औपचारिक, अनौपचारिक शिक्षा एवं संस्कृति


चित्र साभार, स्रोत्र अज्ञात


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अति साधारण शब्दों में ‘शिक्षा’ शब्द का बहुत ही सीधा-साधा अर्थ है - ‘#सीखना-सिखाना’, अर्थात् शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। सीखने-सिखाने की क्रिया #सचेत एवं #अचेत  रूप में #औपचारिक एवं #अनौपचारिक दोनों प्रकार की संस्थाओं के माध्यम से जीवन-पर्यंत चलती रहती है।

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आइए देखें यह कैसे होता है -


जन्म के साथ ही बच्चा अपने परिवेश के भौतिक, सामाजिक व साँस्कृतिक वातावरण के साथ परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया करना आरम्भ कर देता है। भौतिक, सामाजिक व साँस्कृतिक वातावरण के साथ की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया ही बच्चे के ज्ञान, समझ, तर्क, मत, विचार, विश्वास आदि का आधार बनती है। बचपन से ही परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया का जो दौर प्रारम्भ होता है, वही व्यक्ति की वैचारिक समझ की पृष्ठभूमि तैयार करता है। इस प्रकार व्यक्ति की वैचारिक समझ को पैदा करने में उसके सम्पूर्ण वातावरण की अहम् भूमिका होती है। यदि हम व्यक्ति को शिक्षित करने के केन्द्रों का वर्गीकरण करें तो यह दो संस्थाओं में विभक्त है- औपचारिक तथा अनौपचारिक। औपचारिक संस्थाओं में स्कूल, कॉलेज, ओपन-स्कूल/कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि संस्थाएँ ही नहीं, अपितु यू.पी.एस.सी., राज्यों की पी.सी.एस., एस.एस.सी, आई.आई.टी-जे.ई.ई., पी.एम.टी., कैट-मैट आदि परीक्षाओं का आयोजन करने वाली एजेंसियाँ भी आ जाती हैं। परन्तु औपचारिक संस्थाओं का दायरा यहीं तक नहीं सिमटता, इस दायरे में इसके अतिरिक्त तमाम राजनैतिक एवं वैचारिक समूहों की संगठनात्मक कक्षाओं को भी औपचारिक शिक्षण केन्द्र के रूप में शामिल कर सकते हैं। जो अपने कार्यकर्ताओं को तैयार करने हेतु चलाते हैं, जैसे- आर.एस.एस. की शाखाएँ, कम्युनिस्ट संगठनों की कक्षाएँ, मजहबी संगठनों की बैठकें आदि भी औपचारिक संस्थाओं ही कहलाएँगी। 

जहाँ एक ओर शिक्षण हेतु स्थापित औपचारिक संस्थाओं के रूप में स्कूल, कॉलेज,  विश्वविद्यालय, शिक्षा-बोर्ड यू.पी.एस.सी., राज्यों की पी.सी.एस., एस.एस.सी, आई.आई.टी-जे.ई.ई., पी.एम.टी., कैट-मैट आदि की परीक्षों का आयोजन करने वाली एजेंसियों आदि के पाठ्यक्रम का एक वैधानिक अस्तित्व होता है, वहीं दूसरी ओर इन संस्थाओं की मूल्यांकन प्रक्रिया का भी एक स्थापित, वैधानिक व संगठनात्मक ढाँचा होता है। वहीं गैर-सरकारी तरीके से पाठ्यक्रम चलाने वाली औपचारिक शिक्षण संस्थानों में आर.एस.एस की शाखाएँ, कम्युनिस्ट संगठनों की कक्षाएँ, मजहबी संगठनों की बैठकें, बाबा-संतों की संगत, अंग्रेजी एवं कंप्यूटर आदि सिखाने वाली कोचिंग/एनजीओ आदि आ जाते हैं। और क्यों न आएँ, आखिर ये भी तो संगठनात्मक ढाँचे के तहत, तयशुदा लक्ष्यों के अनुरूप लोगों के सोचने-विचारने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। ऐसा नहीं है कि इनका अपना कोई पाठ्यक्रम नहीं होता, इनका भी पाठ्यक्रम होता है, जिसे ये संस्थाएँ कुछ घोषित एवं अघोषित तरीके से लागू करती हैं। इतना ही नहीं, छ्द्म रूप से ही सही, पर इन संस्थाओं में भी मूल्यांकन की प्रक्रिया भी निरंतर और नियमित रूप से चलती रहती है।

अनौपचारिक शिक्षण केन्द्रों के रूप में परिवार, नातेदारी, जाति, मजहब, समुदाय, औपचारिक संगठनों में चलने वाली गतिविधियाँ, जिनके पीछे की संगठनात्मक-योजना काम नहीं कर रही होती है। वहीं औपचारिक रूप में स्थापित संस्थाओं में भी विधान अर्थात् तय नियमों से हट कर जो परस्पर सहचर गतिविधियाँ भी होती हैं। वे सब भी अनौपचारिक ही हैं। समाज में निरंतर चलने वाली परस्पर क्रिया प्रतिक्रिया और उसके फलस्वरूप पैदा होने वाला संवाद ही सामूहिक समझ को   प्रतिस्फुटित करता है। इनमें से कुछ गतिविधियाँ सचेत रूप में और कुछ अचेत रूप में चलती रहती हैं। व्यक्ति की समझ को तैयार करने वाली इन सभी गतिविधियों का कहीं कोई ठोस अस्तित्व नहीं होता। फिर भी यह व्यक्ति के सोचने-समझने एवं विचारने के तरीकों पर गहरा छाप छोड़ती है। बाज़ार और बाज़ार से जुड़ी संस्थाएँ व्यावहारिक बनाती हैं। वहीं मीडिया का भी लोगों की राय, सहमति, समझ, तजवीज़ अर्थात् विचारधारा का निर्माण करने में अपनी विशेष भूमिका है। बसों, ट्रेनों आदि में चलने वाली बातचीत, जो बस-स्टैंड या स्टेशन आने के साथ स्वतः खत्‍म हो जाती है। क्या ये सब व्यक्ति को शिक्षित करने का काम नहीं करती हैं? क्या सरकार के वैधानिक नियमों के बाहर चलने वाले तमाम दूसरे संगठन, जैसे- आर.एस.एस. की शाखाएँ, नुक्कड़ नाटक, साक्षरता समूह की बैठकें आदि-आदि, क्या ये सब व्यक्ति की समझ बनाने में भूमिका नहीं निभाते है? अर्थात् व्यक्ति का ज्ञान-निर्माण करने में उसके सम्पूर्ण भौतिक, आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, समाजिक अर्थात् सम्पूर्ण साँस्कृतिक परिवेश में चलने वाली गतिविधियाँ आ जाती हैं। इस प्रकार औपचारिक संगठनों के रूप मे भी स्कूल-कॉलेज आदि की भूमिका बहुत ही सीमित है और वह भूमिका भी पूरी तरह से तब नदारद हो जाती है जब स्कूल और समुदाय के भाषाई व साँस्कृतिक परिवेश का आपस में कोई ताल-मेल न हो।

मोटे तौर पर देखें तो औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं में भेद सिर्फ़ योजना  का है। जहाँ औपचारिक संस्‍थाओं के पीछे संगठनात्मक योजना काम कर रही होती है वहीं अनौपचारिक संस्‍थाओं के पीछे कोई योजनाबद्ध कार्यक्रम नहीं होता, जैसे- औपचारिक संस्थाओं के सचेत साधनों के रूप में स्थापित स्कूल, मुक्त-विद्यालय, कॉलेज, विश्वविद्यालय, शिक्षा-बोर्ड, मज़हबी संगठन, आर.एस.एस. की शाखाएँ, कम्युनिस्टों की कक्षाएँ, एन.जी.ओ. की गतिविधियाँ  आदि का स्थान, समय, पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्चा, पाठ्यसामग्री, अध्यापक/प्रवक्ता/उपदेशक आदि और उद्देश्य, काफ़ी हद तक निश्चित और स्पष्ट होते हैं। अर्थात् कौन पढ़ायेगा, क्या पढ़ायेगा, किसलिए पढ़ायेगा, किस समय पढ़ायेगा, किस आयु-अवस्था में पढ़ायेगा, किसको पढ़ायेगा, किस तरह से पढ़ाएगा और किस मकसद से पढ़ायेगा आदि-आदि यह सब कुछ तयशुदा होता है। स्कूल-कॉलेज जैसी औपचारिक शिक्षण संस्थाओं के द्वारा हासिल शिक्षा की एक ‘वैधानिक अहर्ता’ भी होती है। वहीं शिक्षा की अनौपचारिक व्यवस्था अत्यंत उलझी हुई है। बिल्कुल अंगूर की बेल के समान। अनौपचारिक संगठन की तुलना ‘ग्रेपवाइन’ से कर सकते हैं। इसकी कोई वैधानिक मान्यता तो नहीं होती। व्यक्ति की सम्पूर्ण शिक्षा औपचारिक और अनौपचारिक के बीच समन्‍वय का ही परिणाम है। स्कूल-कॉलेजों में चल रही शिक्षण क्रियाओं का संवाद जब तक तमाम दूसरे औपचारिक और अनौपचारिक संगठनों के साथ नहीं होगा तब तक औपचारिक शिक्षण संस्थान अपने शिक्षा संबंधी उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सकते। दोनों का समन्वय  ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को तय करता है। देखने में आता है कि विज्ञान का एम.एससी. पास व्यक्ति भी बिल्ली के रास्ता कटाने पर थम जाता है। विश्वविद्यालयों में पढाने वाले प्रोफ़ेसर तक अपने भविष्य की अनिश्चितता से परेशान  होकर ज्योतिषियों के  चक्कर काटने लगता है। विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों के बीच होरोस्कोप को लेकर बात करना तो बहुत ही सामान्य घटना है। अभी तक के सभी उदाहरण उनके हैं जिन्होंने उच्च स्तर के विश्वविद्यालयों से औपचारिक शिक्षा ग्रहण की है। औपचारिक शिक्षा के उदेश्यों में कहीं-भी इस प्रकार के अंधविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं है। उलटे औपचारिक शिक्षा की संपूर्ण व्यवस्था अंधविश्वास को उखाड़ फैंकने हेतु है। फिर भी, उच्च स्तर की औपचारिक संस्थाओं से ‘पास आउट’ के संज्ञान में भी ये अंधविश्वास पैर जमाए खड़ा है, तो सवाल उठता है कि एक लम्बी अंतःक्रिया के बाद भी यह गैर-तार्किक ज्ञान, व्यक्ति के संज्ञान में कैसे अपनी जड़ें जमाए बैठा है? आखिर उसके प्रवेश का रास्ता क्या है? वह संज्ञान में आया तो आया कैसे? कहीं, लोग मानक-औपचारिक शिक्षा को ‘बाय-पास’ तो नहीं कर रहे?   

आइए, अब जरा अनौपचारिक ढाँचे पर पुनः विचार करें। अनौपचारिक संस्थाओं में न केवल परिवार, नाते-रिश्तेदार अपितु समुदाय का वृहत समाजिक ताना-बाना अर्थात् सम्पूर्ण भौतिक, समाजिक, साँस्कृतिक परिवेश आ जाता है। जब हम संस्कृति की बात करते हैं, तो उसमें केवल लौकिक एवं अलौकिक ज्ञान और उस पर आधारित कथा, गीत, नाट्य, पूजा-पाठ भर नहीं होता। अपितु उसमें विश्वास, मत, परम्पराएँ आदि भी समाहित होती हैं, जिन पर सम्पूर्ण लोकाचार स्थापित होते हैं। अतः समाज में प्रचलित  विचारों, विश्वासों, मतों, धारणाओं  आदि पर किसी क्षेत्र विशेष के लोगों का लोकाचार निर्भर करता है। किसी समाज विशेष में पाए जाने वाले तमाम अच्छे और बुरे के बीच में विभाजित क्रियाएँ लोकाचार में आ जाती हैं। व्यक्ति को शिक्षित करने का सशक्त माध्यम उसके परिवेश की संस्कृति एवं उसमें समाहित ज्ञान ही है। शिक्षित करने की प्रक्रिया औपचारिक और अनौपचारिक दोनों रूपों में निरंतर चलती रहती है। समय के साथ संचित ज्ञान ही संस्कृति का रूप धारण करता जाता है। किसी क्षेत्र की संस्कृति उस क्षेत्र की प्रचलित बोली (भाषा) में प्रतिबिम्बित होती है। अतः परिवेश की बोली/भाषा ही ज्ञान की सामाजिक धारा का वाहक भी है। पर औपनिवेशिक अंतःक्रिया के दौरान ‘#औपनिवेशिक_नागरिक तैयार करने के माध्यम के रूप में जिस स्कूली एवं विश्वविद्यालयीव्यवस्था का पदार्पण हुआ, उसने बिना किसी संवाद के अंग्रेजी भाषा में पश्चिमी मूल्यों को थोपने भर का ही कार्य किया। जबकि पश्चिम में वही ज्ञान एक लंबे लोक-संवाद के बाद पैदा और स्थापित हुआ है। औपनिवेशिक शिक्षा का सीधा-सा लक्ष्य आज्ञाकारी नागरिक तैयार करना था ना कि ‘विवेकशील एवं विचारशील नागरिकों’ को खड़ा करना। कमोबेश यही स्थिति स्वतंत्रता के बाद भी बनी रही। औपनिवेशिक मॉडल पर खड़े किए स्कूल-कॉलेज आज व्यक्ति को शिक्षित करने की औपचारिक संस्थाओं के रूप में स्थापित हो चुके हैं। कोठारी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत का भविष्य विद्यालयों में बन रहा है। पर अब सवाल यह उठता है कि वह किस प्रकार का  बन रहा है। एन.सी.एफ. 2005 ने #बाल_केंद्रित_शिक्षा की वकालत की है। उसके अनुसार #बाल_केंद्रित_शिक्षा का अर्थ है- “बच्चों के अनुभवों, उसके स्वरों और उनकी सक्रिय सहभागिता को प्रथमिकता देना। इसलिए शिक्षा की योजना ऐसी हो कि वह विशेषताओं व जरूरतों की विशाल विविधाताओं के तहत भौतिक, साँस्कृतिक व सामाजिक प्राथमिकताओं को संबोधित करे। बच्चे भी उसी वातावरण में सीख सकते हैं, जहाँ उन्हें लगे कि उन्हें महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जैसा कि कहा भी जाता है, एक पूर्ण बच्चा स्कूल आता है, अर्थात् जब कोई बच्‍चा/व्‍यक्ति स्कूल या कॉलेज आता है तो अपने साथ अपने साँस्कृतिक परिवेश को भी लेकर आता है। जिसमें उसकी भाषा और लोकाचार सब कुछ आ जाता है। बच्चे का साँस्कृतिक परिवेश अर्थात् समाज से मिलने वाली अनौपचारिक शिक्षा  विद्यार्थी में अपना स्वयं ज्ञान सृजित करने की स्वभाविक क्षमता को विकसित करती है। अब यदि स्कूल/कॉलेज का वातावरण बच्चे/व्यक्ति के उस साँस्कृतिक परिवेश को अपने अंदर समाहित नहीं करता तो वह बच्चे/व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया में बाधक ही बनता है। बच्चा/व्यक्ति स्कूल के अंदर के कृत्रिम वातावरण तथा स्कूल/कॉलेज से बाहर के साँस्कृतिक वातावरण में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता और इसका सीधा परिणाम यह होता है कि स्कूल में दिए जा रहे ज्ञान को वह बिना अनुभव के गटा-गट गटकता जाता है। ऐसी अवस्था में यह ज्ञान विद्यार्थी के जीवन में तिलिस्म ही पैदा करता है। यह ज्ञान बच्चे/व्यक्ति को उसके परिवेश से काटने का ही काम करेगा, ना की जोड़ने का ... और ऐसे व्यक्ति दोहरी जिंदगी जीने लग जाते हैं।


#अनौपचारिक अर्थात् ग्रेपवाइनव्यवस्था के रूप में समाजीकरण की प्रक्रिया

#अनौपचारिक शिक्षा वास्तविक स्वरूप में ‘#समाजीकरण’ की ही प्रक्रिया है जो जन्म के साथ ही आरम्भ हो जाती हैं और ताउम्र साथ-साथ चलती रहती है। इस प्रक्रिया के द्वारा ही व्यक्ति ‘#साँस्कृतिक-ज्ञान’ को आत्मसात करता जाता है। इस प्रक्रिया में एक साथ कई संस्थाओं की भूमिका एक दूसरे के साथ अन्तःक्रियाएँ करने की रहती है। जहाँ जन्म के बाद के कुछ महिनों में प्राथमिक समाजीकरण की प्रक्रिया में बच्चा बचपन की अबोध अवस्था में ही अपने आसपास की गतिविधियों को महसूस कर सामाजिक मूल्यों को आत्मसात करता जाता है। मनोवैज्ञानिक सुधीर कक्‍कड़ की मानें तो बच्चे के सबसे अधिक निकट माँ होती है तथा बच्चा अपनी भौतिक आवश्यकता के साथ संवेगात्मक आवश्यकता के लिए भी माँ पर सबसे ज्यादा निर्भर एवं निकट होता है। (माँ नहीं है तो जो भी माँ के समान प्राथमिक देखभाल करता/करती है) उसके शरीर से निकलने वाली तरंगों के आधार पर भी अपने नजरिये को गढ़ना प्रारम्भ कर देता है।

बीबीसी-हिन्दी.कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका के पैनसिल्वेनिया स्थित फ़्रैंकलिन एंड मार्शल कॉलेज के माइकेल गोल्डश्टाइन और उनके साथी शोधकर्त्ताओं ने प्ले सेशंज़ यानी क्रीड़ा-काल के दौरान आठ महीनों के शिशुओं और उनकी माताओं के व्यवहार का अध्ययन किया। पहले तो उन्होंने शिशुओं की मुँह से निकलने वाली आवाज़ों और उन ध्वनियों को लेकर की गई उनकी माताओं की प्रतिक्रियाओं का सामूहिक अध्ययन किया। फिर उन्होंने माताओं के दो वर्ग बनाये. एक वर्ग की माताओं से कहा गया कि वे अपने बच्चे की आवाज़ों के जवाब में मुस्कुराएँ, उसके निकट जाएँ और उसे छुएँ या अपने साथ लगाएँ। दूसरे वर्ग की माताओं की प्रतिक्रियाओं को सहज रूप से होने दिया गया। शोधकर्त्ताओं ने इन सबका विश्लेषण करने पर पाया कि पहले वर्ग के शिशुओं ने जल्दी बोलना सीखा। इन शिशुओं की आवाज़ों में वर्णमाला के अक्षर अपेक्षाकृत ज़्यादा थे और वे व्यंजनों से स्वरों की ओर जाने में भी तेज़ी दिखा रहे थे। यहाँ ब्रिटेन की एग्ज़िटर यूनिवर्सिटी के डॉ. ऐलन स्लेटर ने भी इस निष्कर्ष की पुष्टि की है। वे कहते हैं, "अगर बच्चों को बोलते समय प्रोत्साहन न दिया जाए, तो वे देर से भाषा सीखते हैं। बच्चों के बोलने के जवाब में बोलना चाहिए और मुस्कुराना, उन्हें छूना और हाव-भाव आदि का प्रदर्शन करना चाहिए।"

अतः स्पष्ट होता है कि प्राथमिक समाजीकरण के दौरान बच्चा अपनी संस्कृति के अनुरूप ना केवल दृष्टिकोण को गढ़ता है, अपितु मूल्यों को समाहित करते हुए उसके अनुरूप आचरण भी करना भी सीखता है और उसी प्रक्रिया के दौरान भाषा को भी आत्मसात करता जाता है। मैं एक लेखक के रूप में यहाँ अपनी पुत्री का उदाहरण देना चाहूँगा। मैं एक रोज़ घर पर बैठा अपना काम कर रहा था। पर्स रखते वक्त एक सिक्का गिर गया। उसे उठा कर मैनें साइड में रख दिया और मैं अपना काम करने लगा। मेरी पत्नी रसोई में कुछ पका रही थी। जब काम से ध्यान हटा तो अपनी सवा साल की बेटी को आवाज लगाई। जब कोई जबाब नहीं मिला तो उसे ढूँढ़ना प्रारंभ किया। पर वह घर में नहीं थी। फिर पत्नी से पूछा तो वह उसके पास भी नहीं थी। जब व‍ह पूरे घर में नहीं दिखी तो मैंने बाहर नज़र दौड़ाई। देखा वह धीरे-धीरे लुढ़कते-फुढ़कते दुकान की तरफ़ जा रही है। साथ-साथ बोल रही है- चीजी-चीजी। घटना मामूली-सी है, पर सवाल गहरे पैदा करती है। एक सवा साल के बच्चे को कैसे ज्ञान हुआ कि दुकान से चीजी एक्सचेंज अर्थात् अदल-बदल कर ही मिलती है? कैसे ज्ञान हुआ कि इस सिक्के से ही ‘चीजी’ खरीदी जा सकती है? किसी और से नहीं। जब उसकी इच्छा चीजी लेने की ही थी, तो वह वैसे ही दूकान पर जाकर माँग लेती, ठीक वैसे ही जैसे घर पर मम्मी-पापा से माँगती है। वह सिक्के को लेकर ही क्यों गई? शायद इन सवालों को कर के हम बच्चे के सामाजिक मूल्यों को ग्रहण करने की क्षमता को कम करके आँक रहे हैं।

समाजीकरण की प्रक्रिया को अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से अलग-अलग तरीके से स्पष्ट करने का प्रयास किया है। जहाँ मनोवैज्ञानिक सिग्मन फ्रॉयड के अनुसार, एक बच्चे की नैसर्गिक प्रवृत्ति (इद) सामाजिक कारकों (सुपरइगो) से टकरा कर मनुष्य के व्यक्तित्व (इगो) को गढ़ने का काम करती है।इस प्रकार संस्कृति का निर्माण भूख और यौनेच्छा की बुनियाद पर होता है और भूख और यौनेच्छा का गहरा सम्बन्ध प्रकृति से है। मतलब प्राकृतिक तेवर और साँस्‍कृतिक मिजाज में अंतरंग सम्बन्‍ध होता है। (रजनीश 2012)

जबकि मनोविज्ञानिक मीड ने इसे मनोविश्लेषक फ्रॉयड के सिद्धान्त से कुछ आगे बढ़ कर स्पष्ट किया। मीड के अनुसार, व्यक्ति के व्‍यक्तित्‍व को गढ़ने में भाषा (परिवेश विशेष की बोली) की अहम् भूमिका है इस प्रकार परिवेश की भाषा अर्थात् बोली पर विशेष बल दिया। व्यक्ति का ‘स्व’ सामाजिक अनुभवों से गढ़ता है।

मीड के अनुसार, मानव भाषा तथा संकेतों के माध्यम से अर्थों को गढ़ता है। एक बच्चा दूसरों के नज़रिये से खुद को देखता है। दूसरों की भूमिकाओं को समझते हुए ‘स्व’ के प्रति जागरूक होता है। स्व-जागरूकता की वजह से वह आस-पास की उन क्रियाओं को दोहराता है, जिन्‍हें वह अपने आस-पास होते हुए देखता है अथवा सुनता है।

मनोवैज्ञानिक कोली ने भी बच्चे के व्यक्तित्व के निर्माण में सामाजिक अंतःक्रियाओं पर विशेष बल दिया। इस प्राथमिक #समाजीकरण के दौरान बच्चा मूल्यों एवं भाषा (बोली) दोनों को आत्मसात करता जाता है। जिस व्याकरण को स्कूलों में नवीं, दसवीं कक्षा में पढाया जाता है। अपनी बोली के व्याकरण को तो बच्चा तीन साल की ही उम्र में ही आत्मसात कर चुका होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रो. चाँद किरण सलूजा ने भी कई बार अपने वक्तव्यों में इस तथ्य से सम्बंधित उदाहरण दिए हैं। सलूजा जी अपने द्वारा किये गये प्रयोग का हवाला देते हुए वर्णन करते हैं कि किस तरह तीन साल का बच्चा व्याकरण की गलतियों को पकड़ता है। सलूजा जी अपने एक प्रयोग का हवाला देते हैं कि जब वे एक बालक को बालिका की तरह सम्बोधित करते हुए बोलते हैं “मनु, क्या खायेगी? मनु क्या पीयेगी? तो वह बालक उनसे नाराज़ हो जाता है और अपनी माँ से जाकर उनकी शिकायत करता है “मैं तो लड़का हूँ, पर अंकल मुझे लड़की की तरह क्यों बोल रहे हैं?

अनुसंधानकर्ता ने भी अपने अनुभव में पाया के सवा साल का बच्चा बेशक कुछ-ही शब्द बोलता हो, पर वह उन सभी शब्दों को समझता है, जिनके भौतिक अस्तित्व से वह परिचित होता है। अनुसंधानकर्ता ने इस बात को परखने के लिए अपनी डेढ़ वर्षीय पुत्री को जुराबें दीं तथा जब उसे बाल्टी में रखने के लिए कहा तो उसने बाल्टी में और जब जूतों में डालने को कहा तो जूतों में और जब अपनी माँ को दे कर आने को कहा,  तो वह माँ को देकर आई। इस प्रकार जो संज्ञान में है उन वस्तुओं का उच्चारण करने पर उसने उन्हीं को उठाया। जब पूछा गया कि पीनू के खिलौने कहाँ है?” तो वह खिलौने उठा लाई। जबकि वह उस वक्त खिलौने का उच्चारण नहीं कर पा रही थी। इसी प्रकार चम्मच लाने को कहा गया जो उसकी पहुँच के बाहर थी। तो उस चीज को लेने के लिए अपनी माँ को इसारे से उइ–उइ’ कहा। यह ‘उइ–उइ’ शब्द बच्चे ने अपनी सुविधानुसार खुद गढ़ा है। जब भी कोई वस्तु, जो उसकी पहुँच के बाहर की हो उसे लेने हेतु वह ‘उइ–उइ’ बोलती है। इस प्रकार ‘उइ–उइ’ की ध्‍वनि या उच्चारण एक प्रकार से ‘वह या उस’ के स्थान पर प्रयोग कर रही है अतः ‘उइ–उइ’ एक प्रकार से सर्वनाम ही है। प्रयोग को थोड़ा कठिन बना कर जब बाल्टी की तरफ़ इशारा करके जुराब को जूतों में रखने को कहा तो कुछ देर सोच कर उसने उसको चुना, जिसे उसने सुना अर्थात् जूता।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि बच्चा जो अनुभव करता है वह ग्रहण करता है और वह अपने समान्यकृत अनुभवों के आधार पर विचार कर के निर्णय लेता है। चूकि एक–डेढ़ वर्ष का बच्चा अभी “सेंसरी मोटर स्टेज” में है अतः वह वो सारी वस्तुएँ, जिन्‍हें वह महसूस (सेंसेशन) कर सकता है, उनके लिए प्रयुक्त शब्दों को समझ जाता है। इसकी हम व्यवहारवादियों की नज़र से भी व्याख्या कर सकते हैं। जब हम किसी एक वस्तु को एक खास शब्द के साथ सम्बन्धित करते हैं। तो बच्चा भी सुन-सुन कर उस वस्तु को उस शब्द-विशेष के साथ सम्बन्धित करना प्रारम्भ कर देता है। प्रसिद्ध दार्शनिक जॉन लोक ने कहा था - नवजात शिशु एक कोरी स्लेट की भाँति होता है। पर हम पाते हैं कि उसका दिमाग एक कोरी स्लेट के समान नहीं होता अपितु वह तो पूर्ण सहभागी सृजनकर्ता होता है और सहभागी क्रियाओं के द्वारा क्रिया एवं भाषा को आत्मसात करता जाता है। कक्षा-शिक्षण के दौरान केन्‍द्रीय शिक्षण संस्थान की शिक्षा मनोविज्ञान की  शिक्षिका प्रो. भारती भवेजा ने कक्षा में चल रहे विचार-विमर्श के दौरान एक विद्यार्थी द्वारा पूछे गए सवाल पर स्पष्ट किया कि बच्चा क़ाबि‍लियत लेकर तो पैदा होता है, पर क़ाबिल तभी बन पाता है जब वह क्रियाशील होता है। अर्थात्  “शिशु में विभिन्न प्रकार के व्यवहार तथा अनुभवों को ग्रहण करने की क्षमताएँ एवं सम्भावनाएँ रहती हैं।” लेकिन सामाजिक अन्तःक्रियाओं के दौरान ही वह क़ाबिल होता है। परिवेश के अनुरूप क़ाबिल बनाने की प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहते हैं। इस प्रकार समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान एक बच्चा अपने परिवार, समुदाय, क्षेत्र के #समाजिक-साँस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप आचरण को आत्मसात करता जाता है। एक सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश में गाय उसके लिए पवित्र है, तो  वहीं दूसरे समुदाय में बच्चे के लिए गाय महज खाने की वस्तु है। एक सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश में जहाँ वह हाथ से खाना सीखता है, वहीं दूसरे में काँटे और छुरी से। व्यक्ति का चलना, उठना, बोलना, सुख-दुःख में शामिल होना, सब कुछ #सामाजिक-साँस्कृतिक परिवेश की देन है और यह सीखने-सिखाने की परम्परा निरउद्देश्‍य तरीके-से चलती रहती है। अतः इस सीखने की प्रक्रिया में बिना सीखे ही बहुत-कुछ अचेत रूप से सीख लिया जाता है। इसलिए इस सीखने की प्रक्रिया  को सीखना  कहने के बजाय आत्मसात करने की प्रक्रिया  कहना ज्यादा उचित होगा। यह सीखने से कहीं ऊपर आत्मसात करने की प्रक्रिया है। जिसमें सीखी गयी क्रिया व्यक्ति में रच-बस जाती है। अतः यह सीखना नहीं, आत्मसात करना है।

इसी प्रकार बोली भाषा भी भौतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश का ही उत्पाद है। इसलिए उसे सीखा नहीं जाता। वह तो आत्मसात हो जाती है। इस प्रकिया में जहाँ एक सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश में बच्चा ‘भोजपुरी’ बोली आत्मसात करता है। वहीं दूसरे सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश में ‘हरियाणवी’ बोली, तीसरे सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश में ‘जर्मन’ चौथे में सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश में ‘रूसी’ बोली तो पाँचवे  सामाजिक, साँस्कृतिक परिवेश में ‘अंग्रेजी’ बोली। दिल्ली के स्लम इलाकों के बच्चे एक साथ बहुत सी बोली-भाषाओं के पुट (बोल) आत्मसात कर जाते हैं और इस प्रकार एक मिली-जुली भाषा का विकास भी होता है। कारण स्पष्ट है स्लम में देश के भिन्न-भिन्न इलाकों के लोग आकर बसे हैं। मसला पानी के झगड़े का हो या किसी के सुख-दुख का, स्लम के लोगों की आपसी अन्तःक्रियाएँ होती ही रहती हैं। इस कारण बच्चे ना केवल तेजी-से एक-दूसरे की संस्कृति को जान जाते हैं अपितु एक-दूसरे की भाषाओं को भी सीख जाते हैं। यह तथ्य अनुसंधानकर्ता ने अपनी पुत्री के सन्दर्भ में भी देखा कि दिल्ली में हमारे पंजाबी पड़ोसी के बच्चे के साथ खेलते हुए बहुत-से पंजाबी शब्दों का उच्चारण करने लगी। जब महाराष्ट्र के जिला औरंगाबाद स्थित अपने ननिहाल गयी तो वहाँ भी काफ़ी जल्दी ही बिना किसी भेद-भाव के दिल्ली वाली बोली के साथ मराठी को मिला लिया। यहाँ विशेष बात यह भी है कि बच्चे के ननिहाल के लोग बिहार से संबंधित हैं,  वो लोग अमूमन घर में मिश्रित भोजपुरी का प्रयोग करते हैं। परंतु बच्चे पर सिर्फ़ उनकी भाषा का प्रभाव कम तथा आस-पास के परिवारों की भाषा का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है। इसका कारण स्पष्ट है कि खाने-पीने की जरूरतें पूरा होने के बाद बच्चा मुक्त होकर आस-पास के अपने साथ के बच्चों के साथ खेलता है। आस-पास के दूसरे बड़े व्‍यक्तियों के साथ भी सम्पर्क में आता है और सम्पर्क में आने की इस क्रिया के दौरान वह परिवेश की भाषा को ग्रहण करता जाता है। हर बच्चा अपने परिवेश की भाषा (बोली) को उसके व्याकरण के साथ महज तीन साल की उम्र में अपने अंदर समाहित कर चुका होता है।

प्रो. अनिल सदगोपाल के अनुसार “भाषा (बोली के सन्दर्भ में) महज सम्प्रेष्ण का माध्यम नहीं है यह तो संस्कृति का वाहक है। एक क्षेत्र विशेष के लोगों का सम्पूर्ण ज्ञान उनकी बोलियों के माध्यम से प्रवाहित होता है। उदाहरण के तौर पर जमे हुए पानी के लिए हिंदी तथा अंग्रेजी में चंद ही शब्द होगे जबकि एस्किमो की बोली में इसके लिए दो दर्जन से भी अधिक शब्द हैं। राजस्थान की भाषा में गर्म हवा के लिए हिंदी पट्टी की अन्य बोलियों से कहीं अधिक शब्द हैं। इसी प्रकार उत्तर भारत में बोले जाने वाली भाषाओं में समुद्र को लेकर शायद ही कोई मुहावरा प्रचलित हो परन्तु तटीय प्रदेशों की भाषाओं में समुद्र से सम्‍बन्धि‍त अनेकों मुहावरे, लोकोक्तियाँ एवं काव्य हैं। राजस्थान के लोक ज्ञान में जितने मिथक पानी को लेकर हैं, पूर्व की बोली में नहीं। सवाल उठता है क्यों? रामायण एक ऐसा काव्य है जिसके अनेकों संस्करण प्रचलित हैं। उत्तर भारत में रामायण की नायिका सीता को धरती माँ के गर्भ से पैदा हुआ माना जाता है, वहीं दक्षिण में सीता को रावण की छींक से पैदा हुई रावण की बेटी माना जाता है।(संदर्भ–रावण की बेटी) कारण यह है कि अवध के इलाके में जहाँ सीता  शब्‍द का अर्थ हल का फाल होता है, वहीं कन्नड भाषा में सीता का अर्थ सीत आ जाना, अर्थात् सर्दी-जुकाम लग जाना है। अतः शब्द का अर्थ बदलते ही लोक महागाथा का स्वरूप ही बदल गया। बोली-भाषा, भाषा भर नहीं है। यह परिवेश विशेष के सामूहिक अनुभवों की अभिव्यक्ति है। भाषा-बोली अपने क्षेत्र के सौन्दर्य को अपने अन्दर समाहित किये हुए होती है। बोली का मरना सिर्फ़ बोली का मरना नहीं है यह समूर्ण साँस्कृतिक ज्ञान का उजाड़ना भी है। ताऊ, चाचा, काका, ये शब्द अंग्रेजी के अंकल  के पर्यायवाची नहीं हो सकते। ये तो जीवंत भाव है। इस भाव की जड़ें संस्कृति में समाई हुई हैं। यदि ताऊ, चाचा, काका का अंकलकरण होता है तो शब्दों में जड़ा अपनत्व नष्ट होकर महज सम्बोधन बन कर रह जायेगा।

इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व ज़रा संस्कृति के अर्थ को पुनः स्पष्ट  कर लें। प्रो. श्यामचरण दुबे के अनुसार “मनुष्य को संस्कृति निर्माण की क्षमता प्रकृति से हासिल हुई परंतु संस्कृति का निर्माता वह स्वयं है।” “मनुष्य को प्रकृति प्रदत भौतिक स्वरूप के अतिरिक्त मेधावी मस्तिष्क – तर्क द्वारा कार्य-करण सम्बन्ध स्थापित करने की शक्ति और बाह्य शक्ति के द्वारा विचारों तथा क्रियाओं को स्थापित करने की योग्यता प्राप्‍त है।” परन्तु इतनी सारी क्षमताओं के बावजूद भी मनुष्य, संस्कृति का निर्माता नहीं बन सकता था और विकास के क्रम में अपने निकटतम प्राणी चिम्पांजी तक ही सिमट कर रह जाता यदि उसमें एक और क्षमता विकसित न होती वह है बोल कर अभिव्यक्त करने की। “मनुष्य के पास भाषा की शक्ति है। भाषा के माध्यम से मानवीय विचार और प्रक्रियाएँ विस्तार पाने के अतिरिक्त भौतिक परम्परा का रूप ग्रहण कर स्‍थायि‍त्‍व ग्रहण करती  है।”

मनुष्य के ज्ञान-क्रम में जो भौतिक-सामाजिक परम्‍परा एक बार आ जाती है वह पीढ़ी दर पीढ़ी बोली-भाषा के माध्यम से परिवर्धित एवं परिवर्तित होते हुए परिष्कृत होते हुए निरंतर बनी रहती है। आज जिस सिलवट लोंढे/बट्टे का इस्तेमाल हम अपनी रसोई में करते हैं वह आदि मानव द्वारा निर्मित पत्थर के औजार का ही परिष्कृत रूप है।


इतिहास के झरोखों से

यूरोप में मध्य काल के अंध युग के बाद जब पुनर्जागरण काल का उदय हुआ।  तब आम जन ने प्रोटेस्टेंट मूवमेंट के द्वारा न केवल चर्च, अपितु सत्ता के अन्य स्‍तम्‍भों पर भी अपनी दावेदारी ठोकी। जब आम जन ने ज्ञान की सत्ता पर अपनी दावेदारी ठोकी तब ही आम जन की भाषा शिक्षा का माध्यम बन पायी। स्वयं इंग्लेंड में कुलियों की भाषा समझी जाने वाली अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम बनी। इससे पूर्व लेटिन एवं थोड़ी बहुत फ्रेंच भाषा में ही सम्भ्रांत तबके को शिक्षा-दिक्षा होती थी। इंग्लैड़ के ग्रामर स्कूल लैटिन भाषा सिखाने का ही काम करते थे। इस प्रकार, पुनर्जागरण से पूर्व इंग्लैंड में शिक्षा का माध्यम लैटिन एवं परिष्कृत फ्रेंच भाषा ही थी। लोगों की मांग पर जब बाईबल का जन-भाषाओं में अनुवाद किया गया, तभी साक्षरता का प्रसार हुआ। उस साक्षरता के फलस्वरूप ज्ञान-विज्ञान का प्रसार लोगों में संभव हो पाया। यह ज्ञान-विज्ञान का प्रसार ही था जिसने सिर्फ़ इंग्लैड ही नहीं, अपितु संपूर्ण यूरोप में पुनर्जागरण काल को उदित किया।

जाने माने अंग्रेजी और हिन्दुस्तानी के विद्वान प्रो. रघुबीर सहाय उर्फ फ़िराक गोरखपुरी की मानें तो अंग्रेजी का प्रथम प्रोफ़ेसर भारत में ही नियुक्त हुआ था, ना की इंग्लेंड में। इंग्लैंड़ में तो यह जन-भाषा थी। वहाँ तो इसे सिखाने का सवाल ही नहीं उठता। वहाँ अंग्रेजी भाषा को सिखाने के लिए शिक्षक नियुक्त नहीं होते थे। वहाँ साहित्य का विश्लेषण करने हेतु विश्वविद्यालय में शिक्षक होते थे/हैं। अतः इंग्लेंड में जनतंत्र के विकास के साथ-साथ सम्भ्रांत तबके की भाषा समझी जाने वाली लेटिन के स्थान पर जनता की भाषा अंग्रेजी स्थापित हुई। वहीं भारत में औपनिवेशीकरण की वजह से 1835 में मैकाले मिनट के साथ थोपी गई। अंग्रेजी ने जन-भाषाओं में शिक्षा की सम्भावना को ही नकार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि‍ पहले के सम्भ्रांत तबकों, जिनके शिक्षण की भाषा संस्कृत अथवा फारसी थी, उनका वर्चस्व ही बना रहा। क्योकि उन्हें एक परिष्‍कृत भाषा से दूसरे भाषा का ही गमन करना था। आम जन के लिए शिक्षा के दरवाजे खुल कर भी बंद रहे। इस बात का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता के समय व्यस्क साक्षरता दर महज 18% से भी कम थी। जब साक्षरता की स्थिति ही इतनी दयनीय है तो अंग्रेजी राज में शिक्षा के लाख दावों के बावजूद भी औपचारिक शिक्षा की क्या स्थिति रही होगी, इस का अनुमान भी सहज ही लगाया जा सकता है। प्रो. प्रोमेश आचार्य के अनुसार, आम जन की अंग्रेजी के प्रति अभिरूचि स्वतंत्रता पूर्व काल में कम थी। वह स्वतंत्रता उपरांत काल में तेजी से बढ़ी है। स्वतंत्रता पूर्व काल में आम जन की अंग्रेजी के प्रति अभिरूचि न होने का कारण स्वतंत्रता उपरांत काल से उम्मीद थी। उन्हें उम्‍मीद थी कि स्वतंत्रता के बाद परिस्थितियाँ बदलेंगी। पर ऐसा हो न सका।” प्रो. प्रोमेश आचार्य द्वारा बंगाल में किये गए अध्ययन के अनुसार, अंग्रेजी की तरफ़ लोगों का झुकाव तब बढ़ा, जब आम जन के लिए सरकारी नौकरियों के दवाजे खुल तो गये, पर उन नौकरियों के लिए ली जाने वाली परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता भी जोड़ दी गयी। इन बिन्दुओं को पुनः भाषा एवं संस्कृति को समझने हेतु किये कुछ विशेष अध्ययन एवं मातृभाषा का अर्थ माँ-बाप की भाषा नहीं होता है वाले अध्याय में उठाते हुए आगे का विश्लेषण करेंगे। पर जरा अभी संस्कृति की संकल्पना पर फिर से विचार कर लें।

संस्कृति

आम तौर पर जब हम संस्कृति की बात करते हैं तो हमारे ज़हन में गीत-संगीत, कला-नृत्य, करतब-स्वांग आदि का ख्याल आता है। पर यह तो महज़ संस्कृति का सतही आवरण मात्र है। संस्कृति की अवधारणा इससें कही अधिक व्यापक है। मानव वैज्ञानिक श्‍यामचरण दुबे (मानव और संस्कृति पेज17,193) के अनुसार, आम तौर पर कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। परन्तु प्राणी जगत में केवल वही एक समाजिक प्राणी नहीं है। मानव को, जो अन्य प्राणियों से अलग करने वाली एक मात्र विशेषता है। वह है, उसकी ‘संस्कृति-निर्माण करने की क्षमता’ है।यह क्षमता मनुष्य के अतिरिक्त किसी और प्राणी में नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से संस्कृति की व्याख्या, ‘पर्यावरण के मानव निर्मित भाग’ के रूप में करेगें। इस प्रकार “संस्कृति जैविकीय संभावनाओं और सामाजिक आवश्यकताओं द्वारा जनित मानव का आविष्कार है। मनुष्य, संस्कृति में  जन्म लेता है, संस्कृति सहित  जन्म नहीं लेता। इसके आगे श्‍यामचरण दुबे एक बहुत बड़े भ्रम को खारिज़ करते हुए कहते हैं कि “रंग, रूप आदि की भाँति, संस्कृति प्रजनन के माध्‍यम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं होती। अर्थात् मनुष्य में संस्कृति निर्माण की क्षमता होती है पर संस्कृति कोई जैविक गुण नहीं है। यह जिंस के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित नहीं होती।” इस प्रकार स्पष्ट होता है कि “संस्कृति, जैविक संभावनाओं तथा सामाजिक आवश्यकताओं द्वारा जनित मानव का अविष्कार है।” 

लेखक यहाँ स्पष्ट करेगा कि मनुष्य की हर पीढ़ी को और हर पीढ़ी के हर सदस्य को प्राथमिक समाजीकरण के दौरान संस्कृति को आत्मसात करना पड़ता है। यह आत्मसातीकरण की प्रक्रिया, न केवल प्राथमिक समाजीकरण अपितु समाजीकरण की द्वितीयक अवस्था में भी जारी रहती है। जब वह बाह्य परिवेश से सक्रिय संवाद करता है। इस दौरान न केवल वह सीखता है, अपितु सिखाता भी है। मौखिक एवं अमौखिक रूप में संवाद निरंतर चलता रहता है। अतः संस्कृति तालाब के समान स्थिर नहीं है, अपितु यह तो निरंतर बहने वाली नदी है। हाँ, गति तेज और धीमी होती रहती है पर बहाव निरंतर बना रहता है। अतः यह तो एक चलमान जीवन है। समय एवं सभ्यता में आये परिवर्तन के साथ इसमें भी परिवर्तन आता रहता है। यदि संस्कृति के संदर्भ में कुछ स्थाई है तो वह है - उसकी निरंतरता। संस्कृति अनादिकाल से चलायमान है। संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते हुए समाजिक संघर्षों के साथ परिवर्तित एवं परिवर्धित होती रहती है। 

 


 आइए, इन्टरनेट से साभार प्राप्त चित्रों की सहायता से उसके चेतन एवं अवचेतन तत्वों के संबंधों को समझें।



 चित्र संख्या 3.1  , 3 .2 , 3.3 & 3.4  3.5 के चित्रों के स्रोत (साभार) http://johngerberworldedu/2010/11/16/talking-sustainability-change/, http://wwwdiplowebcom/Understanding-culture-and-managinghtml,


यदि हम ऊपर दिए चित्र 3.1 से 3.5 तक देखें तो हम पाते हैं कि सामाजिक व्यवहार की तह में उस समाज के मूल्य होते हैं। और मूल्यों का निर्माण एक गहन सामाजिक अन्तःक्रिया का परिणाम होता है। ये मूल्य, सामाजिक घटना-क्रम का विश्लेषण कर कुछ मान्यताओं/धारणाओं को पैदा करते हैं। अनुभवों की पुनरावृत्ति सामाजिक विश्वास को पैदा करती है। घटनाओं का अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव सामाजिक मानदंडों को पैदा करता है। समाज के अन्दर जितने भी व्यवहार, विचार, प्रवृतियाँ  देखने को मिलती हैं वे इन चार तत्वों से ही नियंत्रित होती हैं। घटनाएँ जो ऊपरी सतह पर घट रही होती हैं, वे मूलतः समाज के अन्दर निहित मूल्यों का ही परिणाम होती हैं। सतह पर घटने वाली घटनाओं के प्रभाव को तब तक नहीं समझा जा सकता, जब तक नीचे के हिस्से के मूल्य, विश्वास और मान्यताओं को न समझ न लिया जाए। इसी प्रकार सतह के अनुभव, एक व्यक्ति को नहीं, अपितु समस्त समाज को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार समाजिक मूल्यों का निर्माण होता है।

समाज की एक इकाई दूसरी इकाई से प्रभावित भी होती है और प्रभावित भी करती है। हर इकाई अपने निर्णय को लेने के लिए स्वतंत्र भी है। लेकिन वह अपने निर्णय लेने के लिए दूसरी इकाइयों के अनुभवों पर निर्भर भी है। इकाईयाँ ना केवल दूसरी इकाइयों का अवलोकन करती हैं, अपितु परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको समायोजित भी करती हैं।

हर समाज में पदानुक्रम का एक ढाँचा होता है, कुछ घोषित एवं अघोषित नियम भी होते हैं। ये नियम कुछ ठोस विश्वासों एवं मान्यताओं पर आधारित होते हैं। एक समयावधि में अग्रलिखित के आधार पर चलते रहने पर कुछ पगडंडी रूपी परम्पराएँ उभर कर आ जाती हैं। ये परम्पराएँ भी पगडंडियों की भाँति पक्की नहीं होतीं, पर जब तक लोग चलते रहते हैं, तब तक बनी जरूर रहती हैं। चूँकि लोग चलते रहते हैं इसलिए पगडंडी रूपी परम्पराएँ बनी भी रहती हैं और पगडंडी रूपी परम्पराएँ बनी हुई हैं इसलिए लोगों को चलना भी आसान है। बस उठो और चल दो। एक रूप से पगडंडी रूपी परम्पराएँ ही हैबिटैट का निर्माण करती हैं। हैबिटैट, अर्थात् सामाजिक सहजता। जब तक पगडंडी रूपी परम्पराओं से जुड़ी कोई मंज़िल होगी, लोग चलते ही रहेंगे। मंज़िल के ना रहने पर यह धीरे-धीरे यह विलुप्त हो जायेगी। पर पूर्णतः समाप्त नहीं हो सकती। यही समाज में परम्पराओं की कहानी भी है। समाज की स्थापित इकाइयाँ नए रास्तों के प्रयोग से घबराती हैं। परिणाम यह होता है कि लोग पगडंडियों पर आँखें मूँद कर निकल निकल पड़ते हैं। बिना सोचे, बिना विचारे बस चल पड़ते हैं।

भाषा, संस्कृति, राजनीति और मार्क्सवाद

मार्क्सवादी दृष्टीकोण के अनुसार उत्पादन प्रणाली ही सभी तरह के समाजिक ताने-बने का आधार है। उत्पादन प्रणाली उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों का प्रतिफल है। उत्पादन प्रणाली ही समाजिक वर्गों की रचना करती है। सारी लड़ाई उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण हासिल करने के लिए है। परिवार, सम्प्रदाय, औपचारिक शिक्षा का समस्त ढ़ाचा उत्पादन प्रणाली का ही प्रतिफल है। वर्गीय हितों की रक्षा ही राजनीति है। राजव्यवस्था का सम्पूर्ण ढ़ाचा वर्गीय हितों को बचाए रखने के लिए है। चूँकि पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन प्रणाली पर बुर्जुआ वर्ग का नियन्त्रण होता है। राज्य की राजनीतिक संस्थाओं का काम बुर्जुआ वर्ग के आर्थिक हीतों की रक्षा करना है। अतः समस्त समाजिक व्यवस्था का ताना-बना उसी के अनुरूप रचा जाता है। मीडिया, विश्वविद्यालय, स्कूल आदि संस्थाओं का ढ़ाचा उसी तंत्र को बनाए रखने के लिए है। यह बात जितनी पूँजीवादी व्यवस्था के बारे में सत्य है उससे कम किसी और व्यवस्था के बारे में नहीं। महाभारत के एकलव्य की कहानी किसी से छुपी नहीं है। जब द्रोणाचार्य (शिक्षा व्यवस्था) ने देखा कि  इस बालक की प्रतिभा है और राजपुत्रों में कोई भी उसके सामने टिक नहीं सकता है। तो द्रोणाचार्य रूपी शिक्षाव्यवस्था ने राजव्यवस्था के संरक्षण के लिए आदिवासी एकलव्य का अंगूठा उतरवा लिया। एक असमान व्यवस्था के अंदर विशेष माध्यम वाली शिक्षा व्यवस्था कि संरचना गैरबराबरी और असमानता को बनाएं रखने के लिए है।

औपनिवेशिक व्यवस्था से उबरे इस देश का सर्वहारा वर्ग, एलिट वर्ग की अंग्रेजीयत की औपनिवेशिक मानसिकता के वर्चस्व से पीड़ित है। इस देश की 90 % आबादी अंग्रेजी से पूर्णतः अनभिज्ञ है। 6 % किसी प्रकार कामचलाऊ अंग्रेजी सीख जाते हैं। 3-4 % ही ठीक-ठाक अंग्रेजी का प्रयोग कर पाते है। देश की 1 % जनसंख्या ही अंग्रेजी भाषा पर नियंत्रण रखती है और वह ही इस देश की राजसत्ता और पूँजीसत्ता पर नियंत्रण रखती है। एक देश जहाँ पर प्रकृत रूप से अंग्रेजी नहीं बोली जाती है। वहाँ पर अंग्रेजी भाषा भर नहीं है, यह कृत्रिम भाषा (अंग्रेजी) सरकारी भाषा के रूप में राजसत्ता को अंग्रेजीदां बुर्जवा वर्ग तक ही समेटे रखने का साधन है। और गैर बराबरी की अधिसंरचना को बनाए रखने के लिए है। कृत्रिम भाषा (अंग्रेजी) को थोपना समाज को स्थाई रूप से मानसिक-पंगू बनाना है। अतः ऐसे देश में अंग्रेजी अधिसंरचना को बनाएं रखने वाले हथियार के रूप के रूप में राजसत्ता और पूँजीसत्ता के आधार को मजबूत करने का साधन मात्र है। अंग्रेजी के माध्यम से ही शोषण की चक्की और गैर-बराबरी की मशीनरी को चलाया जाता है। भ्रष्टाचार की उमदा फसल को पैदा करने में भी अंग्रेजी का हाथ है।

 सन्दर्भ सूची-  









http://johngerberworldedu/2010/11/16/talking-sustainability-change/,

http://wwwdiplowebcom/Understanding-culture-and-managinghtml

अग्निहोत्री, र। (2011 ) भारत में अंग्रेजी की समस्या। भोपाल : एकलव्य

किरण, च। (2006)। शिक्षा के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य। नई दिल्ली : हिंदी माध्यम कार्यान्वयन संस्था

NCERT(2005 )। राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा 2005। New Delhi : NCERT

NCERT(2010)। समझ का माध्यम। New Delhi : NCERT

NCERT(2007)। शिक्षा का लक्ष्य। नई दिल्ली : NCERT

दुबे, श। (1993 )। मानव और संस्कृति। नई दिल्ली : राजकमल ।

http://johngerberworldedu/2010/11/16/talking-sustainability-change/, 

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नोट :- 

अध्याय - 2

औपचारिक, अनौपचारिक शिक्षा एवं संस्कृति

XXXXX

 

नोट :- 

इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज ‘अंग्रेजी राज’ : ‘भ्रष्टाचार’, ‘शोषण’, ‘गैरबराबरी’ की व्यवस्था पर ‘साँस्कृतिक ठप्पापुस्तक से

© सर्वाधिकार  - अश्विनी  कुमार ‘सुकरात’ (लेखक एवं शोधकर्ता)

प्रकाशन एवं मुद्रक :  अश्विनी  कुमार ‘सुकरात’, लेखक एवं शोधकर्ता द्वारा स्व प्रकाशित एवं मुद्रित

संस्करण : प्रथम ड्राफ्ट संस्करण (मार्च, 2014),   ISBN – 978-93-5156-897-1 (PB)

द्वितीय  संस्करण (जनवरी, 2015),     ISBN – 978-93-5212-211-0(HB)

978-93-5212-210-3 (PB), 978-93-5212-212-7(e-book), 978-93-5212-213-4 (CD)

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