बुलैट ट्रेन हटाओं-भारतीय रेल बचाओं
खस्ताहाल की जा रही भारतीय रेल बनाम बुलैट ट्रेन प्रोजेक्ट

500 किलोमीटर के रूट लाईन पर बुलेट ट्रेन चलाने से 12 शहरों को फायदा होगा। पर उस बुलेट ट्रेन को चलाने के लिए गये कर्ज को चुकाने में देश के खनिज संसाधनों का कण-कम बिक जाएगा।बुलेट ट्रेन के लिए आबंटित धन से तो 150 एम्स​ खुल सकते है या गांव-गांव तक स्कूल-कॉलेज,आईटीआई, हस्पताल आदि खोले जा सकते है। रेल के ढ़ाँचे को दुरुस्त किया जा सकता है। बुलेट ट्रेन के लिए गये कर्ज को चुकाने में ये देश कैसे बर्मबाद होगा यह इस पत्र में उजागर करने का प्रयास किया है ।साथियों!! मैं आपसे आग्रह करूगा कि आपकी प्रतिष्ठित पत्रिका में साथ संलग्न पत्र को स्थान दे । ज्यादा से ज्यादा शेयर करे!


सेवा में,
1.         माननीय राष्ट्रपति महोदय, राष्ट्रपति भवन, नई  दिल्ली ।
2.         माननीय प्रधानमंत्री महोदय, प्रधानमंत्री कार्यालय, नई दिल्ली ।
3.         माननीय रेल मंत्री, नई दिल्ली ।
4.         माननीय कैबिनेट मंत्रीमंडल, प्रधानमंत्री कार्यालय, साऊथ ब्लाक, नई दिल्ली ।
5.         माननीय सांसदगण लोकसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
6.         माननीय सांसदगण राज्यसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
7.         माननीय याचिका समिति, लोकसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
8.         माननीय याचिका समिति, राज्यसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
9.         माननीय नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
10.       माननीय नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा, संसद भवन, नई दिल्ली ।
13.       संपादक, समस्त निष्पक्ष जनसंचार माध्यम(प्रिंट-इलैक्ट्रोनिक आदि)

खुला पत्र / ज्ञापन
विषय :-
बुलैट ट्रेन हटाओं-भारतीय रेल बचाओं
खस्ताहाल की जा रही भारतीय रेल बनाम बुलैट ट्रेन प्रोजेक्ट
                                                               
        I.             504 किलोमीटर के रूट लाईन पर बुलेट ट्रेन चलाने से 12 शहरों को फायदा होगा। पर उस बुलेट ट्रेन को चलाने के लिए गये कर्ज को चुकाने में देश के खनिज संसाधनों का कण-कम बीक जाएगा। क्योकि अंतऱाष्ट्रीय मुद्रा में लिया गया कर्ज अंतराष्ट्रीय मुद्रा में ही चुकाया जाता है। येन में लिया कर्ज चुकाने के लिए भारत के पास है क्या? छतीसगढ़, झारखण्ड, उत्तर पूर्व आदि की खनिज संपदा ही न!! 12 शहरों को अमीर बनाने के चक्कर में कही पूरा देश और अधिक गरीब न हो जाए।  क्यों बुलेट ट्रेन की जगह भारतीय रेल में निवेश करना जरूरी है, इसे ही इस पत्र में उजागर करने का प्रयास किया गया है।
     II.            अनिल काकोदकर समिति की सिफरशों के अनुरूप बुलेट के लिए आबंटित धन को यदि भारतीय रेल पर खर्च किया जाए तो काकोदर समिति की 105 सुरक्षा एवं गुणवता सुधार सिफारशों लागू हो सकती है। अतः एक 504 किलोमीटर के छोटे से रूट पर बुलैट ट्रेन के लिए निर्धारित धन को खर्च करने के स्थान पर देश की जनता के खुन पसीने की कमाई और देश के खनिज संसाधनों के बदले लिए गये कर्ज का 1.20 लाख करोड़ बुलैट ट्रेन पर खर्च करने के स्थान पर यदि सरकार 1,20,000 किलोमीटर लम्बे घीसते रेल नैटवर्क को दुरुस्त करे एवं रेलों से जुड़े अन्य अधोसंरचना( इंफ्रास्ट्रक्चर) निर्माण पर सरकार खर्च करे। जिससे न केवल दिन-प्रतिदिन के हादसों पर ही रोक लगे, अपितु भारतीय ट्रेनों की औसत गति जो 50 किलोमीटर प्रतिघंटा से भी कम है, को बढ़ा कर 200 किलोमीटर प्रतिघंटा किया जा सके।
   III.            बुलेट ट्रेन के लिए आबंटित धन से तो 150 एम्स​ खुल सकते है या गांव-गांव तक स्कूल-कॉलेज,आईटीआई, हस्पताल आदि खोले जा सकते है।
  IV.            बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप देश की जनता की गाढ़ी कमाई से खड़े किए रेलवे को औने पौने दाम पर निजी क्षेत्र को बेचने पर रोक लगाई जाए। चंद संपन्न लोगों के लिए बुलैट ट्रेन इतनी ही आवश्यक है तो बुलैट ट्रेन का पूरा का पूरा प्रोजेक्ट निजी क्षेत्र को सौपा जाये। भारत की 120 करोड़ जनता की ओर से सरकार बुलैट ट्रेन के कर्ज को चुकाने की गारंटी न दे।
     V.            काम तो अंततः आदमी को ही करना है, अतः अनिल काकोदकर समिति की सिफरशों के अनुरूप रेलवे में खाली पड़े कामगारों के तमाम पदों पर की तुरंत बहाली की जाए। बुलेट के लिए आबंटित धन को भारतीय रेल पर खर्च कर
माननीय महोदय,
1.      यदि हम रेल दुर्घटनाओं की गिनती करना शुरू करे तो हमें समझ में ही नहीं आ रहा किस दुर्घटना को छोड़े और किस को जोड़े।  केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2013 से 2017 के दौरान साढ़े चार सौ से ज्यादा हादसे हुए। वर्ष 2017 में कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के पटरी पर से उतरने सहित अब तक इस वर्ष आठ रेल दुर्घटनाएं देखी गई हैं। 22 जनवरी 2017 को, जगदलपुर-भुवनेश्वर जा रही हिरणकंद एक्सप्रेस आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले में पटरी से उतर गई, जिसमें 40 लोग मारे गए जबकि 65 लोग घायल हो गए। 17 मार्च 2017 को, कर्नाटक के चित्रादुर्गा जिले में चैलेंकरे के निकट मनचेकोटे-तालाका रोड पर, मानव रहित क्रॉसिंग पर एक एम्बुलेंस ट्रेन से टकरा गई। 15 जनवरी 2017 को, उत्तर प्रदेश में रामपुर के पास मेरठ-लखनऊ राज्यरानी एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पटरी से उतर गए थे। 30 मार्च 2017 को, उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के कुलपहर स्टेशन के पास महाकुंभ एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी। 9 अप्रैल 2017 को, पश्चिम बंगाल में एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई थी। 20 फरवरी 2017 को, कालिंदी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी। कानपुर से आ रही यह ट्रेन मालगाड़ी से टकरा गई थी। 20 फरवरी 2017 को, ड्राइवर को संकेत मिलने के बाद, कानपुर से आ रही दिल्ली-बाउंड कालिंदी एक्सप्रेस की छह बोगियां मालगाड़ी से टकरा गई थीं। पिछलें साल हुई रेल दुर्घटनाओं में  से सबसे दर्दनाक इंदौर राजेन्द्रनगर(पटना) एक्सप्रेस रही है।20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास पुखरायां में इंदौर से पटना जा रही एक्सप्रेस ट्रेन के 14 कोच पटरी से उतर गए। जिसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गये। ये तो छोटी सी लिस्ट मात्र है। जो हमें विविध समाचार पत्रों, रिपोर्टों आदि से प्राप्त हुई है। हम पाते है कि निजीकरण के दबाव के बीच नवउदरीकरण की नीति को अपनाने के बाद रेल हादसों की संख्या लगातार बढ़ती गयी है।
2.      महोदय, रेलवे हादसों की व्यापकता के कारण, रेल हादसों कि तुलना दूसरे हादसों से नहीं की जा सकती। हर साल औसतन 300 से अधिक छोटे-बड़े हादसे होते रहते है। भारतीय भूमि पर बुलेट ट्रेन दौड़ाने के जिद्द के बीच, एक महीने के छोटे से अंतराल में ही एक-एक कर तीन हादसे हो चुके है। हर हादसा दूसरे से अधिक दर्दनाक। मुंबई के एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन पर भगदड़ का हादसा देख तो ऐसा पर्तित होता है कि अंग्रेजों के जमाने की कोई इमारत ही भरभरा कर गिर गयी हो। जिस भारतीय रेल रूपी इमारत को स्वतंत्रता के बाद और अधिक विस्तार और मजबूती देने की जरूरत थी, वह धीरे-धीरे मुरम्त के आभाव में जर्जर होती गयी। प्रतिकात्मक रूप से, भारतीय रेल रूपी, यह जर्जर इमारत ही एलफिस्टन रेलवे स्टेशन पर भरभरा कर गिरी है। पुल ढ़हने और करंट फैलने की अफवाह ऐसे नहीं फैली। इस अफवाह के पीछे भी कोई ठोस आधार था। प्रतिदिन गुजरने वाले दैनिक यात्रियों के मन में कही न कही यह धारणा थी कि अंग्रेजों के जमाने में बना यह पुल आज की मुम्बई की आबादी के हिसाब से काफी नहीं और कभी भी गिर सकता है। पुल इस जर्जर स्थिति में पहुंच गया है कि कभी भी झुल कर नीचे के बिजली की तार को टच कर सकता है। दिन प्रतिदिन के यात्रियों के मन में चलने वाला यह कसम-कस ही अफवाह का रूप ले बैठा। और यह सिर्फ एलफिस्टन रेलवे स्टेशन की ही काहानी मात्र नहीं है। दिल्ली में लालकिले के साथ लगा 165 वर्ष पुराना रेलवे पुल भी अपनी उम्र पुरी कर चुका है। जब भी वहाँ से गुजरों, तो ऐसा प्रतित होता है कि वह बुढ़ा पुल अपनी मुक्ति के लिए किसी दुर्घटना की बाट ही जोह रहा हो। ये किसी क पुल की कहानी नहीं है। डॉ. अनिल काकोडकर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे के कम से कम 3,000 पुल 100 वर्ष से अधिक पुराने, मतलब अंग्रेजों के जमाने के  है। 32 पुलों को मरणासन की अवस्था में है।
3.      कुछ रूटों को छोड़ दे, तो स्वतंत्रता के बाद पटरियों, स्टेशनों आदि को आधुनिकीकरण कर और अधिक बेहतर बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। रेलवे समय सारिणी के अनुसार रेल खंड- गुरारु-गया के बीच इक्कीस किलोमीटर की दूरी महाबोधि एक्सप्रेस ट्रेन दो घंटे इक्कीस मिनट में पूरा करती है- ऐसा में दर्ज है। इस हिसाब से इस खंड में ट्रेन की औसत गति नौ किलोमीटर प्रतिघंटा निकलती है।लिच्छवी एक्सप्रेस से यात्रा करने वाले यात्रि ने बताया, दिल्ली से सीतामढ़ी जाने वाली लिच्छवी एक्सप्रेस दिल्ली से इलाहाबाद तक तो समय पर चलती है। पर इलाहाबाद से बनारस के बीच गति धीमी पड़ जाती है और बनारस से भटनी जंक्शन के बीच की दूरी तो बस रेंग कर ही काटती है। इलाहाबाद समय पर आने वाली ट्रेन भटनी आते आते दो-तीन घंटे लेट हो जाती है। अब यदि तीनों स्टेशनों के बीच की पटरियों का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि जहाँ दिल्ली से इलाहाबाद मुख्य दिल्ली हावडा लाईन पर है। वही बनारस-इलाहाबाद-भटनी लाईन (पटरियों/ट्रेक) का प्राथमिकता क्रम नीचे है। रेलवे द्वारा जारी अधिकारिक समय सारणी के अनुसार प्रत्येक हॉलट पर रुकने के समय को घटा दे तो, जहाँ दिल्ली से एलाहाबाद के बीच की औसत गति लगभग 56 किलोमीटर प्रतिघंटा है। वही एलाहाबाद से बनारस 37 किलोमीटर प्रतिघंटा है, बनारस से भटनी 54 किलोमीटर प्रतिघंटा और सीतामढ़ी तक की शेष यात्रा के लिए 32 किलोमीटर प्रति घंटा। रेलवे के अधिकारिक रिकोर्ड के अनुसार इस ट्रेन की औसत गति 41 किलोमीटर प्रतिघंटा ही है। ये तो हुआ रेलवे द्वारा तय समयसारणी के आधार पर। पर औसतन दो से तीन घंटे देरी को जोड़े, तो रेल की औसत स्पीड ट्रैक्टर की स्पीड के बराबर ही आ जाती है। जो कोहरे के दिनों में तो यह स्पीड बैलगाड़ी को भी फेल कर देती है। ये किसी एक ट्रेन की कहानी नहीं, लगभग सभी ट्रेनों की कहानी है। भारतीय ट्रेन के रूटों की जर्जरता ट्रेन के पुलों से गुजरते वक्त स्पष्ट झलकने लगता है।
4.      कुछ महत्वपूर्ण जगहों और रूटों को छोड़ दे, भारतीय रेलों का एक बढ़ा ढ़ाचा अंग्रेजों के जमाने का ही है। अब एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन  को ही ले। ना अंग्रेजों के जमाने में बना पुल ही बदला, न उसे चौड़ा ही किया गया, न ही कोई नया पुल ही बनवाया।बस, राष्ट्रवादीकरण के नाम पर सिर्फ और सिर्फ हुआ नाम परिवर्तन हुआ। जी हाँ! एलफिस्टन रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर, प्रभादेवी स्टेशन कर दिया गया। इसी तरह तमाम स्टेशनों के नाम बदलने का एक दौर शुरू हो गया है। नहीं बबदला तो रेलवे का हुलिया नहीं बदला ।
5.      महोदय, क्या नाम बदल देने मात्र से, इस तथ्य को भी बदला जा सकता है कि अंग्रेजों द्वारा इस पुल और स्टेशन का निर्माण 1911 में किया गया था। महोदय, इस तथ्य को तो दो ही तरह से ढ़का जा सकता है। एक इस पुल की जगह कोई दूसरा पुल बनावाया जाता या इस पुल के समान्तर में एक और पुल तैयार किया जाता। स्वतंत्रता के उपरांत की सरकारों के असंतुलित विकास की नीति की वजह से, 1911 से अब तक मुम्बई की आबादी में बीसियों गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। सरकारे बढ़ती भीड़ को देखती रही। किस तरह से लोग घिसीया-घिसिया कर निकलते है, इसका आनंद लेती रही। लोग प्रार्थना करते रहे, स्थानीय नेताओं ने भी पत्र लिखे, पर रेलमंत्री की कुंभकर्णी निद्रा तब ही टुटी जब हादसा हो गया। ये कोई पहली बार नहीं हुआ, इससे पहले भी इलाहाबाद में रेल पुल पर भगदड़ की घटना हो चुकी है। दुर्घटनों का आलम यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बीजेपी की हर सरकार में यदि लालबहादुर शास्त्री जैसे नैतिक जिम्मेदारी लेने वाले मंत्री हो, तो एक साल में सत्ता पक्ष के सभी सांसदों और नेताओं को रेलमंत्री बनने का मौका मिल जाए। वैसे नैतिक जिम्मेदारी लेने वाले मंत्री होते तो, ऐसी दुर्घटनाओं की नौबत ही नहीं आती। अब सरकारों के पास सुधार शब्द का एक ही अर्थ रह गया है। जनता के खुन पसीने की कमाई को से स्थापित उद्यम को औने-पौने दाम पर निजी क्षेत्र को बेच दो।
6.      केन्द्र की सरकार जिसने एक झटके में मात्र 504 रूट किलोमीटर की दूरी के लिए 1.20 लाख करोड़ का बुलैट ट्रेन का प्रोजेक्ट पास किया, उसी सरकार के रेलमंत्री ने फंड के आभाव का हवाला देते हुए उस छोटे से पुल के निर्माण के लिए फंड उपलब्ध नहीं करवा पाये। महोदय! शायद आपके संज्ञान में न हो बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की कॉस्ट से रेलवे के डॉ. अनिल काकोदकर कमेटी द्वारा प्रस्तावित  150 पेंडिंग प्रोजेक्ट पूरे हो सकते हैं। यह कॉस्ट/लागत से रेलवे का पूरा ढर्रा सुधारा जा सकता है। जर्जर स्थिति में पहुंच गयी रेलवे लाईन को दुरुस्त किया जा सकता है।
7.      गौरतलब है कि रेल हादसों की वजह जानने व निवारण के उपाय सुझाने के लिए संप्रग सरकार में तत्‍कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसमें दिल्ली मेट्रो रेल व कोंकण रेलवे के प्रबंध निदेशक तथा रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके ई श्रीधरन भी सदस्य के रूप में शामिल थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल मिलाकर 106 अहम सिफारिशें कीं थीं। लेकिन इन सिफारिशों की तब की मनमोहन सरकार ने ढ़डें बस्ते में डाल दिया और महोदय आपकी, मोदी सरकार सरकार ने भी उसे ढ़डे बस्ते से बाहर निकाल कर झाड़-पोछने की जहमत नहीं उठाई।
8.      काकोदकर समिति ने स्टेशन मास्टर, असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, लोको पायलट, असिस्टेंट लोको पायलट, गैंगमैन, की मैन, प्वाइंट्स मैन जैसे संरक्षा स्टाफ की कमी तुरंत दूर करने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में ट्रैक व रोलिंग स्टॉक का रखरखाव बढ़ाने, कलपुर्जों की कमी दूर करने, प्रशासनिक ढांचे में सुधार जैसे उपाय लागू करने के लिए पांच सालों में 1.40 लाख करोड़ रुपये निवेश की जरूरत बताई गई है। मतलब जितने धन में में बुलेट ट्रेन का एक छोटा सा रूट तैयार होगा, उतने में भारत की रलों का पूरा कायाकल्प बदल सकता है।
9.      भारतीय रेल के ट्रेकों की कुल लम्बाई लगभग 1,20,000 किलोमीटर है। 28 हजार किलोमीटर का ट्रेक रेलगाड़ियों के रख रखाव और ठहराने आदि के लिए प्रयोग में लाया जाता है। भारतीय रेल के ट्रेकों का यह हिस्सा हमें रेलवे स्टेशनों के आसपास के यार्ड के रूप में दिखाई देता है। जिसपर माल और यात्रि गाडियाँ परिचालन से पूर्व खड़ी की जाती है। शेष 92,000 किलोमीटर ट्रेकों पर रेलगाड़ियाँ दौड़ती है। परिचलन के हिसाब से भारतीय रेलों की कुल लम्बाई 66,687 रूट किलोमीटर है। रूट किलोमीटर अर्थात एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन की दूरी। इन 66,687 रूट किलोमीटर में से लगभग 55,000 रूट किलोमीटर स्वतंत्रता से पूर्व का, मतलब अंग्रेजों के जमाने का है। अतः स्वतंत्रता के 70 सालों में मात्र 11,000 रूट किलोमीटर का ही विस्तार हुआ है। जो अपने आप में नगण्य विस्तार ही प्रतित होता है। इस 66 हजार रूट लाईन में से भी 60 हजार रूट लाईन ब्रोडगेज में आती है। शेष नैरो और मीटर गेज लाईन ही है। इस तरह मीटर-गेज लाईन को ब्रोडगेज लाईन में परिवर्तन करने का लक्ष्य भी अभी शेष है। समय और ट्रैफिक के दबाव को देखते हुए ट्रेकों के दोहरी करण और तिहरी करण के कार्य को भी प्राथमिकता सूचि में रखा जाना चाहिए। पर ये कार्य भी खरगोश के चरित्र वाले कछुए की रफ्तार से ही आगे बढ़ रहा है। हाँ! पिछलें 70 सालों में रेलवे का विधुतिकरण पर कुछ जोर जरूर दिखाई देता है। जहाँ 1950-51 में कुल रेलवे लाईन का 7.5% हिस्सा ही विधुतिकृत था, जो वर्तमान में 36% के लगभग है। विधुतिकरण का दबाव दो कारणों से है। एक कोयले के स्रोत्रों का घटना दूसरा डीजल के पट्रोलियम निर्यातक देशों पर निर्भर रहना। इन दो दबाओं की वजह से कछुए की विधुतिकरण का विस्तार हो रहा है। पर रेलवे ट्रेकों की बेहतर स्थिति के लिए ट्रेकों को समय अंतराल पर बदले जाने की जरूरत होती है। इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। रेल मंत्रालय की ओर से जारी श्वेतपत्र में कहा गया है कि देश भर में फैली पटरियों के नेटवर्क का करीब हर साल साढ़े चार हजार किलोमीटर हिस्सा बदला जाना चाहिए। पर उदारीकरण के बाद के वर्षों में, वित्तीय तंगी के चलते इस लक्ष्य में लगातार कटौती की जा रही है। उदाहरण के लिए चालू साल का लक्ष्य 4500 के स्थान पर महज 2,100 किमी का ही है। वह भी पूरा नहीं हुआ। इसका सीधा सा अर्थ है कि 1,20,000 किलोमीटर रेलवे लाईन का बड़ा हिस्सा 2500 किलोमीटर प्रतिवर्ष की दर से आउटडेटेड होता जा रहा है। या कैमिस्ट की भाषा में कहे तो ऍक्स्पायर्ड हो गया है। अब आप सोचे ऍक्स्पायर्डदवाई आप लेंगे तो क्या होगा? उसी अनुभव के आधार पर सोचे कि यदि ऍक्स्पायर्डट्रेक पर गाड़ी दौड़ाई गयी तो क्या होगा?  जैसा दवाई के केस में हो सकता है दवाई नुकशान न करे। पर रिएक्शन  कर गयी तो क्या होगा? वैसे ही एक्स्पायर्ड ट्रेक से रेलगाड़ी गुजरने पर हो सकता है कि एक्सीडेंट न हो पर यदि एक्सीडेंट हो गया तो क्या होगा? दुर्घटना चाहे खतौनी की हो या कानपुर की दोनों जगह दुर्घटना का मुख्य कारण ट्रेकों का आउटडेटेड होना ही है। अतः देश के यात्रियों की जान माल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए। रेलवे के ट्रेकों को तेजी से बदलने की आवश्यकता है। पर हर बजट के साथ जिस हिसाब से रेलगाड़ियों की संख्या, माल के आवागमन का दबाव और यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। उस हिसाब से न तो रेलवे ट्रेकों का मात्रात्मक और न ही गुणवता सुधार दिखाई दे रहा है। ऊपर हम बता ही चुकें है कि हर साल 2500 किलोमीटर रेलवे लाईन ऍक्स्पायर्डहोती जा रही है। इन ऍक्स्पायर्ड ट्रेकों की वजह से रेलगाड़ी को कभी भी आप पूरी क्षमता के साथ दौड़ा नहीं सकते। कुछ चुनिंदा ट्रेनों को छोड़ दे, तो ट्रेनों का घंटों लेट चलना आम बात है। राजधानी, शताब्दी जैसी एक ट्रेन को चलाने का मतलब है कि शेष एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों को दो सिग्नल पॉइंट के के बीच की दूरी तय करने में लगने वाले समय के बराबर देर करना। क्योकि इन ट्रेनों को पास देने के लिए अन्य ट्रेनों को बीच के साईड लाईन पर रोका जाता है। भारतीय रेलों का सफर देरी और हादसों का सफर बन कर बन कर रह गया है। आलम तो यह है कि रेल में यात्रा या भीड़-भाड़ वाले स्टेशन से गुजरने के बाद ठीक-ठाक अपने गगंतव्य पर पहुँच जाये, तो आप समझ लो कि दूसरा जन्म हो गया है। टाईम पर अपने गंतव्य पंहुचना तो किसी लॉटरी लगने से कम नहीं है।
10. अतः रेल दुर्घटनाओं का विश्लेष्ण करने पर स्पष्ट होता है कि रेल दुर्घटनाओं का मुख्य कारक रेलवे का घीसती अध्योसंरचना(Depreciated Infrastructure) ही है। अतः बजाए 504 किलोमीटर के एक छोटे से रूट पर 1.20 लाख करोड़ खर्च करने के सरकार, यदि सरकार 1,20,000 किलोमीटर लम्बी ट्रेकों के ऊपर और इससे जुड़े अन्य अधोसंरचना( इंफ्रास्ट्रक्चर) पर यह धन खर्च करे तो सम्पूर्ण रेलवे की काया पलट जाएगा। भारतीय ट्रेनों की औसत गति जहाँ 50 किलोमीटर प्रतिघंटा है वह बढ़ कर 200 किलोमीटर प्रतिघंटा तक पहुंच जाएगी है।
11. पर महोदय, मोदी सरकार ने एक तरफ तो कर्ज लेकर 120 करोड़ भारतीय जनता और भविष्य की पीढ़ी के अस्तित्व को गिरवी रख कर 1.20 लाख करोड़ का बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट लगा रही है। जिसमें से 90 हजार करोड़ का अकेले कर्ज ही है। बेसक कहने के लिए यह कर्ज .5% की दर पर लगाया गया हो पर जब इसमें 50 साल में येन की कीमत में होने वाली संभावित वृद्धि और जोड़ दे तो इस प्रोजेक्ट के कर्ज की संभावित लागत 1.5 लाख करोड़ के आस पास गहो जाएगी। मोदी सरकार के बुलेट ट्रेन के फैसले से देश का हर बच्चा 1.20-1.50 लाख के आसपास कर्जदार हो गया। जो कभी बुलेट ट्रेन पर चढ़ना तो दूर, उसके आस-पास भी कदम नहीं रख सकता। यदि किसी के पास बुलेट ट्रेन पर चढ़ने की क्षमता भी है तो, वह अपने इलाके से बुलेट पर चढ़ने के लिए भी वही बैलगाड़ी की रफ्तार वाली रेलगाड़ी से आएगा। ये कहा की समझदारी है कि एक छोटे से इलाके और चंद लोगों को को उन्नत करने के लिए पूरे देश को कर्ज में डुबों दो। वैसे तो, मोदी सरकार अपने से पूर्व की मनमोहन सरकार की तरह ही सार्वजिक उपक्रमों को बोझ मानती है। तो मोदी सरकार ने इस बुलैट ट्रेन के प्रोजेक्ट को निजी कम्पनियों को क्यों नहीं सौपा? या दे देते बुलैट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए 100% एफडीआई की मंजूरी। जापानी कंपन्नी धन लगाती, बुलैट ट्रेन चला कर मुनाफा कमाती। इस घाटे के प्रोजेक्ट के लिए पूर्वर्ती कांग्रेस सरकार की तरह(जैसा उन्होंने मैट्रों के केस में किया) ही देश के नागरिकों को कर्जदार क्यों बनाया??
12.  एक तरफ तो मोदी सरकार हम नागरिकों की अस्मिता को गिरवी रख बुलैट ट्रेन चलाने के जनून में हम भारत के 120 करोड़ नागरिकों पर बुलैट एक लाख 20 हजार रुपये की दर से बोझ लादने जा रही है।तो दूसरी तरफ हमारे खुन पसीने की कमाई से खड़ी रेलवे को औने-पौने दाम पर विदेशी और देशी पूंजीपतियों को बेचने की तैयारी कर रही है। आज देश का सबसे बड़ा सरकारी उपक्रम कुछ बड़े उद्योगपतियों और कई विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले होने जा रहा है। इसकी शुरुआत मधेपुरा और मढौरा से हो चुकी है इसीलिए कारखानों में कार्यरत रेलकर्मियों को उनकी मनमानी करने की छूट देकर पिछले कुछ वर्षों से रेलवे के सभी कारखानों और उत्पादन इकाईयों को जानबूझकर बीमारकिया जा रहा है। इसीलिए रेल कारखानों से हर महीने रिटायर हो रहे सैकड़ों रेलकर्मियों की जगह वहां कई वर्षों से नई भर्ती नहीं की जा रही है। रेल कारखानों का लगभग 80 प्रतिशत कर्मचारी औसतन 52-55 वर्ष आयु वर्ग का है। इस तरह अगले कुछ वर्षों में यह सभी रेल कारखाने नई भर्ती के आभाव में स्वतः ही बंद हो जाएंगे। मधेपुरा-मढौरा के दो बड़े रेल कारखाने फ्रांस और अमेरिका की दो बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौपने की तैयारी की जा रही है। केंद्र सरकार ने बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में एक कमेटी को रेलवे के पुनर्गठन, रेलवे में एफडीआई, पीपीपी, निगमीकरण, निजीकरण आदि नीतियां रेलवे में कब, कहां और कैसे लागू करनी हैं, का काम सौंपा था। पूर्व रेलमंत्री सुरेश प्रभु को सौंपी अपनी अंतिम रिपोर्ट में उन्होंने सुझाया कि किस प्रकार रेलवे का टुकड़ों-टुकड़ो में निजीकरण किया जाए।
13. अतः हमारी मांग है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई से खड़े किए रेलवे को औने पौने दाम पर निजी क्षेत्र को बेचने से रोक लगाई जाए। चंद संपन्न लोगों के लिए बुलैट ट्रेन इतनी ही आवश्यक है तो बुलैट ट्रेन का पूरा का पूरा प्रोजेक्ट निजी क्षेत्र को सौपा जाये। भारत की 120 करोड़ जनता की ओर से सरकार बुलैट ट्रेन के कर्ज को चुकाने की गारंटी न दे। या तो जापानी कंपनी अपने रिस्क पर निवेश करे या देशी पूंजीपतियों को कर्ज दे।
बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिसों को देश की जनता के हित में रद्द किया जाए। अनिल काकोदकर कमेटी के मानदंडों के अनुरूप बुलेट ट्रेन के लिए आबंटित धन को रेलवे की रिनोवेशन के लिए सरकार खुद खर्च कर, देश की जनता की धरोहर को सरकार बचाएं।
 देश का शुभचिंतक



अश्विनी कुमार 'सुकरात',                                                                                दिनांक : 04-10-2017
सहायक प्रोफेसर(ऐड-हॉक), दिल्ली विश्वविद्यालय।
A-726, गली न.-9, पार्ट -1, पहला पुस्ता , सोनिया विहार , नई दिल्ली  110090 । फोन न. 9210473599
संदर्भ :
1)     विविध न्यूज पेपर में छपी खबरे।
2)     सरकार की रिपोर्ट
3)     विभन्न वैबसाईट
4)   रेलयात्रियों एवं कर्मचारियों से बातचीत

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