प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए है..’आरक्षण’ की व्यवस्था । मनुवादी-ब्राह्मणवर्चस्ववादी व्यवस्था से उपजी समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही है 'आरक्षण' की व्यवस्था...
प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए है..’आरक्षण’
की व्यवस्था
मनुवादी-ब्राह्मणवर्चस्ववादी व्यवस्था से उपजी
समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही है 'आरक्षण' की
व्यवस्था...
ब्राह्मणवादी
व्यवस्था से उपजी समाजिक गैरबराबरी की प्रतिक्रिया ही 'आरक्षण' की वर्तमान व्यवस्था है। आरक्षण आर्थिक नहीं
समाजिक गैरबराबरी समाप्त करने का व्यवस्थागत प्रयास भर है। समाज के हर तबके का
व्यवस्था में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए। आज आरक्षण को लेकर पक्ष विपक्ष
आमने सामने है। ना ना तरिके से इस मुद्दे पर भटकाने का प्रयास किया जा रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इसका फायदा आर्थिक रूप से कमजोर समाज के नीचले तबके तक
नहीं पहुंच पाया है। परंतु आरक्षण की व्यवस्था ने जिस प्रतिवाद को जन्म दिया, उस प्रतिवाद
से इंकार नहीं किया जा सकता है। वह वाद है जन्म के आधार पर समाजिक रूप से
श्रेष्ठता के आरक्षण का ।
आज,
आरक्षण के माध्यम से समाज के एक तबके को ऊपर उठाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई
क्योकि भारतीय समाज में एक बड़े तबके को जन्म के आधार पर अछूत माना जाता रहा है ।
क्यों पिछले 5000 सालों से, कर्म की वकालत करने वाली गीता की पूजा करने वाले,
सिर्फ जन्म के आधार पर, एक बच्चे को श्रेष्ट और दूसरे को अछूत घोषित करते रहे है? याद करे! कुत्ते-बिल्ली
जैसे जानवरों को गोद में खिलाने वाले उच्च वर्ण का व्यक्ति शुद्र जाति में जन्में
बच्चे की परछाई से भी अपवित्र हो जाते थे। जगदगूरू की उपमा से नवाजी भारतीय
संस्कृति की विडंबना ही है कि यहाँ ब्राह्मण कुल में जन्मा एक व्यक्ति जन्म लेते
ही पूजनीय और शुद्रवर्ण में जन्मा आजीवन प्रतांडना का भोगी बनता है। इस वर्ण से
संबंध रखने वाले तबके को शिक्षा और तमाम तरह की शासकीय भूमिकाओं से वंचित रखा जाता
रहा। किसी जमाने में इन्हें शिक्षित होने का अधिकार तो दूर, ऐसे लोगों द्वारा यदि
वेदों के पाठ भी गलती से सुन भी दिया जाता तो उन्हें मारने तक का हुक्म दे दिया
जाता । ऐसा हम किसी और आधार पर नहीं मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम के राजकाज के वर्णन
के आधार पर कह रहे है। तमाम धर्मग्रंथ शुद्रों के साथ हुई गैरबराबरी की गवाही करते
है।
योग्यता
के आधार पर आरक्षण का विरोध करने वालों ने आज तक मंदिरों में ब्राह्मण जाति के
आरक्षण का विरोध क्यो नहीं किया? आरक्षण
को यदि खत्म करना है, तो आप उसका प्रारंभ मंदिरों से ही कीजिये । कुछ समय पूर्व तक तो हालत यह थी कि पुजारी तो दूर
निम्न जाति के भक्त को भी मंदिर में जाने की इजाजत तमाम पुजारियों के पद जो आज तक
ब्राह्मण जाति में जन्में व्यक्ति के लिए आरक्षित है,
उन पदों पर
ब्राह्मणों का आरक्षण समाप्त कर सभी जातियों से पुजारी बनाए जाने चाहिए। मंदिरों का प्रयोग भगवान से
मिलाने के लिए होता है या नहीं, पर समाजिक गैर-बराबरी को बनाए रखने के लिए जरूर
होता रहा है। समाज के धन का बड़ा सरप्लस इन मंदिरों में जमा रहा है। उस सरप्लस
मतलब समाज की बचत पर परिवार और उसके विस्तार जाति के अधिकार को सुनिश्चित करने के
लिए। इन मंदिरों से आने वाले आदेशों ने ही वर्ण व्यवस्था के को सुदृढ़ और जाति
व्यवस्था को स्थाई किया। यदि एक ही गोत्र में विवाह अनुवांशिक आधार पर अनुचित तो,
एक ही जाति में विवाह किस आधार पर उचित है। जब तक इस आरक्षण को ख़त्म नहीं किया जाता
तब तक इस समाजिक गैरबराबरी को पाटने के लिए सरकारी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व को
सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की जरूरत रहेगी ही रहेगी । अतः आरक्षण ख़त्म करना है,
तो जातीय उन्मूलन का मार्ग अपनाए। अंतः जाति विवाहों को बढ़ावा दे।
बाकलम –अश्विनीकुमार ‘सुकरात’ - 9210473599, 8178499080

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