नेहरू पार्क में एक सवाल नेहरू पार्क में , लेनिन की मूर्ति के साथ , सेल्फी लेते-लेते मेरे शागिर्दों ने मुझसे पूछी यह बात। समाजवाद का वह दौर भला आख़िर कब आएगा , जब न कोई ग़रीब रहेगा , न कोई अमीर कहलाएगा। या समाजवाद , साम्यवाद की बातें क्या सिर्फ़ दिखावा थीं , सर्वहारा वर्ग की मुक्ति क्या केवल छलावा थीं। साम्यवाद क्या नहीं, चंद हुक्मरानों का फ़तवा है , जहाँ विरोधी होने भर से आदमी का क़त्ल पक्का है। उत्तर कोरिया में चलता किम ख़ानदान का राज है , चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी लाल परचम का यही साज़ है। नाम साम्यवाद का है , लेकिन रुख़ सामंतवाद से भी कड़ा , मुखौटा समाजवाद का ओढ़े चीन साम्राज्यवाद की ओर बढ़ा। उसकी विस्तारवादी नीति से कौन-सा देश है, बचा भला। स्टालिन के दौर में भी हर असहमति पर पहरा था , कानाफूसी तक जुर्म ठहरी , मौत का साया गहरा था। फिर क्या ऐसा निज़ाम भी इंसाफ़ का पैग़ाम कहलाएगा , या साम्यवाद के नाम तले बस शोषण-दमन का जाम पिलाएगा। चिंता बड़ी वाजिब थी , जिज्ञासा में कोई साज़िश न थी , जो देखा , जो समझा , वही कहा , न कुछ मोल लिया , न रटा-रटाया पढ़ा। मैंन...
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अनुपस्थित अश्विनी कुमार ‘ सुकरात ’ यह कहानी एक चिंतनशील स्कूल-शिक्षक की है , जो डॉ. भीमराव अंबेडकर और पंडिता रमाबाई के विचारों से प्रेरित होकर विद्यार्थियों को जाति-केंद्रित सोच से विमुख करने की दिशा में काम करता है और इस प्रक्रिया में जाति-उन्मूलन की आधारभूमि निर्मित करता है। कथा की शुरुआत एक स्कूल-कक्षा में उपनाम को लेकर हुए मज़ाक से उत्पन्न जातिगत तकरार से होती है। शिक्षक प्रारंभ में भारतीय संविधान के आधार पर हस्तक्षेप करता है , परंतु इस हस्तक्षेप की सीमाएँ स्पष्ट होने पर वह डॉ. अंबेडकर के विचारों और सामाजिक अध्ययन की ओर उन्मुख होता है। अगले चरण में वह कक्षा को इस प्रकार पुनर्संयोजित करता है कि विद्यार्थी जन्माधारित श्रेष्ठता के दावों की अस्थिरता को समझने लगते हैं , अपने व्यवहार में निहित हिंसा को पहचानते हैं , और अंततः बराबरी , गरिमा तथा बंधुत्व जैसे मूल्यों की ओर उन्मुख होते हैं। ......................................................................................... सुबह की वह घड़ी थी जब स्कूल पूरी तरह जाग तो चुका था , पर पहली घंटी की औपचारिक गंभीरता अभी कक्षाओं...
अंग्रेजी माध्यम राज व्यवस्था का परिणाम - अंग्रेजी माध्यम विद्यालय
जब तक जन भाषाओं का प्रयोग शासन, प्रशासन तथा उच्च शिक्षा के श्रेष्ठ माने जाने वाले संस्थानों में नहीं होगा, तब तक स्कूली शिक्षा का माध्यम साँस्कृतिक परिवेश के अनुरूप भी नहीं होगा। अतः बेहतर यह होगा की स्कूली शिक्षण को सुधारने के बजाए उच्च शिक्षण के तथाकथित सर्वश्रेष्ठ संस्थानों, नौकरियों एवं उच्च शिक्षण संस्थाओं की परीक्षाओं का आयोजन करने वाली एजेंसियों जैसे यूपीएससी, एसएससी, राज्य-पीसीएस, IIM-CAT आदि इसके अतिरिक्त सत्ता के तमाम दूसरे केन्द्र जैसे सम्पूर्ण विधायिका, कार्यपालिका, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के ढाँचे में भी क्रांतिकारी परिवर्तन किए जाने की ज़रूरत है। जब तक इन संस्थाओं के ढांचे को संस्कृति की भाषा (क्षेत्रीय भाषाओं) के अनुरूप नहीं बनाया जायेगा, तब तक लोग उच्च शिक्षा के माध्मय से बेहतर भविष्य की तलाश की आस में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की तरफ़ भागते ही रहेंगे। अतः प्राथमिक शिक्षा की भाषा को परिवेश के अनुकूल बनाने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि ‘इंग्लिश सिस्टम’ अंग्रेजी छोड़े। सारी समस्या की जड़ इंग्लिश मीडियम सिस्टम में है। विश्लेषण के दौरान निष्कर...

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