विश्वविद्यालय एवं कॉलेज में खाली पड़े रिक्त पदों की भर्ती की प्रक्रिया के संदर्भ में ...
सेवा में,
1. माननीय
राष्ट्रपति महोदय, राष्ट्रपति भवन, भारत सरकार, नई दिल्ली ।
2. माननीय
प्रधानमंत्री महोदय, प्रधानमंत्री कार्यालय,
साऊथ ब्लाक, नई दिल्ली ।
3.
कैबिनेट, कैबिनेट सचिवालय,भारत सरकार, नई दिल्ली।
4.
माननीय मानव संसाधन मंत्री, भारत सरकार,
दिल्ली।
5.
माननीय सांसद, लोकसभा, दिल्ली।
6.
माननीय सांसद, राज्यसभा, दिल्ली।
7. माननीय
मुख्य मंत्री, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नई दिल्ली ।
खुला पत्र /
ज्ञापन
विषय :- विश्वविद्यालय एवं कॉलेज
में खाली पड़े रिक्त पदों की भर्ती की प्रक्रिया के संदर्भ में :-
i.
केन्द्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों
एवं कालेजों में सहायक प्रोफेसर स्तर पर नियुक्ति हेतू ‘खुली अखिल
भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता नियुक्ति संयुक्त परीक्षा’ के आयोजन की मांग
ii.
वर्तमान में
एक वर्ष से अधिक अवधि से कार्यरत समस्त एड-हॉक, कॉन्ट्रैक्टचुअल आदि को स्थाई किया
जाए।
iii.
निजी
विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों द्वारा किये जाने वाले आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक
शोषण पर अंकुश।
माननीय महोदय,
नियुक्ति की
वर्तमान व्यवस्था
इन पदों को
भरने के लिए न्यूनतम अहर्ता प्राप्त अभ्यार्थियों को उनके API स्कोर के आधार पर
साक्षत्कार के लिए कॉल किया जाता है। कुछ एक संस्थाओं को छोड़ दे तो, साक्षत्कार
में क्या होता है, यह सबकों मालूम है। नियुक्ति के लिए विज्ञापन भी निकाले जाते है, साक्षत्कार के लिए
उम्मीदवारों को बुलाया भी जाता है, पर यह सब सिर्फ औपचारिकताओं की पूर्ति के साधन मात्र हैं। हम यह नहीं कहते
कि इस स्तर पर होने वाली 100% नियुक्तियों में धांधली होती है। कुछ एक-आध प्रतिशत
को छोड़ दे तो यह सर्वविदित है कि सीधे साक्षत्कार लेने की व्यवस्था
की वजह से सहायक प्रोफेसर के स्तर पर केंद्रीय और राज्य स्तर पर नियुक्ति के दौरान
भाई-भतिजावाद, पक्षपात और पैसे का खुलम खुला खेल चलता है। बिना
रिश्वत दिए या राजनीतिक पहुंच के शायद कोई विरला ही इस पद पर पहुंच पाता हो।
विश्वविद्यालयों के कुलपति और
कॉलेज के प्रचार्य मनमाने तरीके से नियुक्ति करते रहे हैं। कुलपति (वीसी) उन लोगों
का चयन करते हैं, जो उनसे जुड़े होते हैं या
अमीर और रसूल वाले परिवारों से संबंधित रखते हैं या बड़े नेताओं और अधिकारियों के
संबंधी होते है या वे किसी प्रोफेसर के बेटे, बेटियां और
दामाद आदि होते है या जिनका सत्ताधारी वर्ग द्वारा दबाव बनाया जाता है। नियुक्ति
की इस वर्तमान व्यवस्था में ईमानदार और योग्य लोगों की शायद ही नियुक्ति होती हो।
साक्षत्कार
के लिए कॉल करने का फार्मूला API
अब जरा आप साक्षत्कार के लिए कॉल
करने के तरिके पर भी गौर फरमाएं। वर्तमान में शायद यह अनोखा पद होगा जिसपर दौहरी
अहर्ता का सिद्धांत लागू होता है। एक तरफ सरकार के द्वारा जारी गज़ट के अनुसार, युजीसी
द्वारा तय न्यूनतम अहर्ता 55% अंकों के साथ स्नाकोत्तर की उपाधी और युजीसी नेट(UGC-NET) या SLET/SET(सिर्फ संबंधित
राज्य स्तर के लिए) है। NET /SLET/SET से उन
अभ्यार्थियों को छुट मिल सकती जिन्होंने एक तय समय से पूर्व पीएचडी कर रखी हो।
स्पष्ट है कि न्यूनतम आहर्ता के लिए युजीसी नेट या SLET/SET(सिर्फ संबंधित राज्य
स्तर के लिए) या पीएचडी में से अभ्यार्थी ने कम से कम एक अहर्ता उम्मीदवार ने
हासिल कर रखी हो। वही दूसरी तरफ 2010 के बाद साक्षात्कार के लिए बुलाने हेतू
युजीसी ने API स्कोर का फार्मूला
भी दिया है। यह API स्कोर का फार्मूला अपने आप में दौहरे मापदंड का है। 2010 में लागू होने के
बाद से ही API स्कोर में अनेकों बार बदलाव हो चुके हैं। समय के
साथ यह अधिक विभेदकारी बना है और समाजिक स्तरीकरण को बनाए रखने भर का साधन है।
API है क्या ?
सर्वप्रथम
तो यहाँ यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि ‘API’ है क्या और यह किस तरह निम्न आर्थिक पृष्टभूमि के विद्यार्थियों को उच्च
शिक्षण संस्थाओं में सहायक प्रोफेसर पद का उम्मीदवार बनने तक से रोकेगा ? API लागू होने के बाद कॉलेज
और विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पीजी में 55%+NET/SET या PhD की न्यूनतम अहर्ता
तो हाथी के दिखाने वाले दांत भर रह गयी हैं। उम्मीदवारों को साक्षात्कार के
दरवाजें तक पहुंचाने में API स्कोर की अहम भूमिका है। अतः असल में अभ्यार्थियों की छटनी तो, API के माध्यम से ही की
जाती है। इस प्रकार असल में खाने वाले दांत तो, API स्कोर ही है। जो
न्यूनतम अहर्ता वाले अभ्यार्थी को साक्षात्कार तक भी नहीं पहुंचने देगा। इससे न तो
आर्थिक और समाजिक रूप से पिछड़ों को ही मुख्य धारा में आने का समान अवसर मिलेगा और
न ही पीएचडी एवं रिसर्च पेपर आदि की गरिमा ही बच पाएगी। निजी शिक्षण संस्थानों की
अंकों की दुकान चमकेगी और गुणवत्ता पर फोकस करने वाले संस्थान खाक हो जाएंगे।
पीएचडी तो फटाफट निपटने वाला और/या बिकाऊ माल बना दिया जाएगा। निजी शिक्षण संस्थान
तो, शिक्षकों का
अनुभव के नाम पर ही शोषण कर वारे न्यारे कर ही रहे है। इससे प्रकाशकों का धंधा दिन
दुगुना रात चौगुना फल फुल रहा है। विद्यार्थियों द्वारा ‘शिक्षा’ नहीं, सिर्फ अंक हासिल
करेंने की परम्परागत होड़ और अधिक पुख्ता होगी।
ऐसा क्यों? इसे जानने के लिए API स्कोर कैसे बनता है, यह समझने की जरूरत है।
हाल ही में
जारी गजट के अनुसार API स्कोर में चार घटक है। 1) पूर्व परीक्षा के अंक (आकादमीक) 2) अनुभव 3) प्रकाशन 4) अवार्ड(सम्मान पत्र)
1.
आकादमीक के
नाम पर पूर्व परीक्षा के अंकों (50 से बढा कर 84 किया गया)
सर्वप्रथम
तो यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की आकादमीक प्रदर्शन को न तो
पूर्वपरीक्षा के अंक से नहीं मापा जा सकता और न ही दो व्यक्तियों की उनके पूर्व
परीक्षा के अंकों के आधार पर तुलना ही की जा सकती है। यहाँ पर स्पष्ट हो जाना
चाहिए कि अभ्यार्थी की व्यक्तिगत परिस्थियों के अलावां उसकी 10वीं, 12वीं, B.A., P.G. आदि के प्राप्तांकों
पर बोर्ड, विश्वविद्यालय और विषय चयन का भी प्रभाव पड़ता है। निजी विद्यालय, कॉलेज और
विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को तुलनात्मक रूप सरकारी विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालयों
से अधिक अंक मिलते है। जो विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालयों गुणवत्ता पर अधिक ध्यान
देते हैं, वहाँ पर विद्यार्थियों को कम अंक प्रदान किया जाता है। अर्थात स्पष्ट
है कि एक व्यक्ति किसी एक अहर्ता के लिए यदि एक साथ एक से अधिक
कॉलेज-विश्वविद्यालय, बोर्ड से परीक्षा दे तो, उसके प्राप्तांक अलग अलग आएगें। उसके प्राप्तांक वर्ष और विषय ग्रुप बदलने के साथ भी बदल सकते है।
प्रेक्टिकल और इंटरनल अंक में व्यक्तिगत पक्षपात होना तो आम बात है। परीक्षाओं की
व्यवस्था भी पक्षपात विहीन नहीं है। अतः पूर्व परीक्षा के अंकों को पैमाना बनाना
सर्वथा अनुचित ही नहीं, शिक्षा नहीं, अंकों के बाजारीकरण का हिस्सा भी है।
2.
नेट(5 अंक)
या पीएचडी(30 अंक)
जब
असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पीजी में 55%+NET या PhD की न्यूनतम अहर्ता
रखी है तो, ‘या’ में दी गयी एक का मूल्य 5 और दूसरे का 30 कैसे हो सकता है। दूसरा PhD कोई समयबध कार्यक्रम
तो है, नहीं कि तीन साल में कोर्स ख़त्म । PhD अनुसंधान के लिए है।
इसकी समय अवधि अनुसंधान के लिए अपनाए गये टूल पर निर्भर करती है। परन्तु इस तरह से
सहायक प्रोफेसर स्तर पर ही इसे अप्रत्यक्ष तौर पर अनिवार्य बना देनें से इस डिग्री
की गुणवत्ता ही समाप्त हो जाएगी है। दूसरा निम्न आर्थिक पृष्टभूमि के विद्यार्थी
के विद्यार्थी जो पीजी (M.A./M.SC./M.Com
etc) करते-करते 24-25 की उम्र में आ जाते है। उन
विद्यार्थियों के लिए बीना किसी स्थाई आर्थिक आधार के PhD करना भी संभव नहीं।
ऐसी विद्यार्थियों के लिए पहली प्राथमिकता नौकरी है, न कि पीएचडी और यदि सिर्फ
पीएचडी न होने की वजह से कोई अभ्यार्थी के हाथ से यह मौका जाता है तो, उसके साथ
उसके अंदर छुपी अनुसंधान करने की प्रतिभा का भी नाश होता है।
3.
रिसर्च जरनल
में छपे लेख
जब पहली बार
API को लाया गया
तो, उस वक्त
अखबार में छपे लेख से लेकर इंटरनेशनल जर्नल तक के अंकों के लिए अंक थे। इसको 25 अंक का भार
दिया गया था। अब इसे घटा कर 10 अंक कर लिया गया है। अब धीरे-धीरे कुछ खास चुंनिंदा
जर्नल को ही युजीसी द्वारा इस लिस्ट में शामिल किया गया है। सधारण पृष्टभूमि क्या, बीना गाईड और सिफरिश
के अच्छे खासे लोग तक इन जर्नलों तक पहुंच नहीं रखते।इन अंकों की आड़ में जर्नल
में लेख छापने और छपवाने की नई दुकानदारी ने जन्म ले लिया है।
4.
शैक्षिक तथा
अनुसंधान अनुभव
जब पहली बार
इसे लाया गया था तो, इसको 20/25 अंक दिये गये थे। अब इसे घटा कर 10 अंक कर लिया गया है। पर इस
अंकों की आड़ में निजी संस्थाओं ने जम कर अपने यहाँ काम करने वाले शिक्षकों का
शोषण किया और उनसे अधिक ‘कागजी तनख्वाह’ पर साईन लेकर , कम वास्तविक तंख्वाह दी और जम कर काला धन बनाया। वहाँ काम करने वाले
शिक्षकों ने अपने मुहँ पर कपड़ा ठूसे रखा कि कही अनुभव के अंक न चले जाएं। सहायक
प्रोफेसर का पद अनोखा पद है। जिस में उसी पद या उसी स्तर के पद के अनुभव को शामिल
किया जाता है।
5.
अवार्ड(सम्मान
पत्र)
राष्ट्रीय
एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले अवार्ड को 3 अंक दिये गये है और राज्य स्तर
पर मिलने वाले अवार्ड को 2 अंक। इसमें कोई छुपाने वाली बात नहीं कि अवार्ड कितनी
ईमानदारी से दिये जाते है। अवार्ड(सम्मान पत्र) को इसी साल के गज़ट से API में शामिल किया गया
है। अतः बहुत जल्द इसकी भी दूकानदारी शुरू होने की संभावना है।
साक्षत्कार व्यवस्था और API स्कोर के
विश्लेषण का निष्कर्ष
तो इस
प्रकार हम पाते है कि न तो साक्षत्कार और न ही साक्षत्कार के लिए बुलाये जाने वाले
अभ्यार्थियों की छटनी (स्कूटनी) के लिए बनायी गयी API स्कोर की व्यवस्था
ही त्रुटी एवं पक्षपात हीन है। इन त्रुटियों के चलते न तो योग्य लोग ही नियुक्त हो सकते है और न ही
नियुक्ति की प्रक्रिया ही निष्पक्ष रह सकती है। इस प्रकार साक्षत्कार के लिए बुलाए जाने वाले अभ्यार्थियों की छटनी का यह
तरिका अवैज्ञानिक और अतार्किक है।
समाधान क्या हो?
अब जहाँ वर्तमान में
केन्द्र सरकार पर इतने बड़े पैमाने पर नियुक्तियों की जिम्मेदारी है। अतः हमारा
सुझाव है कि-
- एक साल
से अधिक अवधि से कार्यरत सभी एड-हॉक, कॉन्ट्रैक्ट आदि माध्यम से नियुक्त
सहायक प्रोफेसर को स्थाई किया जाए। क्योकि वे सभी न्यूनतम अहर्ता रखते हैं और
चयन बोर्डों द्वारा ही नियुक्त हैं।
- सहायक
प्रोफेसर स्तर की नियुक्ति की प्रक्रिया को एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर
स्तर की नियुक्ति की प्रक्रिया से अलग किया जाए और API, पीएचडी की अनिवार्यता और साक्षत्कार आदि को एसोसिएट
प्रोफेसर और प्रोफेसर स्तर की नियुक्ति तक ही सिमित रखा जाए। क्योंकि इस स्तर
के पद तक आते-आते कि इस पद के सभी अभ्यार्थियों 8-10 साल सहायक प्रोफेसर के
स्तर पर काम करने का मौका मिल चुका होता है। पर इस दौरान उन्हें अनुसंधान और
लेखन के भी प्रयाप्त अवसर मिलें इसकी भी व्यवस्था हो।
- निष्पक्षता
बरतने के लिए यूजीसी के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर ‘खुली अखिल
भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता चयन
बोर्ड’ बनाकर
एक संयुक्त परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति की प्रक्रिया को पूरा किया जाए। केन्द्र
और राज्य
स्तर पर चयन की एक ही प्रक्रिया अपनाई जाए।
- हर विषय
के लिए सभी विश्वविद्यालयों से शामिल विषय विशेषज्ञों एवं शिक्षाविदों की एक
स्वायत्त समिति का गठन किया जाना चाहिए जो जिनपर पूर्ण गोपनीयता के साथ
प्रश्नबैंक एवं प्रश्नपत्र बनाने या बनवाने की जिम्मेदारी हो।
- पश्नबैंक
वस्तुनिष्ट हो तथा इसमें विश्लेषणात्मक, संश्लेषणत्मक, मूल्यांकनात्मक आदि
क्षमताओं को जांच कर सकने योग्य प्रश्न शामिल किये जाए। जानकारी आधारित
प्रश्नों को न शामिल किया जाए। इन प्रश्न बैंकों से रैंडम तरिके से प्रश्नों
का चयन हो।
- देश के
हर कॉलेज और विश्वविद्यालय अपने रिक्त पदों की सूचना युजीसी को दें।
यूजीसी-नेट के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर इन रिक्तियों के लिए भी ‘खुली अखिल भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता नियुक्ति संयुक्त
परीक्षा’ का आयोजन करें। या यूजीसी-नेट के स्थान पर इसे आयोजित करें।
- अब, इस
प्रक्रिया के माध्यम से चयनित सहायक प्रोफेसर पद के अभ्यार्थियों के लिए
अनिवार्य हो कि वे 5-10 के भीतर वे अपनी पीएचडी को पूर्ण करें। कॉलेज, युजीसी
एवं विश्वविद्यालय आदि अनुसंधान योग्य वातावरण भी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी
हो।
- साक्षत्कार
न हो तो बेहतर। यदि रखना भी हो तो Qualifying मात्र हो। इसके लिए एक
राष्ट्रीय स्तर का बोर्ड स्थापित किया जा सकता है, जिसमें देश के हर हिस्से और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर रखे जा सकते
है। साक्षात्कार
बोर्ड में केन्द्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों के आधे आधे प्रतिनिधि होने
चाहिए।
- सहायक
प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए कोई आयु सीमा नहीं होनी चाहिए क्योंकि
इसकी अहर्ता युजीसी-नेट या पीएचडी करने के लिए कोई आयु सीमा नहीं है। दूसरा
अनेकों लोग जो एक लम्बे समय से अस्थाई या निजी कॉलेजों में अज्ञात रूप से
पढ़ा रहे है, उनको मौका नहीं मिलेगा।
- ‘खुली अखिल भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता नियुक्ति संयुक्त
परीक्षा’ भारत जैसे विशाल देश में
नियुक्ति का सबसे न्यायसंगत तरीका हो सकता है। नियुक्ति न्यूनतम योग्यता पर
आधारित है। इस प्रयोजन के लिए, केंद्रीय
विश्वविद्यालयों और राज्य विश्वविद्यालयों के अधिनियम में आंशिक संशोधन किया
जाएगा। यदि ऐसा होता है, तो इसके लाभ और परिणाम दूरगामी
और देशव्यापी होंगे। और इससे हमें उच्च शिक्षा में भारत की बेहतर गुणवत्ता
देखने में मदद मिलेगी।
- इस
प्रक्रिया से देश के दूरस्थ, अविकसित क्षेत्रों के
उम्मीदवारों को भी चयनित होने का समान अवसर मिलेगा। इसका एक लाभ तो यह भी
होगा कि अखील भारतीय स्तर के शिक्षक सभी विश्वविद्यालयों से मिल सकेंगे। इस तरह
की प्रक्रिया को अपनाने से चयन प्रणाली में स्थिरता आएगी। हर कॉलेज या
विश्वविद्यालय स्तर पर होने वाले घपलों की जांच नहीं की जा सकती। परन्तु ‘खुली अखिल भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता नियुक्ति संयुक्त
परीक्षा’ की
प्रक्रिया को पार्दर्शी बना कर इसे भ्रष्टाचार एवं कदाचार मुक्त किया जा सकता
है।
- एक
अभ्यार्थी (विशेषतः बेरोजगार) के लिए यह संभव भी नहीं कि एक पद के लिए सभी
विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में आवेदन कर सके। वह ऐसा
करने का प्रयास भी करें तो, उसे मोटी रकम की जरूरत होगी। उदाहरण के तौर पर
दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंध 80 कॉलेज है। यदि आवेदन शुल्क 500 रूपयें है
तो, इन सभी कॉलेजों में एक पद पर आवेदन करने के लिए एक अभ्यार्थी को कम से कम
40 हजार रूपयें चाहिए। दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इसलामिया
विश्वविद्यालय ने अपने विज्ञापन Advt.
No. 02/2019-20 dated 17.06.2019 में तो
हद ही कर दी। एक फैक्लटी(शिक्षा) के अंदर दो विभाग और इन दो विभाग में एक ही
न्यूनतम आहर्ता वाले अलग अलग पद और प्रत्येक पद का आवेदन शुल्क 500 रूपयें।
मतलब एक फैक्लटी के सभी 20 पदों पर आवेदन करने के लिए 10 हजार रूपयें का
आवेदन शुल्क। आप
विचार करें, कहा तक उचित है।
- सामाजिक न्याय के सिद्धांत 200 प्वाइंट रोस्टर को
केन्द्र सं संबंध विश्ववविद्यालयों और कॉलेजों के संबंध में केन्द्र को युनिट
मानते हुए एवं राज्य विश्वविद्यालयों के संबंध में राज्य को युनिट मानते हुए
लागू किया जा सकता है। जिससे यह सिद्धांत और अधिक सममिक (symmetric) रूप से लागू किया जा सकता।
- निजी
कॉलेज और विश्वविद्यालय अपने यहाँ काम करने वाले अभ्यार्थियों का जम कर शोषण
करते है। आम तौर पर इन कॉलेजों में नियुक्ति का आधार कम से कम तनख्वाह पर काम
करने के लिए तैयार हो जाना है। निजी कॉलेज और विश्वविद्यालयों के लिए भी
अनिवार्य हो कि इसी परीक्षा के माध्यम से अपनी रिक्तियों को भरे। निजी कॉलेज
और विश्वविद्यालयों के संबंध में एक और व्यवस्था यह होनी चाहिए कि वहाँ काम
करने वाले शिक्षकों एवं कर्मचारियों को वेतन ये संस्थान सरकार के माध्यम से
ही करें। शिक्षकों एवं कर्मचारियों का सैलरी अकाउंट उस बैंक में न हो जिस में
संस्थान का अकाउंट हो तथा इन का अकाउंट उनके निवास के निकटतम बैंक में हो।
इसके बाद भी जांच होते रहनी चाहिए कि निजी संस्थानों में शिक्षकों का किसी भी
तरह से शोषण न हो।
निष्कर्ष
संवाद
अंत में हम सरकार से पुनः अनुरोध करते हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया को
भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी बनाने के लिए ‘खुली सहायक प्रोफेसर नियुक्ति संयुक्त
परीक्षा’ का आयोजन
ही बेहतर विकल्प है। परीक्षाओं के मार्क्स और पीएचडी की डिग्रियों के सहारे सही
प्रतिभा आगे नहीं आ सकती है। पदों के लिए काफी हद तक अनुपयुक्त सिफरिशी और
चाटुकारिता प्रवृति के लोग केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में लगातार बढ़ रहे
हैं। जिसकी वजह से भारतीय उच्च शिक्षा की गुणवत्ता दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है
और असली प्रतिभा सड़क की धूल फांक रही है। कई वास्तविक प्रतिभाओं को निजी क्षेत्र
में 4-5 हजार प्रति माह के वेतन पर निचोड़-निचोड़ कर बर्मबाद किया जा रहा है।
वर्तमान में भारत के किसी भी कुलपति, प्रचार्य या चयन समिति(सार्वजनिक
एवं निजी) के सदस्य से पूछने पर वह केवल यह बताता है कि सभी नियुक्तियां निष्पक्ष
रूप से यूजीसी विनियमन के अनुसार की गई हैं। जो बाहर से विशेषज्ञ साक्षात्कारकर्ता
के रूप में आते हैं, वे भी हैं जो पहले से ही
कुलपति या चयन समिति के सदस्य के व्यक्ति ही होते हैं। वे उसी उम्मीदवार को
नियुक्त करते हैं जिसको कि कुलपति या चयनकर्ता चयन करना चाहता है। सच्चाई तो यह है
कि बाहर के विशेषज्ञों को केवल हस्ताक्षर और औपचारिकताओं के लिए ही बुलाया जाता
है। नियुक्ति में पारदर्शिता न केवल ईमानदार होने से काम करेगी, बल्कि इसका पूरी तरह से ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए, जो वास्तव में कह भी दिखाई भी देनी चाहिए है।
अतः सहायक प्रोफेसर के स्तर पर यह प्रक्रिया निष्पक्ष हो इसके लिए
साक्षत्कार के माध्यम से वर्तमान चयन की व्यवस्था को जल्द से जल्द ‘खुली अखिल भारतीय सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता नियुक्ति संयुक्त
परीक्षा’ की व्यवस्था की जाए और इस व्यवस्था के
माध्यम से ही भविष्य में केन्द्रीय, राज्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के रिक्त
पदों को भरा जाए।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने 2014 से
पूर्व के अपने चुनावी अभियान में भ्रषाटाचार मुक्त व्यवस्था का वादा किया था। अतः भ्रष्टाचार
मुक्त व्यवस्था के लिए अखिल भारतीय स्तर पर सहायक प्रोफेसर एवं अनुसंधानकर्ता
नियुक्ति की संयुक्त परीक्षा की व्यवस्था लाए।
आपके सहयोगी
अश्निनी कुमार ‘सुकरात’
अंजनी कुमार एवं अन्य
साथियों! आप सबसे अपील है कि इसपत्र को अपने सभी मित्रों को
फार्वर्ड करें और इस पर चर्चा करें। इस मत से सहमत हो तो अपने और अपने साथियों के
हस्ताक्षरों के साथ राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और मानवसंसाधन मंत्री को भेजें। इस विषय पर अधिक स्पष्टता हासिल करने के लिए संपर्क
करें-
बाकलम- अश्विनी कुमार ‘सुकरात’ (9210473599)
(हर नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, प्रतिष्ठा
और अवसर की समता एवं गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हासिल हो!!)

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