ़ रमेश के पिता के मामले में ही देखने को नहीं मिली, अपितु तमाम दूसरे मामलों के अध्ययन के दौरान भी सामने आई।  अंग्रेजी भाषा ने कहीं-न-कहीं लोगों को बाधित किया ही है। वे ही आगे ज्ञान की सत्ता के केन्द्रों तक पहुँच पाते हैं, जो अंग्रेजी भाषा में महारत रखते हैं। ज्ञान, पूँजी, नैकरशाही, राजनीति की सत्ता के केन्द्रों पर जमे लोगों कि भाषा चूँकि अंग्रेजी है, इसलिए समस्त समाज भी सत्ता के उन केन्द्रों तक पहुँचने की चाहत में ‘अंग्रेजी मैया’ की भक्ति करना अपना दायित्व समझता है। आज भी मेरे पास निम्न एवं निम्न मध्यम वर्ग के जितने लोग संपर्क में आते हैं, उनकी सिर्फ़ एक ही चाहत होती है- “किसी तरह अंग्रेजी बोलना सीख जाएँ।” यदि बीसीजी के इंजेक्‍शन की तरह विटामिन-इ अर्थात् अंग्रेजी का इंजेक्‍शन मिल जाए तो आज ही सभी अपने बच्चों को लगवा देंगे। कैन्सर की बीमारी के बाद भी कोई व्यक्ति बच जाए, पर जिसे अंगरेजी नहीं आती वह तो इस समाज के ऊपरी पायदान पर सर्वाइव ही नहीं कर सकता। अंग्रेजी बोल पाने की क्षमता ही उसकी हैसियत को निर्धारित करती है। लोगों को लगता है कि अंग्रेजी में बोलना सीखते ही उनकी सामाजिक हैसियत का अंतर खत्‍म हो जाएगा और वे भी समाज के उच्च वर्ग के समकक्ष  आ जाएँगे। इस अंग्रेजी का प्रसार गोरे-अंग्रेजों के युग में कम, काले अंग्रेजों के युग में अधिक हुआ है। कारण स्पष्ट है- सत्ता हस्तान्तरण के पश्चात् उच्च श्रेणी सरकारी नौकरियों के दरवाजे भारतीयों के लिए भी खुले। पर सत्ता के इन केन्द्रों तक पहुँचने के लिए अंग्रेजी किसी-ना-किसी रूप में अनिवार्य ही रखी गयी। उच्च शिक्षा के दरवाजे भी सिर्फ़ अंग्रेजी के जानकारों के लिए ही खुले। यहाँ यह सवाल उठता है कि यह किस प्रकार एक किसान की उत्पादकता को बढ़ा सकती है या बढ़ई की कारीगरी में सहायक हो सकती है या सड़क पर मज़दूरी करने में सहायक हो सकती है? यह स्पष्ट नहीं है। हाँ! इन सबको दबाये रखने में सहायक है। इस प्रकार पर गाँव के किसान से लेकर शहर के मज़दूर तक सभी की शिक्षा की संकल्पना अंग्रेजी तक आकार ही सिमट कर रह जाती है। इस स्थिति को देखते हुए अंग्रेजी रोज़गार उपलब्ध करने में कितनी सहायक होगी, यह कहना तो बड़ा मुश्किल है, पर हाँ! यह मानसिकता सम्पूर्ण सामाजिक ताने-बाने को तोड़ कर मानसिक गुलामों की फौज़ तैयार करने के लिए पर्याप्त है। संयुक्त परिवारों का टूटना, पब और क्लब संस्कृति का जन्म, आदि इसी अंग्रेजियत के वर्चस्व का ही परिणाम है। इस प्रकार अंग्रेजियत रोज़गार का अवसर उपलब्ध कराए या ना कराए, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उपभोक्ता अवश्य तैयार कर देती है। अंग्रेजी का भूत इस तरह हावी है कि आज हमारे समाज का मध्यम वर्ग इसी श्रेष्ठता मनोग्रंथि का शिकार है। फलस्वरूप अंग्रेजीकरण की होड़ तथा भाषा की शुद्धता के सवाल ने समाज में अलगाव पैदा कर दिया है। सोचिये इस मानसिकता के साथ जिस बच्चे की परवरिश तथा शिक्षा-दीक्षा होगी, वह समाज को किस दिशा में ले जाएगा? यह बात सिर्फ़ उच्च मध्यम वर्ग तक ही सीमित रहती तो बात कुछ और थी। ये उच्च वर्ग के वर्चस्व प्राप्त लोग बाकी समाज के लिए एक मॉडल बन जाते हैं। फलस्वरूप समाज के बाकी वर्ग भी अपने आप को इसी साँचे में ढ़ालने का प्रयास करते हैं। अंग्रेजी सीखने की होड़ में जो व्यक्ति अंग्रेजी तो सीख लेता है वह श्रेष्ठता-ग्रंथी तथा जो नहीं सीख पाता वह हीनता-ग्रंथी का शिकार बन कर रह जाता है। वह इस अंग्रेजियत के चक्कर में वास्तविक शिक्षा से काफी पीछे छूट जाता है। व्यवस्था के कर्णधारों द्वारा प्रसारित भ्रम के फलस्वरूप आज हमारी सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था ज्ञान, क्षमता एवं कौशल नहीं अहर्ता और अंग्रेजियत पैदा करने की फैक्टरी मात्र बन कर रह गयी है और शिक्षक इन अहर्ताओं को पैदा करने का एक एजेन्ट ! अब चूँकि अहर्ता प्राप्त करने हेतु परीक्षाओं को उत्‍तीर्ण करना होता है अतः यहाँ शिक्षण की एक नई अवधारणा उभर कर आती है, वह यह कि शिक्षण वह प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक रूपी व्यक्ति अपने विद्यार्थियों को परीक्षाओं को पास करने की कला सिखाता है। इस उदेश्य के लिए ही उसे हर प्रकार से ड्रिल कराता है और वह भी अंग्रेजी माध्‍यम से।’

इस प्रकार, शिक्षक की भूमिका विद्यार्थियों में वैज्ञानिक चिंतन जागृत करने वाले की नहीं, अपितु परीक्षा पास करने वाले सहायक भर की रह जाती है। यदि अहर्ताएँ ही अंतिम सत्य हैं तो उन्‍हें प्राप्त करने हेतु अपनाए गए अलग-अलग तरह के हथकण्डों में बुराई कैसी? शिक्षक के रूप में काम करने वाला व्यक्ति कोई एलियननहीं है, वह भी इस समाज का ही है, और इस समाज के सभी पूर्वाग्रह और बुराइयाँ भी साथ लेकर आया है। शिक्षक बनने का उसका उद्देश्य महज रोज़गार हासिल करना होता है। यह व्यक्ति विषय एवं शिक्षक-केन्द्रित शिक्षक न बन कर विद्यार्थी-केन्द्रित शिक्षक बने, यह उसकी रूढ़ियों से लड़ने की क्षमता पर निर्भर करता है और साथ ही हवा के विपरीत बहाव में कितनी अडिगता से वह खड़ा रह सकता है, इस बात पर भी निर्भर करता है। समाज की शिक्षा के प्रति अवधारणा, विषय एवं शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण को ही मान्यता प्रदान करती है ना कि बाल-केंद्रित शिक्षण को।   

 

 

 

रटन्त शिक्षा के बोझ को दर्शाता एक कार्टून....

इंग्लिश मीडियम ने लोगों के मानस पर स्थापित कर दिया है कि शिक्षा का मतलब अंग्रेजी में रटना और क्लास पास करना, डिग्री लेना

शिक्षा = इंग्लिश में रटना और उसे इंग्लिश में बोल कर उगलना

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