गांधी मार्ग सॆ ही कामरेड जनता के बीच पहूंच सकते हैॆ।

 जमीनी हकीकत से कहीं दूर,  कमरेड साहब! समझने में असफल रहे कि समाज की जमीनी हकीकत क्या है?  उस दौर में जिस दौर में कांग्रेस चंद सम्मानित लोगों तक ही सीमित थी,  उस दौर में गांधी आए और  समाज के सबसे निचले क्रम  में  घुसपैठ कर गए।  यदि भगत सिंह को छोड़ दिया जाए तो आज तक कोई भी कामरेड नेता  समाज के निचले क्रम को अपने साथ नहीं ले पाय़ा है। कॉमरेड कामरेड महज़ बौद्धिक जुगाली तक ही सीमटे रहे।  और दक्षिणपंथी  संघी  जन्म मुद्दों को उठाकर,  अपने साथ बहा ले गये।  कामरेडों को जनता के साथ  कैसे जुड़ना है यह सीखना है तो उन्हें RSS की कार्यप्रणाली का अध्यन करना होगा।  गांधी की अहिंसा का मार्ग ही वह रास्ता है, जिस पर चलकर आज राजसत्ता से मुकाबला किया जा सकता है।  वरना वरना आप सबको खत्म करने के लिए राजसत्ता के पास अच्छा असला बारुद है।  और सबसे बड़ी बात,  पूंजी पतियों का संरक्षण करने वाली इस राजसत्ता को  आप सब आप से मुकाबला करने के लिए आपकी बिरादरी के लोगों  को ही सेना और अर्धसैनिक बलों  में भर्ती कर रखा है। मरने वाला चाहे जनसमान्य व्यक्ति हो या पुलिस या अर्धसैनिक बल ,  वह समाज के सबसे निचले क्रम का व्यक्ति है। पूंजीपति और धन्नासेठों को नौकरी करने के लिए सेना में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह का सैन्य या हिंसक  मुकाबला अंततः पूंजीपति और सामंतों को ही ताकतवर बनाता है।  ऐसे संघर्षों का एक जबरदस्त फायदा यह होता है कि समाज का निचला क्रम निचले क्रम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। क्योंकि दोनों ही स्थिति में मरने वाले  और मारने वाले समाज के निचले क्रम से होते हैं।  राजसत्ता की  आड़ में छुपे  पूंजीपति  और उनके संरक्षक राजनेता बड़ी आसानी से जनता को गुमराह करने में सफल होते हैं।  जनता फिजूल के विवादों में फंस जाती है,  राजनेता चोर दरवाजे से पूजी पत्तियों और धन्नासेठों का काम करके निकल जाते हैं। आज जनता को सबसे पहले प्रायोजित मीडिया के चुंगल से बचाना है। आज मीडिया, 24 घंटे लगातार चलने वाली  मीडिया एक खास तरह का मायाजाल बुनने का काम कर रही है।  देशभक्ति की दुहाई देकर पूरे दिन चलने वाले चैनलों को 2-4 मुद्दों तक ही समिति रखा जाता है।  और चोर दरवाजे से  मीडिया उन सब कामों पर पर्दा डाल देता है, जो जनहित के होते हैं या जंनहितों  को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं।  जनता भी इतनी समझदार नहीं कि वह चाल को समझ सके।  ऐसी स्थिति में कॉमरेड़ो  का दायित्व जनता के साथ लगातार संपर्क बनाकर जनता को अपने निर्णय खुद लेने के काबिल बना।  वैसे तो कामरेड बंधुओं को बंद कमरे में होने वाली बौद्धिक जुगाली में ही आनंद आता है। यदि जाएंगे भी तो सीधे व्यवस्था परिवर्तन की बात करेगे। जनता को उनकी बात समझ नहीं आती। सोसलिस्ट वर्कर पार्टी से राजेश त्यागी जैसे अति बौद्धिक छमता के कामरेड  तो जनता को सीधे  अंतराष्ट्रीय बना देते है। स्थानीय समस्याओं से जूझ रही  जनता का  सीधा अंतर्राष्ट्रीयकरण की समझ से परे है।  फलस्वरूप  कामरेड जमीनी हकीकतो और जमीनी सच्चाई से कटे हुए हैॆॆॆ।  कामरेडों को यदि जनता के बीच पहुंचना है तो उनके लिए एक ही रास्ता बचता है वह है गांधीमार्ग।  जनता के बीच जाओ जनता के साथ मिलकर दिन प्रतिदिन की समस्याओं पर काम करो। बौद्धिक जुगाली निकालने से पहले या मार्क्स के जमीनी हकीकत से कहीं दूर,  कमरेड साहब! समझने

में असफल रहे कि समाज की जमीनी हकीकत क्या है?  उस दौर में जिस दौर में कांग्रेस चंद सम्मानित लोगों तक ही सीमित थी,  उस दौर में गांधी आए और  समाज के सबसे निचले क्रम  में  घुसपैठ कर गए।  यदि भगत सिंह को छोड़ दिया जाए तो आज तक कोई भी कामरेड नेता  समाज के निचले क्रम को अपने साथ नहीं ले पाय़ा है। कॉमरेड कामरेड महज़ बौद्धिक जुगाली तक ही सीमटे रहे।  और दक्षिणपंथी  संघी  जन्म मुद्दों को उठाकर,  अपने साथ बहा ले गये।  कामरेडों को जनता के साथ  कैसे जुड़ना है यह सीखना है तो उन्हें RSS की कार्यप्रणाली का अध्यन करना होगा।  गांधी की अहिंसा का मार्ग ही वह रास्ता है, जिस पर चलकर आज राजसत्ता से मुकाबला किया जा सकता है।  वरना वरना आप सबको खत्म करने के लिए राजसत्ता के पास अच्छा असला बारुद है।  और सबसे बड़ी बात,  पूंजी पतियों का संरक्षण करने वाली इस राजसत्ता को  आप सब आप से मुकाबला करने के लिए आपकी बिरादरी के लोगों  को ही सेना और अर्धसैनिक बलों  में भर्ती कर रखा है।   मरने वाला चाहे जनसमान्य व्यक्ति हो या पुलिस या अर्धसैनिक बल ,  वह समाज के सबसे निचले क्रम का व्यक्ति है। पूंजीपति और धन्नासेठों को नौकरी करने के लिए सेना में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह का सैन्य या हिंसक  मुकाबला अंततः पूंजीपति और सामंतों को ही ताकतवर बनाता है।  ऐसे संघर्षों का एक जबरदस्त फायदा यह होता है कि समाज का निचला क्रम निचले क्रम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। क्योंकि दोनों ही स्थिति में मरने वाले  और मारने वाले समाज के निचले क्रम से होते हैं।  राजसत्ता की  आड़ में छुपे  पूंजीपति  और उनके संरक्षक राजनेता बड़ी आसानी से जनता को गुराह करने में सफल होते हैं।  जनता फिजूल के विवादों में फंस जाती है,  राजनेता चोर दरवाजे
से पूजी पत्तियों और धन्नासेठों का काम करके निकल जाते हैं। आज जनता को सबसे पहले प्रायोजित मीडिया के चुंगल से बचाना है। आज मीडिया, 24 घंटे लगातार चलने वाली  मीडिया एक खास तरह का मायाजाल बुनने का काम कर रही है।  देशभक्ति की दुहाई देकर पूरे दिन चलने वाले चैनलों को 2-4 मुद्दों तक ही समिति रखा जाता है।  और चोर दरवाजे से  मीडिया उन सब कामों पर पर्दा डाल देता है, जो जनहित के होते हैं या जंनहितों  को नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं।  जनता भी इतनी समझदार नहीं कि वह चाल को समझ सके।  ऐसी स्थिति में कॉमरेड़ो  का दायित्व जनता के साथ लगातार संपर्क बनाकर जनता को अपने निर्णय खुद लेने के काबिल बना।  वैसे तो कामरेड बंधुओं को बंद कमरे में होने वाली बौद्धिक जुगाली में ही आनंद आता है। यदि जाएंगे भी तो सीधे व्यवस्था परिवर्तन की बात करेगे। जनता को उनकी बात समझ नहीं आती। सोसलिस्ट वर्कर पार्टी से राजेश त्यागी जैसे अति बौद्धिक छमता के कामरेड  तो जनता को सीधे  अंतराष्ट्रीय बना देते है। स्थानीय समस्याओं से जूझ रही  जनता का  सीधा अंतर्राष्ट्रीयकरण की समझ से परे है।  फलस्वरूप  कामरेड जमीनी हकीकतो और जमीनी सच्चाई से कटे हुए हैॆॆॆ।  कामरेडों को यदि जनता के बीच पहुंचना है तो उनके लिए एक ही रास्ता बचता है वह है गांधीमार्ग।  जनता के बीच जाओ जनता के साथ मिलकर दिन प्रतिदिन की समस्याओं पर काम करो। बौद्धिक जुगाली निकालने से पहले या मार्क्स के सिद्धान्त को आंख बंद करके प्रस्तुत करने से पहले  जनता के साथ रचनात्मक कार्यों के माध्यम से जुड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण है। बात बेबात पर संस्कृति की खिल्ली उड़ाना,  तौर-तरीकों की खिल्ली उड़ाना,  यह सब कामरेडों के मार्ग में सबसे बड़ी भाषा है।  यह सब ही जनता  का कामरेडों के साथ जुड़ाव में बाधक है। 

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