आय की असमानता कम हो! समान काम समान वेतन का सिद्धान्त लागू हो!! ठेकेदारी प्रथा ख्तम हो!!
पहले पे कमीशन में तय सिद्धान्त को पढ़ो, जो सीधे
संविधान के समान्तर आया था। पूर्णचः संविधान के सिद्धान्तों के आधार पर।
नवउदारीकरण की वर्ल्डबैंक-आईएमएफ नीति की गुलामी को स्वीकार के बाद आए पे कमीशनों
ने आय की असमानता को बढ़ाया है। पाँचवे से शुरू, छठे पे कमिशन के बाद तेजी से और सातंवे पे कमीशन
ने संविधानिक सिद्धान्तों की धज्जियां ही उड़ाई। छठे पे कमीशन के बाद जहाँ एक तरफ
ग्रुप डी और ग्रुप सी की लगभग सारी नौकरियाँ ठेकेदारों के हवाले कर दी गयी। वही
ग्रुप ए और बी में नियुक्ति के लिए दौहरे मापदंड़ को अपनाया गया। एक तरफ चंद लोगों
की तंख्वाह बेतहासा बढ़ा दी गयी। वही कांट्रेक्ट के आधार पर अधिकतरों की नियुक्ति
की जाने लगी। जिसमें सबसे प्रभावित क्षेत्र शिक्षा का ही रहा। क्योकि सबसे ज्यादा ग्रुप
बी ए की कांट्रेक्चुअल नौकरियाँ स्कूल से लेकर कॉलेज विश्वविद्यालय तक के शिक्षकों
की रही । एक तरफ जहाँ चंद लोगों को बेतहाशा सिक्योर आय दे कर इस समाज से इस कदर
काट के बाहर किया है कि उनके हीत आदानी अंबानी के साथ जूड़ गये है। दूसरी तरफ एक
बड़ा वर्ग हमेशा अनिश्चितता की स्थिती में रहता है और उसकी स्थिती बद से बदतर होती
जाती है। इसलिए में उस गैप को कम करने के पक्ष में हूँ। यहाँ दो उपाय है, इन चंद
धनकुबेरों की आय को स्थिर रख नीचे से आय बढ़ाई जाए या या उनका आध कर नीचे वालों को
ठेकेदारी पर्था ख़त्म कर समानता की स्थिती में लाया जाये, ठेकेदारी, कॉन्ट्रैक्ट,एड-हॉक
व्यवस्था ख़त्म कर नौकरियों की असमानता कम की जाए।
अमेरीका में क्लास फोर और क्लास वन की सैलरी में चार गुणे से
ज्यादा अंतर नहीं है। यहाँ पचास गुणे का है। एक तरफ जहाँ प्रोफेसरों की सैलरी
2-2.5 लाख या उससे भी ऊपर है। वही अनगिनत पोस्ट खाली है और अस्थाई तौर भरी जा रही
है। एक बार पोस्ट पर विराजमान होने वाला इस देश से कट जाता है। उनके बच्चे भारत
में नहीं पढ़ते, छुट्टियाँ
भारत में नहीं बीतती।
जहाँ औसत प्रतिव्यक्ति आय 67 हजार प्रतिवर्ष के करीब है।
वर्किंग जनसंख्या 40% 1/3 मान लो .. तो वर्किंग जनसंख्या की प्रतिव्यक्ति आय 2 लाख
प्रतिवर्ष .. एक स्थाई शिक्षक की आय 12 लाख प्रतिवर्ष, स्थाई प्रोफेसर की आय 24-36 लाख
प्रतिवर्ष... ऐसे शिक्षक और प्रोफेसर और शिक्षक कहाँ से जनता का दुख दर्द समझेंगे।
आय के पीरामीड के हिसाब से स्थाई सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थाओं के प्रोफेसर 1% से कम ऊपर की जनसंख्या का हिस्सा है और स्थाई
सरकारी शिक्षक ऊपर की 4% जनसंख्या का हिस्सा है। और
सारी तंख्वाह जनता के टैक्स के पैसे से जाती है। अतः आय की असमानता को कम करने का
सिद्धान्त तो लागू होना ही चाहिए। पहले पे कमीशन के सिद्धान्त को लागू होना चाहिए।
मनोज चाहिल, “Manoj K. Chahil अश्विनी इतने भोले पहले
भी थे या अचानक हो गए हो? प्रोफ़ेसर की तनख़्वाह
की दिक़्क़त हो रही है जो मालिया, मोदी जैसे ‘राष्ट्रभक्त’ पैसे लेकर भाग गए वो भी नज़र
में है या नहीं। आप तो शिक्षाविद हैं इस तथ्य से भली भाँति अवगत होंगे कि शिक्षा
पर कितना ख़र्च किया जा रहा है और दिन ब दिन इसमें कटौती की जा रही है। बिलकुल यही
आपके वाला तर्क नवउदारवाद के पैरोकार देते हैं जब वो कहते हैं कि सरकारी स्कूलों
में (कोलेजों में भी) शिक्षकों के वेतन पर बहुत ज़्यादा ख़र्च होता है इसलिए इस पर
ख़र्च न करके बच्चों को वाउचर दे दिए जाए ताकि वो कम फ़ीस वाले निजी स्कूलों में
पढ़ सके। (जहाँ ५००० व उससे कम में भी शिक्षक पढ़ा रहे हैं)”
Manoj K. Chahil शायद तुम वो पढ़ते हो जो
पढ़ना चाहते हो, भाई..कभी माल्या आदि पर जो लिखा है, उसे भी पढ़ लिया कर।
अरे! अनुसंधानकर्ता हो.. तो लो रैफरेंश देता हूँ।
ठेकेदारी प्रथा, कॉन्ट्रैक्ट,एड-हॉक और निजी स्कूलों
और कॉलेजों विश्वविद्यालय के खस्ता हाल शिक्षकों पर जो लिखा है उसे भी देख लेता तो, आंख पर पट्टी ही पढ़
गयी। बाबूजी...चंद प्रोफेसरों को बेतहास
मैं तम्हारी इस बात की सहमती के साथ ही
ये कह रहा हूँ कि प्रोफेसरों का कॉर्पोरेटिकरण बंद होना चाहिए। और आय की असमानता
कम होनी चाहिए। पहले ये बताओं ये क्लास वन, मतलब ए ग्रेड वालो, जिसमें प्रोफेसर
शिक्षक आदि भी आते है, की तंख्वाह किसने बढ़ाई। क्या कामरेडों ने बढ़ाई... नहीं
उसे भी नव उदारवाद के प्रोपकारियों ने ही बढ़ाई। और इसलिए बढ़ाई ताकी इस वर्ग को
अपना मुरीद बनाए और दूसरा तर्क गढ़े की इतनी तनख्वाह पर हजारों शिक्षक भर्ती नहीं
कर सकते तो, अब कॉन्ट्रैक्ट,एड-हॉक निजीकरण लागू
करों । और मायाजाल इस तरह से बुना कि तथाकथित कामरेड उसमें ही उलझ कर रह जाएं।बाकलम - अश्विनी कुमार 'सुकरात' (9210473599)






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