‘इंग्लिश मीडियम’,
दैट इज ‘अंग्रेजी राज’
:
‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की व्यवस्था पर ‘सांस्कृतिक ठप्पा’
कार्टून (साभार)- आर के लक्ष्मण, टाईमस आफ इंडिया, एनसीइरटी
प्रस्तावना
भगत सिंह ने कहाँ था, “मुझें विश्वास है कि आने वाले 15-20 सालों में ये गौरे मेरे देश को छोड़ कर जाएगे । पर मुझें डर है कि आज जिन पदों पर ये ‘गौरे अंग्रेज’ विराजमान है, उस पर यदि ‘काले अंग्रेज’ विराजमान हो जाएगे तो हमारी लड़ाई और भी कठीन हो जाएगी ।” भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद “गौरे अंग्रेज” तो चले गये । पर जाते जाते वे सत्ता ‘मैकाले के मानस पुत्रों’ अर्थात “काले अंग्रेजों” को सौप गये । फिर क्या था, सरकार बदली, झंडा बदला, रंगाई-पुताई के साथ राज-व्यवस्था को भी नया रंग रूप मिला, पर राजसत्ता का ढ़ाचा नहीं बदला । जी हाँ ! राजसत्ता का स्वरूप वही का वही रहा । एक तरिका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज तीस-चालीस करोड़ अविभाजित हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे । यह तंत्र ही विरासत के रूप में काले अंग्रेजों को प्राप्त हुआ ।
26 जनवरी 1950 में लागू हुए संविधान के माध्यम से एक तरफ तो “हम भारत के लोग” के लिए समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कही गयी है । नागरिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धान्तों के माथ्यम से ऩए भारत के उदय की उम्मीद जगायी गयी । वही संविंधान के अनुच्छेद 147, 343(1) & (2), 348 के आड़ में लुट- खसोट के पुराने तंत्र को कायम रखा गया है । जी हाँ ! हिन्दी को राज भाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) एक तरफ तो हिन्दी बैल्ट माने जाने वाले क्षेत्र के लोगों में तत्सम प्रधान तथाकथित हिन्दी के राष्ट्र भाषा होने का भ्रम पैदा करती है और दूसरी तरफ गैर हिन्दी भाषी माने जाने वाले क्षेत्रों में हिन्दी भाषी लोगों के वर्चस्व का भय जगाती है । फलस्वरूप ‘तथाकथित हिन्दी भाषी’ और तथाकथित गैर हिन्दी भाषी एक दूसरे के प्रतिद्वंधी बन जाते है । इस प्रकार 343(1) की आड़ में ही अनुच्छेद 343 (2), 348, और 147 ही नहीं 343 से लेकर 351के सभी अनुच्छेद अन्तः इंग्लिश के वर्चस्व को ही कायम रखते है। हम भारत के लोगों के सामने अनुच्छेद 350, 350A, 350B और 351 के माघ्यम से व्यक्तिगत गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता के भ्रम पैदा करने वाले माया जाल को पैदा किया गया है । हकिकत में मूलतः अंग्रेजी में रचित यह संविघान अंग्रेजी के वर्चस्व को ही बनाये रखता है । अंग्रेजी का वर्चस्व विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर, अवसर को अंग्रेजी भाषी तबके तक सीमित रख, हम भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय से वंचित रखता है । जहाँ तक बंधुता का सवाल है – उसे खतम करने का महान काम अनुच्छेद 343(1) करता है ।
जी हाँ ! इंग्लिश मीडियम स्कूल ही नहीं होते इंग्लिश मीडियम अदालते भी होती है । इंग्लिश मीडियम संसद के कानून भी होते है, पी.एम.ओ. समेत सम्पूर्ण नौकरशाही का ढ़ाचा इंग्लिश मीडियम है । स्कूल तो बेचारे इसलिए इंग्लिश मीडियम खुलते है क्योकि ये सभी संस्थानें इंग्लिश मीडियम है । ..और इन सबकों पोसने का काम इंग्लिश मीडियम विश्वविद्यालय करते है । यही अल्प तंत्र ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ है । यह ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ही शोषण और गैर-बराबरी के अल्पतांत्रिक-पंगू-पंजीवादी किले को बनाए रखने वाली सांस्कृतिक दीवार को पुख्ता करने का काम करती है । सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख कर, यह सिस्टम उस किले के चारों और भ्रष्टाचार की सड़ांध वाली दलदली जमीन निर्मित करता है । बीना इस ‘इंग्लिश मीडियम तंत्र’ को नस्तेनाबूर किए , न तो भ्रष्टाचार की गंदगी दूर किया जा सकता है और न ही समाजिक और आर्थिक गैरबराबरी को बनाए रखने वाली किले की दीवार को ही ढ़हाया जा सकता है । आम जनता की समझ से परे की भाषा का अल्पतंत्र ही आम जनता को भ्रम और असमंजस की स्थिति में रखता है ।
इस पुस्तक का मूलभाग लेखक के शोध कार्य ‘अंग्रेजी माध्यम स्कूलों’ तथा जन समुदाय के मध्य हुई सामाजिक-सांस्कृतिक अन्तः क्रियावों के फलस्वरूप ‘जन सामान्य’ के सांस्कृतिक मूल्यों’ पर पड़ने वाले प्रभाव का ‘विशलेषणात्मक-मूल्यांकन’ (विशेषतः) ‘बाल केन्द्रित पाठ्यचर्चा’ को लागु करने के संदर्भ में ” पर आधारित है । दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में जमा कराए, इस शोध के अध्ययन के दौरान और उससे भी पहले मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों में पाया कि किस प्रकार ‘इंग्लिश मीडियम केन्द्रित एजुकेशन (शिक्षा)’ व्यवस्था राजव्यवस्था के एजेंट के रूप में ग्रामीण-कस्बआई-निम्न एवं निम्नमध्यम वर्गीय पृष्टभूमि के 90% लोगों को सिस्टम से बाहर करती है । ..और इस प्रकार सत्ता के तमाम केन्द्रों की बागडोर 1-2% मैकाले के मानस वंसजों के हाथ में बनाए रखने का काम करती है । सांस्कृतिकरण के टूल के रूप में ‘मीडियम केन्द्रित एजुकेशन सिस्टम’ 5-8% लोगों का ‘सांस्कृतिकरण’ ‘सिस्टम’ की जरूरत के अनुरूप मानक भाषाओं में करता है । ये 5-8% लोग ही सिस्टम के विभिन्न पायदानों पर सिस्टम के भागीदार बनते है । इन 5-8% लोग के हिस्से ही सिस्टम की मलाई पहुँच पाती है । ये लोग ही सिस्टम के सांस्कृतिक दलाल के रूप में स्थापित होते है । और फिर क्या शेष समाज उनके पीछे भेड़ो की तरह चल पड़ता है । वे शेष समाज के लिए आदर्श बन जाते है ।
इस देश में शिक्षा तो उसी दिन राज-व्यवस्था के हाथ का खिलौना बन गयी, जिस दिन स्वायत पाठशाला व्यवस्था को भंग करने के लिए ब्रिटिश कम्पनी हुकूमत ने स्कूली व्यवस्था की नींव डाली थी । भारत में स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा का संपूर्ण ढ़ाचा कम्पनी एवं ब्रिटिश राज में खड़ा किया गया है और आज भी तमाम सतही प्रयासों के बावजूद भी औपनिवेशिक जरूरत के अनुरूप ही है । औपचारिक शिक्षा के संस्थान के रूप में स्कूल और विश्वविद्यालय राजसत्ता की उप व्यवस्था ही है और ये राजसत्ता की जरूरत के अनुरूप समाजिक स्तरीकरण का काम करते है । अतः स्कूल इसलिए इंग्लिश मीडियम है क्योकि राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है । ..और राजसत्ता इसलिए इंग्लिश मीडियम है क्योकि ‘परदेशी इंग्लिश’ राजसत्ता को एक दो प्रतिशत इंग्लिश-हिग्लिश लोगों तक समटे रखने का सबसे आसान और कारगर साधन है । इंग्लिश सिर्फ भाषा नहीं है, यह तो शासक और शासितों के मध्य अन्तर बनाने का साधन है । अतः इंग्लिश हम भारत के लोगों को न केवल नियंत्रित अपितु भ्रमित रखने का सबसे आसान साधन है ।
जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक सांस्कृतिक भाषाओं में समान स्कूली व्यवस्था की बात सोचना तक बेवकूफी है । जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, बच्चों की सांस्कृतिक परिवेश में बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र की बात हम भारत के लोगों के साथ बेमानी और धोखा है । जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, शिक्षा का सार्वभौमिकरण (संविधान का अनुच्छेद 21A) महज़ एक युटोपिया है । कॉमन स्कूल की लड़ाई को खतम कर उसकी आड़ में इंग्लिश मीडियम प्राईवेट स्कूलों में 25% EWS कोटे की दूकानदारी है । जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक इंग्लिश मीडियम स्कूलों की भेड़ चाल को रोक पाना असंभव ही नही नामुमकिन ही है । ..और जब तक शिक्षा की व्यवस्था इंग्लिश मीडियम है तब तक ही राजव्यवस्था 1-2% अंग्रेजी भाषी लोगों के हाथों में सुरक्षित है ।
अथः शिक्षा को मुक्तिदाई, काम आघारित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक बनाने के लिए राजसत्ता को इंग्लिश मीडियम के नियंत्रण से मुक्त करने की जरूरत है ।
लेखक एवं शोधकर्ता
अश्विनी कुमार
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