इंग्लिश मीडियम एजुकेशन : समाज में एक बढ़ता क्रेज़
अश्विनी कुमार
‘सुकरात’
अप्रैल 2012 में NUEPA द्वारा प्रो.
अरुण सी. मेहता के नेतृत्व में प्रकाशित
DISE की एक रिपोर्ट 'Elementary Education in India:
Progress towards UEE' प्रकाशित हुई। यह रिपोर्ट प्राथमिक स्कूलों के स्तर
पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के संदर्भ में किये गए शोध पर आधारित थी। इस शोध में यह
अनुसंधान किया गया था कि 6-14 साल के कितने प्रतिशत बच्चे स्कूलों
में जाते हैं। साथ ही यह भी जांच किया गया कि वे किस भाषा-माध्यम
के स्कूलों में जाते हैं। यह रिपोर्ट उजागर करती है कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में
दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। 2002-03 से लेकर 2010-11 के आठ सालों के दौरान इंग्लिश मीडियम
निजी स्कूलों में पहली से लेकर आठवीं तक के दाखिले की वृद्धि दर 274 प्रतिशत रही है। इस प्रकार यह अन्य सभी भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलगू, कन्नड़, उड़िया, तथाकथित मानक-हिन्दी एवं उर्दू आदि माध्यमों में चलने
वाले स्कूलों के दाख़िले की वृद्धि दर को पीछे छोड़ते हुए, इंग्लिश
मीडियम सबसे अधिक लोकप्रिय स्कूली शिक्षा माध्यम के रूप में उभरा है। संख्या के आधार
पर अंग्रेजी भाषा में एनरोलमेंट (दाखिला) लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या बंगला तथा मराठी को पीछे छोड़ते हुए हिंदी
के बाद दूसरे स्थान पर आ गई है।
नर्सरी कक्षाओं में ही निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों
में दाख़िले के लिए मची मार-काट इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति चाहे अमीर हो या ग़रीब, हर एक का सपना अपने बच्चों को निजी
इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिला दिलवाना ही है। स्कूल के मामले में सबकी एक ‘चॉइस’ (पसंद) है, वह है - इंगलिश मीडियम स्कूल। आज उच्च-वर्ग तथा उच्च-मध्यमवर्ग का शायद ही कोई व्यक्ति होगा
जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला करवाता हो। तमिलनाडू राज्य के एक आई.ए.एस. अधिकारी ने जब अपने बच्चे
का दाखिला सरकारी स्कूल में करवाया तो यह घटना मीडिया में चर्चा का विषय ही बन गयी।
मीडिया में चर्चा का विषय वही खब़र बनती है जो लीक से हट कर होती है। शिक्षाविद् अनिल
सदगोपाल ने तो इस घटना को केन्द्र में रख कर फ्रंट लाइन जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका
में आलेख भी लिखा। उन्होंने लेख के माध्यम से कॉमन स्कूल सिस्टम के मुद्दे को फिर से
उछालने का प्रयास भी किया एवं शिक्षा के मुद्दे
पर सरकार द्वारा किये जाने वाले ख़र्च के आकड़ों के आधार पर भारतीय राज व्यवस्था की शिक्षा
के सर्वव्यापीकरण के प्रति उदासीनता को भी उज़ागर किया। पर 1960 के दशक में सरकार द्वारा स्थापित
कोठारी कमीशन की रिपोर्ट में दी गयी कॉमन स्कूल की संकल्पना खुद
सरकार की कार गुजारी की वजह से किस प्रकार विलुप्त हुई, यह अपने
आप में एक चर्चा एवं विश्लेषण का अलग विषय है। आज तो सरकारी क्षेत्र में ही स्कूलों
की बहु स्तरीय व्यवस्था है। पर यहाँ मैं जिस बात की तरफ़ ध्यान आकर्षित करना चाहता
हूँ वह यह कि सरकार ही नहीं लोग भी क्षेत्रिए भाषा माध्यम में चलने वाली सरकारी स्कूली
व्यवस्था को नकार रहे हैं। उदाहरण, जहाँ अनिल सदगोपाल जैसे शिक्षाविद
क्षेत्रिए भाषा माध्यम की कॉमन स्कूल की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्ध है वही उन्हीं को
‘ऑटो’ से नियमित रूप से रेलवे स्टेशन छोड़ने वाले
ऑटो ड्राईवर, जो कभी उनकी कॉमन स्कूली शिक्षा को स्थापित करने
की लड़ाई का सहयोगी था, निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से पिछड़े
वर्ग (EWS) को शिक्षा अधिकार अधिनियम 2010 के अनुसार 25% आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद,
उस आरक्षण के फलस्वरूप डी. पी. एस. जैसे प्रतिष्ठित निजी इंग्लिश मीडियम स्कूल में अपने
बच्चों के दाखिले का स्वप्न देख रहा है। वह ऑटो ड्राईवर शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल से आग्रह करता है, ‘‘साहब! आपकी तो बड़ी जानकारी है। सुना है, बड़े स्कूलों में गरीब लोगों (EWS) के लिए भी कुछ सीट
आरक्षित की गयी है। आप सिफारिश कर दो तो हमारे बच्चे भी बड़े प्राईवेट इंग्लिश मीडियम
में पढ़ सकेंगे।’’ कहने
का मतलब यह है कि आज हर माता-पिता अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम
के स्कूलों में दाखिला दिलवाना चाहता हैं। रहने वाला वह चाहे स्लम का हो या महल का,
हर एक की पहली पसंद इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गई है। निजी स्कूल में दाखिला
दिलवा लेना किसी किले को फ़तह करने से कम नहीं हैं। अमीर-ग़रीब
दोनों वर्गों की प्राथमिकता इंग्लिश मीडियम स्कूल हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाई
कोर्ट की जितनी गाईड
लाईन निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों के दाखिलों की व्यवस्था को लेकर है, उसकी एक दहाई भी सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को दूरस्थ करने के लिए हो। यहां
तक कि सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने वाले माता पिता तक अब उम्मीद करते हैं
कि उनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में भी इंग्लिश मीडियम में ही शिक्षा उपलब्ध करवायी
जाए। वैसे आजकल हर एक की कोशिश अपने बच्चों को उच्च ब्राण्ड के इंग्लिश मीडियम स्कूलों
में दाखिला दिलाने की ही रहती है। आजकल, लोग सरकारी स्कूलों में
तो बस मजबूरी में ही अपने बच्चों को भेजते हैं। लोग सिर्फ़ क्षमता ना होने की स्थिति
में ही सरकारी स्कूलों की तरफ़ रूख करते हैं। इस बात की पुष्टि NUEPA की यह रिपोर्ट भी करती कि सरकारी स्कूल के दाखिले में गिरावट आयी है।
इंग्लिश की चाह में लोग क्षमता न होने की स्थिति में अपनी अपनी जेब के अनुसार निम्न दर्जे के निजी स्कूलों का भी चयन करते हैं।
नतीजा यह निकलता है कि आज हर तरह के निजी इंगलिश मीडियम स्कूल खुल रहे हैं। निजी इंग्लिश
मीडियम स्कूलों की श्रेणी में घटिया दर्जे के कहलाने वाले गली नुक्कड़ के गैर मान्यता
प्राप्त इंग्लिश मीडियम स्कूल से लेकर उच्च दर्जे के कहलाने वाले अति विशिष्ट
‘हाई-फाई’ डी.पी.एस., अमेटी इंटरनेशनल,
आदि जैसे ‘ब्राण्डेड’ इंग्लिश मीडियम स्कूल भी आ जाते हैं।
अब यदि हम समाज की वर्गीय संरचना के आधार पर विश्लेषण करें तो पाते हैं कि उच्च तथा
उच्च मध्यम वर्ग के लगभग
सभी बच्चे विशिष्ट माने जाने वाले इंगलिश मीडियम स्कूलों में जा रहे हैं। वहीं निम्न
मध्यमवर्ग तथा निम्न वर्ग के माता पिता का भी सपना अपने बच्चों को सीबीएसई का पाठ्यक्रम
चलाने वाले इंगलिश मीडियम स्कूलों में ही दाखिला करवाने का है। सीबीएसई शब्द ग्रामीण
एवं कस्बाई क्षेत्र में अंग्रेज़ी माध्यम के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है।
यदि लोग उच्च दर्जे के स्कूलों का खर्च वहन नहीं कर पाते, तो
ऐसी अवस्था में ही वे निम्न दर्जे के गैर-मान्यता प्राप्त स्कूल
में अथवा राज्य बोर्ड से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला
कराते हैं, सरकारी स्कूल में तो सिर्फ़ उस ही अवस्था में अपने
बच्चों को डालते हैं। जब वे पूर्णत: आर्थिक रूप से असक्षम हों।
परन्तु जैसे ही आर्थिक स्थिति में सुधार आता है तब वे अपने बच्चों को अपेक्षाकृत निम्न
दर्जे के स्कूलों से निकालकर ऊपर के दर्जे के स्कूल में डालते हैं। वैसे शिक्षा अधिकार
अधिनियम 2010 के तहत मिले 25% के आरक्षण
से बहुतों को, बहुत ज्यादा उम्मीद है। पर क्या ये ऊपर के
10% लोगों के लिए खुले स्कूल 85% आबादी के बच्चों
को अपने अंदर समाहित कर भी पायेगें? यह एक अपने आप में बड़ा प्रश्न
है। पर हम उससे भी बड़े प्रश्न को उठा रहे हैं।
प्रश्न यह है कि इन इंग्लिश मीडियम स्कूलों में शिक्षित
होने की चाह में पहुँची देश की 85% जनसंख्या अर्थात् निम्न मध्यमवर्ग, ग्रामीण कस्बाई इलाकों के बच्चे कुछ सीख भी पाते हैं? या उच्चवर्गीय विद्यार्थियों के मुकाबले पिछड़ते ही जाते हैं? कहीं ये दाख़िले की भागम-भाग सिर्फ़ भेड़-चाल तो नहीं है?
अब यदि 2001 के जनगणना के आकड़ों को आधार बनाकर देखें तो इस देश
की जनसंख्या का 0.023% प्रतिशत अर्थात् नगण्य भाग की ही प्राथमिक
भाषा अंग्रेज़ी है। प्राथमिक भाषा अर्थात् वह भाषा जो प्राथमिक समाजिक संपर्क के
दौरान मनुष्य सीखता है। प्राथमिक भाषा, मातृभाषा का ही मानक
रूप है। मातृभाषा और प्राथमिक भाषा में अंतर यह है कि जहाँ मातृभाषा जिसे अंग्रेज़ी
में ‘मदर टंग’ कहते हैं। वह भाषा,
भाषा न होकर बोली होती है। इस भाषा को हम किसी भी भाषा परिवार में विभक्त
करने के स्थान पर समाजिक-साँस्कृतिक परिवेश में उपलब्ध भाषाओं
के मिश्रित रूप में देख सकते हैं। बच्चा बड़ी सहजता के साथ परिवेश में उपलब्ध बोलियों
को ग्रहण करता जाता है। जैसे बच्चे के मन में जाति धर्म को लेकर जन्म के समय कोई भेद
नहीं होता उसी प्रकार वह जन्म के साथ भाषाओं के भेद को लेकर भी पैदा नहीं होता है।
ये सामाजिक अंतरक्रिया है, जिसके दौरान उसे जाति धर्म के भेद-भाव के साथ भाषा-बोली का भेद-भाव
भी सिखाया जाता है या वह धीरे-धीरे स्वत: आत्मसात करता जाता है। हमारे स्थापित ज्ञान में जिसे मातृभाषा कहते हैं,
वह मातृभाषा (बोली) न होकर
प्राथमिक भाषा ही है। आम तौर पर माता-पिता की भाषा को ही मातृभाषा
मान लिया जाता है। जो एक गलत तरीका ही नहीं, गलत अवधारणा भी है।
हम इस मिथ को आने वाले अध्यायों मे खंडित कर मातृबोली की परिवेश जन अवधारणा का प्रतिपादन
करेंगे।
मतलब साफ है, 2001 की जनगणना के अनुसार 100 करोड़
लोगों में महज़ 23 लाख लोगों की ही प्राथमिक भाषा
अंग्रेजी है। हाँ, द्वितीयक भाषा के रूप में अंग्रेजी दर्ज करवाने वालों की संख्या जरूर 12.50 करोड़ के लगभग है। जो इस देश की जनसंख्या का बामुश्किल से 10 प्रतिशत हिस्सा ही होगा। साधारण शब्दों में प्राथमिक भाषा एवं
द्वितीयक भाषा के बीच अंतर का आधार उसे आत्मसात करने के तरीकों में है। प्राथमिक भाषा,
वह भाषा है जिसे बिना स्कूल, कॉलेज, कोचिंग सेंटर आदि की दहलीज पर कदम रखे, आत्मसात कर लिया
जाए। परन्तु द्वितीयक भाषाओं की स्थिति में सीखने के लिए स्कूल कॉलेज कोचिंग सेंटर
जैसे कृत्रिम संस्थानों की ज़रूरत पड़ती है। प्राथमिक भाषा स्वत: ही आत्मसात होती जाती है, जबकि द्वितीयक भाषा को सीखने
की ज़रूरत पड़ती है। अत: द्वितीयक भाषा कितनी परिवेश गत हो पाती
है और कितनी महज़ रेपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स जैसे किताबों से दो चार लाईन रट
कर हासिल होती है। यह
तो कहना ही मुश्किल है। वैसे जनगणना के आँकड़े एकत्र वाले कोई टैस्ट तो लेते नहीं हैं।
वे तो बस व्यक्ति से मिली जानकारी को दर्ज भर करते हैं। वैसे अंग्रेजी का दायरा औपचारिक
परिवेश तक ही है। पिछले दिनों ND टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम
रवीश की रिपोर्ट के एक अंक में दिखाया गया कि किस तरह लोगों में ‘‘अमेरिकी स्टाइल’’ वाली अंग्रेजी के प्रति क्रेज बढ़ा है।
इस कार्यक्रम में दिखाया की हर गली नुक्कड़
पर अंग्रेजी सिखाने वाली संस्थाएँ खुल गई हैं। अंग्रेजी सिखाने
के व्यवसाय में लगे लोगों की चाँदी ही चाँदी है। कोचिंग सेंटर सिर्फ़ 400 से 500 रू महीने पर महज़ 90 दिनों
में अंग्रेजी सिखाने का दावा भी कर रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि
लोगों में अंग्रेजी का क्रेज इस कदर हावी है कि लोगों ने ‘हैट
वाली अंग्रेजी देवी’ की पूजा तक प्रारम्भ कर दी है। और तो और
शुद्ध देशी जुबान में अंग्रेजी देवी के आराधना गीत तक का भी सृजन कर ली है। शायद बहुत
जल्द हमें दुर्गा मंदिर, लक्ष्मीमंदिर की तरह अंग्रेजी माता के
मंदिर भी देखने को मिलें। अंग्रेजी का जुनून कुछ इस कदर हावी है कि आजकल हर एक के सिर
पर ‘अंग्रेजी मईया’ ही सवार है। पर इस जुनून
में कितनी अंग्रेजी भाषा प्राथमिक रूप में सीखी और कितनी दो-चार
लाईनें रट कर हासिल की गई है। यह तो कहना बड़ा ही मुश्किल है। अत: 10 प्रतिशत अंग्रेजी बोलने वालों का आँकड़ा कितना सही है, यह स्पष्ट नहीं है। क्योंकि इस 10 प्रतिशत में पूर्ण क्षमता के साथ इंगलिश बोलने एवं समझने वालों के साथ-साथ महज़ खानापूर्ति के लिए अंग्रेजी में नाम लिख भर लेने वाले तक शामिल हैं।
भाषा के जानकारों के अनुसार महज़ 3-5 प्रतिशत लोग ही अंग्रेज़ी
का ठीक-ठाक प्रयोग कर पाते हैं। शेष तो महज़ भाषा के प्रति क्रेज
की वजह से ही अपनी द्वितीयक भाषा अंग्रेजी बता देते हैं। इस अवस्था में अंग्रेजी में
मौलिक अभिव्यक्ति कर पाने वालों की संख्या तो नगण्य ही होगी।
यदि द्वितीयक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को ही लें
तो, द्वितीयक
भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग भी
अति सीमित ही रहा है। इसका उपयोग भी सरकारी दफ्तरों के उच्च-अधिकारियों
एवं बड़ी-बड़ी कम्पनियों के आला अफसरों के केबिन, सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट में चलने वाली कार्यवाहियों, श्रेष्ठ समझे जाने वाले विश्वविद्यालयों, इंगलिश मीडियम
स्कूलों-कॉलेजों के व्याख्यानकक्षों, प्रभुत्वशाली
लोगों की पार्टियों आदि में औपचारिक बातचीत तक ही सीमित है। अत: द्वितीयक भाषा के रूप में भी अंग्रेजी
का प्रयोग सरकारी एवं
निजी दोनों प्रकार के दफ्तरों में महज़ लिखा-पढ़ी के काम काज करने भर तक सिमट कर रह जाता
है। यदि इन जगहों की भी बात करें तो सिर्फ़ उच्च अधिकारियों के स्तर पर औपचारिक बोलचाल
में ही अंग्रेजी भाषा का कुछ हद तक उपयोग होता है। जैसे सुप्रीम एवं हाई कोर्ट में जिरह के लिए तो अंग्रेजी का उपयोग होता
है। परन्तु वहाँ के दफ्तर में भी आम बोलचाल में अंग्रेजी भाषा का उपयोग अपवाद स्वरूप
ही होता है। अभी हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा का सबसे ज्यादा
उपयोग संसद भवन में ही किया जाता है।
देश के अंग्रेजी न जानने वाले आम आदमी के प्रतिनिधी काम काज करते
हैं। अब अंग्रेजी के प्रभाव से उच्च मध्यम वर्ग के बोलचाल की भाषा तो अंग्रेजी शब्दों
की बहुलता वाली ‘हिंगलिश’ हो गई है। कुछ
हद तक यह हिंगलिश, इंगलिश की ही प्रतिक्रिया है। हिन्दी का प्रतिष्ठित
अखबार नवभारत टाइम्स वास्तव में हिंगलिश अखबार ही है। बहुराष्टी्रय कम्पनियों में भी
अंग्रेजी का उपयोग ऊपरी स्तर के अधिकारीयों के वार्तालाप में तो देखने को मिलता है।
परन्तु जैसे ही मध्यम एवं निम्न स्तर के कर्मचारियों की बात आती है, उससे वार्तालाप के लिए क्षेत्रीय बोली-भाषा जैसे हिंदी,
तमिल, तेलगु, बंगला आदि मिश्रित
हिंगिलश का ही प्रयोग होने लगता है। एक बार ट्रेन में मेरी मुलाकात बहुराष्ट्रीय कम्पनी
में काम करने वाले दो तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत लोगों से हुई। जो अपनी टीम के साथ
देश में घूम-घूमकर बहुराष्ट्रीय कम्पनी का प्रोजेक्ट लगाने का
काम करते हैं। उनमें से एक पंजाब का तो दूसरा गोवा का था। जो अपनी बातचीत अपने प्रदेश
के लहज़े के साथ विकसित हिन्दुस्तानी में कर रहे थे। दो अलग-अलग
प्रदेश के होने के बाद भी दोनों के विचार-विमर्श में किसी भी
तरह का व्यवधान नहीं था। दोनों की बातचीत दो-तीन घण्टों तक सुनने के बाद मैंने उनसे
पूछा कि ऑफिस मीटिंग के दौरान उनसे किस भाषा में बातचीत की जाती है। जवाब था - अधिकारी
लोग मिक्स हिन्दी (अर्थात् गांधी की हिन्दुस्तानी) का ही प्रयोग करते हैं। सिर्फ़ तकनीकी शब्द ही अंग्रेजी के होते हैं। और शब्द, तो किसी भाषा की बपौती होते ही नहीं
जी ! इस प्रकार हम पाते हैं कि थोड़ी स्वतंत्रता मिलते ही परिष्कृत
क्षेत्रीय भाषाओं का स्थान बोलियाँ ले लेती हैं। बोलियाँ चलायमान होती हैं। इसमें भाषाओं
की तरह कोई बंधन नहीं होता। जैसे बहुराष्ट्रीय कम्पनी के टैकनिशियनों ने आपस में बातचीत
के लिए एक नई बोली गढ़ ली। जिसमें पंजाबी भी है, कोंकणी भी है।
जब कर्मचारी पंजाब, राजस्थान और बिहार आदि के एक साथ हो तो उसमें
भोजपुरी, तमिल, राजस्थानी, गुजराती आदि का मिश्रण क्यों न हो? इस प्रकार बैंकों,
दफ्तरों, कोर्ट, स्कूल-कॉलेजों आदि में लिखने पढ़ने के काम के लिए बेशक अंग्रेजी का प्रयोग होता हो
पर आम बोलचाल में हिन्दुस्तानी भाषाओं का ही प्रयोग किया जाता रहा है।
पर आजकल दृष्टिकोण ही कुछ इस प्रकार का बन गया है कि
अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करने मात्र से ही किसी व्यक्ति विशेष को आधुनिक मान लिया जाता
है। ब़ेशक वह कितना भी बड़ा दकियानूसी, अन्धविश्वासी ही क्यों न हो? आजकल
कम-से-कम अंग्रेज़ी की दो लाईनें रोजगार दिलाने में तो सहायक हैं ही। मेरे पड़ोस के एक
युवा व्यक्ति ने एक रोज मुझसे पूछते हुए अपनी बात रखी, “मैं एक
सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। कामकाज के लिए रोमन लिपि की ज़रूरत पड़ती है, विचार विमर्श काम-काज करते वक्त तो कहीं अंग्रेजी बोलचाल
का प्रयोग नहीं होता है। काम-काज के लिए जितनी अंग्रेजी की ज़रूरत
है। उससे कहीं ज्यादा हमें अंग्रेज़ी आती है। फिर ये इंटरव्यू के दौरान इंगलिश में
अपना परिचय देने की बात पर इतना जोर क्यों देते हैं? कम्बख्त
अब तो अपना परिचय तक रटना पड़ता है।” कहने का तात्पर्य सिर्फ़
इतना भर है कि सत्ता की धुरी पर बैठे लोगों भर की भाषा ही अंग्रेजी है। क्या ये बातें
भी जन-सामान्य को प्रभावित करती हैं? कहीं उन श्रेष्ठ जनों जैसा
बन जाने की इच्छा ने ही तो हममें अंग्रेजी सीखने का क्रेज पैदा नहीं किया है? कहीं इसी कारण ऐसा तो नहीं कि जो लोगों अंग्रेजी बोल पाते हैं, वे एक श्रेष्ठता बोध के शिकार हो जाते हैं और जो अंग्रेजी का प्रयोग नहीं कर
पाते वे हीन भावना से ग्रसित रह जाते हैं। क्या इस हीन भावना का नतीज़ा ही ये तेजी से
इंगलिश मीडियम स्कूलों में बढ़ता एनरोलमेंट रेट तो नहीं है? कहीं
माँ-बाप ने अपनी हीनता का ठीकरा ही तो नहीं, अपने बच्चों के सिर
फोड़ दिया। कम से कम यह तो सर्वविदित ही है कि इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले
अधिकांश विद्यार्थियों के परिवेश की भाषा अंग्रेजी नहीं है।
मीडियम अर्थात् माध्यम को लेकर शिक्षाविदों की राय
अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि गाँधी से लेकर
टैगोर तक कोई भी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी पढ़ाने के खिलाफ़ नहीं था और न ही लेखक अर्थात्
मैं ही हूँ। पर जब शिक्षा के माध्यम की बात आती है तो माध्यम के लिए हर एक ने
मातृभाषा को ही बेहतर माना है। गाँधी जी तो यहाँ तक कहते हैं कि हमारे देश के अधिकतर
विद्यार्थी अपनी अधिकांश ऊर्जा अंग्रेजी रटने में गवां देते हैं। हिन्द स्वराज
में गाँधी जी लिखते हैं, “हम एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं। तब
गलत अंग्रेजी में लिखते हैं। एक साधारण एम. ए. पास व्यक्ति भी ग़लत अंग्रेजी से बचा नहीं होता है। हमारे अच्छे-से-अच्छे विचार
प्रकट करने का ज़रिया अंग्रेजी ही है। हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अंग्रेजी में चलता
है। हमें समझना होगा की अंग्रेजी शिक्षा को लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम ही बनाया
है।” नयूपा (नयूपा ) के कुलपति आर. गोविन्दम
के कहा कि ऐसे बहुत से गहन अनुसंधान हैं, जो यह दर्शाते हैं कि
बच्चों में वैचारिक समझ तब ही पैदा हो सकती है, जब अनुदेशन मातृभाषा/बोली में हो। आर. गोविन्दम ने आगे कहा कि सिर्फ़ अंग्रेजी
सिखाने मात्र के लिए अंग्रेजी मध्यम स्कूल में दाखिला लेना जरूरी नहीं है। भारतीय भाषाओं
में पढ़ाने वाले स्कूल अर्थात् क्षेत्रीय माध्यम के स्कूलों में भी एक बेहतर अंग्रेजी
सीखी जा सकती है। उन्होंने अपना खुद का उदाहरण भी दिया कि उन्होंने अपनी प्रारंभिक
शिक्षा एक कन्नड़ माध्यम के स्कूल में पायी और वही से उन्होंने अंग्रेजी पर भी अच्छी
पकड़ बनायी। एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित पुस्तक
समझ का माध्यम के अनुसार भाषा एवं समझ का गहरा रिश्ता है, औपनिवेशिक प्रभाव के फलस्वरूप शिक्षा में समझ की जरुरत लगभग नकार दी गई है।
पिछले कुछ सालों में शिक्षा सम्बन्धी जितनी भी नीतियाँ बनी हैं वो पहली बार शिक्षा
में समझ देने की बात कह रही हैं। इसके पहले समझ क्या है? इसकी
भी समझ नहीं बन पा रही थी। ज्ञान देने और ग्रहण करने की परम्परा बस चल रही थी। बहुत
कुछ आज भी चल रही है। इसी क्रम में वर्तमान पाठ्यक्रम के आधार, NUPA-2005 का भी यह मानना है कि “बच्चा अपनी गतिविधियों के फलस्वरूप
पैदा होने वाले ज्ञान को स्थापित करता है। आम दिनचर्या में, विद्यालय
से बाहर हमने बच्चे की जिज्ञासा खोजी तथा लगातार प्रश्न पूछने की प्रवृति का आनंद लेते
रहते हैं। बच्चे अपनी आस-पास की दुनिया से बहुत ही सक्रिय रूप
से जुड़े रहते हैं। वे ख़ोज-बीन करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, चीजों के साथ कार्य करते हैं,
चीजे बनाते हैं, और अर्थ गढ़ते हैं। इस विकास में
व्यापक समाज में समाजीकृत होना भी शामिल है। जिसमें बच्चा संसार के ज्ञान को ग्रहण
करता है और नए ज्ञान का सृजन भी करता है। बच्चा अपने आप को दूसरों से जोड़ कर देखना
भी सीखता है। जिससे उसकी
समझ बनती है, वह कार्य कर पाता है और रूपांतरण भी कर पाता है।
समाज में हर एक नईं पीढ़ी को विरासत में संस्कृति एवं ज्ञान का
ऊपर के कथन से स्पष्ट होता है कि एक बच्चे को शिक्षित
करने में उसके परिवेश की बोली भाषा की ही अहम भूमिका है। बच्चे की स्कूल में चलने वाली
शिक्षा भी तभी सार्थक होगी जब वह परिवेश की गतिविधियों को समावेशित कर पायेगी। अत: समुदाय/समाज
से संस्कृति के रूप में प्राप्त होने वाली शिक्षा का समावेश विद्यालय में होना चाहिए।
क्षेत्र विशेष की संस्कृति को अभिव्यक्त करने में बोली (एवं भाषा)
की एक अहम भूमिका है। साँस्कृतिक ज्ञान को उसकी बोली के परिपेक्ष्य में
ही समझा जा सकता है। साँस्कृतिक ज्ञान महज़ मज़हबी कर्मकांड, गाना
बजाना भर नहीं है। अपितु मूल्य विश्वास परम्पराओं के साथ द्वंद्वात्मक संवाद भी हैं।
पर सवाल यहाँ यह पैदा होता है कि जिन स्कूलों में माध्यम के रूप में परिवेश से इतर
की भाषा जैसे ‘अंग्रेजी’ का गैर हिंदी भाषाई
क्षेत्रों में ‘तथा-कथित हिंदी’ अथवा ‘परिष्कृत
क्षेत्रिय भाषाओं’ का ही प्रयोग होता है। वहाँ क्या बच्चे स्कूल
के अंदर के औपचारिक और स्कूल के बाहर के अनौपचारिक वातावरण में कोई संवाद स्थापित कर
भी पाते हैं अथवा बच्चा सिर्फ़ और सिर्फ़
किताबी जानकारियों को ही ज्ञान के भ्रम में ग्रहण करते जाते हैं।
ऐसे में NCF-2005 के तत्वाधान में गढ़ा गया। नया विद्यार्थी केन्द्रित
रचनात्मक एवं विवेचनात्मक पाठ्यचर्चा
की सार्थकता क्या रह जाती है। क्या कहीं उसकी सार्थकता धरी की
धरी तो नहीं रह जाती है।
शिक्षा के एक और जानकार प्रोफेसर रैना के अनुसार प्राइवेट
स्कूलों के अध्यापकों पर कड़ाई के साथ दबाव बनाया जाता है कि वो अंग्रेजी में ही पढ़ाएं।
लेखक ने भी अपने शिक्षण अनुभव के दौरान पाया कि प्रबंधक वर्ग ही नहीं अपितु माता-पिता और यहाँ तक की विद्यार्थियों का
दबाव भी होता है कि शिक्षण कार्य अंग्रेजी में ही हो। चाहे बच्चे अंग्रेजी में बताई
बात समझ पाएं अथवा नहीं, पर शिक्षण तो अंग्रेजी में ही होगा।
एक लेखक एवं शोधकर्ता के रूप में मेरी जिज्ञासा
- एक
शोधकर्ता के रूप में मेरी जिज्ञासा का विषय बनता है कि क्या ‘परिवेश की बोली/भाषा’ के स्थान पर ‘गैर परिवेश की भाषा’ का इस्तेमाल बच्चों
में मौलिक समझ को प्रतिस्फुटित होने में सहायक बन भी सकता है?
- क्या ‘गैर परिवेश की भाषा’ में विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षण सम्भव भी है? जिसकी वकालत NCF-2005 करता है।
- कहीं
ऐसा तो नहीं कि NCF-2005 पर आधारित विद्यार्थी केन्द्रित विवेचनात्मक शिक्षण में भी बच्चा उसी
तरह से रटता है जैसा उससे पहले के पाठ्यक्रमों को रटता रहा है। ऐसे में
विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षण का क्या अर्थ रह जाता है?
- यदि हम
एन.सी.ई.आर.टी. की रिपोर्ट ‘समझ का माध्यम’ में लिखी बात, ‘‘समझ और भाषा का रिश्ता कुछ ऐसा होता है, जैसे
हवा और उसकी तरंगों का होता है। हमारी अपनी समझ अपनी ही भाषा में बनती है।
भाषा के बिना समझ की परिकल्पना असंभव है।’’ इसे
शब्दश: सत्य माने तो क्या इस नई अंग्रेजी माध्यम
स्कूलों में दाखिला दिलाने से मौलिक समझ और चिंतन प्रभाव पड़ता है?
- क्या
माता-पिता का अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में दाख़िला कराने के
पीछे कोई ठोस आधार है? या फिर एक
दूसरें के देखा-देखी, अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में
डालने की होड़ में, अपने बच्चों को भेड़ बकरियों की
भाँति इंगलिश मीडियम स्कूलों के बाड़े में ठूसते जा रहे हैं?
- आखिर वे
कौन-से घोषित और अघोषित मानदंड हैं, जो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाली स्कूली व्यवस्ता में डालने
हेतु प्रेरित करते हैं? अर्थात् अंग्रेजी माध्यम
स्कूल में डालने के पीछे क्या धारणाएं काम कर रही हैं?
- अंग्रेजी
के वर्चस्व वाली यह व्यवस्था (‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’) किस प्रकार के मूल्यों को जन्म देती हैं?
- यदि
वर्तमान में स्कूलों में चलने वाली पाठ्यचर्या के आधार, NCF-2005 में कही बात ,
‘‘बच्चे की मातृभाषाओं को नकारने अथवा उनको मिटाने के प्रयास
उसके व्यक्तित्व में हस्तक्षेप की तरह लगते हैं।’’ अर्थात् उसके व्यक्तित्व को मिटाना ही है। इस बात को शब्दश: सत्य मान लें, तो ऐसी व्यवस्था जो पूर्णत: उनकी मातृभाषाओं को नकारती हो, उनके व्यक्तित्व
पर क्या असर डालती होगी?
- गैर-परिवेश
की भाषा अंग्रेज़ी को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग करने से शिक्षा का
उद्देश्य क्या बन कर रह जाएगा?
- बच्चों पर
वह कौन-सा दबाव है, जो उसको विवश करता है कि वह ‘गैर-परिवेश की भाषा’ में ही अध्ययन करे और
इस विवशता का बच्चे के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- गैर परिवेश
की भाषा- अंग्रेजी उसके दृष्टिकोण को किस प्रकार
से गढ़ रही है? उसमें किस प्रकार का विश्वास पैदा
कर रही है?
- माँ- बाप क्या इस बात को भी समझते हैं या नहीं कि बच्चे का मौलिक चिंतन अपनी बोली में ही पैदा होता है? यदि हाँ, तो वो समझें कि वे कौन से कारक
हैं जो उन्हें अपने बच्चों को ‘गैर परिवेश की भाषा (अंग्रेज़ी) में दाख़िला दिलवाने हेतु
प्रेरित करते हैं?
- क्षेत्रीय
भाषा माध्यम विशेषत: सरकारी
स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के दृष्टिकोण पर इंगलिश मीडियम स्कूल
किस प्रकार का प्रभाव छोड़ते हैं?
- सबसे
महत्वपूर्ण है गैर परिवेश की भाषा-अंग्रेजी में बच्चे सीख भी पाते हैं अथवा नहीं? सीखने की प्रक्रिया को लेकर उनका क्या दृष्टिकोण पनपता है?
- महज़
औपचारिक वार्तालाप तक प्रयोग होने वाली अंग्रेजी भाषा के प्रति लोगों का बढ़ता
रुझान ही इंगलिश मीडियम स्कूलों के प्रति बढ़ते क्रेज़ का आधार तो नहीं है। आज
हर माता-पिता का सपना है कि उसका बच्चा अंग्रेजी सीखे और उसे सिर्फ़ अंग्रेजी
बोलनी आ जाए इसके लिए उन्होंने अपने बच्चों को इंगलिश मीडियम स्कूलों में डाल
दिया है। इंगलिश मीडियम स्कूल, अर्थात् वह स्कूल जहाँ न केवल इंगलिश में ही सारी पढ़ाई करवाई जाती
है अपितु बोल-चाल तक इंगलिश में ही होती है।
- बच्चे
उस भाषा में पढ़ाई कर रहे होते हैं जिसमें उनके स्कूल के बाहर कोई विरला ही
व्यक्ति बोलता हो। जी हाँ ! पढ़ने वाले अधिकांश बच्चों के परिवेश की भाषा अंग्रेजी नहीं है, न माँ-बाप, न अड़ोस-पड़ोस। इंग्लिश बोलना तो दूर, कोई इंग्लिश
की दो लाईनें तक नहीं समझ सकता है। तो ऐसे में बच्चे स्कूलों में इस भाषा में
शिक्षा किस प्रकार ग्रहण करते होंगे।
लेखक को ये सभी प्रश्न परेशान कर रहे हैं और इन प्रश्नों
की तलाश में ही उसने शोध कार्य किया। उसके नतीजे आप आगे के अध्यायों में पाएंगे।
XXXXX
नोट :-
अध्याय-1,
इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज ‘अंग्रेजी राज’ : ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की
व्यवस्था पर ‘साँस्कृतिक ठप्पा’ पुस्तक
से
© सर्वाधिकार -
अश्विनी कुमार ‘सुकरात’ (लेखक एवं शोधकर्ता)
प्रकाशन एवं मुद्रक : अश्विनी
कुमार ‘सुकरात’, लेखक एवं शोधकर्ता द्वारा स्व प्रकाशित एवं मुद्रित
संस्करण : प्रथम ड्राफ्ट संस्करण
(मार्च, 2014), ISBN –
978-93-5156-897-1 (PB)
द्वितीय संस्करण
(जनवरी, 2015),
ISBN – 978-93-5212-211-0(HB)
978-93-5212-210-3 (PB), 978-93-5212-212-7(e-book), 978-93-5212-213-4 (CD)
मुफ्त पीडीएफ के लिए
ईमेल janchetna.janmukti@gmail.com
/ या 9210473599 पर संक्षिप्त परिचय के साथ संपर्क करें।
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