ईद-उल-जुहा पर बधाई के साथ, समस्त इस्लामिक समाज से अपील
ईद-उल-जुहा
पर बधाई के साथ, समस्त इस्लामिक समाज से अपील
साथियों! यह
परम्परा तब शुरू हुई, जब पश्चिम एशिया के
रेगिस्तानी इलाकों के लोग कबीलों में रहा करते थे। उन कबीलाई परिवारों में सिर्फ
इंसान ही नहीं पशु भी शामिल थे। साथ-साथ रहने की वजह से इंसान का पशुओं के साथ
स्नेह का एक परिवारीक नाता था। पर रेगिस्तानी इलाकों की विषमताओं
में रहने वाले कबीलाई लोगों को इंसान और पशु में से किसी एक के जीवन को चुनना था।
इंसान पशु मोह में फँस कर भोजन के आभाव में अपने को ही समाप्त न कर ले,
इससे बचने के लिए ‘जुहा’ अर्थात
कुर्बानी की परम्परा शुरू हुई। इस परम्परा के अनुसार इंसान जिन पशुओं के साथ विचरण
करता था, जो पशु उसके सुख दुःख के साथी हुआ करते थे। उन
पशुओं की ही कुर्बानी करना होता था। यहां छुपा उदेश्य इंसानी जिंदगी की रक्षा का
था। पर आज न तो इंसान कबीलों में रहता है और न ही पशु उसके परिवार का हिस्सा ही है,
जिस तरह कभी कबीलाई समाज में हुआ करते थे। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत
इब्राहिम अपने पुत्र हज़रत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में
कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान
दे दिया और अल्लाह ने इब्राहिम को अपने सबसे प्रिय अर्थात ‘बक़र’(अर्थात सबसे बड़ा/प्रिय पशु) को ‘जिबर’(काटने) का आदेश दिया। यहाँ सीधा सा संदेश यह है कि जब इंसान(पुत्र) और
पुत्र स्वरूप पशु में से किसी एक की जिन्दगी की रक्षा का प्रश्न आ जाये तो, अपने
प्रिय पशु (बक़र) को इंसानी जिन्दगी की रक्षा हेतू कुर्बान कर दो। इस प्रकार
इंसानी जिन्दगी की भोजन की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए ही ‘बक़र-ईद
अर्थात ईद-उल-जुहा अर्थात ईद-उल-अज़र की परम्परा शुरू हुई। यह पर्व, सर्व प्रिय
पशु की कुर्बानी का है।
पर अब, यहाँ सवाल
यह उठता है कि आज भी इस्लामिक समाज क्या कबीलों में भटकता है और जीवन रक्षा के
अंतिम चारे के रूप में आज भी क्या उसके पास अपने पशुओं की कुर्बानी के अलावा कोई
और चारा नहीं है?
सबसे
बड़ी बात तो यह है कि आज भोजन के लिए पशुओं पर अनिवार्यता उतनी नहीं जितनी पहले
थी। दूसरी जिन पशुओं का कत्ल करता है, उनके
साथ उसके सुख-दुःख का नाता भी वैसा नहीं । जब नाता नहीं तो कुर्बानी किस बात की? वह तो खुल्लम खुल्ला
सिर्फ वध ही है। अब, सिर्फ परम्परा निर्वाह के नाम पर पशुओं को बाजार से खरीदाना है
और ईद-उल-जुहा के रोज हलाल/कत्ल किया जाना,क्या ‘अजाह’ या जुहा की श्रेणी में आ सकता है? किस
बात की ‘अजाह’ जब पशु के साथ ‘बक़र’ अर्थात
पुत्र-पुत्री वाला संबंध ही नहीं है? जो पशु ‘बक़र’ नहीं,
उसका ‘अजाह’
भी नहीं हो सकता
और इस प्रकार ईद-उल-जुहा पर पशुओं की
कुर्बानी के नाम पर चलने वाली परम्परा सिर्फ पशु वध से अधिक कुछ नहीं है। इस्लामिक
समाज को इस परम्परा पर अंकुश लगाने के लिए आगे आना चाहिए या पशु का ‘अजाह’ करने
से पूर्व उन पशुओं के साथ ‘बक़र’
का संबंध बनाना चाहिए।
लेखक यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता है कि उसका कदापी
उद्देश्य इस्लामिक अनुयायीयों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है?
बाकलम
अश्विनी कुमार सुकरात

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