B. Ed कॉलेजों में बायोमैट्रिक
अभी हाल ही में एनसीटीई ने B.Ed
कॉलेज के शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए बायोमैट्रिक अटेंडेंस
अनिवार्य किया है। इस विषय पर हमारी एक
वरिष्ठ साथी ने मुझे अपनी राय रखने के लिए कहा। राय रखना जितना आसान नहीं था। कारण
स्पष्ट है कि सभी B.Ed
कॉलेजों का ढ़ांचा एक सा नहीं। अमूमन चार तरह की
संस्थाओं द्वारा B.Ed का कोर्स संचालित होते है- 1)गैर सहायता प्राप्त निजी
संस्थाओं द्वारा संचालित, जिसे निजी कॉलेज भी कहते है। 2) सरकार द्वारा सहायता प्राप्त
निजी संस्थाओं द्वारा संचालित, जिसे संक्षेप में एडेड(सहायता प्राप्त) कॉलेज
भी कहते है 3) सरकार द्वारा स्थापित स्वायत कॉलेज 4) विश्वविद्यालयों के शिक्षा
विभाग, जिसे हम आगे निजी और सरकार द्वारा वित्त पोषित में विभाजित कर सकते है। यदि
हम B.Ed
कॉलेजों के इस सम्पूर्ण ढांचे पर गौर करें तो हम पाते हैं कि 92%
B.Ed कॉलेज, ‘निजी
गैर सहायता प्राप्त’ है। 8 % B.Ed कॉलेज सरकारी क्षेत्र में हैं। 6% B.Ed कॉलेज सरकार
द्वारा वित्तपोषी निजी संस्थाओं द्वारा संचालित होते हैं। सिर्फ 2% B.Ed कॉलेज ही सरकार द्वारा स्थापित संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। जिसमें विश्वविद्यालयों
के विभाग भी शामिल हैं।
अब यदि इन कॉलेजेस की कार्यप्रणाली पर गौर किया जाए तो,
इन तीनों क्षेत्रों के B.Ed कॉलेज की कार्यप्रणाली
में जमीन आसमान का अंतर है। 2% B.Ed कॉलेज जो सरकार द्वारा
संचालित संस्थाओं या विश्वविद्यालय के विभागों के रूप में चल रहे हैं, उनकी कार्यप्रणाली उन 92% B.Ed कॉलेज से पूर्णतया
भिन्न है, जो निजी क्षेत्र के द्वारा संचालित होते हैं।
सरकारी क्षेत्र द्वारा संचालित B.Ed कॉलेज के रेगुलेशन की
अपनी एक स्वायत्त तरिके से चलने वाली शिक्षकों की अपनी स्व- अनुशासित प्रणाली है। जिसके
अनुसार संस्थाओं का संचालन होते है। सम्पूर्ण सत्ता किसी व्यक्ति विशेष के हाथों
में न होने की वजह से, वहाँ चैक और बैलेंस के सिद्धांत पर अनुशासन बना रहता है। जबकि
निजी क्षेत्र के द्वारा संचालित B.Ed कॉलेज की रेगुलेशन बॉडी
कॉलेज का मैनेजमेंट, मतलब कॉलेज के मालिक की मर्जी होती है।
सम्पूर्ण सत्ता कॉलेज के मालिक के हाथ में होती है। अब यदि कॉलेज का मालिक चाहता
है कि शिक्षकों को सुबह 9:00 बजे बुलाया जाए और शाम को 5:00 बजे छुट्टी की जाए।
जैसा कि फैक्ट्रियों और दफ्तरों में होता है, तो ऐसा ही
होगा। यदि ऐसे B. Ed कॉलेजों के मालिकों की समझ में B.Ed कॉलेजों की
कार्यप्रणाली फैक्ट्रियों एवं दफ्तरों की कार्यप्रणाली के समान ही होती है। इन B.Ed
कॉलेज में एनसीटीई के रेगुलेशन के बिना ही बायोमेट्रिक की व्यवस्था
है और यदि बायोमेट्रिक नहीं भी लगा तो इस काम के लिए एक क्लर्क बैठाया जाता है। जो
शिक्षकों के आने और जाने और विद्यार्थियों के आने और जाने पर पूरी निगरानी रखता
है। गलती से भी कोई शिक्षक 1 मिनट लेट हो जाए तो, उसको ‘अटेंडेंस शीट्’ में ‘रेड मार्क’ किया जाता
है। 3 से ज्यादा ‘रेड मार्क’ हो जाए तो,
शिक्षक की 1 दिन की तनख्वाह भी काट ली जाती। उनमें से कुछ कॉलेजों में यही हाल
विद्यार्थियों का भी है कि यदि वह अनुपस्थित होते हैं तो, उनसे
फाइन के रूप में मोटी रकम वसूली जाती है। नान अटैंडिग विद्यार्थियों को सीनियर सिटीजन्स
का सम्मान मिलता है। शायद एनसीटी का यह नार्म ऐसे ही B.Ed कॉलेज
से प्रेरित रहा होगा। ये B.Ed कॉलेज शिक्षकों और
विद्यार्थियों की तौहीन की कोई कसर नहीं छोड़ते। मुझे याद है, जब एक प्राइवेट कॉलेज में, जहाँ कभी मैं पढ़ाया
करता था। वहां पर टीचिंग का कार्य दोपहर 2 बजे तक समाप्त हो जाता था। परंतु हमें
फिर भी 5:00 बजने का इंतजार करना पड़ता था। 5:00 बजते ही गेट पर जिस तरह की भीड़
दिखाई देती थी। वह शिक्षकों की गुलामी को बयान करने के लिए काफी थी। इधर 5:00 बजा
नहीं, उधर बायोमेट्रिक पर निशान लगाओ कॉम्पिटिशन शुरू और
निशान लगाओं और ऐसे भागों कि आप किसी जेल से निकल रहे हो। मुझे याद है एक बार मुझे
अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए एक पुस्तक की आवश्यकता थी और वह पुस्तक
दिल्ली विश्वविद्यालय के डी स्कूल की लाइब्रेरी में उपलब्ध थी। कॉलेज मैनेजमेंट को
यह बताने के बावजूद भी कि मुझे विद्यार्थियों के काम से की जाना पड़ रहा है कॉलेज
मैनेजमेंट ने मेरी आधे दिन की तनख्वाह काटी और कहा कि पुस्तक की व्यवस्था करना
आपकी व्यक्तिगत समस्या है। विद्यार्थियों की कक्षाएं खत्म हो जाए उसके बावजूद भी
शिक्षकों को कॉलेज आना अनिवार्य होता था। ‘एकेडमिक फ्रीडम’ या ‘फ्रीडम ऑफ लर्निंग’ नाम
की अवधारणा के लिए कॉलेज परिसर में कोई जगह नहीं थी। आप समझते होंगे कि जिस समय कॉलेज
में क्लास नहीं होती तब शिक्षक कॉलेज के पुस्तकालय में बैठ कर स्वाध्याय करता
होगा। नहीं जनाब, वह समय स्वाध्याय के लिए नहीं। एक दूसरे की
चुगली करने के लिए होता है। मालिकों के भाषण सुनने के लिए और उनकी हर बात पर
मुस्कुराकर हां में हां मिलाने के लिए होता है। हाँ, इसी क्रम में एक कॉलेज के
मालिक को भाषण सुनाने का शौक था। तो आये दूसरे दिन फैकल्टी डेवलपमेंट के नाम पर प्रोग्राम
आयोजित करता। जिसमें अममुमन उन लोगों को बुलाया जाता, जिससे उसे अपने राजनीतिक
संबंध स्थापित करने होते थे। चूँकि सभी विभागों को मिला कर फैकल्टी की संख्या 150 या 200 के पार हो ही जाती थी। आने
वाले आगंतुक भी खुश की उनकों सुनने वाली एक बड़ी संख्या है। फैकल्टी से उम्मीद की
जाती है कि जब तक उनका कार्यक्रम खत्म न हो जाए, चुप-चाप सुनती रहे, बीच-बीच में
वाह-वाह करती रहे। वे बीच में ‘नैचुरल कॉल’
के लिए भी नहीं उठ सकते। बीच में कोई क्रास प्रश्न पूछना तो अक्षम्य अपराध है। कम
से कम ऐसे कॉलेजों को रेगुलेट करने के लिए तो, निसंदेह एनसीटीई का यह नार्म नहीं ही
है। उल्टे यह नार्म तो इन कॉलेजों की कार्यप्रणाली को सही साबित (लेजिटीमेट) कर
रहा है।
दूसरी तरफ एक और किस्म के B.Ed
कॉलेज हैं। यह B.Ed कॉलेज कागजों पर चलते हैं।
ऐसे B.Ed कॉलेजों को प्रचवन की भाषा में नॉन-अटेंडिंग कॉलेज कहते
है। इस तरह के B.Ed कॉलेज
का मैनेजमेंट विद्यार्थियों को आश्वासन देता है कि उनको कक्षा में आने की उनको कोई
जरूरत नहीं है। ऐसे B.Ed कॉलेज में शिक्षकों की नियुक्ति भी
कागजों पर ही होती है। शिक्षकों से उनसे सर्टिफिकेट के कागज मासिक या सालाना शुल्क
पर ले लिए जाता है। शिक्षकों और
विद्यार्थियों को साल में कुछ दिन ही कॉलेज आने की जरूरत होती है। बिना बताए,
ही आप समझ गए होंगे कि ये दिन इंस्पेक्शन वाले दिन होते हैं। ये B.Ed
कॉलेज, B.Ed की डिग्री को बेचने वाली दुकानें
मात्र है। इन B.Ed कॉलेजों में ‘लेसन प्लान’ से लेकर ‘प्रोजेक्टर’ तक की
कीमत तय है। यहां तो नंबर भी बिकते हैं। मुझें याद है मेरे कई साथियों ने ऐसे ही B.Ed कॉलेज
से B.Ed की अहर्ता हासिल की
और आज वे सिस्टम में हैं। कुछ सरकारी स्कूलों के लिए भी नियुक्त हुए है। उन्होंने
दिल्ली विश्वविद्यालय से B.Ed
करने के निर्णय
को मुर्खतापूर्ण करार दिया। बोले, “B.Ed
करने के लिए अपना समय क्यों बर्मबाद करते हो। वह शिक्षक
भर्ती परीक्षा की तैयारी में लगाओं।“ एक हमारे ऐसे ही
साथी जो इंग्लिश में बोलना जानते थे। वे इन दिनों एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में
प्रिंसिपल है। अतः स्कूल एजुकेशन सिस्टम को तो B.Ed की
डिग्री से मतलब है। कहाँ से किया? कैसे
किया? ये गौण सवाल है। मेरी यादास्त को वह दौर भी याद है जब
मैंने शिक्षा में M.Ed और NET
किया। उसके बाद दिल्ली एनसीआर के सभी कॉलेजों में अपना
सी.वी. भेज दिया। फिर क्या था, निजी कॉलेजों से जॉब के लिए आने वाली लगभग हर कॉल
नॉन अटैंडिंग कॉलेज से होती थी। उनकों सिर्फ निरक्षण वाले दिन ही संवाओं की जरूरत
होती थी। जिन कॉलेजों में कक्षाएं चलती भी तो वहाँ सिर्फ नाम के लिए। अधिकतर कॉलेज
में शिक्षण के नाम पर गाइड से डिक्टेशन देने और तमाम तरह के फंड इक्कठा करने का
काम होता था। अपवाद स्वरूप ही कुछ एक निजी कॉलेज हो जो शिक्षण पर फोकस करते हो।
शायद पहले किस्म के प्राइवेट कॉलेज से प्रेरित एनसीटीई
का यह प्रयोजन दूसरे किस्म के प्राइवेट कॉलेज को नियंत्रित करने के लिए ही हो।
परंतु इसका प्रभाव 2 % स्व-अनुशासित कॉलेजों पर भी पड़ेगा जो सरकार के द्वारा
संचालित होते हैं। उनकी स्व-अनुशासित कार्यप्रणाली पर एनसीटी का बाह्य-अनुशासन
हावी हो जाएगा और कुल मिलाकर उन चंद प्राइवेट B.Ed कॉलेज
के मूल्य शिक्षक-शिक्षा व्यवस्था पर स्थापित हो जाएंगा, जो शिक्षक को कोल्हू का
बैल और विद्यार्थी को फीस निचोड़ने की
सरसों समझते हैं।
अतः एनसीटीई के इस निर्णय को किसी भी कीमत पर सही नहीं
ठहराया जा सकता। परंतु B.Ed के नाम पर खुल चुकी
दुकानों को नियंत्रित करने का कोई ना कोई ठोस उपाय तो जरूर हो। एनसीटीई जैसी
रेगुलेटिंग संस्था नीति और नियम बनाते वक्त वह दो पर्सेंट स्व-अनुशासित कॉलेजों को
ध्यान में नहीं रखती बल्कि 92% उन निजी कॉलेजों को ध्यान में रखती है, जिनकी B.Ed शिक्षा व्यवस्था में बहुलता है। अमेरिका
जैसे निजीकरण के समर्थक देशों में शिक्षण में 50 परसेंट से अधिक निजी संस्थाएं
नहीं है। जबकि संप्रभुता संपन्न भारत में शिक्षा व्यवस्था का जो खाका अमेरिका के
इशारे पर खींचा जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप शिक्षा व्यवस्था से सार्वजनिक
निवेश धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। अतः जरूरत बायोमैट्रिक अटेंडेंस की नहीं
अपितु शिक्षा जैसी सामूहिक रूप से उपयोगी सेवाओं को निजी क्षेत्रों को सौपने की
व्यवस्था की है। वह व्यवस्था जिसने शिक्षा जैसे सामूहिक एवं सामाजिक उत्थान की
सेवा को व्यक्तिगत निजी लाभ कमाने की वस्तु में तब्दील कर दिया है। परिणाम स्वरूप
सिर्फ B.Ed ही नहीं तमाम तरह की डिग्री आज बिकाऊं माल बन गयी है। अतः
एनसीटीई को कुछ करना ही है तो, निजी कॉलेजों के शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया
को अपने हाथ में ले। सुनिश्चित करें की इन B.Ed कॉलेजों के शिक्षकों को पद अनुरूप वेतन मिले और सत्ता का
केन्द्रण संस्था के मालिक के हाथ में न हो। इन निजी कॉलेजों भी शिक्षकों की स्टाफ काउंसिल हो। इन काउंसिल
के माध्यम से ही B.Ed
कॉलेज का संचालन
हो।
बाकलम अश्विनी
कुमार 'सुकरात'(9210473599)
(सा विद्या या विमुक्तये एवं अप्प दीपो भव:)
(राष्ट्र के हर नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की
समता एवं गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हासिल हो!!)
फोन/फेसबुक/व्टसएप/इमेल संपर्क : 8178499080, 9315170059/ janchetna.janmukti@gmail.com, http://janchetna-janmukti.blogspot.in
नोट :- यह लेख बोल कर टाइप किया गया है। अतः कुछ
वार्तनी संबंधी त्रुटियाँ रहने की संभावना है।

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