प्रिय साथियों,

मैं अपनी पुस्तक जिसका शीर्षक है, इंग्लिश मीडियम दैट इज अंग्रेजी राज की एक प्रति आपको भेज रहा हूँ । यह पुस्तक शोध पर आधारित है । इस पुस्तक को लिखने से पूर्व किए गये अध्ययन के दौरान मैंने पाया कि अंग्रेजी भाषा  देश के सभी भागों अर्थात्त उत्तर, दक्षिण पूरब, पश्चिम क्षेत्र के हर कोने के ग्रामीण, कस्बाई, स्लम, निम्न एवं निम्न मध्यम वर्गी आबादी के समक्ष एक बाधा के रूप में खड़ी है । भाषा के रूप में अंग्रेजी में अपने आप में कोई बुराई नहीं है । पर व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी देश के 95लोगों को मुख्यधारा से काटे रखने का काम ही करती है । ये व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व ही है जिसने लोगों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ भागने को विवश किया है ।   लोगों का अंग्रेजी प्रेम पतंगे और शमा का प्रेम है । पतंगा जानता है कि शमा उसे जला देगी । पर फिर भी वह शमा की तरफ जाता है । इसी प्रकार लोग जानते है कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाली शिक्षा कभी उन्हें आगे बढ़ने  नहीं देगी, फिर भी वे अंग्रेजी माध्यम की तरफ भागते है । परिणाम भी अपेक्षित ही निकलता है। देश के ग़रीब वर्ग(90%) के 99लोग बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते है । जो 1% गलती से काम्याब हो जाते है वे शेष 99के आदर्श के रूप में स्थापित हो जाते है । इस प्रकार देश की 3अमीर , एलिट आबादी की सत्ता सुरक्षित रहती है ।
अंग्रेजी माध्यम वाली व्यवस्था कि वजह से जितनी आत्महत्या उत्तर भारत में हुई उससे कम दक्षिण में नहीं हुई । अंग्रेजी के वर्चस्व वाली व्यवस्था में न  तो मौलिक ज्ञान संभव है न रचनात्मक चिंतन । अतः  अंग्रेजी-वाद के वर्चस्व के खिलाफ़ भारतीय भाषाओं के अधिकार की लड़ाई अखिल भारतीय स्तर पर लड़े जाने की जरूरत है । इसमें तमिल, तेलगू , गुजराती, बंगला, सभी को एक प्लेटफार्म पर लाने की जरूरत है । जब बैलज़ियम जैसा छोटे से देश की शासन और शिक्षा व्यवस्था दो भाषाओं में चल सकता है तो भारत का शासन और शिक्षा व्यवस्था भारत की भाषाओं में क्यो नहीं ???
लोकतंत्र में शासन मे जनता की सह भागिता तब ही आ सकती है जब शासन जनता की अपनी भाषा में हो ।
अतः भारत की भाषाओं को एक प्लेटफार्म पर लाने की जरूरत है । भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा कर अभी तक अंग्रेजी का राज चलता रहा है ।
अतः अब हिन्दी नहीं हिन्दुस्तानी, तमिल, तेलगू, बंगला पंजाबी की एक कहानी । 



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